Monday, March 9, 2020

गुरु क्यों आवश्यक है?

 

गुरु क्यों आवश्यक है?

सद्ग्रंथों के वचन है कि
        शुक सनकादिक, ध्रुव नारदादिक गुरु उपदेश ते अमरणम।
        ऋषि  मुनि  जन  प्रकृत जग में लै दीक्षा प्रभु सुमिरणम।

शुकदेव जी को गर्भयोगीश्वर कहा जाता है। जब वह माता के गर्भ में ही थे तो उन्हें ज्ञान प्राप्त था परन्तु बिना गुरु के वे भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हुये। जब उन्होने महाराज जनक जी को गुरु धारण किया तो वह मोक्ष के अधिकारी हुये।

गर्भ योगीश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव।

कहें  कबीर वैकुण्ठ से फेर दिया शुकदेव।।

जनक विदेही गुरु किया लागा हरि की सेव।

कहें कबीर वैकुण्ठ में फेर मिला शुकदेव।।

सनक, सनन्दन, सनत कुमार, सनातन और देवर्षि नारद जी ब्राहृा जी के मानस पुत्र कहलाते हैं। गुरुदेव की कृपा से उनसे नाम दीक्षा लेकर सुमिरण किया तभी वे अमरपद को प्राप्त हुये। धनी धर्म दास जी परम सन्त श्री कबीर साहिब जी के शिष्य हुये हैं, वे गुरु महिमा में वर्णन करते हैं।

अखिल विवुध जग में अधिकारी। व्यास वशिष्ठ महान आचारी।

गौतम कपिल कणाद पातञ्जलि।जौमिनी बाल्मीकि चरणन बलि।

ये सब गुरु की शरणहिं आये। तासे जग में श्रेष्ठ कहाये।।

विश्व में जितने भी ऋषि मुनि, राजर्षि, महर्षि, ब्राहृर्षि, देवर्षि हुयें हैं उदाहरण देते हैं गौतम, कपिल, कणाद, पातञ्जलि, वेदव्यास, वसिष्ठ, बाल्मीकि आदि ये सब शास्त्रों के रचियता, ब्राहृनिष्ठ उच्चकोटि के महापुरुष हुये हैं सभी गुरु की शरण में आये उनकी सेवा करके उनकी प्रसन्नता व कृपा के पात्र बने तब ही जग में श्रेष्ठ और पूज्यनीय हुये।

    कहते है कि महर्षि वेदव्यास जी के सुपुत्र श्री शुकदेव मुनि पाँच वर्ष की अवस्था में घर बार त्याग कर भजन करने के लिये वन को चले गये थे और पूरे सोलह वर्ष तक एकान्त सेवन और भजन किया लेकिन मन को शान्ति न आई| तब पिता वेदव्यास जी के पास आकर अपने मन का सब वृतान्त सुनाया| श्री वेद व्यास जी पूर्ण ज्ञानवान, महान तत्वक्ता गुरु थे| शुकदेव जी की कहानी सुन कर जान गये कि इन्होने भजन तो किया परन्तु गुरु धारण नहीं किया और गुरु के बिना सफलता कहाँ? अब यदि मैं इनको अपनी शरण में लेकर गुरु दीक्षा देता हूँ तो पिता पुत्र के नाते जो गुरु के चरणों में शिष्य का श्रद्धा विश्वास होना चाहिये, वह नहीं बन सकता| जनक जी पूर्ण महापुरुष है| उनको गुरु धारण करने से इनका कल्याण होगा| यह सोचकर श्री शुकदेव जी को समझा बुझा कर राजा जनक जी के पास भेज दिया| पिता जी की आज्ञा पाकर श्री शुकदेव जी राजा जनक जी को गुरु धारण करने के लिए जा रहे थे| चलते भी जाते और मन में सोचते भी जाते थे कि मुझे इतना त्याग वैराग्य धारण करने पर भी मन को शान्ति नहीं मिली तो जिनके चरणों में मैं जा रहा हूँ वे तो मुझ से अधिक  गुणवान अधिक वैराग्य और त्याग का स्वरुप होंगे| मन के अन्दर इसी प्रकार के संकल्प उठाते और सोचते हुये श्री जनक महाराज के दरबार में पहुँचे| क्या देखते है- श्री जनक जी स्वर्ण के सिंघासन पर विराजमान है सुंदर-सुंदर रूप वाली स्त्रियाँ और बन्दीगण हाथ बांधे सिंघासन के आस पास खड़े हुये हुक्म की प्रतीक्षा कर रहे है तथा सिंघासन के पास नाना प्रकार के सुख सम्पत्ति के सामान भरे पड़े है| इस दृश्य को देखते ही श्री शुकदेव जी के मन में सन्देह हुआ कि यह कैसे गुरु है जिनके इर्द गिर्द सब माया ही माया है| जनक जी महाराज नेत्र मूंदे हुऐ थे| शुकदेव जी को दरबार में आता देखकर उनके दिल की जान गये कि इनके मन में भ्रम उत्पन्न हो गया है| उस समय शुकदेव जी का भ्रम निवारण करने के लिये और उनके संकल्प की दृढ़ता को परखने के लिये कई युक्तियों से परीक्षा ली| अन्त में जनक जी ने मिथिलापुरी को आग लगाने की माया रची| इतने में उस समय द्वार का सन्तरी घबरा कर भाग आया और कहने लगा- महाराज| सारी मिथिलापुरी को आग लग गई है और अब आग राजदरबार के अन्दर तक आ पहुँची है| उस के बुझाने का शीघ्र उपाय होना चाहिये| सन्तरी की बात को सुन कर राजा जनक जी ने तो कोई उत्तर नहीं दिया परन्तु शुकदेव जी के मन में संकल्प उठा कि द्वार के पास तो मेरा पोथी-पत्तर और कपड़े, खड़ावा आदि सामान का बस्ता पड़ा है, कहीं वह न आग को भेंट हो जाए| शुकदेव जी आग से अपना बस्ता बचाने के लिए द्वार की तरफ जाने के लिये सोच ही रहे थे कि इतने में राजा जनक जी ने शुकदेव जी को एक शलोक पढ़ कर सुनाया जिस का अर्थ यह है- “हे शुकदेव| मेरा जो आत्मिक धन है, वह अनन्त व अपार है वह कभी नाश नहीं हो सकता| यदि सारी मिथिला पुरी जल कर राख हो जाये तो भी मेरे रूहानी धन की विंचितमात्र भी हानि नहीं हो सकती|” फिर कहा- हे शुकदेव| जो कुछ आप मुझे समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूँ, मैं और हूँ| मुझे देखने के लिये तुझको आँख की जरुरत है| जब वह आँख खुल जायेगी, तब तू मेरे वास्तविक स्वरुप को देख सकेगा| उत्तम अधिकारी के लिए गुरु का एक वचन ही काफी होता है| चूँकि श्री शुकदेव परमार्थ के परम अधिकारी थे, गुरु के वचनों का इशारा पाते ही समझ गये अर्थात श्री जनक महाराज जी के वचन सुनते ही शुकदेव जी के मन का भ्रम दूर हो गया और चरणों पर गिर कर क्षमा माँगी| महापुरुषों ने अपनी दया का हाथ श्री शुकदेव जी के सिर पर रखा और परमार्थ की दीक्षा दी| तत्पश्चात गुरु की आज्ञा पाकर श्री शुकदेव जी पिता वेदव्यास जी के पास आये| वे मन में अति प्रसन्न थे| पिता ने पूछा- बेटा| गुरु कैसे मिले? शुकदेव जी कुछ उत्तर न दे सके| पिता ने फिर पूछा- बेटा| क्या गुरु चाँद जैसे उज्जवल मिले? तो शुकदेव जी बोले- नहीं पिता जी| चाँद से अधिक उज्जवल, क्योंकि चाँद में दाग है परन्तु मेरे गुरु में दाग नहीं है| फिर पूछा- हे बेटा| क्या तेरा गुरु सूर्य जैसा है? तब शुकदेव जी बोले- नहीं, पिता जी| सूर्य से बहुत विशेष है क्योंकि सूर्य में तपश है और मेरे गुरु में तपश नहीं है| श्री वेदव्यास जी ने फिर पूछा- अच्छा बेटा| कुछ तो बताओ- गुरु कैसे मिले? तब शुकदेव जी ने बड़ी प्रसन्नता से कहा- पिता जी| गुरु मिले पर उन के साथ किसी वस्तु का प्रमाण नहीं दिया जा सकता, वे अपना प्रमाण आप है| वे परमदयाल स्वरूप है जो शिष्य की करनी की तरफ ध्यान नहीं देते कि इसमें कितने अवगुण हैं बल्कि अपनी दयालुता की ओर देखते हैं| वे शरणागतपाल हैं और शरण आये की रक्षा करते हैं, उनके गुण तो अनन्त और अपार हैं| 

    राजा जनक ने शुकदेव जी की अज्ञानता की मैल धोने के लिये कितनी रचना की! भाँति-भांति से बाज़ारों को सजवाया। उन्हें दूध का भरा कटोरा देकर कहा कि जनकपुरी का चक्र लगाकर आओ, परन्तु खबरदार! इस कटोरे में से एक बूँद भी गिरने पाये वरना सैनिक जो तुम्हारे साथ होंगे तुम्हारा सिर काट देंगे। पूरी की पूरी सुरति हाथ पर रखे दूध के कटोरे में जमा कर बाज़ार के बीचों-बीच चक्र लगाकर जब शुकदेव जी वापिस आये, तो जनक जी ने पूछा-शुकदेव! बाज़ार में क्या देखा? शुकदेव जी ने उत्तर दिया-भगवन्! मैने तो कुछ भी नहीं देखा, क्योंकि मेरी पूरी सुरति कटोरे में एकाग्र हो चुकी थी। तब राजा जनक ने उन्हें समझा-बुझाकर फरमाया कि जिनकी सुरति इसी प्रकार शब्द में जुड़ी रहती है, वे संसार में रहकर भी न्यारे रहते हैं। तुम भी इसी प्रकार न्यारे एवं निर्लेप रहा करो। सत्पुरुष जनक जी महाराज के सत्संग के वचनों को सुनकर शुकदेव जी का मोह-अज्ञान संशय-भ्रम सब नष्ट हो गये। उन्होंने श्रद्धा-भावना से उनकी शरण ली और नाम दान पाकर कृतकृत्य हो गये।

    ऐसे ही नारद जी के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वे अपने तप के प्रभाव से कहीं भी आ जा सकते है| एक बार नारद जी जब बैकुण्ठ गए तो भगवान विष्णु ने उन्हें बैठने के लिए कहा| कुछ देर वार्तालाप करने के बाद जब नारद जी चले गए तो विष्णु जी ने अपने सेवादारों से उस आसन को साफ़ करने के लिए कहा जहाँ नारद जी बैठे थे| सेवादार आज्ञा पालन में लग गए| इधर नारद जी को कोई बात याद आ गई वह अभी दूर नहीं गए थे, अत: पुन: वापिस लौट आए| जब उन्होंने सेवादारो को वह स्थान साफ़ करते देखा जहाँ वे पहले बैठे थे तो वह हैरान हो गए| नारद जी ने भगवान विष्णु जी से पूछा कि  भगवन यहाँ तो कुछ देर पहले मैं ही बैठा था फिर इसे साफ़ क्यों कराया जा रहा है? "क्या मैं अपवित्र हूँ| भगवान बोले "नारद जी| यह ठीक है कि आप ज्ञानी, ध्यानी और वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता है| परन्तु आपने अभी गुरु की शरण ग्रहण नहीं की| इसलिए हम आपको पवित्र नहीं मानते| यही कारण है कि जब आप यहाँ आकर बैठते हैं तो आपके जाने के बाद हम वह स्थान अपवित्र समझकर स्वच्छ एवं पवित्र करवाते है| भगवान विष्णु जी के वचन सुनकर नारद जी ने कहा- "भगवन| यह सत्य है कि मैंने किसी को गुरु धारण नहीं किया, परन्तु तप साधना तो की है और उस तप साधना द्वारा आपको प्राप्त करने में भी सफल हुआ हूँ| आपको प्राप्त करके क्या मैं पवित्र नहीं हो गया?" भगवान विष्णु बोले- "नारद जी| यह ठीक है कि आप अपनी तप साधना के द्वारा बैकुण्ठ में आने के अधिकारी हो गए हैं, परन्तु आपका यह कहना सरासर गलत है कि आप मुझे प्राप्त कर चुके हैं| आपकी साधना मनमति की साधना है| इसलिए आपके अन्दर अभी अहंता एवं अहंकार के आसन जमा है| इस अहंता अहंकार के परदे ने अभी भी आपको मुझसे अलग रखा है| अहंता-अहंकार के इस परदे को दूर करने के लिए ही गुरु की शरण में जाना जरुरी है| नारद जी ने कहा- "यदि गुरु की शरण में जाना इतना आवश्यक है तो फिर मैं आपको ही गुरु धारण कर लेता हूँ| भगवान बोले- "मैं किसी भी प्रकार से आपका गुरु नहीं हो सकता, क्योंकि मैं निराकार हूँ और आप साकार है| मनुष्य का गुरु जब भी होगा, साकार ही होगा| साकार रूप गुरु से ही मनुष्य को भक्ति परमार्थ का लाभ प्राप्त हो सकता है| गुरु ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और गुरु ही महेश है और गुरु ही पारब्रहम परमेश्वर है| नारद जी ने निवेदन किया- "भगवान| ज्ञानदृष्टि तो मुझे पहले से ही प्राप्त है, फिर इसके लिए गुरु धारण करने की क्या आवश्यकता है| भगवान बोले जिसे आप ज्ञान कहते और समझते है, वह तो वास्तव में अज्ञान है जिसने आपके अन्दर अहंता और अहंकार भर दिया है| आप इस समय जो कुछ भी कह रहे है, अज्ञान के वश होकर कह रहे हैं| यदि आपके ज्ञान चक्षु वास्तव में ही खुले होते तो फिर आप वाद-विवाद में कदापि ना पड़ते| प्रत्युत मेरी, जिसकी आप उपासना करते हैं, उसकी बात तत्काल मान लेते, भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर नारद जी की आँखे खुल गई| उन्होंने निवेदन किया- मैं किसको अपना गुरु बनाऊँ? भगवान बोले- "आप कल प्रात: काल गंगा जी के किनारे चले जाना और जो मनुष्य सबसे पहले मिले, उसे ही अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा ले लेन| इसी में आपकी भलाई है|" भगवान से आज्ञा लेकर नारद जी विदा हुए और मृत्यु लोक में आये| उनके मन मस्तिक में सारी रात भगवान विष्णु की बातें ही गूँजती रही| प्रात: होते ही वे गंगा जी की ओर चल पड़े| गंगा जी के निकट पहुँचकर क्या देखते है कि एक धीवर (मछुआ) कंधे पर जाल रखे सामने से आ रहा है| उसे देखते ही नारद जी ने अपने माथे पर हाथ मारा और मुँह से बड़बड़ाते हुए कहा- यह कैसा अपशगुन हुआ| यह अनपढ़, गवांर मछुआरा मुझ जैसे ज्ञानी का गुरु कैसे हो सकता है| यह सोचकर नारद जी वापिस जाने लगे| तब पीछे से आवाज आई कि यह नारद भी कैसा अज्ञानी है| भगवान के समझाने पर आया था गुरु धारण करने, परन्तु इसमें तो अहंता अहंकार कूट-कूट कर भरा हुआ है| कानों में ये शब्द सुनते ही नारद जी रूक गए और कुछ समय उन शब्दों पर विचार किया फिर लौटकर उसके चरणों में गिर पड़े और अपनी गलती की क्षमा माँगी और बोले कि आपको कैसे पता चला कि भगवान के कहने पर मैं यहाँ गुरु धारण के लिए आया हूँ| मछुए ने हँसते हुए कहा- "तुम्हें इस बात से क्या लेना-देना है| तुम गुरु धारण करने आये हो या मुझसे सवाल जवाब करने? "नारद जी ने क्षमा माँगी और निवेदन किया कि गुरुदेव मुझे अपना शिष्य बना लीजिये| धीवर ने गुरु-दीक्षा देकर नारद जी को विदा किया| नारद जी वहाँ से सीधे बैकुण्ठधाम पहुँचे| उन्हें देखकर भगवान विष्णु बोले- "नारद जी, गुरु मिले?" नारद जी ने उत्तर दिया- "भगवन| गुरु मिले तो सही पर...........|" भगवान ने उनकी बात बीच में ही काटते हुए कहा- "नारद जी| 'पर' शब्द कहने का अर्थ है कि आपने मेरे कहने से गुरु धारण तो किया, परन्तु आपकी अपने गुरु पर श्रद्धा एवं निष्ठा नहीं है| श्रद्धारहित व संशय युक्त मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है| इसलिए भक्ति-परमार्थ की दृष्टि से आपका सब किया कराया व्यर्थ हो गया| अब तो आपको चौरासी अवश्य भुगतनी पड़ेगी| भगवान विष्णु के ये वचन सुनकर नारद जी के होश उड़ गए| उन्होंने निवेदन किया- "प्रभु| गुरु के प्रति अश्रद्धा प्रकट कर मैंने बहुत बड़ी भूल की है जिसका दण्ड मुझे चौरासी भुगतनी पड़ेगी| कृपा करके मुझे इससे बचने का उपाय बताइये| भगवान बोले कि चौरासी से बचाने वाले तो संसार में केवल-केवल गुरुदेव ही होते है इसलिए यदि चौरासी से बचना चाहते हो तो फिर गुरु की शरण में जाओ| नारद जी फिर मृत्युलोक में आये और गंगा जी के किनारे गुरुदेव को देखने लगे| कुछ देर बाद उन्हें गुरुदेव के दर्शन हुए| नारद जी तुरंत उनके चरणों में जा गिरे और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और विष्णु जी के वचन दोहरा दिए| गुरुदेव ने हँसते हुए फ़रमाया- "नारद तुम फिर विष्णु लोक में जाओ और भगवान विष्णु से कहो कि जो चौरासी मैंने भोगनी है उसका नक्शा बना कर दिखा दें तो तुम उस पर लोट-पोट हो जाना| जब भगवान ऐसा करने का कारण पूछे तो उत्तर देना कि मैं चौरासी भोग रहा हूँ| क्योंकि वह चौरासी भी आपकी बनाई हुई है और यह भी आप ने ही बनाई है|" नारद जी ने वैसा ही किया| तब भगवान बोले- "नारद जी| आपने देखा कि गुरु ने कितनी सुगमता से आपको चौरासी भोगने से बचा लिया|" अब की बार जब नारद जी गुरुदेव के चरणों में उपस्थित हुए तो उनके दिल की अवस्था बदल चुकी थी| अब उनके दिल में गुरुदेव के प्रति पूर्ण श्रद्धा थी| तब गुरुदेव ने नारद जी को भक्ति के गहन रहस्य विस्तार से समझाये| अभिप्राय यह है कि भक्तिमार्ग पर चलने वाले जिज्ञासु पुरुष के लिए गुरु की शरण ग्रहण करना परमावश्यक है| श्रद्धा, निष्ठा एवं विश्वास के साथ गुरु के वचनों पर आचरण करके ही मनुष्य इस मार्ग पर सफलता प्राप्त कर सकता है और अपना जीवन धन्य बना सकता है|

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