Thursday, March 12, 2020

असली मंजिल

 

असली मंजिल

 

कहते हैं कि जब इंसान इस धरती पर जन्म लेता है तो सबसे पहले वह रोना शुरू करता है | उसके रोने की आवाज में कॉइन कॉइन की ध्वनि होती है |आत्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इसका मतलब यह है कौन हूं ? मैं अर्थात बच्चा धरती पर जाकर सबसे पहले यही प्रश्न करता है कि कौन हूं मैं ? अब बच्चों के सगे संबंधी उसे सांसारिक दृष्टिकोण से उसके रिश्ते नातों से अवगत करवाते हैं | कोई उसे कहता है कि तू मेरा बेटा है, कोई कहता है तू मेरा भतीजा, तो कोई कहता है तू मेरा भांजा है, इसी तरह सभी उसे बच्चों को उसकी पहचान  बताते हैं | फिर उसे बच्चों को किसी नाम से पुकारा जाने लगता है | धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता है | जैसा-जैसा उसे अपने परिवार से अपने आसपास के लोगों से सीखने को मिलता है, वैसे-वैसे विचार उसके बांटे जाते हैं | फिर जिस राह पर वह चलने लगता है, उसे यह मालूम ही नहीं होता कि क्या यह सच की राह है, यह झूठ की राह | जो सीखा था इतनी समझ थी उसी को सत्य मन कर भ्रम में जीत चला जाता है | किसी शायर ने कथन किया है कि

किस लिए दुनिया में आया

समझ ना इस राज को

लग गया रोगी की फिक्र में

भूल गया असली बात को

छोड़ दे तू फिकर अपनी और जिक्र कर भगवान का

फिक्र तेरी खुद करेगा जिसने जमा दिया इंसान का

बंदगी मलिक की करना असली तेरा काम था

गैर ख्यालों को हटाकर दिल में बसाना मलिक का नाम था

चेत जा और जाग जा है जिंदगी दो-चार दिन

कर ले नाम भक्ति की कमाई सवर जाए तेरा जीवन

अर्थात संसार में आकर जो काम जीव ने करना था, वह तो भूल ही गया सिर्फ अपने शारीरिक सुखों में फंस गया | हर समय बस यही चिंता जीव को सताती है कि संसार की हर वस्तु मेरी हो जाए |मुझे किसी चीज की कमी ना रहे | हर कोई मुझे सम्मान दे मेरी बातों को हर जगह तवज्जो मिले | हर काम में मैं ही आगे रहूं, लेकिन जीव यह भूल जाता है कि आगे बढ़ाने के चक्कर में वह सबसे पीछे होता जा रहा है | क्योंकि वह आगे पहुंचाने के लिए झूठ निंदा चालाकी इरशाद स्वार्थ आदि बुरे अवगुणों को अपने अंदर बताता जा रहा है वह यह भूल गया है कि क्या जिन सामानों को वह इकट्ठा कर रहा है या जी मान सम्मान को पाने के लिए वह सारा दिन चिंतित रहता है, वह सब शरीर तक ही सीमित है जब शरीर में से आत्मा निकली तो इस शरीर का महत्व ही खत्म हो जाता है | तब संसार  की कितनी भी कीमती वस्तु क्यों ना हमारे पास हो हमें उसे छोड़ना पड़ता है | जिन रिश्ते नाटो से हम पूरा जीवन मोल लगाते हैं अंत में वह भी साथ नहीं देते लेकिन यह समझ जीव को जन्म से लेकर मरण तक या तो आती नहीं है या आती है तो वह माया में इतना उलझा हुआ है, कि अपनी आत्मा के सुख के बारे में कभी नहीं विचारता अपितु नश्वर चीजों से प्रीति लगता है और अमिट समय में उन्हीं चीजों को त्यागना पड़ता है जिनके पूछे पूरा जीवन लगा दिया | उदाहरण लिया जाए की कोई व्यक्ति अगर नहीं गाड़ी को लेकर अपने घर पर आए और वह रोज उसे गाड़ी को साफ करें उसे पर तरह-तरह की आकर्षित चीज लगे, उसे पर सजावट करें, उसे और अच्छे से अच्छा बनाने की कोशिश करें पर उसे चलाने चलाई ना तो एक न एक दिन उसके आसपास के लोग उसे अवश्य कहेंगे कि भाई तूने गाड़ी तो ले ली ठीक है, पर तो उसे सजाता रहता है रोज उसकी सफाई करता है पर इसे चलता नहीं है | जो असली काम है गाड़ी को चलाने का वह तो करता ही नहीं है |इसीलिए इसी तरह धीरे-धीरे सभी लोगों से समझाना शुरू कर देंगे की गाड़ी का जो असली उद्देश्य है कि उसे चलाया जाए वह तो पूरा करो लेकिन यह बात सिर्फ वही लोग उसे व्यक्ति को कहेंगे जिन्हें पता है की गाड़ी किस लिए ली जाती है जिन्हें गाड़ी का उपयोग नहीं पता,वह उसे व्यक्ति को कभी नहीं कहेंगे ठीक इसी तरह कहते हैं कि मलिक ने यह जो मनुष्य तन हमें दिया है यह भी किसी विशेष कार्य के लिए हमें मिला है लेकिन इसके बारे में कोई हमें कुछ नहीं बताता कि इसका क्या मकसद है किस लिए शरीर मिला है | क्योंकि किसी को खुद ही नहीं पता संसार में लोग खुद ही नहीं जानते कि हम किस लिए इस दुनिया में आए हैं तो दूसरों को क्या बताएंगे सारा जीवन इंसान अपने शरीर की सजावट में लगा देता है लेकिन उसे यह कोई नहीं बताता कि शरीर का असली काम क्या है किस लिए मलिक ने यह पारस रूपी शरीर इस आत्मा को प्रदान किया है इस बात का बुद्ध जीव को पूर्ण सतगुरु की शरण में जाकर होता है | सतगुरु शरण में पहुंचकर ही जीव को सच और झूठ की परख होती है उसे पता चलता है कि इस जन्म का क्या उद्देश्य है अपने शरीर को शरीर की विशेषता का पता चलता है सतगुरु क्षण में जाने से इंसान की प्रवृत्ति भी बदल जाती है कहां भी है कि पहले यह मन काग था करता जीवन धात अब तो मां हंस भैया जुग जुग मोती खत अर्थात कहा की प्रवृत्ति गंजी खाने की होती है उसके सामने कितना भी अच्छा खाने का सम्मान हो वह हमेशा गंदगी ही उठेगी इसके विपरीत हंस हमेशा सुचे मोती ही उठता है | बुरे सामान कभी नहीं उठाता | ऐसे ही जीव के मन की दशा बहल जाती है जब जीव सतगुरु शरण में पहुंचता है जीव बुराइयों को त्याग कर गुणों को लेना शुरू कर देता है | जीव के लिए सबसे अनमोल है सतगुरु की शरण मिलना| जिन्हें सतगुरु की शरण मिल गई समझो उस व्यक्ति को सत मार्ग मिल गया और एक लक्ष्य मिल गया | जिसे वह सतगुरु की कृपा से ही पूरा कर लेता है |

परमात्मा से आत्मा जुदा रही बहू काल,

सुंदर मेला हो गया, जब सतगुरु मिले दयाल |

 इस आत्मा का परमात्मा से मिलन सतगुरु ही करवाते हैं |सतगुरु ही जीव के सच्चे साथी होते हैं जो इस लोक में भी जीव को खुशियां प्रदान करते हैं और परलोक में भी | इसीलिए अगर किसी के मन में सत मार्ग जानने की इच्छा है तो पहले वह सतगुरु की चाहना करें जब जीव सतगुरु की चाहना करेगा तो सतगुरु खुद ही उसे शिष्य को ढूंढ लेंगे | वैसे तो सुनने में आता है कि जिस व्यक्ति को प्यास लगती है वह पानी के पास खुद चल कर जाता है, लेकिन पुरण सतगुरु अपने शिष्य की प्यास भुजाने खुद आते हैं |अगर मन में सच्ची चाहना होगी तो सद्गुरु खुद ही मिल जाएंगे और सतगुरु मिलेंगे तो भगवान को पाने का रास्ता भी मिल जाएगा क्योंकि सतगुरु ही भगवान के सबसे करीब होते हैं और भगवान का ही रूप होते हैं वह जीव को पूर्णता आत्मा में परमात्मा का मिलन करवाने का बोध करवाते हैं | इसके लिए वह अपने वचनों द्वारा जीव को राह दिखाते हैं | इतिहास भी साक्षी है कि बिना गुरु के किसी ने भगवान को नहीं पाया|  जितने भी बड़े-बड़े भक्त हुए हैं जैसे शबरी, मीरा, धन्ना, स्वामी विवेकानंद, कबीर आदि इन सब ने गुरु धारण किया | तब जाकर भगवान की प्राप्ति हुई और फिर भगवान के रूप में ही रंग गए कथन आता है कि

वेद शास्त्र और भागवत गीता पड़े जो कोई,

तीन कल संतुष्ट मन बिन गुरु कृपा ना हुए |

अर्थात बिना गुरु के कोई कितने भी शास्त्र पढ़ ले, गुरु के ज्ञान के बिना मन को संतुष्टि नहीं मिलेगी | गुरु ही जीव को वह मार्ग बतलाते हैं जिससे जीव का सुख होता है गुरु ही जीव को मोक्ष तक ले जाते हैं| इसीलिए अगर सच को पहचानना है तो जीव सतगुरु की संगत ग्रहण करें | जिनकी शरण में जाकर ही जीव अपनी मंजिल को समझ पाएगा और यहां इस लोक में भी सच्ची खुशियां प्राप्त करेगा और जो जब यहां से जाएगा तो भी भक्ति का धन अपने अच्छे कर्मों की कमाई साथ लेकर जाएगा | जिससे कि वहां पर लोक में भी सम्मान मिलेगा और खुशियां हासिल होंगी आप इस लेख को बड़े अच्छे से पड़े और जरूर विचार करें कि क्या जिस मार्ग पर हम चल रहे हैं जिन पदार्थों को पाने के लिए हम अपनी रात और दिन लग रहे हैं क्या वह हमारे कुछ काम आएंगे | अपने आप को सांसारिक बंधनों में इतना ना फसांये की अपने लिए भी समय ना रहे | जो जीव की असली पूंजी है जो साथ जाने वाली वस्तु है मालिक का नाम वह इकट्ठा करने की भी कोशिश करें| क्योंकि अंत में वही साथ जाना है गुरबाणी का वचन है

साथ न चले बिन भजन बिटिया सगली द्वारा,

हर हर नाम कमावना नानक एह धन सार |

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