Monday, March 23, 2020

निष्काम कर्म

 

निष्काम कर्म

 

सेवक के लिए सेवा करते समय उसके मन का भाव बहुत महत्वपूर्ण होता है। सेवक सेवा करते समय अगर यह भाव रहता है कि सेवा से लोगों में मेरी ख्याति हो लोग मुझे जाने, लोगों को यह पता चले कि मैं कितनी सेवा करता हूँ । तो यह भाव सेवक को उसके स्वामी से दूर करेगा। यदि सेवक मन में यह भाव रखे कि मेरी सेवा से मेरे स्वामी प्रसन्न हो और वह अपने द्वारा की गई सेवा को गुप्त रखें तो यह भाव प्रभु को सबसे अधिक प्रिय होता है ।

 

श्री रामचरित मानस में एक बहुत ही सुंदर प्रसंग आता है कि श्री राम जी का सुंदर दरबार लगा हुआ है और वहाँ श्री रामजी के सभी सेवक हनुमान जी, नल-नील, अंगद, जामवंत, विभीषण, लक्ष्मण, शत्रुघ्न आदि सभी मौजूद हैं ।सभी श्री राम जी व सीता जी के पावन श्री दर्शनों का लाभ उठा रहे हैं। हनुमान जी ने देखा कि भरत जी कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं जब हनुमान जी ने भरत जी को दरबार में चारों तरफ़ ढूंढा तो वह उन्हें श्री राम जी के सिंहासन के पीछे छत्र पकड़ कर खड़े दिखाई दिए। तो हनुमान जी ने कहा कि भरत जी आप पीछे क्या कर रहे हैं। आप दरबार में नज़र ही नहीं आ रहे आगे आइये आपके बिना दरबार अधूरा सा लग रहा है। तो भरत जी कहने लगे कि हनुमान जी मेरी सेवा छत्र पकड़ने की है इसलिए मैं यहाँ खड़ा हूँ। हनुमान जी बोले की भरत जी यह सेवा तो आप आगे आ कर भी कर सकते हैं। तब भरत जी ने जो बात कही वह उन सभी सेवकों के लिए प्रेरणादायक है जो सेवा करके अपने स्वामी की प्रसन्ता प्राप्त करना चाहते हैं। भरत जी ने कहा कि हनुमान जी जो सेवा दिख जाती है फिर वो सेवा नहीं कहलाती।  कितने प्रेरणादायक शब्द हैं ये हर सेवक के मन में यह भावना होनी चाहिए कि वो ऐसी सेवा करें कि किसी को पता भी न चले और सेवा भी हो जाए लेकिन हमारे मन में यह भावना होती है कि हम जो सेवा कर रहे हैं वह सभी को पता चले। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि उसके पास कितना धन है और उसकी संपत्ति कितनी है तो वह यह कभी नहीं बतायेगा। हर व्यक्ति अपनी धन संपत्ति को गुप्त रखना चाहता है ठीक उसी प्रकार मालिक की भक्ति मालिक की सेवा को भी गुप्त रखने की आवश्यकता है। जितना हम इसे दूसरों को बताते हैं उतना ही हम अपना ही नुक़सान करते हैं। जब सेवक के मन में भरत जी जैसे उच्च विचार होते हैं तो भगवान भी ऐसे सेवक की बढ़ाई किए बिना नहीं रहते।

 

अब हनुमान जी प्रभु श्री राम जी से कहने लगे कि “प्रभु आप भरत जी से कहें कि वह आगे आ जाए आगे आ के सेवा करें।”तब श्री राम प्रभु  जो त्रिलोकी के मालिक हैं वे क्या कहते हैं कि “ हनुमान जी भरत जी जहाँ खड़े हैं उन्हें वहाँ ही रहने दो। भरत जी संत हैं और इन्होंने जो ये छत्र छाया हम पर की हुई है उससे हमे बहुत अच्छा लग रहा है और हमे ऐसा प्रतीत हो रहा की हम संत की छत्र छाया में बैठे हैं।”जब सेवक के भाव इतने उच्च है तो भगवान भी अपने सेवक का मान बढ़ाने में पीछे नहीं रहते हैं। वह तो अपने सेवक के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं।

 

सन् 1944 की बात है कुछ संगत श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तृतीय पादशाही जी पावन श्री दर्शन के लिए आई | उनमे एक भक्त जो आफ़िसर था, श्री दर्शन के लिए पंजाब से आया  | उस भक्त ने महात्मा सद्गुरू सेवानन्द जी को कहा कि मै अपने साथ नौकर नही ला सका | एक नौकर का प्रबन्ध मुझे कर देवें | महात्मा सद्गुरुदेव सेवानन्द जी ने कहा कि नौकरो  का तो यहाँ कोई प्रबन्ध नही है | हम अपने शरणागतो में से एक लड़का आपकी सेवा में लगा देते हैं जो आपकी हर प्रकार की सेवा करेगा  | आपको किसी प्रकार का कष्ट न होगा | यह बात होने पर महात्मा जी ने एक लड़का उस आफ़िसर की सेवा में लगा दिया | वह भक्त आठ दिन श्री आनन्दपुर में रहा और वह लड़का उस भक्त का सारा काम करता रहा  | जब वह भक्त जाने लगा तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में उपस्थित होकर काफी लोगो के सामने उसने विनय की कि भगवन ! हम घर में नौकरों से काम लेते हैं, जितनी हमे उनसे सिरदर्दी करनी पड़ती है उतना नौकर काम नही करते | वे वेतन भी लेते हैं फिर भी सिरदर्दी बहुत करनी पड़ती है तब कहीं जाकर उनसे काम करवाते हैं  | मगर यहाँ जिस लड़के ने आठ दिन मेरे पास काम किया हैं, केवल पहले दिन मैंने उसे समझा दिया कि मेरे यह काम इस समय करना है | उसके बाद प्रत्येक वस्तु मुझे तैयार मिलती रही  | कमरा साफ़ इस समय करना है, चाय – पानी पिलाना, बर्तन साफ़ करना, लंगर से भोजन लाना और जो काम था किसी काम के लिए मुझे दोबारा नही कहना पड़ा और विशेष बात यह है कि इन बच्चो के ह्रदय में किसी प्रकार का लोभ नही है | बिना स्वार्थ के काम करना ऐसा नजारा अपने जीवन में मुझे पहली बार देखने को मिला है | चाहे मै आफ़िसर हूँ, मुझे घर में व दफ्तर में भी नौकरों से काम करवाना पड़ता है, परन्तु पूरा वेतन लेते हुए भी ठीक से काम नही करते और यहाँ जब एक बच्चे के अन्दर काम करने की उमंग है तो बड़ो के विचार कितने उच्च होंगें  | गीता में मैंने कई बार पढ़ा है कि भगवान श्री कृष्णचन्द जी महाराज ने अर्जुन को निष्काम कर्म करने का उपदेश दिया है –मै दिल में सोचता था कि इस उपदेश पर आचरण कैसे होता होगा | अब प्रत्यक्ष मैंने अपनी आँखों से देखा कि निष्काम कर्म करने का साक्षात् प्रमाण यहाँ श्री आनन्दपुर दरबार में मिलता है | यहां सब आदमी बिना किसी सकामता के अपनी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं | ऐसी ऊँची शिक्षा जो आपने यहां के निवासियों को दी है, उससे सबके जीवन धन्य हो गये है | और भी मैंने इन आठ दिनों में जो बात देखी हैं सब प्रशंसनीय हैं | सब लोग अपने कर्तव्य का पालन बहुत ही अच्छी तरह से करते हैं | एक विशेष बात यह है कि बच्चे से बूढ़े तक कोई भी निष्क्रिया (निकम्मा) नहीं रहता | किसी के कहे बिना सब अपने अपने काम पर पहुँच जाते हैं और सबके मन में शान्ति है |

 

सतगुरु हमेशा अपने सेवा को निष्काम कर्म की प्रेरणा ही देते है क्योंकि वे जानते है कि सेवक का कल्याण सिर्फ और सिर्फ निष्काम कर्म करने से ही होगा| सेवक के मन में हमेशा यह ध्यान रहना चाहिये कि मेरे किसी कर्म में मेरी सेवा में कोई स्वार्थ तो नहीं है अगर है तो ऐसी कमी को दूर करने की सेवक कोशिश जरुर करे|

 

 

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