Monday, March 23, 2020

मन की एकाग्रता

 

मन की एकाग्रता

 

सेवक के लिए मन की एकाग्रता अति आवश्यक है | सेवक अपने मन पर सैदव नजर रखे कि उसका मन उसे धोखे में न लेकर जाए अर्थात सेवक कभी मन की चाल में ना आये | मन के साथी है काम, क्रोध लोभ, मोह , अहंकार जो मन के साथ मिलकर हमें रात दिन भटकाने में लगे रहते है | हमारे श्री गुरु महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी फरमाया करते थे कि मन और माया ये दोनों अपने काम में गफलत नहीं करते इनका काम है आपको भक्ति से दूर करना ये रात दिन इसी काम में लगे रहते  है | सेवक जब अपने सतगुरु के ध्यान में बैठे तो उसका मन एकाग्र होना चाहिए | ऐसा ना हो कि शरीर को तो टिका लिया लेकिन मन सांसारिक वासनाओं की पूर्ति में लगा रहे |

 

एक बार श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी पावन श्री चरणों में एक भक्त आया वह एक तस्वीर बना कर श्री चरणों में लाया श्री गुरु महाराज जी ने देखा तस्वीर पर दिल बना हुआ है और उस दिल के बीच में एक दरवाजा है| तब श्री गुरु महाराज जी ने पूछा कि इस दरवाजे पर कुण्डी क्यों नहीं लगाईं तो भक्त के कहा कि स्वामी जी दिल के दरवाजे पर कुण्डी नहीं होती| तब श्री गुरु महाराज जी ने एक कथा सुनाई| एक बड़े ऊँच कोटि के फकीर थे| एक दिन उन्होंने अपने सेवक को कहा कि आज हम ध्यान पर बैठ रहे है कोई भी हमे आज परेशान ना करे| हम कमरे में बैठ रहे है कोई भी अंदर कमरे में ना आये| कुछ समय बाद उसी देश का राजा वहाँ आ गया| सेवक ने बादशाह को शीश झुकाया और जलपान ग्रहण करवाया| अब बादशाह ने सेवक से कहा कि मैं फकीर साहिब से मिलना चाहता हूँ| लेकिन सेवक ने कहा फकीर साहिब ने मना किया है जब तक उनकी आज्ञा नहीं होती, दरवाजा खोलने कि तब तक कोई भी अंदर नहीं जा सकता| बादशाह ने कई बार कहा कि मुझे बहुत जरुरी काम है| लेकिन सेवक ने बादशाह को जाने नहीं दिया| अब एक दिन बिता दो दिन बीते तीसरे दिन सुबह फकीर साहेब ने आवाज लगाई| सेवक अंदर गया उसने फकीर साहेब से विनय की कि बादशाह आये है वे आप से मिलने के लिए बहुत आतुर है| तो फकीर साहेब ने कहा कि उन्हें अंदर भेज दो जब बादशाह सलामत अंदर गए उन्होंने ने फकीर साहेब को नमस्कार किया| वे अंदर से बड़े रोष में थे| तो उन्होंने अंदर जाते ही फकीर जी से ये शब्द कहे कि-

“दरे दरवेशा दरबान ना बायत”

अर्थात फकीरों के दरबार में दरबान कि क्या जरुरत है| तो फकीर साहेब ने उत्तर दिया

“ब बायत ता सगे दुनिया ना आयत”

अर्थात जरुर बैठना चाहिए ताकि दुनिया के चाहने वाले अंदर ना आ सके| श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि इसलिए दिल के द्वार पर भी कुण्डी होनी चाहिए कि ताकि एक सतगुरु के सिवा कोई अंदर ना सके और जब सतगुरु आ जाए जो कुण्डी लगा दो के फिर वो जा ना सके| किसी प्रेमी ने लिखा भी है कि

 

ऐ एब्र ज़रा थम के बरस कही वो आ ना सके|

जब वो आ जाए तो फिर इतना बरस के वो जा ना सके ||

 

एक बार भगवान बुद्ध के दो शिष्य उनसे मिलने जा रहे थेपूरे दिन का सफर थाचलते-चलते रास्ते में एक नदी पड़ीउन्होंने देखा कि उस नदी में एक स्त्री डूब रही हैबौद्ध भिक्षुओं के लिए स्त्री का स्पर्श वर्जित माना जाता हैऐसी दशा में क्या होउन दोनों भिक्षुओं में से एक ने कहा - "हमें धर्म की मर्यादा का पालन करना चाहिएस्त्री डूब रही है तो डूबे! हमें क्या!" लेकिन दूसरा भिक्षु अत्यंत दयावान था|

उसने कहा - "हमारे रहते कोई इस तरह मरेयह तो मैं सहन नहीं कर सकता|" इतना कहकर वह पानी में कूद पड़ा डूबती स्त्री को पकड़ लिया और कंधे का सहारा देकर किनारे पर ले आयादूसरे भिक्षु ने उसकी बड़ी भर्त्सना कीरास्ते भर वह कहता रहा कि- मैं जाकर तथागत से कहूँगा कि आज तुमने मर्यादा का उल्लंघन करके कितना बड़ा पाप किया है| दोनों बुद्ध के सामने पहुँचे तो दूसरे भिक्षु ने एक सांस में सारी बातें कह सुनाईं - "भिक्षु ने बताया कि मैंने इसको बहुत रोकापर यह माना ही नहींबड़ा भयंकर पाप किया है इसने|"

बुद्ध ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनीफिर पूछा - "इस भिक्षु को उस स्त्री को कंधे पर बाहर लाने में कितना समय लगा होगा?"

"कम-से-कम पंद्रह मिनट तो लग ही गए होंगे|"

"अच्छा!" बुद्ध ने पूछा - "इस घटना के बाद यहाँ आने में तुम लोगों को कितना समय लगा?"

भिक्षु ने हिसाब लगाकर उत्तर दिया - "यही कोई छ: घंटे!"

बुद्ध ने कहा - "भले आदमी! इस बेचारे ने तो उस स्त्री को पंद्रह मिनट ही अपने कंधे पर रखालेकिन तू तो उसे छ: घंटे से अपने मन में बिठाए हुए हैबोल दोनों में बड़ा पापी कौन है?

 

यहाँ प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है मन से किया गलत कर्म भी हमारे लिए हानिकारक है | सेवक अपने मन पर सदैव नजर रखे कि मन उसे गलत तरफ न ले जाए|

 

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