Monday, March 9, 2020

सच्चा सुख

 

सच्चा सुख

संसार में हर व्यक्ति सुख चाहता है। हर व्यक्ति चाहता है कि वह अपना जीवन सुखी रहकर व्यतीत करें। उस सुख को प्राप्त करने के लिए वह तरह तरह के साधन भी अपनाता है। सुखी रहने के लिए तरह तरह के सामानों को एकत्रित करता है। अपने लिए रोटी, कपडा और मकान इत्यादि जरुरी चीजों की अच्छी तरीके से पूर्ति करता है। पर विचार करने वाली बात जो है वो ये है कि इंसान ने सुख प्राप्त करने के साधन तो बहुत इकट्ठे कर लिए हैं लेकिन सुख अभी भी नहीं है। कहने को तो इंसान कहता है कि मैं बड़ा खुश हूँ, लेकिन यह तो वह भी जानता है कि वह खुशी आंतरिक हैं या सिर्फ बाहरी है, जो केवल और केवल दूसरों को दिखाने के लिए है। सही मायने में इंसान नासमझी की तरफ जा रहा है। उसके लिए खुश रहने का तात्पर्य सिर्फ इस बात से है कि उनके पास दूसरों से ज्यादा समान हो, दूसरों से बड़ा मकान हो, बड़ी गाड़ी हो, दूसरों से ज्यादा इज्जत मान हो। इंसान का सुख इसी तक सीमित रह गया है कि वह हर मार्ग पर दूसरों से आगे अपने आप को देखना चाहता है। वही उसके लिए सच्चा सुख और खुशी की बात है जब वह दूसरों को धोखा देता है, दूसरों की निंदा करता है, किसी दूसरों की हानि होते हुए देखता है, उन्हीं चीजों में वह अपना सुख मानता है। किसी संत के वचन भी है कि इंसान अपने दुख से इतना दुखी नहीं होता बल्कि दूसरों के सुख से ज्यादा दुखी होता है। आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि हमें खुशी मिलती ही तब है जब हम दूसरों को परेशान देखते हैं या अपनी जीभा से दूसरों के बारे में चर्चा करते हैं किसी की निंदा करते हैं। सही मायनों में हमारी खुशी पाने की तलाश ही गलत जगह पर हो रही है।

झूठे आडंबरों में हम सुख को ढूंढ रहे हैं और ऐसा करते करते ही हमारा जीवन भी 1 दिन समाप्त हो जाएगा। जिस सच्चे और वास्तविक सुख को पाने के लिए इस संसार में आए थे उससे अब भी वंचित हैं और सदा के लिए वंचित ही रह जाएंगे। सही मायने में वास्तविक सुख है आत्मिक सुख। जिस तरह हम शरीर को तीन समय भोजन खिलाते हैं, शरीर को गर्मी लगे तो पंखे कूलर की हवा खिलाते हैं, ठीक उसी तरह हमारी जीवात्मा भी खुराक चाहती है, उसे भी ठंडक चाहिए, शांति चाहिए, लेकिन उसे वह शांति किसी की बुराइ करने में, निंदा करने में, संसारी पदार्थों में दूसरों को नीचा दिखाने में नहीं अपितु किसी का भला करने में परमात्मा की भक्ति में प्राप्त होती है। हम यह अनुभव भी करते हैं कि जब कभी बड़े ही उत्तम सौभाग्य से हमारा किसी तीर्थ स्थान पर जाना होता है या कभी भगवान की महिमा का गुणवाद सुनने को मिलता है, तभी हमें आत्मिक सुख का अनुभव होता है। सही मायनों में सुख है ही इसमें। भगवान की भक्ति के लिए ही जीवात्मा को मनुष्य का तन मिलता है, लेकिन सांसारिक ऐश्वर्य में उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रहता। पूरा जीवन झूठे सुख को ही जीव अपनी खुशी समझ कर व्यर्थ जीवन गंवा देता है। ये मेरा खुद का अनुभव है जिस सुख को आप संसार में तलाश रहे हों, चीजों से ढूंढ रहे हों, जगत की मोह ममता में ढूंढ रहे हो उसमें कभी नहीं मिलने वाला। आप एक बार एकाग्रचित होकर भगवान के चरणों को निहारें, उसके सुंदर रूप का ध्यान अपने हृदय में धारण करे, आपको ऐसा सुख अनुभव होगा जिसकी तुलना आप किसी वस्तु से नहीं कर पाओगे। पर शर्त सिर्फ इतनी है की हमारा मन उस समय साफ होना चाहिए। जितना मन साफ होगा, जीतने शुद्ध हमारे भाव होंगे, छल कपट से रहित होंगे, उतना ही सुख हम प्राप्त करेंगे। कहते हैं मुख में नमक हो और रसगुल्ला खाया जाए तो रसगुल्ले का स्वाद नहीं आ सकता। इसी प्रकार आनंद तो परमात्मा के नाम में ऐसा अद्भुत है कि जीव के मुख से नाम निकलते ही उसका रोम रोम खिल जाये प्रंतु बात सिर्फ यहीं अटकती है कि वह नाम कितने विश्वास और साफ मन से लिया जा रहा है। मन तो माया की चपेट में आया हुआ है। सनसार की वस्तुओं में सगे संबंधियों में मोह में फंसा हुआ है और मुख्य से बेशक राम राम जपता रहे कुछ प्राप्त नहीं कर पाएगा। इसलिए अगर मन में सच्चा सुख प्राप्त करने की इच्छा है तो जीव नियम अनुसार परमात्मा की भक्ति के लिए समय निकालें। जैसे शरीर के सुखों के बारे में सोचता है जो कि शरीर के रहने तक सीमित है, वैसे ही हम आत्मा जो हमारी असली पहचान है उसके बारे में भी सोचें। उस वस्तु को प्राप्त करने की कोशिश करें, जिससे आत्मा को खुशी मिलती है, जो आत्मा की खुराक है तभी जीव सही मायनों में वह सच्चा सुख प्राप्त कर पाएगा जिसे पाने के लिए वह निरंतर प्रयास करता रहता है। वह सुख यहाँ भी खुशी देगा और परलोक में भी खुशी देगा। धन्यवाद।

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