सच्चे सेवक की पहचान उसके नम्रता भाव से होती है। सेवक के मन में जितनी नम्रता होगी उतना ही वह सेवा में आगे बढ़ता जाएगा। नम्रता का ही एक बड़ा सुंदर उदाहरण
रामचरितमानस में आता है। कहते हैं कि जब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका में गए
तो वहाँ हनुमान
जी ने देखा कि लंका में चारों तरफ राक्षस भ्रमण कर रहे हैं जिनका स्वभाव और कर्म दोनों
ही तामसी वृत्ति हैं । कुदरती श्री हनुमान जी की नज़र विभीषण जी के भवन पर पड़ी। विभीषण
जी के घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगा है और विभीषण जी पाठ पूजा में लगे है। यह देखकर श्री
हनुमान जी के मन में यह विचार आया कि इस राक्षस नगरी में यह साधु पुरुष कौन है जो राक्षसों के बीच रहते हुए भी भगवान की भक्ति से जुड़े
हुए हैं। कहते हैं कि भगवान का भक्त के मन में सदैव यही भाव रहता है कि उसे भगवान के प्रेमी को
ही मिले जिनके साथ वे भगवद् चर्चा कर सके | वचन भी
है कि-
प्रेमी ढूँढ़त मैं फिरूँ, प्रेमी मिले न कोय।
प्रेमी को प्रेमी मिले, सब
विष अमृत होय॥
अर्थात जब भगवान के प्रेमी मिलते हैं और भगवान की महिमा का गुणगान करते
हैं तो उसे समय विष भी अमृत
के समान हो जाता है। श्री हनुमान जी ने विभीषण जी को मिलने की जिज्ञासा से पंडित का रूप बना लिया और जाकर
विभीषण जी से मिले| जब विभीषण
जी और हनुमान जी का आपस में एक दूसरे से परिचय हो गया तब हनुमान जी विभीषण जी से पूछने लगे,
"आप यहां राक्षस नगरी में रहते कैसे हैं। यहाँ तो चारों तरफ दुष्कर्म करने वाले पुरुष ही दिखाई दे
रहे हैं। " तब विभीषण
जी ने कहा कि-
सुनहु
पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ
मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥
अर्थात हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं
यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच में बेचारी जीभ। हे तात! मुझे अनाथ जानकर
सूर्यकुल के नाथ श्री रामचंद्रजी क्या कभी मुझ पर कृपा करेंगे?
फिर आगे फरमाते हैं कि
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं
संता॥
कहने लगे कि मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और
न ही मेरे मन में
श्री रामचंद्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है, परंतु हे हनुमान्! अब मुझे विश्वास
हो गया कि श्री राम जी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते
।
यहां विभीषण जी का नम्रता भरा भाव देखो
कि सब प्रकार से भगवान की भक्ति करते
हुए भी अपने आप को कितना तुच्छ जान रहे हैं। क्या फरमाते
हैं कि "तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा", अर्थात भगवान मुझे कभी अनाथ जान कर मुझ पर कृपा
करेंगे? कहते हैं कि एक भक्त के
लिए सबसे सुंदर भाव यही है कि वह अपने आप को सदैव भगवान का भिखारी समझे। जैसे यहाँ विभीषण जी अपने आप को अनाथ कह रहे हैं और अपने आप
को तुच्छ प्रतीत कर रहे हैं। फिर आगे कहते हैं "तामस तनु कछु साधन नाहीं",
अर्थात मेरा तो तामसी शरीर है, कोई पाठ पूजा भी नहीं करता। प्रभु की भक्ति करने के
बाद भी मन में विभीषण के क्या भाव है कि मैं कुछ करता ही नहीं। ना ही मेरी कुछ भक्ति
है जबकि हम थोड़ी सी भी भक्ति करके अपने आपको कितना
बड़ा भक्त समझने लगते है। हमारा मन अहंकार से भर जाता है। विभीषण
जी के मन में जो यह नम्रता पूर्ण भाव है
यही हम सबके लिए प्रेरणा दायक है ।
हनुमान जी ने जब यह बात विभीषण जी से सुनी तो हनुमान जी जो नम्रता के सागर है, जिनके मन में श्री
राम जी के चरणों में प्रीति है और जिनका अटूट विश्वास है कि जो कुछ करने वाले हैं तो मेरे राम हैं,
कहने लगे कि
कहहु कवन मैं परम
कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥
अर्थात हनुमान जी कहने लगे कि, भला
कहिए, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? (जाति का) चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ,
प्रातःकाल जो हम लोगों (बंदरों) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले। हम सब जानते हैं कि श्री हनुमान जी भगवान
शंकर का अवतार हैं| और भगवान शिव जी और श्री हरि में कोई भेद नहीं है अर्थात हनुमान
जी भी श्री हरि का ही रूप हैं । स्वयं परब्रह्म परमेश्वर होते हुए भी श्री हनुमान जी
के मन में कितना सुंदर भाव है कितनी नम्रता है जिनको शब्दों के रूप में बताना नामुमकिन है । खुद परमात्मा स्वरुप होते हुए
भी श्री हनुमान जी के मन में कितना सुंदर भाव है। क्या कह रहे हैं कि विभीषण जी
मुझे देखिए ना मैं वानर, कोई साधन नहीं, कोई भक्त नहीं, स्वभाव का चंचल हूं। कोई प्रात: काल हमारा नाम भी ले ले तो
उसे आहार न मिले। कितनी नम्रता है श्री हनुमान जी के वचनों में|
फिर आगे श्री हनुमान जी क्या फरमाते हैं,
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्हीं कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
अर्थात हे सखा! सुनिए कि मैं तो ऐसा अधम
हूँ, पर श्री रामचंद्रजी ने तो
मुझ पर कृपा की है। क्या फिर आप पर वे कृपा नहीं करेंगे। भगवान की महिमा का गुणगान
करते- करते दोनों की आंखों
में आंसू आ गए । यह है
सच्ची नम्रता का भाव। सेवक वही जो सेवा करते हुए भक्ति करते हुए भी अपने आप को तुच्छ जाने।
मन में यही भाव रखें कि सब मेरे सतगुरु ही करने वाले हैं। उनकी कृपा से ही सब काम हो
रहे हैं। नम्रता ही सेवक का सबसे बड़ा गहना है जो कि प्रत्येक सेवक में होना अति
आवश्यक है।
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