सेवक जब सेवा में हो तो उसके मन में यह भाव रहे
कि मैं संगत की सेवा नहीं कर रहा अपितु अपने गुरु महाराज जी की सेवा कर रहा हूँ|
सेवक का यह भाव ही सेवक को सतगुरु से पूर्ण रूप से मिलाएगा| श्री गुरु गोविन्द
सिंह साहिब के जमाने की एक कथा है शत्रु के साथ युद्ध हो रहा था| गुरु महाराज की सेना के सिपाही शत्रु को जब मुर्छित करते थे
तो इसी सेना का एक सिक्ख जिसका नाम कन्हैया जी था, उन मुर्छित हुए शत्रुओ के मुंह में पानी डालकर उनकी घबराहट
को दूर करता था और उनको सचेत बनता था| इस पर सिखों ने गुरु महाराज जी के चरणों में शिकायत की कि
भाई कन्हैया जी ऐसा करते है| गुरु महाराज जी ने भाई कन्हैया जी को बुलाकर पूछा –भाई कन्हैया आपकी शिकायत आई
है क्या तुम ऐसा करते हो? तब भाई कन्हैया की के नेत्रों में अश्रु आ गए उन्होंने हाथ जोड़कर गुरु जी के
चरणों में मस्तक निवाकर विनय की –दीनदयाल! मैं किसी शत्रु के मुंह में पानी नहीं
डालता और न मुझे कोई शत्रु दिखता है जिस समय मैं पानी पिला रहा होता हूँ, उस समय मुझे यही दिखाई दे रहा होता हैं कि आपको प्यास लगी
हैं और मैं आपको पानी पिलाने की सेवा कर रहा हूँ| भाई कंहैया जी की ऐसे वाणी सुनकर गुरु महाराज जी की
प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही| उस प्रसन्नता में गुरु महाराज जी ने फरमाया –भाई कन्हैया! पहले तो आप पानी
पिलाते थे लो, अब ये मरहम
पट्टी की डिब्बी भी ले लो और जहाँ जरूरत समझो साथ ही मरहम पट्टी भी कर दिया करो| हम आपकी ऐसे अवस्था पर बहुत खुश हैं | सेवक का यह भाव अति मनमोहक है |
श्री गुरु अर्जुन देव जी के
समय की बात है एक बार लाहौर से कुछ संगत गुरु अर्जुन देव जी के दर्शन के लिए पहली
बार आई, उन्होंने कभी पहले गुरु जी
के दर्शन नहीं किये थे| रात का समय था गुरु अर्जुन देव जी खुद उन्हें लेने गेट पर पहुंचे| फिर उन्होंने संगत को लंगर करवाया उनके झूठे बर्तन उठाए| तब उन संगत ने विनय की हमे गुरु जी के दर्शन करने है तब आप
जी ने फरमाया अब रात काफी हो गई| मैं आपको कमरा देता हूँ, वहां आप विश्राम करे कल सुबह सभा में श्री गुरु महाराज जी का दीवान लगेगा वही
आकर दर्शन करना|
ऐसा कहकर आप जी वहां से चले आये| अगले दिन वह संगत जब दर्शन करने पहुंची तब उन्होंने देखा की
जिन्होंने रात को हमे लंगर करवाया, हमारे झूठे बर्तन उठाए वही श्री गुरु महाराज जी है तो
उन्हें बड़ी ही शर्मिन्दगी महसूस हुई| उन्होंने विनय की महाराज हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई, आपने हमारी सेवा की, हमारे झूठे बर्तन तक उठाए| तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया– संगतो की सेवा बड़े ही
भागो से मिलती है इसमें तो हमारी भी शान है| कहते है कि श्री गुरु दरबार की संगत की सेवा के लिए तो
देवी-देवता भी तरसते है|
एक बार श्री गुरु महाराज जी
श्री पंचम पादशाही जी श्री आनंदपुर मोती बाग़ में विराजमान थे| वहाँ पर दुबई से एक भक्त जी आये हुए थे| वो श्री गुरु महाराज जी जी के चरणों में बैठे थे| तब प्रसंग वहाँ कुछ ऐसा प्रसंग चल रहा था तो वो भक्त जी
श्री गुरु महाराज जी से कहने लगे कि भगवान जब भी देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है
तब श्री गुरु महाराज जी फरमाने लगे कि जब इंसान परमार्थ के मार्ग पर लगता है जब
सेवक निष्काम भाव से संगत की सेवा में लग जाता है तब भगवान छप्पर फाड़ कर नहीं देते
अपितु पूरा का पूरा आसमान फाड़ कर देता है| साध संगत की सेवा में ही सच्ची खुशियाँ और बरकते है |
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