श्री रामचरित मानस में वचन आता है कि
अग्यासम न सुसाहिब सेवा
आज्ञा पालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई
सेवा नहीं है।
सेवक वह है जो अपने सतगुरु की आज्ञा को मुख रख
कर चलता है| गुरु के मुख से जो भी वचन निकले उसे बिना सोचे
समझे, उसमे अपना कोई
स्वार्थ जाने बिना सेवक उस सेवा को
करे| जब सेवक अपने सतगुरु
के समक्ष खुद को पूर्ण
रूप से सोंपा है तब सतगुरु
अपने सेवक के भाग्योदय में चार चाँद लगाये हैं|
एक बार श्री दूसरी पाद्शाही जी ने 6,7 महात्माजनों
के साथ ये प्रवचन किये -“ जो गुरु की आज्ञानुसार नहीं चलता, उसकी
भक्ति मनमति के अनुसार है | गुरु कि आज्ञा
मानना ही सेवक का परम कर्तव्य है |” केवल
प्रवचनों को श्रवण करना ही गुरु आज्ञा नहीं है | उस
पर पूर्ण रूप से मनन करना गुरु का वास्तविक अर्थ है | जो
सतगुरु कि शरण ग्रहण करके श्री आज्ञा में तत्पर रहना नहीं सीखता तो उसका जीवन
आनंदमय कैसे बनेगा |
ऐसे की कई उदाहरण
इतिहास में आये हैं कि जब
जब भक्त अपने स्वामी की दी हुई कसौटी पर खरे उतरे हैं स्वामी ने उन्हें अपना ही
रूप बना लिया| एक बड़ा ही सुंदर प्रसंग है एक दिन
भाई लहणा (श्री गुरु अंगद देव जी) जी
अपने गाँव से करतारपुर श्री गुरुनानक देव जी के श्री दर्शन के लिए गए| जब
ड़ेरे पर पहुँचे तो गुरुनानक देव जी ड़ेरे पर मौजूद नहीं थे| माता
सुलक्षिनी जी से पूछने
पर पता चला की श्री गुरु महाराज जी खेतो में घास निकलवा रहे है| भाई
लहणा जी के ह्रदय में दर्शन की तड़प थी, अतः
वह खेतो की ओर चल दिए| उस समय वे
मूल्यवान एवं साफ़- सुथरे वस्त्र धारण किये हुए थे| भाई
लहणा जी खेत में पहुंचे और गुरुनानक देव जी के चरणों में मस्तक निवाया| तत्पश्चात
भाई लहणा जी ने विनती की सच्चे पादशाह! आज्ञा हो तो मैं भी घास निकालूँ? गुरुनानक देव जी
ने फरमाया आप घास मत निकालो, बल्कि घास का यह
गठ्ठर उठाकर ड़ेरे पर ले चलो| भाई लहणा जी ने
आज्ञा मानकर तुरंत गठ्ठर सिर पर उठा लिया| उस
समय उनके दिल में यह विचार तक नहीं आया कि मैंने इतने मूल्यवान रेशमी वस्त्र पहन
रखे है| उनके लिए तो गुरु महाराज जी की आज्ञा ही मुख्य थी| चूँकि
घास गीली भी थी और कीचड से लतपत भी थी अतः उसमे पानी के कीचड़ से सनी बूँदे गिर-गिर
कर भाई लहणा जी के साफ़ सुथरे वस्त्रो पर गिरने लगी, जिससे
वस्त्रो पर धब्बे ही धब्बे हो गए| भाई लहणा जी
ड़ेरे पर पहुंचे और घास का गठ्ठर नीचे उतारा| पीछे-पीछे
गुरुनानक देव जी पहुँच गए| भाई लहणा जी के
वस्त्र देखकर माता सुलक्षिनी जी ने गुरु नानक देव जी के चरणों में विनती की गरीब
निवाज! यह आपने क्या किया? इस भले आदमी के
सिर पर आपने कीचड़ से भरी घास रखवा दी| देखिये!
कीचड़ की बूंदो से इसके कपड़े
खराब हो गए है| श्री गुरुनानक
जी ने हँसते हुए फरमाया- यह जो घास का गठ्ठर इन्होने उठाया है यह गठ्ठर नहीं है, बल्कि
त्रिलोकी का छत्र है| वस्त्रो पर गिरे
हुए ये छींटे कीचड़ की नहीं, केसर की छींटे
है| गुरुनानक देव जी के ये वचन सुनकर भाई
लहणा जी गुरु जी के चरणों में गिर पड़े| श्री
गुरुनानक देव जी ने उन्हे उठाकर गले से लगा लिया और अपना रूप बना लिया| समय
आने पर भाई लहणा जी दूसरी पादशाही श्री गुरु अंगद देव जी के पावन नाम से सुशोभित
हुए और उनका यश चारो तरफ छा गया| यह सब गुरुवचनो
को श्रद्धापूर्वक पालना करने के परिणाम स्वरुप ही सम्भव हुआ|
भाई लहणा जी के जीवन में ऐसी कई बार
हुआ जब वे अपने गुरु की दी हुई परीक्षा में सफल हुए | उन्होंने यह बतलाया हैं की
जब सेवक अपनी सेवा में सफल होता है तो गुरु सेवक को अपने चरणों से उठा कर अपने अंग
से लगा लेते हैं यानि अपने हृदय से लगा लेते हैं| और फिर गुरु की ऐसी मेहर बरसती
हैं की सारा ब्रम्हाण्ड आपके चरणों में आ जाता हैं| यह घटना इसी बात को प्रमाणित करती है|
इसी तरह एक बार श्री गुरुनानक देव जी ने अपने भक्तो को रात के समय घाट पर जाकर कपड़े
धोकर उनको सुखाकर लाने के लिए कहा
तो सभी ने सोचा कि इतनी रात को हम कहाँ जाएंगे? गुरुनानक
देव जी से कहा कि आपके पास और भी वस्त्र है तो वो पहन लेना, तो
सभी ने मना कर दिया| पर भाई लहणा जी
ने वह वस्त्र लिए और घाट की तरफ चल पड़े जब वह घाट पर पहुँचे तो वहां तो उजाला था, दिन
निकला पड़ा था| उन्होंने कपडे
धोए और सुखाकर फटा-फट ले आये जब वह वापिस आये तो सबने उससे पूछा की तू तो बहुत
जल्दी आ गया तो उन्होंने बताया की वहाँ तो दिन निकला हुआ था| ये
तो गुरु महाराज जी की लीला थी वे पूर्ण संत है रात को दिन, दिन
को रात कुछ भी कर सकते है |
एक बार श्री गुरुनानक देव जी ने एक
लोटा गंदे नाले में फैक दिया और अपने पुत्रों से उसे निकाल के लाने को कहा तो उनके बच्चो ने
कहा कि स्वामी जी आपके पुत्र होकर गंदे नाले में हाथ मारे तो गंदे हो जाएंगे| अभी
कोई सिक्ख आता है, सेवादार आता है
उसे कह देंगे| तभी भाई लहणा जी
वँहा आ पहुँचे| गुरुनानक देव जी
ने उन्हें लोटा निकालने के लिए कहा| उन्होंने
बिना कुछ विचार किये नाले में लोटा निकालने के लिए हाथ डाल दिए| तब
श्री गुरुनानक देव जी ने फरमाया-किसी को कीचड़ में से निकलने के लिए खुद भी कीचड़
में जाना पड़ता है| उनकी कृपा से
अनेको का उद्धार होता है|
एक बार श्री दूसरी पाद्शाही
जी श्री गुरु महाराज जी के दिल में श्री परमहंस दयाल जी के श्री दर्शनों की तीव्र
इच्छा हुई | स्वामी जी उस
समय जयपुर में विराजमान थे | अतः आप जयपुर पहुँचे | वहाँ श्री परमहंस दयाल जी की मौज कुछ ऐसे हुई कि अभी आप दंडवत प्रणाम करके
बैठने ही नहीं पाए थे कि आज्ञा हुई तुरंत वापिस लौट जाओ | श्री आज्ञा पाते ही आप वहाँ से तुरंत वापिस आ गए | उस समय की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता | उधर यह आज्ञा फरमाई जा रही थी कि ‘एकदम लौट जाओ’ इधर स्वामी
जी के नेत्रों में जल भर आया| परन्तु किसी से कुछ नहीं कहा | अंदर ही पी गए | जिस स्थान पर स्वामी जी विराजमान थे उस स्थान से चलकर अभी
आप थोड़ी ही दूर पहुँचे थे कि मार्ग में पंडित जगन्नाथ जी जो कि आपके दर्शनों के
लिए घर से आ रहे थे, मिल गए और उन्होंने आपको अपने साथ घर ले जाकर भोजन करवाया और अपने लड़के को
गाड़ी के किराये के लिए रुपए देकर आपके साथ भेज दिया| इस काम से निपटकर जब पंडित जी स्वामी जी के पास पहुँचे तो
उन्होंने स्वामी जी को सारा वृतांत सुनाया| तो स्वामी जी के नेत्रों से जल की धारा बह निकली और फरमाया
कि पंडित जी आज तो हम तेरे भी ऋणी हो गए | हमारी तो ऐसी मौज थी और इसमें एक गुप्त रहस्य भी था | परन्तु किसी ने हमारी मौज को न पहचाना | इसलिए हमने वापिस जाने को कहा, लेकिंन यहाँ तो सबके दिल अंधे है किसी ने उन्हें पानी तक न
पूछा | ऐसा कहकर परमहंस दयाल जी
मौन हो गए | उधर आपने पुनः
आगरा जाकर तपस्या शुरू कर दी | यहाँ सिखने वाली बात ये है कि श्री गुरु महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने
अपने गुरु महाराज जी श्री परमहंस दयाल जी की आज्ञा को मुख रखा | और मन में तनिक भी
संशय नहीं किया कि गुरु महाराज जी ने ऐसा क्यों कहा|
गुरु की आज्ञा ही सर्व
सुखों की खान है गुरु की आज्ञा में ही दयाल का पहरा है | जो सेवक अपने सतगुरु की
आज्ञा को मुख रख कर चलता है तीनो लोको में ऐसे सेवक का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है|
ऐसा सेवक ही सतगुरु को सर्वप्रिय है |
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