Thursday, March 19, 2020

सेवक की भावना

 

सेवक की भावना

 

सेवक की भावना सदैव अपने प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करने की होती है| रात दिन सेवक का यही प्रयास होता है कि वह ऐसा कर्म करे जिससे कि उसके स्वामी खुश हो जाए| उसके ह्रदय  भी यही भावना होती है कि मैं हर पल, हर श्रण अपने सतगुरु के चरणों से जुड़ा रहूँ उनके वचनों की पालना करूँ| मेरे मुख से वाक् निकले तो सतगुरु की महिमा का वर्णन हो | कानों में सदा सतगुरु की महिमा  का गायन हो अगर स्वांस चले तो सतगुरु का सुमिरन हो और आँख खुले या बंद हो हमेशा सतगुरु का दर्शन हो| सच्चा सेवक दुनिया की मान बड़ाई में न फस कर अपने मालिक की रज़ा में प्रसन्न रहता है और हर जड़- चेतन वस्तु में अपने मालिक का ही स्वरुप देखता है |

 

रामचरित मानस में बड़ा ही सुंदर प्रसंग आता है एक बार माता सीता ने हनुमान जी को मोतियों से बनी माला उपहार दी| जैसे ही हनुमान जी को वह माला मिली, वे उसे तोड़ कर एक –एक मोती को गौर से देखने लगे| तो माता–सीता को यह देखकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा| उन्होंने हनुमान जी से पूछा- ‘यह क्या कर रहे हो?’ तो हनुमान जी ने जवाब दिया- ‘मैं इन मोतियों में प्रभु श्री राम जी को ढ़ूंढ़ रहा हूँ| जिस वस्तु में मेरे प्रभु श्री राम नहीं है, वह वस्तु मेरे किस काम की?’ अपने उपहार का अपमान सुनकर माता सीता जी ने हनुमान जी को कहा कि क्या तुम्हारे शरीर में भी श्री राम  जी है? यह सुनकर हनुमान जी ने भरी सभा में श्री राम जी के सामने अपना सीना फाड़ कर दिखाया| जिसमे सभी ने श्री राम जी, लक्ष्मण और माता सीता के दर्शन किये| ये है सेवक की सच्ची भावना कि वह केवल को केवल अपने स्वामी को ही चाहता है |

 

कहते है की जब प्रभु श्री राम जी, माता सीता जी, लक्ष्मण बनवास पर जा रहे थे तब बनवास में जाते समय एक जगह पर माता सीता जी की नजर एक वृक्ष पर पड़ी| उस वृक्ष की बहुत सुंदर लटाएँ थी| उन लटाओं को देख कर माता सीता ने भगवान श्री राम जी से वचन किए कि प्रभु इस वृक्ष के कितने उच्चे भाग्य है जो लटाएँ इस वृक्ष की शोभा बढ़ा रही है| तब श्री राम जी ने फरमाया कि इस वृक्ष के उच्चे भाग्य नहीं बल्कि इन लटाओं के उच्चे भाग्य है जो वृक्ष ने इन्हें सहारा दे रखा है तब श्री राम जी ने लक्ष्मण जी को बुलाया और उन्हें फरमाया कि माता सीता का कहना है कि इस वृक्ष के उच्चे भाग्य है जो लटाएं इनकी शोभा बढ़ा रही है और मेरा कहना है कि इन लटाओं के उच्चे भाग्य है जो वृक्ष ने इन्हें सहारा दे रखा है तुम बताओं किसके उच्चे भाग्य है| तब लक्ष्मण जी भगवान श्री राम जी के चरणों में बैठ गए और कहने लगे कि हे प्रभु मैं नहीं जनता कि इस वृक्ष के उच्चे भाग्य है या इन लताओं के उच्चे भाग्य है मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मेरे उच्चे भाग्य है जो मुझे आपकी चरण शरण मिली है| सेवक के लिए उसके स्वामी का साथ ही उसके जीवन की सबसे अनमोल वस्तु है| सही मायने में जिसे अपने स्वामी की चरण शरण मिल गई है वहीं जीव ही संसार में सबसे भाग्यशाली है |

 

एक बार श्री परमहंस दयाल जी टेरी में सत्संग उपदेश कर रहे थे कि आप के दिल में यह ख्याल आया कि देखे | यहाँ इतने प्रेमी एकत्र हुए है इनके दिल में किस प्रकार भक्ति की लगन है? सत्संग के बाद आपने प्रत्येक सत्संगी से पूछा कि आप भक्ति में क्या चाहते हो? किसी ने समाधि लगाने के विषय में बात की, किसी ने शब्द सुनने की इच्छा प्रकट की, तो किसी ने प्रकाश देखने की युक्ति बतलाने की प्रार्थना की | श्री परमहंस दयाल जी हर एक की इच्छा के अनुरूप युक्ति बतलाते जा रहे थे | जब प्रत्येक से पूछ चुके तो सबसे पीछे बैठे हुए एक व्यक्ति से पूछा-कहिये! आप क्या चाहते हो ? तब उसने कहा कि-“ऐ मेरे मालिक! मैं आपसे मान बड़ाई तथा ऐश्वर्य के सामान नहीं चाहता हूँ | मैं आपसे अपने दर्द के लिए कोई औषधि भी नही चाहता | प्रत्येक मनुष्य अपनी विवशता प्रकट कर तुमसे अपना मतलब सिद्ध करना चाहता है, परन्तु नाचीज़ तो तुमसे केवल तुम्ही को चाहता है |” श्री परमहंस दयाल जी ने उसे कृपापूर्ण दृष्टि से देखा और फरमाया-“ठीक है! भक्ति में सबसे उत्तम मांग भी यही होती है और होनी भी चाहिए |” सेवक के मन में ऐसी भावना ही सर्वोतम भाव है| भाग्यशाली है ऐसे प्रेमी –गुरुमुख, जिनके दिल में सच्चा प्रेम है और जिनके दिल में केवल एक ही अभिलाषा है इष्टदेव की निकटता, प्रसन्नता |

 

 

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