सेवक गुरु दरबार में जो भी सेवा करे पूरी सच्चाई
के साथ करे | सेवक के मन में ये भावना रहे कि मेरे स्वामी की नजर हमेशा मुझ पर है
वे मेरे हर कर्म को जानते है |
एक दिन एक भक्त मेलाराम जी श्री दूसरी पाद्शाही जी के श्री चरणों में हाजिर
हुआ | श्री महाराज से दीक्षित
होकर वह आश्रम में सेवा करने लगा | लंगर के लिए सामान खरीदने की सेवा श्री मेलाराम जी के
जिम्मे कर दी गई | उनकी गुरु निष्ठा चूँकि सुनी सुनाई बातो पर निर्भर थी इसलिए माया के चक्कर ने
उसे और भी भ्रमित कर दिया | पूरा विश्वास न होने के कारण भजनाभ्यास में भी कोई आनन्द नहीं आता था | वह मन ही मन सोचने लगा कि चार दिन स्थान को छोड़कर व्यापार
करके जीवन निर्वाह किया जाए| मंजिल और ध्येय बदला तो साधन और काम भी साथ ही बदल गए| अब जीवन ध्येय परमार्थ का तो था नहीं, केवल स्वार्थ ही स्वार्थ था| वह बाजार जाता तो सैकड़ो माल खरीदता | धीरे-2 वह स्वयं भी गोलमाल करने लगा | और चूँकि उसकी चोरी किसी ने न पकड़ी और जतलाई थी इसलिए उसके
मन में यह संकल्प कर गया था कि श्री महाराज जी को लोग अन्तर्यामी कहते है यदि
अन्तर्यामी होते तो मेरी हेरा-फेरी से मुझे जरुर रोकते | इसी बीच किसी श्रद्धालु ने बहुत अच्छा घोड़ा लाकर श्री चरणों
में अर्पण किया | स्वामी जी ने इस घोड़े को नहलाने और उसकी देखभाल करने का जिम्मा भक्त मेलाराम
जी को दे दिया | एक दिन मेलाराम घोड़े को नहलाने के लिए चनाव नदी
पर ले गया| घोड़ा गहरे पानी
में चला गया और नदी में बह गया | मेलाराम रोनी सूरत बनाये श्री महाराज जी के चरणों में हाजिर हुआ| श्री स्वामी जी ने फरमाया- ‘मेलाराम ! रोता क्यों है ? क्या हुआ जो घोड़ा बह गया ?’ मेलाराम ने विनती की – ‘महाराज ! मैंने दरबार को बहुत
नुकसान पहुँचाया है | ’श्री स्वामी जी ने फरमाया – ‘यह नुकसान तुमने जान बुझकर नहीं किया इसलिए रोने
से क्या फायदा? दुःख और
पश्चाताप तो उस नुकसान पर करो जो तुम जान बुझकर गुरु दरबार का कर रहे हो |’ श्री स्वामी जी के मुख से ये वचन सुनते ही भक्त मेलाराम पर
बिजली सी गिर पड़ी| उसने जितने पाप किये थे, उसके सामने आ गए | स्वामी जी के चरण पकड़कर वह बोला- ‘महाप्रभु ! मुझे क्षमा कर दो, मैं पापी हूँ |’ तब स्वयं ही उसने अपने मुहं से अपनी सारी करतूतों को बताया | स्वामी जी ने अपार कृपा करते हुए उसे क्षमा कर दिया | अन्तर्यामी प्रभु करुणा भरी दृष्टि से उसकी ओर निहारने लगे |कहने का भाव यह है कि सतगुरु तो घट -2 की जानते है वे सब
कुछ जानते हुए भी हमारे पापों पर नजर नहीं डालते और हमारी गलतियों के लिए भी हमें
माफ़ कर देते है | सेवक के मन में यदि सेवा को लेकर सच्चाई होगी लगन होगी तब तो उसे
सेवा में और तरक्की मिलती जाएगी यदि सेवक सेवा में चोरी करेगा मन के विचारों से
चलेगा तब फिर सेवक की आत्मिक उन्नति का विकास नहीं होगा| वह अपनी चतुराई से संसार
के लोगो को तो रीझा लेगा लेकिन सतगुरु की प्रसन्नता के लिए उसे पूर्ण रूप से
गुरुमति धारण करनी होगी|
एक बार श्री चतुर्थ पादशाही
जी श्री गुरु महाराज जी ने श्री आनंदपुर के शरणागतों को एकत्र कर श्री वचन फरमाए
–“गुरमुखो! श्री आनंदपुर दरबार सारी सृष्टी में रूहानियत की शिक्षा के लिए
सर्वोच्च है | फिर इस दरबार में शरणागति प्राप्त करना उच्च भाग्यों की निशानी है | जिस गुरूमुख
प्रेमी को भी अपने जीवन के कल्याण की अभिलाषा हो वह इन चार बातो को नित्यप्रति, हर समय, हर घड़ी स्मरण
रखा करे | वे चार बातें कौन सी है-
(1) दरबार की हितचिंता
(2) सच्चाई
(3) सुमति
(4) समय की कद्र |
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