सच्चा प्रेम
कहते हैं कि प्रेम दो प्रकार का होता है
एक मिजाजी और एक हकीकी। मिजाजी प्रेम वह है जो हम संसार में सगे-संबंधियों
रिश्तेदारों के साथ करते हैं जो कि सब दिखावा है। और हक़ीक़ी प्रेम वह है जो मीरा
ने भगवान श्री कृष्ण से किया। मीरा का जन्म कलयुग में हुआ लेकिन उसने अपनी भक्ति
से द्वापर युग के श्री कृष्ण जी का दर्शन पाया। कितने ही जहर के प्याले मीरा को
दिए गए लेकिन उसने वह अमृत समझ कर पिया और उसे कुछ भी नहीं हुआ। क्यूंकि उसे अपने
भगवान श्री कृष्ण पर विश्वास था। वह हर चीज को उनका प्रशाद समझ कर स्वीकार करती
थी। लेकिन हमारा प्रेम ऐसा नहीं है। हम कहते तो हैं कि हमें भगवान से प्यार है
लेकिन सोच कर देखें कि क्या यह हक़ीक़ी है या मिजाजी। जिस भगवान ने ब्रह्मांड
रचाया ऐसे संसार की रचना की जिसने रंग, रूप, चेहरा सब कुछ
अलग है। इतनी सुंदर रचनाये की जैसे सूरज, चाँद, सितारे कि जिसे
देखकर हर कोई मोहित हो जाए। तो जरा सोचिए कि इतने सुंदर संसार की रचना करने वाला
भगवान ख़ुद कितना सुंदर होगा। किसी गीतकार ने गाया भी है-
नाम है तेरा तारणहारा, कब तेरा दर्शन
होगा।
जिसकी रचना इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर
होगा।।
और वह केवल सुंदर ही नहीं होगा बल्कि उसके
नाम में भी कितनी ताकत होगी। कितना सुख होगा उसके नाम में। लेकिन वह सुख हमें नहीं
मिलता। हम भगवान को याद करते हैं उसके बाद भी हमारा मन दुखी रहता है। इसका कारण है
कि हमने भगवान से प्रेम तो किया लेकिन वह हकीकी प्रेम नहीं है, सच्चा प्रेम
नहीं है केवल बाहरी दिखावा है। जैसे इंसान के
मुँह में नमक हो और वह रसगुल्ला खाये तो उसे स्वाद नहीं आता है ठीक उसी तरह
अगर इंसान भगवान की भक्ति करने बैठे लेकिन मन में तरह-तरह के विचार आते हो तो आनंद
कैसे आएगा। जब तक हम अपने मन के विचारों को एकाग्र करके सच्चे मन से भगवान को याद
नहीं करेंगे तब तक हमें आनंद नहीं मिलेगा।
इसी विषय पर एक कथा दी जा रही है आप उसे
ध्यान से पढ़िए और समझिए कि वास्तव में सच्चा प्रेम क्या होता है ।
भगवान श्री राम जी की एक बहुत बड़ी भक्त
थी जिसका नाम शबरी था । शबरी का जन्म भीलों के घर में हुआ था। ईश्वर ने उसे बहुत
ही भद्दा और श्याम रूप दिया था लेकिन पूर्व जन्म के शुभ संस्कारों के कारण भगवान
की भक्ति उसे जन्म से ही प्राप्त हुई थी। वह हर समय अपने भगवान की भक्ति में लीन
रहती थी। बड़े होने पर उसका विवाह एक भील से हुआ। वह बड़ी धूमधाम से विवाह कर शबरी
को अपने गाँव ले चला। यात्रा लंबी थी और गर्मी के कारण शबरी को प्यास लगी। शबरी के
जल मांगने पर भील पास के जलाशय से जल लेकर आया । जब वह उसे जल पिलाने लगा तो संयोगवश
घूँघट हटने के कारण शबरी के मुख पर उसकी दृष्टि पड़ गई । शबरी का काला रूप देखकर
वह हैरान हो गया। उसे उसकी देह से घृणा होने लगी। वह उसे डोली में वही छोड़कर अपने
गाँव लौट गया।
शबरी वन में अकेली रह गई। उसने वही घासफूस एकत्र करके एक झोपड़ी बना ली और
उसमें रहने लगी। वह भजन भक्ति में लीन रहने लगी। वन के पास ही ऋषि मुनि भी रहते
थे। उसके मन में उनकी सेवा करने की भावना उत्पन्न हुई। लेकिन वह जानती थीं कि ऋषि
लोग उसकी सेवा नहीं स्वीकारेंगे क्योंकि
वह भील जाति की थी। बहुत सोचने के बाद उसने एक उपाय सोचा। उसी तपोवन में पंपासर
नाम का एक सरोवर था। शबरी ने देखा कि ऋषि लोग प्रातः काल उठकर उसमें स्नान करने
जाते थे और उस समय उनकी कुटिया में कोई नहीं होता था । वह ऋषि लोगों से पहले उठकर
सरोवर में स्नान कर जंगल से फूल ले आती । जब ऋषि पंपसार को जाते तभी वह उनकी
कुटिया में जा पाती। वहाँ का झाड़ू पौंछा करके आश्रम को साफ़ करती और फिर ऋषियों
के आसन के पास फूल रखकर लौट आती।
यह आश्रम ऋषि मतंग का था जो कि अपने
शिष्यों के साथ वहाँ रहते थे । उनका स्नान करने का समय निश्चित था। जब प्रहर भर
रात्रि शेष रह जाती तो वह अपने शिष्यों को साथ लेकर पंपासर नदी पर स्नान करने के
लिए जाते और सूर्योदय के पश्चात ही वापिस लौटते।इसी दौरान शबरी आश्रम की सेवा करती
थी ।एक दिन यह जानने के लिए कि कौन प्रेमी आकर सेवा करता है ऋषि मतंग जी ने सभी को
स्नान के लिए भेजा किंतु ख़ुद वहीं आश्रम में ही रुक कर इंतज़ार करने लगे। जब शबरी
आश्रम में झाड़ू लगा रही थी तो अचानक से ऋषि मतंग उसके सामने आ गए और उस से उसका परिचय
मांगा। भीलनी सहम गई और बोली कि मैं नीच जाति की अछूत स्त्री हूँ। पर मेरे मन में
संतों की सेवा करने की इच्छा थी इसलिए मैं चोरी छिपे आपके आश्रम में प्रवेश कर
सेवा करने लगी। क्यूंकि मुझे पता था कि यदि किसी को भी मेरी जाति का पता चलेगा तो
मुझे कोई भी व्यक्ति इस आश्रम के पास भी नहीं आने देगा। तब ऋषि बोले की कौन कहता
है कि तुम अछूत हो। तुम्हारे जैसा निष्काम भाव से सेवा करने वाला कभी नीछ नहीं हो
सकता। उसी समय ऋषि मतंग ने शबरी की सेवा से प्रसन्न हो उसे गुरु-दीक्षा देकर अपना
शिष्य बना लिया तथा उसे उसी आश्रम में रह कर सेवा करने की आज्ञा प्रदान की।
एक दिन आश्रम की सेवा करते समय शबरी ऋषि
मतंग के एक तपस्वी से टकरा गई। वह उसी समय सरोवर से स्नान कर लौट रहे थे
किंतु जब उन्हें पता चला कि वह भील जाति
की है तो वह शबरी के स्पर्श से नाराज़ हो उसे बुरा भला कह फिर से स्नान करने चले
गए किंतु जैसे ही वह स्नान करने के लिए जल में उतरे सरोवर का जल दूषित हो गया
उसमें से दुर्गंध आने लगी। यह देख सबने ऋषि मतंग से जाकर शिकायत की कि उन्होंने
शबरी को आश्रम में रखकर ग़लत किया है। सरोवर के जल का दूषित होने का सारा दोष उस
शबरी पर लगाने लगे । तब ऋषि मतंग ने समझाया कि शबरी का जन्म भले ही नीछ जाति में
हुआ हो परंतु वह अपने ईश्वर की एक स्वच्छ
हृदय वाली सच्ची भक्त है। तुमने उसके स्पर्श से घृणा की उसे बुरा भला कहा
इसलिए सरोवर का जल तुम्हारे स्पर्श से दूषित हुआ है। कई शिष्य तो ऋषि की बात मान
गए किंतु कई शिष्यों ने शबरी से घृणा कम नहीं की। कुछ समय बाद जब ऋषि मतंग का
अंतिम समय आया तब उन्होंने शबरी को बताया कि अब वह इस लोक को छोड़कर जा रहे हैं
किंतु तुम इसी आश्रम में रहकर अपनी भक्ति करो और जब श्री राम जी यहाँ आये तब उनके
चरणों की धूल को सरोवर में डाल देना जिससे सरोवर का जल साफ़ हो जाएगा । शबरी ने
अपने भगवान के दर्शन पाने की लालसा में सब कुछ त्याग दिया। वह प्रति दिन आश्रम दूर
तक सफ़ाई करती मार्ग से कंकड़ हटाती ताकि जब प्रभु आयें तो कोई कंकड़ या काँटा
उनके सुकोमल चरणों में चुभ न जाए। इसके पश्चात वन से बेर तोड़कर उन्हें चख कर
देखती की जब प्रभु इन बेरों का भोग लगाये तो कहीं भूल से भी कोई खट्टा बेर ना आ
जाए। खट्टे बेरों को फेंक मीठे बेरों को इकट्ठा करती । इसी तरह कई वर्ष बीत गए और
शबरी प्रतिदिन यह प्रक्रिया करती । समय आया शबरी की भक्ति पूर्ण हुई और भगवान श्री
राम जी माता सीता की खोज में जंगलों में भटक रहे थे। जब ऋषि मुनियों को पता लगा कि
प्रभु श्रीराम जी आ रहे हैं तो उन्होंने उनके आगमन की तैयारी शुरू कर दी किंतु
भगवान श्रीराम जी ने अपना रास्ता बदल दिया और उस रास्ते पर चल पड़े जिसका रास्ता
शबरी के आश्रम से होकर जाता था । शबरी ने जब राम जी को आता देखा तो उसकी आँखों में
आँसू आ गए। वह अपने भागों की सराहना करने लगी कि प्रभु स्वयं चल कर मुझ नीच जाति
की भीलनी को दर्शन देने आये हैं। शबरी के रास्ते में बिछाये फूलों पर चल कर श्री
राम जी उसकी कुटिया में आये और उसके झूठे बेरों का भोग भी लगाया। भगवान भोग भी लगाते
और साथ में उन मीठे बेरों की सराहना भी करते।
चिरकाल से प्रभु प्रेम की दीवानी बन भगवान
की प्रतीक्षा में आँखें बिछाये एक एक कर घड़ियाँ गिनने के बाद अंततः उसे वह दीदार
हुआ। श्री दर्शन के प्यासे लोचन जो भगवान के मार्ग में निरंतर छिड़काव करते रहे आज
उन्होंने दर्शन रूपी अमृत रस का पान किया।
भगवान श्री राम जी ने प्रसन्न होकर वचन
कहे -
कछु रघुपति सुनि भामिनी बाता। मानऊ एक
भक्ति कर नाता।।
जाति पाति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन
गुण चतुराई।।
भक्तिहीन नर सोहत कैसे। बिनु जल वारिद
देखिय जैसे।।
“ए मन को भाने वाली भक्तिनी। मेरी इस बात
को ध्यान पूर्वक सुन। मैं एकमात्र भक्ति का ही नाता अथवा संबंध मानता हूँ। इसके
अलावा अन्य किसी तरह का नाता मुझे नहीं भाता है। ऊँची जाति, श्रेष्ठ कुल , धन सम्पति, मान प्रतिष्ठा, शारीरिक बल, बहुत बड़े कुनबे
का होना , विद्या, कला आदि उत्तम गुण तथा बुद्धि चतुराई समस्त गुण भी यदि किसी
एक व्यक्ति में हो लेकिन वह व्यक्ति भक्ति से हीन है तो मेरी दृष्टि में उसी
प्रकार है। जैसे कि जल से रिक्त बादल का होना वृथा है ।
और वचन कहे की हे शबरी देने को तो मैं
तुझे दुनिया की सारी वस्तु दे सकता हूँ लेकिन मेरी नज़र में वो कौड़ी के समान है
इसलिए मैं तुझे ऐसी वस्तु देना चाहता हूँ जिसका कोई मोल नहीं लग सकता। फिर भगवान
ने उसे नवधा भक्ति के बारे में बताया और उसे सच्चे धन से मालो माल कर दिया ।
इस के बाद सब ऋषि मुनि भगवान के दर्शन
करने आ गए और भगवान जी से अपने पापों की क्षमा माँगी । उन्होंने भगवान से
प्रार्थना की कि वे उन्हें अपने चरणों की धूल दे जिसे सरोवर में डाल के सरोवर का
जल साफ़ हो जाए। तो भगवान ने कहा की इस से कुछ लाभ नहीं होगा। तुम सब ने इस सच्ची
भक्तिनी का अपमान किया है जो की तप और त्याग की साक्षात मूर्ति है। यदि आप सरोवर
स्वच्छ करना चाहते हो तो इस भीलनी के चरणों को धो कर उस धोवन को सरोवर के जल में
मिला दोगे तो निश्चय ही आप सब का मनोरथ पूरा हो जाएगा। सभी श्री राम जी की बात सुन
कर आश्चर्य में पड़ गए । तब श्री राम जी बोले की मैं भी अपने नियमों और मर्यादा
में बंधा हूँ जो मेरा अपमान करता है उसे मैं क्षमा कर देता हूँ लेकिन जब कोई मेरे
सच्चे भक्त का अपमान करता है या निंदक शब्द बोलता है तो मैं उसे कभी क्षमा नहीं
करता । आपने इस भक्तिनी का अपमान किया है इसलिए यह ही आओ क्षमा दे सकती है । तब
सभी को ज्ञान हुआ की उनकी भक्ति तो केवल दिखावे की है केवल शबरी की भक्ति ही हकीकी
भक्ति है। तब सभी ने शबरी के पैरों को धो के उस धोवन को सरोवर में डाला तो सरोवर
का जल पुनः निर्मल और मधुर हो गया।
जिसने भी
भक्ति और प्रेम की भावनाओं को अपने हृदय में स्थान दिया तथा भक्ति में लीन
होकर अपने आप को खो दिया अर्थात अहंभाव को खो दिया वही भगवान की दृष्टि में प्रिय
और महत्वपूर्ण है ।
यही हक़ीक़ी भक्ति का दृष्टांत है। भगवान
तो केवल भाव के भूखे होते हैं। जो सच्चे भाव से उन्हें प्रेम करता है और प्रेम से
याद करता है वे उसे सच्चे धन यानी अपनी सच्ची भक्ति से मालो माल कर देते हैं।
जिससे उसका जीवन और परलोक दोनों सँवर जाते हैं।
प्रभु नाम अमृत भरा, जो पीवे
तृप्ताय।
सुखी बसे संसार में, और परम पद
पाये।।
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