सच्चे सेवक का अपने स्वामी के चरणों में सदा अटूट
प्रेम होता है, सेवक अपना सर्वस्व अपने स्वामी के चरणों में न्यौछावर कर देता
है| श्री रामचरितमानस में
एक बहुत शिक्षाप्रद प्रसंग आता है जब प्रभु श्री राम प्रभु वनवास पर चले जाते हैं और पीछे से जैसे ही भरत जी को इस बात की सूचना मिलती है वह
बेचैन हो जाते हैं और अपने प्रभु श्री राम जी को वनवास से वापस लाने के लिए नंगे पांव
ही अपने राज्य से निकल जाते हैं| भरत जी के साथ-साथ उनके राज्य के सैनिक, सेनापति व अन्य मुख्य लोग भी साथ होते हैं| वे
भरत जी से विनती करते हैं कि भरत जी आप रथ पर सवार हो जाएँ, आपके पांव में कांटे कंकर
चुभ जाएंगे | तब भरत जी के जो भाव थे वही भाव हर सेवक के लिए प्रेरणादायक हैं| भरत जी ने कहा कि-
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा, सब तें सेवक धरमु कठोरा ||
अर्थात सेवक होने के नाते तो मेरा यह फर्ज
बनता है कि जहां –जहां
से मेरे प्रभु श्री राम जी गए है वहाँ -2 से मैं
सर के बल जाऊं (अर्थात मेरा सर ज़मीन पर हो और पांव ऊपर हो)| यह है सेवक का सच्चा प्यार| जो सेवक अपने स्वामी से इतना प्रेम रखता
है वही अपने स्वामी की प्रसन्नता का सच्चा पात्र बनता है|
इतिहास में एक राजा हुए है महमूद गजनवी उनका एक सेवक था
अयाज। अयाज हर समय अपने स्वामी महमूद गजनवी की सेवा में रहता
था और जो भी उसके मालिक महमूद गजनवी अयाज,
के लिए हुकुम करते थे अयाज उसे पूरा करता था। कई बार महमूद गजनवी अयाज को खुश होकर
बड़े -2 बड़े उपहार भी दिया करते थे। एक दिन महमूद गजनवी के दरबार में कोई व्यक्ति तरबूज भेंट करने लाया। महमूद गजनवी अयाज से कहने लगा
अयाज आज मेरा बड़ा मन है मै तुझे अपने हाथों से तरबूज खिलायूँ | तू मेरी इतनी सेवा करता है आज मैं तेरी सेवा करूँ | एक बर्तन में तरबूज कट कर महमूद गजनती के पास आया, तब महमूद गजनवी ने एक-2 फाक अपने हाथों से अयाज को खिलाना
शुरू किया । अयाज बड़े भाव से एक-एक फांक तरबूज की खा रहा था। अयाज के चेहरे
पर बड़ी प्रसन्नता थी की मेरे मालिक खुद अपने हाथों से मुझे तरबूज खिला रहे है। अयाज के इतने सुन्दर भाव देख कर और उसे प्रसन्न
देख कर महमूद गजनवी ने अयाज
से पूछा की अयाज तरबूज
कैसा है तो अयाज कहने लगा मालिक बहुत अच्छा है | जब तरबूज का आखिरी फांक बचा तो महमूद गजनवी ने अयाज से कहा कि अयाज़ तुमने इतने भाव और प्रसन्नता से तरबूज खाया इसका मतलब तरबूज बहुत
मीठा है| महमूद ने ये कहते हुए आखिरी फांक अपने मुँह में डाल लिया| जब वह फांक महमूद
ने अपने मुँह में डाला तो फांक डालते ही वह थूकने लगा और कहने लगा की ये तो बहुत ही कड़वा है जोकि हलक
से भी नीचे ही नहीं उतर रहा अयाज़
तूने तो बड़े चाव से यह तरबूज खाया है, क्या तुझे यह कड़वा नहीं लगा|
अयाज़ ने उतर दिया की महाराज आपने मुझे अपने जीवन में कितने सुन्दर सुन्दर उपहार
दिए है| आप हमेशा मेरी बात
सुनते हो मुझे प्रेम और मान भी देते हो जब भी तो मैं स्वीकार करता हूँ तो क्या सेवक होने के नाते आज मेरा यह फर्ज नहीं बनता की आपने मुझे कुछ भी दिया
है तो मैं उसे ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करू। यह बात
सुनकर महमूद ने उसे गले लगा लिया। ये है सेवक
का भाव। अपने- आपको
सेवक कहना बहुत आसान है लेकिन सेवक धर्म निभाना
बहुत की कठिन है
सच्चा सेवक
वो है जो मान और अपमान में एक समान रहे। हम अपने आप को सेवक तो कहते है लेकिन जब तक
हमे मान मिले सेवा करते - 2 उसे तो हम बहुत खुशी से ग्रहण करते है लेकिन सेवा के समय
कोई हमे अपमानित करे या कोई हमे हमे कुछ कह दे तो हम उसे स्वीकार नही करते | कहते है
कि सेवक को हर स्थिति में मालिक का शुक्र अदा करना
चाहिए क्या पता मालिक ने हमे सिखाने के लिए वो स्थिति बनाई हो। लेकिन हम ऐसा नहीं करते| हम से कोई कुछ कह
दे व् अपमानित कर दे तो भगवान को भी कोसना शुरू कर देते है। लेकिन सच्चे सेवक में तो
यह भाव होना चाहिए कि वह मान अपमान दोनो स्थिति में ही प्रसन्न रहे। मान मिले तो ज्यादा
खुशी न जताये और अपमान मिले तो तो ज्यादा दुखी न हो | हर स्थिति में समान भाव ही एक
सच्चे सेवक की निशानी है
श्री परमहंस दयाल जी महाराज
श्री प्रथम पादशाही जी ने एक बार सेवक
शिष्य के लक्षण बतलाते हुए फरमाया कि एक सच्चे सेवक में निम्नलिखित चार लक्षण पाए
जाते है -
(1)
अहंता-अहंकार का त्याग
(2)
विषय-वासना से रहित होना
(3) सतगुरु
की सेवा तन-मन-धन से करना
(4) सतगुरु
के वचन पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखना |
सत्य तो यह है कि यदि सेवक एक अंतिम गुण को अपना ले अर्थात
सतगुरु के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखे तो शेष सारे गुण अपने आप ही
उसमें आ जाते है |
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