Saturday, March 14, 2020

"क्या करना था और क्या कर रहे हैं"

"क्या करना था और क्या कर रहे हैं"

 

कुल 84 लाख अलग-अलग योनियो में से मानुष की योनी ही श्रेष्ठ बताई गई है ऐसा इसलिए है कि अन्य जितने भी पशु-जीव-जन्तु हैं वे सब भोक्ता हैं वे केवल अपने कर्मों का भुगतान करने के लिए ही संसार में आते हैं वे कुछ नये कर्म करके अपने जीवन का सुधार नहीं कर सकते। इसके विपरीत मनुष्य भोक्ता भी है और कर्ता भी है। अर्थात् वह अपने पिछले जन्मों का भुगतान तो करता ही है साथ ही साथ वह अच्छे कर्म करके अपने इस जीवन को और आने वाले जीवन को सुखमय बना सकता है। हमारे सद्ग्रन्थो में भी लिखा गया है कि मानुष देह को प्राप्त करके अपने शुभ कर्मो से ही जीव मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

अब विचार करने वाली बात है कि करना क्या था और कर क्या रहे हैं। इस दुनिया में लाखों-करोड़ो लोग ऐसे होंगे जिन्हें यह ही नही पता हम संसार में आये किसलिए है, किसलिए मालिक ने हमें भेजा है, हमारा असली मकसद क्या है इस संसार में आने का क्या है जो हमारे साथ जायेगा, ऐसे अनेकों ही विचार है। जोकि इन्सान को विचारने चाहिए थे लेकिन संसार के माया जाल में फंस कर इंसान बस झूठ की तरफ चल रहा है। अब आप ये सोच रहे होंगे की ये झूठ क्या है, हम तो सच की तरफ चल रहें है, हम अपने कार्य व्यवहार कर रहे, जिसके लिए हम आये है, अपनी-अपनी ड्यूटी निभा रहे है जो हमें मिली है। अपने रिश्तों को निभा रहे हैं। ये तो सब ठीक है कि आप लोग अपने कार्य व्यवहार कर रहे है अपने रिश्ते नाते निभा रहें हैं पर जो बात विचारने की है वो यह है कि आज इंसान की मन की दशा क्या रह गई है। इन्सान के मन में कैसे-कैसे विचार पनपते है। आप एक काम कीजिये, अपने पूरे दिन में जितने भी विचार जो भी आप सोचते है, जो भी आप करते है जो भी बोलते है वो एक किसी जगह पर लिख लें। रात के समय एकान्त में बैठ कर उन पर विचार करें । एकान्त में इसलिए कहा जा रहा है कि हम सब संसार में ऐसे उलझे पड़े है हमें सब कुछ जो हम करते है वो ठीक लगता है। हम अपने आप को ही सबसे श्रेष्ठ समझते है। इसलिए कहा गया कि एकान्त में बैठे और विचार करे, अपनी आत्मा से पूछे कि क्या जो विचार पूरे दिन में हमारे मन में आये, या जो जो काम मैंने किये वो सही थे। तो शायद आत्मा से जवाब मिलेगा 'नहीं' । आप जब ध्यान से उन बातों पर विचार करेंगें तो आपको पता चलेगा कि जो विचार मैं मन में रखता हूँ उसमें तो स्वार्थ भरा हुआ है। मै तो हमेशा ही अपने बारे में सोचता हूँ, मुझे तो यही पसन्द है कि लोग हमेशा मेरी बड़ाई करे, मेरे आगे और किसी की बड़ाई ना हो। मै ही हर जगह आगे रहूँ हर काम में लोग मुझसे राय लें। कोई मुझसे आगे बढ़ता है तो मेरा मन कहता है कि नहीं ज्ञान तो मुझे ज्यादा है ये कैसे आगे बढ़ रहा है। किसी की मदद करने से पहले मेरा मन कहता है कि क्यो करू इसकी मदद इसने तो कभी मेरी मदद नहीं की। लेकिन जहाँ अपना कोई स्वार्थ होगा वहाँ तो इन्सान मदद भी करता है और यही दिखाता है मै तो तुम्हारे साथ हूँ लेकिन असलीयत तो कुछ और ही होती है। कहावत भी है कि मुश्किल समय में तो लोग गधे को भी बाप बना लेते है । आजकल ऐसा ही हो रहा है। भगवान अगर आपको सबके मन की बात जानने की शक्ति दे दे तो आप कहोगे की इस संसार में कोई भी सही नहीं है सभी ने अपने मन में एक दूसरे के प्रति जलन रखी हुई है। एक और बात भी है अक्सर आपने देखा होगा कि जब भी हम अपने साथ काम करने वालों से मिलते है तो हम ये सोचते है कि पहले HI, Hello या नमस्ते सामने वाला करे, मन में आता है कि मै क्यों करूँ मै तो इससे बड़ा हूँ। ये तो नया नया आया है या फिर मेरा ओहदा इससे बड़ा है। ऐसे ही विचार हमारे मन में आते है । और जहां चापलूसी करनी हो किसी ऊपर के अफसर को या मालिक को खुश करना हो तो वहाँ तो बार बार Hello, Good Morning, नमस्ते अन्य तरह तरह के तरीके अपनाता है खुश करने के । इन्सान ये भी सोचता है कि सामने वाले को मैने अपनी बातों में लगा लिया । लेकिन आजकल हर कोई समझदार है विशेष करके वो जो उच्च पदों पर होते है। दोस्तों ये कोई मजाक नही है I वास्तविक्ता है जीवन की जिसे आप सब लोग समझ सकते है। अच्छा और सुनो आजकल दिखावा इतना हो गया है कि लोग कहते है कि मेरा मकान सबसे बड़ा होना चाहिए। मेरी गाड़ी बड़ी होनी चाहिए मेरे कपड़े मेरी हर चीज़ सबसे बढ़िया होनी चाहिए। आप बढ़िया चीज़ रखो इस्तेमाल करो अगर आपके पास पैसा है, कोई मना नहीं है। लेकिन आजकल जो लोग दिखावा करता है दूसरों को बताते है मेरे पास तो ब्रांडेड चीजे है, मेरे पास ये है, हमारा रहन-सहन ऐसा है हमारी Family ऐसी है ये सब दिखावा करने की जरूरत ही क्या है । अखिरकार सब भगत के बनाये बन्दे है ठीक है किसी की किस्मत में ज्यादा है तो किसी किस्मत में कम है लेकिन इन्सान बड़ा मान करता है अहम से ऐसा भरा रहता है कि मैं ही मैं हूँ और तो कुछ है ही नहीं लेकिन मेरे दोस्त ये सब चीज़ मेरे आगे काम नहीं आनी । ये सब शरीर की साथी है आत्मा से तेरा शरीर चल रहा है जब तक आत्मा शरीर में है इन्सान का मान-अपमान, चलना-बैठना - उठना सब है, आत्मा निकलते ही ये शरीर भी किसी काम का नहीं रहता और जिन चीजो को हम अपना कह कर पूरा जीवन इतना इतराते रहते हैं वो सारी चीजें भी यहीं की यहीं धरी रह जाती हैं। पूरा जीवन इन्सान जो है शरीर को खिलाता रहा, पिलाता रहा शरीर की सजावट के लिए इसके आराम के लिए तरह तरह के सामान खरीदे और अन्त में क्या हुआ यह काम किसी काया की ना रही जिस आत्मा को खुराक देनी थी। जिस आत्मा को परमात्मा से मिलाने के लिए संसार में आया, मानुष का तन मिला उस बात पर तो कभी विचार नहीं किया। पता होते हुए भी कि मालिक का नाम साथ जायेगा लेकिन संसार के ऐशो आराम में ही जीवन व्यतीत कर दिया। किसे बड़े सन्त जी क वचन है

 

'आये थे जिस काम को भूल गये वो बात ।

क्या ले मिलिये राम से, जब खाली दोनो हाथ ।।'

 

असल में हमारे मन की हालत ही ऐसी हो चुकी है कि यह मन हमेशा गलत तरफ ही जाना चाहता है दूसरों की निन्दा करने में इस मन को बड़ी खुशी मिलती है। सामने से तो लोग दूसरो की बड़ी तारीफ करते है लेकिन पीछे से वही लोग बुराई करते है। कहते हैं कि जब कभी हम किसी की निन्दा करते है तो जिस व्यक्ति की हम निन्दा कर रहे है उसके पाप तो कटते जाते है और हमारे पाप बढ़ते जाते है। एक समय का वृतान्त है कबीर साहिब जी जो कि बहुत बड़े सन्त थे एक दिन बहुत रो रहे थे तो किसी व्यक्ति ने उनसे पूछा कि आप रो क्यों रहे हो तो कबीर साहिब जी ने जवाब दिया कि आज जो है मेरा निन्दक मर गया है तो उस व्यक्ति ने कहा कि ये तो अच्छी बात है कि आप का निन्दक मर गया है अब तो आपकी बुराई नहीं करेगा। तब कबीर साहिब जी ने फरमाया कि तभी तो मै परेशान हूँ कि वो मर गया ता अब मेरी बुराई कौन करेगा। वो तो मेरी बुराई करके मेरे पाप कम करता था अब ऐसा कौन करेगा । वचन हुए कि -

 

'निन्दक हमारा ना मरे, जीये आद जुगाद ।

निन्दक ने प्रताप से, पाया मोक्ष हार ।।'

 

कितना बड़ा नुकसान है निन्दा करने का, लेकिन हम फिर भी ऐसा करते है। कहते हैं मुँह में नमक हो और रसगुल्ला खाया जाये तो स्वाइ नहीं आ सकता। इसी तरह हमारे मन में दूसरों के प्रति गलत विचार हो तो हम कितना ही भगवान को याद करे, उसका नाम जपे हमें आनन्द नहीं प्राप्त होगा । श्री राम जी के वचन है कि

 

'निर्मल मन जन, सोहि मोहे पावा ।

मोहे कपल छल, छिद्र ना भावा ।।'

 

अर्थात् भगवान को भी वही व्यक्ति पसन्द है जिसके मन में छल, कपट या दूसरों के प्रति बुरे विचार नहीं हो लेकिन आजकल इन बातों को कोई विचारना ही नहीं चाहता सभी अपनी अपनी सोच रखते है अपने अपने तरीके से जीवन व्यतीत करते है। आजकल का जो इन्सान है वो अपने दुख से दुखी नहीं है दूसरों के सुख से ज्यादा दुखी है। उसको यह तकलीफ ज्यादा है कि दूसरा व्यक्ति इतना खुश क्यों है । इन्सान किसी को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकता । कोई अच्छा काम के, या किसी व्यक्ति की हमारे सामने बड़ाई हो तो हमें तकलीफ होने लग जाती है। हमारे मन में विचार आने लगते है इससे अच्छा तो मै हूं मुझे क्यो नहीं बड़ाई मिली - इसे क्यों मिल रही है। ऊपर से इन्सान दिखावा करता है मुझे मान-सम्मान नहीं चाहिए लेकिन अन्दर से हर कोई चाहता है कि मुझे ही हर जगह बड़ाई मिले। मै ही सबसे आगे रहूँ। लेकिन होता क्या है कि इसी आगे बड़ने के चक्कर में हम सबसे पीछे हो जाते वचन भी है कि

 

'भक्त तो हारा भला, जीतन दे संसार ।

हारा तो हरि से मिले, जीता यम के द्वार ।।'

 

अर्थात जो भगवान का भक्त है वो हमेशा यही कहता है कि मै पीछे रहूँ वह अपने आप को छोटा समझता है अपने को अज्ञानी समझता है तो भगवान से जाकर मिलता है क्योंकि उसके मन में अहम नहीं है लेकिन जो ये सोचता है कि मैं ही हर जगह आगे रहूँ मै ही हर जगह जीत मुझसे आगे कोई ना बड़े तो वो इस चक्कर में अपने ही नुकसान करवा कर यम के द्वार जा पहुचँता है। भक्त जो है वो, हार कर भी जीत जाता है। कहते है कि भगवान को खुश करने के लिए बड़े बड़े यज्ञ, कर्म काण्ड की जरूरत नहीं है। आप सबकी मदद करो सबके साथ अच्छा करो, मीठा बोलो भगवान आपसे बहुत प्रसन्न होगे। सबके साथ एक सा व्यवाहर करो ऐसा नहीं कि कोई गरीब है तो उसे लड़ झगड़ के बात कर रहे है और अकीर के साथ बड़े प्यार से । जीवन का सरल तरीके से जियो दिखावे की कोई जरूरत नहीं है जितना हम अपने मन में दूसरो के प्रति गलत विचार लायेगे तो नुकसान तो हमारा भी होगा। कहते है कि माचिस की तीली से किसी दूसरी चीज को जलाया जाये तो पहले तो तीली आप भी कुछ जल जाती है ऐसा ही होता है किसी की बुराई करेंगे चाहे दूसरा इन्सान सच में ही बुरा है। लेकिन बुराई करते वक्त हमारे मन को भी तकलीफ होगी ही, हमें भी दुख मिलेगा। जैसे फूल अपनी खुश्बू से सबको महकाता है ऐसे ही हम भी अपने कर्मों से अपनी अच्छाईयों से दूसरों को सुख पहुंचा सकते है। इस लेख मे मै यही चाह रहा हूँ कि आप सब विचार करे कि हमारे दुख का कारण हमारे मन में आने वाले बुरे विचार ही है। ह इन्हें मन से निकाल कर जीवन को अच्छे से जिये सबके साथ अच्छा करे जितना समय था जितने स्वास मालिक ने हर दिए है उन स्वासो को अच्छे कामों में लगाये जितना समय मिले उस परमपिता को भी याद करे जिसने हमें मानुषत दिया है। फिर आपका ये जीवन भी सुखमय बनेगा और आगे परलोक में भी सुख प्राप्त होगा ।।


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