नवधा भक्ति
भगवान श्री राम जी शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश करते हुए बताते हैं
नवधा भक्ति कहुउँ तोहि पाही। सावधान सुनु धरू मन माही।।
1. प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
भगवान फरमाते हैं कि प्रथम भक्ति 'सन्तों का संग' अर्थात पहली भक्ति
है - संतों-सत्पुरूषों का संग अर्थात सत्संग। भगवान ने सत्संग को पहली भक्ति क्यों
बतलाया? इसलिए कि सत्संग में ही मनुष्य को विवेक की प्रप्ति होती है।
2. दूसरी रति मम कथा प्रसंग।
'कथा प्रसंग' का अर्थ यहाँ भगवान की कथाओं का श्रवण करना तो है ही, भगवान
चर्चा। भगवान की लीला कथाओं का वर्णन सुनकर प्रेम-विभोर हो जाना, शरीर में रोमाँच हो
जाना तथा नेत्रों से प्रेम आँसू प्रवाहित होने लगना-यह भक्ति का लक्षण है। 'हृदय माहि
प्रेम जो, नैनो झलके आये
कुलिस कठोर निठुर सोई छाति, सुनि हरी चरित न जो हर्षिति।
अर्थ- 'वह हृदय वज्र के सुनकर हर्षित नहीं होता। समान कठोर एवं
निष्ठुर है, जो भगवान के चरित्र
3. गुरू पद पंकज सेवा, अर्थात तीसरी भक्ति है तीसरी भगति अमान। अभिमान
रहित होकर गुरूदेव के चरण-कमलों की सेवा
करना। गुरु दरबार में तो अनेकों ही सेवक रहते है और सभी सेवा करते
हैं, परन्तु सेवा वास्तव में वही है, जो अभिमान से रहित होकर की जाये। हनुमान जी
श्री राम जी के प्यारे सेवक थे क्योंकि उनमें लेशमात्र भी अभिमान नहीं था।
4. चौथि भगति मम गुन गान, करइ कपट ताजि गान।
अर्थात - चौथी भक्ति है
कपट का त्याग कर भगवान के गुणों का गान करना। भगवान फरमाते हैं कि गुण- स्तुति
गायन करते समय मन में तनिक भी छल, कपट, दिखावा व आडम्बर न हो। भगवान को छल कपट तथा
आडम्बर आदि तनिक भी पसंद नहीं है। भगवान के वचन है कि
निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
5. मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा, पंचम भजन सो वेद प्रकासा ।
अर्थात - हृदय में दृढ़
विश्वास रखकर सत्गुरू से प्राप्त नाम मन्त्र का जाप करना यह पांचवी भक्ति है जो
वेदों में प्रसिद्ध है। मन्त्र का जाप करते समय हृदय में पूर्ण श्रद्धा एवं
विश्वास होना चाहिए। बिना विश्वास के की गई भक्ति कभी फलीभूत नहीं होती और न ही
इष्टदेव की कृपा प्राप्त होती है। इसलिए हृदय में श्रद्धा एवं विश्वास रखकर
नित्यप्रति नियमपूर्वक भजन करना चाहिए।
6. छठ दम सील बीरति बहु करमा, निरत निरंतर सज्जन धर्मा ।।
अर्थात- छठी भक्ति है
इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहुकार्यों से वैराग तथा सदैव संत-सत्पुरूषों के
निर्धारित किये हुए श्रम आचरण में लगे रहना ।
पहली बात इन्द्रियों को विषय विकारों में जाने से रोकना है जब तक
इन्द्रियाँ विषयों की ओर भागती रहेगी मनुष्य भजन भक्ति नहीं कर सकता।
दूसरी बात जो व्यक्ति शील अर्थात अच्छा स्वभाव व चरित्र वाला है वही
भजन भक्ति कर सकता है। दुश्चरित्र व्यक्ति तो सदा बुरे आचरण में निवृत्त रहता है।
पांडव शीलवान थे, तभी भगवान के प्यारे थे। कौरवों में शील का अभाव था।
तीसरी बात जो भगवान ने कही है वह है बहु कार्यों से वैराग्य। जिस
मनुष्य का मन संसार के
अनेकों कार्यों में फँसा रहता है, उसका मन संसार के अनेकों कार्यों
में फसा रहता है, उसका मन संसार में ही लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति भक्ति भजन क्या
करेगा? चौथी बात जो भगवान ने छठी भक्ति के अन्तर्गत कही है वह है सदा संत
सत्पुरूषों द्वारा बताये गए धर्म के मार्ग पर चलना।
7. सातवाँ सम मोहि मय जग देखा,
मोतें संत अधिक करि लेखा ।।
अर्थात संत संसार में प्रभु को देखना और सत्पुरूषों को भगवान से अधिक
मानना। ऐसा भगवान ने इसलिए कहा क्योंकि संत शरण व उनके माध्यम् से ही जीव को भगवान
की प्राप्ति होती है।
8. आठवाँ जथा लाभ संतोषा,
सपनेहुँ नहीं देखइ परदोषा ।।
जो कुछ मिल जाए उसी में संतोष करना और स्वपन में भी पराये दोषों को न
देखना, यह आठवी भक्ति है।
9. नवम सरल सब सन छलहीना,
मम भरोस हिय हरष न दीना।
सबसे साथ सरल स्वभाव से और कपट रहित होकर व्यवहार करना, हृदय में
भगवान पर भरोसा रखना और हर्ष तथा विषाद से न्यारे रहना नवी भक्ति है। जो इस नवधा
भक्ति को हृदय में अपना लेता है वह अपने ईष्ट देव की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त
कर अपना लोक-परलोक सवार लेता है और अपना जन्म सफल कर लेता है।
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