मन का परिवर्तन
सेवक यह विचार
करें कि मेरे मन में सेवा से भक्ति से कुछ परिवर्तन आ रहा है
या नहीं| सतगुरु की भक्ति
अंदर की वस्तु है और उसे अंतरमन लगाकर ही किया जा सकता है| अगर हम भक्ति करने के लिए
बैठे हैं और हमारा मन सांसारिक विषय वासनाओं में लगा है तो
सेवक को आंतरिक लाभ कभी प्राप्त नहीं हो सकता|
परम संत श्री
कबीर दास जी के वचन हैं-
मन दिया कहुँ और
ही, तन साधुन के संग
|
कहैं कबीर कोरी
गजी, कैसे लागै रंग
अर्थात जब सेवक
का मन तो कहीं और लगा है बेशक शरीर संतों के पास है तो सेवक को भक्ति का रंग
कभी नहीं चढ़ सकता| जो वास्तव में भक्ति लेना चाहते हैं
अपने सतगुरु से तो ऐसे सेवक को अपना मन अपने सतगुरु को सौंपना पड़ेगा|
हमारे श्री गुरु
महाराज श्री तृतीय पादशाही जी अपने वचनों में फरमाया करते थे
कि एक हाथ से मन दो, दूसरे हाथ में भक्ति लो| जब तक सेवक मन की मति से
चलेगा वह सांसारिक उलझनों में ही उलझा रहेगा और मन में परिवर्तन कभी नहीं होगा|
गुरुवाणी मैं
वचन आता है-
मन बेचे सत्गुरू
के पास , तिस सेवक के
कारज रास
जो सेवक अपने
सतगुरु की पूर्ण प्रसन्नता पाना चाहता है तो अपना मन अपने सतगुरु के
हवाले कर दे| जब मन सतगुरु का हो गया तो फिर काल का पहरा सेवक के जीवन
से खत्म हो जाएगा| फिर तो सद्गुरु खुद अपने सेवक की पल पल संभाल करते हैं| लेकिन ऐसा कोई विरला ही
सेवक होगा जो मन की मति त्यागता है और अपने सतगुरु की आज्ञा अनुसार
चलता है|
कहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार; यह पांचो मन के साथी हैं जो
मन के साथ मिलकर जीव को रात दिन माया में भ्रमा रहे हैं| सब कुछ सामने होते हुए भी
अर्थात रात दिन सत्संग सुनने के बाद, पोथी पढ़ने के बाद भी इंसान
के मन में परिवर्तन नहीं आता| अब विचार करो कितना बड़ा नुकसान है सेवक का| एक जौहरी होने के बाद भी
अगर जोहरी हीरे की पहचान नहीं कर पाए तो फिर जीवन तो घाटे में चला जाएगा| ऐसे ही रात दिन संतों का
संग भी किया लेकिन मन में ना तो अहंकार खत्म हुआ ना ही मन
में नम्रता आई| फिर तो यही हुआ कि चले थे कहीं और पहुंच कहीं और गए| फिर से शून्य से यात्रा
शुरू करनी पड़ेगी| श्री शांति वचन भंडार में वचन आता है कि कोई
व्यक्ति धीरे धीरे एक पहाड़ पर चढ़ता है चोटी तक पहुंचने के लिए रास्ते में अगर वह गिर
जाए तो एक तो यह हो सकता है कि हड्डी टूट गई पहाड़ चढ़ने से ही मना कर दिया या फिर
यह हो सकता है कि ठीक होने में 6 महीने लगे उसके बाद दोबारा से वह व्यक्ति चढ़ाई शुरू
कर सकेगा | ऐसे ही सेवक का जीवन है | सेवक भी भक्ति मार्ग में ऐसे ही धीरे-धीरे आगे
बढ़ता है लेकिन मन और माया के आधीन होकर यह सीधा नीचे आ जाता है| फिर दोबारा से सेवक को
भक्ति की पढ़ाई शुरू करनी पड़ती है| सेवक को यह विचार रहे कि मेरी मनमती की वजह से
मेरी भक्ति को नुकसान तो नहीं हो रहा| कहते हैं कि जैसे बॉर्डर पर खड़ा सैनिक बड़ा सतर्क
रहता है कि कोई शत्रु आकर मेरे देश पर attack ना कर दे| ठीक इसी तरह से भक्त भी सतर्क
रहे कि कहीं माया के चक्कर में फस कर और अपने मन
के बहकावे में आकर मेरी भक्ति का नुकसान ना हो जाए| सेवक अपने मन को अहंकार, निंदा, ईर्षा, क्रोध, लोभ वह अन्य विकारों से सदा
बचा कर रखे| सेवक के मन में तो सदैव यही भाव रहे कि मेरे
सतगुरु ही सब कुछ करने वाले हैं| जहां मन में विचार आया कि सब कुछ मैं ही
कर रहा हूं तो जहां मैं है वहां सतगुरु कभी हो ही नहीं सकते| जब तक सेवक अपने मन को अपने
सतगुरु को पूर्णता नहीं सौंपेगा तब तक मन सेवक को सांसारिक माया में भ्रमाता
रहेगा | गुरु मति का
मतलब है कि गुरु के वचनों पर चलना| सतगुरु हमें सदैव शिक्षा
देते हैं कि हमें संसार में ऐसे रहना है जैसे कीचड़ में कमल रहता है| कार्य व्यवहार करते हुए
हमें जग में न्यारा रहना है और सदा सत्य के पथ पर चलना है| सेवक का काम है निस्वार्थ
भाव से परमार्थ करना| नम्रता तो सेवक का अनमोल गहना है | सतगुरु का सेवक तो ऐसा हो
जो सबके लिए प्रेरणादायक हो | उसकी सेवा उसके विचारों को देख हर कोई कहे कि कौन
इसके सतगुरु हैं जिनसे यह शिक्षा ले रहा है| सेवक की मिसाल तो दुनिया देती है| खुद श्री गुरु महाराज जी
सेवक की मसाले अपने श्री वचनों में फरमाते हैं| जब सेवक अपने मन को अपने
सतगुरु को समर्पित कर देगा तो सतगुरु का प्रिय बन जाएगा|
एक बार श्री
गुरु महाराज की पंचम पादशाही जी से किसी ने प्रश्न पूछा कि science
हर चीज को
प्रमाणित करती है| क्या इस भक्ति को प्रमाणित किया जा
सकता है| तब श्री गुरु
महाराज जी ने वचन फरमाया कि देखो science जो है वह बाहरी चीज और
बाहरी प्रयोग से ही उसे प्रमाणित किया जा सकता है लेकिन भक्ति जो है यह अंतर मन से
की जाने वाली वस्तु है| जब सेवक अंतर मन से भक्ति करता है तो उसकी सेवा भक्ति ऐसे
प्रमाणित होती है कि पूरा संसार ऐसी भक्ति की महिमा गाता है| इन श्री वचनों से हमें
शिक्षा मिलती है कि यदि हम भक्ति में अपने मन को सम्मिलित नहीं करते तो इसका कोई भी लाभ
नहीं है| अब सेवक को कैसे
पता चले की भक्ति में मेरा मन लगता है या नहीं| यदि हम भक्ति कर रहे हैं और
हमारे मन में कुछ परिवर्तन नहीं आ रहा तो मन पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार का अभी भी पूरा जोर
है| मन ईर्षा में
लगा है, मन में बिल्कुल भी नम्रता नहीं है, मन अपने को बड़ा एवं दूसरे
को छोटा समझ रहा है, मन हर पल क्रोधित रहता है; तो फिर सेवक के लिए यह बड़ी
आपत्तिजनक हालत है| सेवक अभी भक्ति में तो जुड़ा है लेकिन वास्तविक
आनंद से कोसो दूर है| वह सेवक भक्ति सतगुरु की नहीं अपितु माया की कर रहा है| जो सेवक गुरु मति की जगह
मनमती अनुसार आचरण करते हैं तो माया का गुलाम बनकर अपने जीवन के
कीमती समय को व्यर्थ गवा देते हैं |
माया के गुलाम
तो सभी बनना चाहते हैं लेकिन संसार में सतगुरु का गुलाम कोई
नहीं बनना चाहता| अपने आप को सेवक सभी कहलाना चाहते हैं लेकिन सेवक धर्म
क्या है भूलकर बस मन की चाल चल रहे हैं| इससे सेवक के समय का भी नुकसान है और फिर
मनमती की चाल भी जीव चलता है दुख परेशानियां अलग आ जाती हैं| यह कितना बड़ा नुकसान है| इसलिए सेवक सदा यह ध्यान
रखे कि मेरा जीवन सतगुरु के प्रवचनों के अ नुसार चल रहा है या
नहीं| एक सतगुरु ही
जीव के सच्चे हितेषी हैं जो हमें वास्तविक आनंद व हमारी आत्मा की
खुराक हमें देना चाहते हैं और हमें माया के बंधनों से पूर्ण रूप से आज़ाद करवाना चाहते
हैं|
हमारे श्री गुरु
महाराज जी श्री द्वितीय पादशाही जी फरमाया करते थे कि मन और माया कभी अपने
काम में गफलत नहीं करते। इनका काम है जीव को भक्ति से दूर करना। इसी
काम में यह लगे रहते हैं| अगर हम अपनी बुद्धि से इनसे जीतना चाहें तो हम बहुत कमजोर हैं
हम कभी नहीं जीत पाएंगे| सेवक अपने मन को सतगुरु के वचनों पर चलकर ही काबू में ला
सकता है | सेवक सदैव अपने मन पर नज़र रखे कि मेरे मन में भक्ति का रंग चढ़ रहा है या माया
का रंग चढ़ रहा है| जब सेवक अपने स्वामी के चरणों में यही अरदास करे कि मेरा मन सदैव
भक्ति में लगा रहे तभी सेवक के मन में सच्चा परिवर्तन आ पाएगा|
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