कहते हैं कि जो सतगुरु के सेवक हैं और जो सेवा कर अपने सतगुरु
को रिझाना चाहते हैं वह अपने मन में यह विचार जरूर करें कि वह सेवा मान बढ़ाई के लिए
करते हैं या अपने आप को मिटाने के लिए। अगर तो सेवक के मन में यह भाव है कि सेवा से
मुझे जगत प्रसिद्धि मिले हर कोई मुझे जाने मेरी मान बढ़ाई करे तो यह सेवा तो स्वार्थ
भाव से हुई। क्यूंकि इसमें इंसान सेवा के बदले अपना फायदा देख रहा है। याद रखे कि स्वार्थ
भाव से की गई सेवा से हम दुनिया को तो खुश कर सकते हैं लेकिन अपने सतगुरु को सेवक तभी खुश कर सकता
है जब वह निस्वार्थ भाव से सेवा करेगा। जब सेवा के पीछे अपनी हस्ती को मिटाने का भाव
होगा तब जाकर हमारी सेवा निःस्वार्थ कहलाएगी।
इतिहास में ऐसे कई बड़े भक्त हुए हैं जिन्हे उनकी सेवा के कारण दुनिया
उन्हें याद करती है। उनमें से एक भक्त श्री हनुमान जी। जिन्होंने
सेवा करके अपने प्रभु को रिझा लिया। कहते भी हैं कि
सेवा ऐसी कीजिए, जैसे की हनुमान ।
रोम रोम में बस गए, प्यारे प्रभु श्री राम ।।
हनुमान जी ने ऐसी सेवा की कि जब तक ये दुनिया रहेगी तब
तक हनुमान जी की महिमा के गुणगान करती रहेगी। हनुमान जी का जीवन हम सब के लिए प्रेरणादायक
है। हर सेवक जो सेवा करके अपने सतगुरु को रिझाना चाहता है उसे हनुमान जी के जीवन से
प्रेरणा लेनी चाहिए कि कैसे हनुमान जी श्री
राम जी की सेवा में हर समय तत्पर रहते है| इतनी सेवा करने के बावजूद भी अपने आप को तुच्छ जानते है और हमेशा यही वचन
फ़रमाते है कि जो कुछ करने वाले हैं वह मेरे प्रभु श्री राम जी हैं।
श्री रामचरित मानस में एक बहुत ही सुंदर प्रसंग
अता है कि जब हनुमान जी माता सीता की खोज करके लंका से वापिस आए और प्रभु श्रीराम जी
से मिले तब प्रभु श्री राम जी हनुमान जी से कहते हैं कि “वाह हनुमान वाह
आज तो आपने ऐसा काम किया है कि तीनो लोकों में तुम्हारी जय- जय कार हो रही है। बताओ
इतनी बड़ी लंका को कैसे जलाया?” कहते हैं कि
भगवान का यह स्वभाव है कि वह अपने भक्तों को बढ़ाई देते हैं। कार्य स्वयं करते हैं लेकिन मान अपने भक्त का बढ़ाते हैं। अब यह सब
सुनकर श्री हनुमान जी प्रभु श्री राम जी के चरणों में नतमस्तक हुए और जोर- जोर से रोने लगे मुख से एक ही बात कह रहे हैं
कि प्रभु रक्षा करो - प्रभु रक्षा करो। भगवान बढ़ाई देना चाह रहे हैं लेकिन हनुमान
जी बढ़ाई लेना ही नहीं चाहते। हम सब विचार करें कि क्या ऐसे भाव हमारे मन में रहते
हैं। हमे तो कोई जरा सी बढ़ाई देदे तो हम फूले नहीं समाते। हमारा मन अंदर ही अन्दर
प्रसन्न होता है। यह अहंकार की स्थिति है जब हम अपनी प्रशंसा सुन उत्साहित और प्रसन्न
होते हैं। जबकि सेवक के मन में यह भावना होनी चाहिए कि मैंने तो कुछ किया ही नहीं जो
कुछ भी किया है वह मेरे सतगुरु ने ही किया है। ऐसी भावना जिसके मन में होती है सतगुरु
सदा उसके साथ होते हैं।
यहाँ हनुमान जी बार- बार यही बोल रहे हैं कि रक्षा करो और नेत्रों
से जल बह रहा है ऐसी स्थिति देख कर श्री राम जी ने दया भरा हाथ हनुमान जी के सिर पर
रखा और फ़रमाने लगे कि हनुमान रोते क्यों हो तो हनुमान जी कहने लगे कि प्रभु मुझे बढ़ाई
नहीं चाहिए जो कुछ भी किया है वह आपने ही किया है मैंने तो कुछ भी नहीं किया, फिर मुझे मान
क्यों दे रहे हो। मैंने सारे काम आपका नाम लेकर ही किये हैं। यह श्री राम नाम का ही
प्रताप है जिससे सारे काम हुए हैं। भगवान श्रीराम जी ने जब देखा कि हनुमान जी के नेत्रों
में आँसू हैं और नम्रता भरा भाव है सब कुछ करते हुए भी सारा श्रेय अपने प्रभु को ही
दे रहे हैं तो श्री राम जी ने हनुमान जी को अपने गले से लगा लिया। उस प्रेम में भगवान
और भक्त, सेवक और स्वामी , प्रीतम और प्रेमी दोनों की ही आँखों से प्रेम अश्रु बहने
लगे। ये है सच्चा प्रेम जब सेवक सब कुछ अपने प्रभु को अर्पण कर अपने अहम् को त्याग देता है तो फिर भगवान भी अपने सेवक को अपनी सच्ची प्रीति प्रदान करते हैं।
अब प्रसन्न होकर भगवान श्री राम जी कहने लगे कि
हे हनुमान मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ माँगो क्या माँगते हो| तब हनुमान जी ने
अपना सिर श्री राम जी के चरणों में रख दिया और कहने लगे कि हे प्रभु मुझे अपनी सबसे
प्रिय भक्ति प्रदान करो। तब भगवान ने आशीर्वाद देकर हनुमान जी को भक्ति से भरपूर कर
दिया। सतगुरू के हर सेवक का यही भाव होना चाहिए जैसे हनुमान जी के मन में था कि जो कुछ करने वाले हैं मेरे प्रभु ही हैं। यदि सेवक को जग में मान बढ़ाई मिले तो उसका सिर झुक जाए और आँखों में
निवापन रखते हुए मन में यही भाव आए कि मैंने कुछ नहीं किया जो किया मेरे सतगुरु ने
किया है। ऐसे भाव से सेवक अपने सतगुरु की पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त कर सकता है।
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