सेवक सदा अपने मन पर ध्यान रखे कि कही उसका मन
उसे बईमानी में ना ले जाए | क्योंकि मन का ये काम है की मन जीव को रात दिन भटकाने
में लगा रहता है मन कभी नहीं चाहता कि जीव गुरु की भक्ति में सेवा में निष्काम भाव
से श्रद्धा के साथ आगे बड़े| सेवक को हर समय इस मन की संभाल करनी है | ऐसे ही
प्रसंग आता है श्री गुरु महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी चकौड़ी आश्रम में
विराजमान थे | किसी प्रेमी ने
महाप्रभु के चरण कमलों में कुछ धन की सेवा भेंट की | श्री महाराज जी ने स्वामी अजूनियांनंद जी को वह सेवा
संभालने को दे दी | स्वामी अजूनियानंद जी दूसरे कमरे में जाकर बक्से में सेवा रखने लगे | इतने में महाप्रभु को कोई काम याद आया तो उन्होंने स्वामी
अजूनियांनंद जी को आवाज दी | उनको आने में कुछ देर हो गई | जब वे श्री चरणों में हाजिर हुए तो गुरुदेव से पूछा – “क्या कर रहे थे ?” इन्होने प्रार्थना की – “महाप्रभु ! सेवा सम्भाल रहा था |” श्री महाराज जी ने आज्ञा दी कि “ वह सेवा यहाँ ले आओ |” फ़ौरन आज्ञा का पालन किया गया | जब वे नोट लेकर आये तो श्री महाराज जी ने फरमाया – “आज आपको
इस धन के पीछे गुरु आज्ञा उल्लंघन करने की हिम्मत हुई है, आगे चलकर पता नहीं क्या हो |” इतने शब्द कह कर श्री सद्गुरुदेव जी ने इन्हें वे नोट फाड़ने
की आज्ञा दी | ये अपने मन में
बहुत डरे कि अब क्या किया जाए ? यदि महाराज जी की आज्ञा का पालन करता हूँ तो गुरु दरबार की सेवा बेकार जाती है
और आज्ञा का उल्लंघन करता हूँ तो पाप का भागी बनूँगा | श्री सद्गुरुदेव जी ने इन्हें उलझन पड़ा देखकर कहा – “क्या
सोच रहे हो, तुरंत इन नोटों
को फाड़ दो ताकि फिर कभी आज्ञा पालन में देर न हो |” इन्होने महाप्रभु के सामने वे नोट फाड़ दिए | पता नहीं वह कितना धन था, परन्तु सच्चे सद्गुरु के दरबार में भला किस बात की कमी है ? कहने का भाव यह है कि सेवक गुरु आज्ञा के सामने जब मन अपनी
चलाने लगता है अर्थात गुरुमति भूल कर मनमति करता है तब सेवक की भक्ति का नुकसान
होता है|
एक बार श्री गुरु महाराज जी
ने किसी महात्मा जी को सत्संग का प्रचार करने के लिए किसी स्थान पर भेजा | जहाँ पर महात्मा जी को भेजा वहाँ पर महात्मा जी को काफी आदर, सत्कार मिला | महात्मा जी का मन वही पर लग गया | जब महात्मा जी वापिस आये तो स्वामी जी ने महात्मा जी को
कहीं ओर जगह जाने के लिए कहा लेकिन महात्मा जी का मन उसी जगह पर जाने का था जहाँ
पहले गए थे | उन्होंने श्री
चरणों में विनय की स्वामी जी मुझे वहीं भेज दो जहाँ मैं पहले गया था वहाँ मुझे
सारे जानते भी है | तो स्वामी जी बहस तो करते नहीं थे उन्होंने महात्मा जी को वही भेज दिया | जब महात्मा जी वहाँ पहुँचे तो किसी के घर गए और दरवाज़ा
खटखटाते रहे परन्तु किसी ने दरवाज़ा न खोला | जब कोई आया तो उसने छत पर बने कमरे में भेज दिया और बाहर से
दरवाज़ा बंद कर दिया | जब वे श्री आज्ञा के अंदर आये थे तो उन्हें पूरा सत्कार मिला था लेकिन अब
महात्मा जी ने मन की मर्जी चलाई तो किसी ने उन्हें पूछा भी नहीं | कहने का तात्पर्य जब सतगुरु की आज्ञा से काम किया जाता है
तो फिर सतगुरु इस आज्ञा में शक्ति भी प्रदान करते है और उस आज्ञा में सेवक को
बरकते भी मिलती है | लेकिन जब सेवक मन की चलाता है फिर उसमे सेवक का नुकसान है|
ऐसे ही श्री दूसरी पाद्शाही
जी के समय ही कोटली मुहम्मद सदीक में एक बार किसी थानेदार के दिल में ये ख्याल आया
कि यदि श्री गुरु महाराज जी गुरुवाणी को मानते है और मेरे साथ गुरुवाणी के ही श्री
वचन करेंगे तो मैं मानूँगा कि ये पूर्ण संत है |संगत के साथ वे भी आश्रम में श्री दर्शनों के लिए पहुँच गए | श्री स्वामी जी ने सत्संग किया | जब सत्संग समाप्त हुआ तो उस थानेदार को समीप बुलाकर कहा
–‘आप थानेदार होकर क्या काम करते हो ?’ उसने बड़े विनम्र भाव से उतर दिया कि श्री स्वामी जी ! जो
कार्य थानेदार करता है,वह मैं करता हूँ | हमारा कर्तव्य है कि चोर-डाकुओं को पकड़कर उन्हें दंड देना | आपने फरमाया -‘यदि कोई सरकारी कर्मचारी भी चोरों के साथ
मिला हुआ हो तो उसे क्या दंड देना चाहिए ?’ उसने उत्तर दिया कि जैसे दंड चोरो को मिलना चाहिए, वैसे ही उसे ही मिलेगा | आपने मुस्कराकर उत्तर दिया – ‘ठीक है, तो आप भी चोरों के साथ मिले हुए हो, आप अपने दंड स्वयं बता दीजिये |’ वह बेचारा घबरा गया और इतना कहने के लिए मन ही मन सोचा कि
मैंने तो आज तक कभी चोरी नहीं की | इतने में श्री गुरु महाराज जी स्वयं कृपा करते हुए फरमाने
लगे –‘इंसान के अंदर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार ये पांच चोर है | संकल्प, विकल्प इसकी सेना है, मन इनका सरदार है, आप केवल चोरो से ही नहीं अपितु उसके नायक से भी मिले हो | आप सब से मिलकर भी यही सोच रहे थे कि मैंने कभी चोरी नहीं
की | ये तो आपको प्रत्येक क्षण
धोखा दे रहे है | हम प्रकृति के सरकारी कार्यकर्ता है | हम आपको चेतावनी देते है इनसे बचकर रहो, नहीं तो सच्ची सरकार के दंड के भागीदार बनोगे | अंत में उन्होंने एक गुरुवाणी का श्लोक सुनाया |’ थानेदार गुरु ग्रन्थ को मानने वाला था | श्लोक सुनते ही नतमस्तक हो, श्री चरणों में क्षमा मांगने लगा| अपने मन का सब भेद प्रकट कर श्री चरणों में गुरु दीक्षा के
लिए विनय की | आपने उसे नाम
दीक्षा से कृतार्थ किया | महापुरुषों का काम ही यही है जीव को मन की बईमानी से बचाना |
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