सेवकों का प्रेम भी मतवाला
होता है अपने तन मन की सुधि को भुला कर सेवक अपने स्वामी सतगुरु से सच्चा प्रेम
रखता है| एक बार श्री दूसरी पाद्शाही जी विश्राम कर रहे थे और भक्त सहिबराम जी पंखा लेकर सेवा कर रहे थे | रात्रि
के बारह बजे श्री गुरु महाराज जी ने करवट बदली और फरमाया -“पानी ले आओ, प्यास
लगी है” भक्त जी एकदम पानी लेने के लिए चले गये | ज्यों ही
पानी लेकर लौटे तो श्री गुरु महाराज जी पुनः विश्राम में हो गये | भक्त जी
के बाएं हाथ में पानी का गिलास एवं दायें हाथ में पंखा करना आरम्भ कर दिया | प्रातः
चार बजे श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया –“पानी लाये हो, हमने
पहले कहा था |” शीघ्र ही गिलास बढ़ाकर विनय की –“श्री गुरु महाराज जी! ले
आया हूँ |” भक्त जी रात भर खड़े रहे किन्तु थकने का नाम भी नहीं लिया और
न ही आराम का ख्याल पैदा किया |
उनकी पलकों ने भी मानो बंद
न होने की शपथ ले ली थी |
वे इसमें भी इतने प्रसन्न
हुए मानो उन्हें जीवन का अनमोल खजाना मिल गया हो जिसे वे रात्रि भर दामन में भरते
रहे | वे केवल एक टक श्री मुखारविंद की ओर निहारते रहे | श्री
दर्शन की अनूठी मस्ती के प्याले पीते रहे |
एक बार लक्की मरवत में
श्री दूसरी पाद्शाही जी बरामदे में विराजमान थे | प्रियतम
को देखते ही प्रेमी यदि मतवाला हो जाता है तो प्रियतम भी ऐसे बंधन में बंध जाता है
| जिससे छूटना उनके लिए कठिन हो जाता है | रात्रि
के 9,10 बजे का समय था | भक्त
साहिबराम जी को सम्मुख देखकर स्वामी जी ने प्रवचन वृष्टि आरम्भ कर दी | उस समय
नीचे चींटियो के बिल थे |
प्रेम मग्न स्वामी जी को
इस बात का ध्यान न रहा और न ही प्रेम चात्रिक साहिबराम जी को इसका पता चला | रात्रि
के 2 बज गए | सभी सेवक इस प्रतीक्षा में थे कि कब प्रवचन समाप्त हो और
स्वामी जी भोग लगाएं और विश्राम करे | किन्तु
यह स्वामी जी और सेवक एक दूसरे की प्रेम –प्यास मिटाने में संलग्न थे | उन्हें
और किसी की चिंता ही नहीं थी |
सुबह के 5 बज गए सत्संग
अभी भी जारी था |
प्रेम विभोर हुए साहिबराम
जी को चीटियों के काटने का पता तक नहीं चला | और मग्न
होकर सुनते रहे |
केवल प्रेम का नाम लेना ही
सरल है परन्तु उस पर चलना कठिन है | प्रेम का कितना बड़ा उदाहरन भक्त साहिबराम जी के जीवन से
हमे मिलता है |
एक बार श्री दूसरी
पाद्शाही जी ने भक्त साहिबराम जी तथा भक्त हेमराज जी को नगर कालाबाग में जाने की
आज्ञा दी क्योंकि वहाँ एक सत्संगी ने श्री महाराज जी से स्थान बनाने की प्रार्थना
की हुई थी | श्री महाराज जी ने दोनों को स्थान की जमीन पसंद करने और
दूसरे कार्यो का प्रबंध करने भेजा | साथ ही
वचन फरमाए -‘जो जमीन आप दोनों पसंद करो, वही ठीक
होगी |’ यह आज्ञा पाकर दोनों भक्त लक्की रेलवे स्टेशन की ओर चले | उस समय
भक्त साहिबराम जी का एकलौता पुत्र घर में बहुत बीमार था, परन्तु
भक्त साहिबराम जी अपनी प्रेमभक्ति में हर समय लीन रहते थे | घर के
कामो में उन्हें कोई रूचि नहीं थी | वे जो भी
कमाते श्री चरणों में भेंट कर देते थे | फिर वह
महाराज जी से लेकर निर्वाह करते थे | श्री
महाराज जी की भी इन पर अपार दया दृष्टि थी | स्टेशन
पहुँचने पर इनको घर से यह संदेशा मिला कि लड़के का स्वास्थ्य बहुत ख़राब हो चुका है | यह बात
सुनकर भी भक्त जी ने सोचा कि श्री महाराज जी की सेवा और आज्ञा में कोई फर्क न आने
पाए | उन्होंने निर्मोही होकर यह जवाब दिया – ‘जो प्रभु इच्छा
होगी, वही ठीक है |’ अभी गाड़ी आने वाली ही थी कि दूसरे व्यक्ति ने आकर यह बताया
कि ‘आपके लड़के का स्वर्गवास हो गया है, इसलिए आप
घर चलो |’ यह दुखद समाचार पाकर भी भक्त जी की गुरु निष्ठा में कोई कमी
न आने पायी | उन्होंने उत्तर दिया -‘मैं घर जाकर क्या करूँगा ? बाकि सब
लोग तो घर में ही है |
प्रभु इच्छा से जो हुआ, ठीक ही
हुआ | जिसकी वस्तु थी वहीं चली गई | मैं इस
पवित्र दरबार का चाकर हूँ |
उस मालिक को सबकी फ़िक्र है
| मैं क्यों चिंता करूं ?’ यह शब्द कहकर भक्त जी गाड़ी में सवार होकर कालाबाग़ चले गए और
बड़े प्रेम से श्री महाराज जी की आज्ञानुसार सेवा कर आये | लौट के
जब वह श्री महाराज जी के चरणों में पहुँचे तो श्री महाराज जी ने अपने मुखारविंद से
उनके सच्चे प्रेम और निष्काम भक्ति की सराहना की और सर्व संगत से यह फरमाया –‘भक्त
साहिबराम जी का नश्वर संसार में बिल्कुल मोह नहीं है और यह हमारे सच्चे लाल है |’
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