Wednesday, April 29, 2020

संतो के पारमार्थिक वचन –II

(संतो के पारमार्थिक वचन –II)

 

v मोह अज्ञान की नींद से, सोते जीव जगाय |

  किरपा कर सतगुरु दिया, भक्ति पत्थ दरसाय ||

 

v सतगुरु दाता भक्ति के, सकल सुखों की खान |

  शरणागत को देत है, दुःख चिंता से त्राण ||

 

v सतगुरु की महिमा महा, अगम अपार अनन्त |

 गा गा थाके ऋषि मुनि, किसे न पाया अंत ||

 

v जप तप संयम साधना, कोटि करे उपवास |

   सतगुरु की किरपा बिना, मिटे न यम का त्रास ||

 

v  सतगुरु की कृपा बिना, मिले ना मुक्ति पंथ|

  सभी संतो का मत यही, यही पुकारें ग्रन्थ||

 

v  माया भयानक डाकिनी, खाय रही संसार|

  वही बचा जिसने लिया, सतगुरु नाम आधार||

 

v  जन्म -2 भरमत रहा, लख चौरासी माहिं|

  सतगुरु ने अति दया कर, राखा चरणन छाहि||

 

 

v  सुंदर -2 सतगुरु मेरे, सुंदर शिक्षा दीन|

  सुंदर वचन सुनाए के, सुंदर -2 कीन||

 

v  पूरण सतगुरु जो पाए है, तेरे पूरण भाग|

  छोड़ कर गफलत को बड़े, नाम भजन में लाग||

 

v  परमात्मा से आत्मा, जुदा रही बहुकाल|

  सुंदर मेला कर दिया, जब सतगुरु मिले दयाल||

 

vलख पीर पैगम्बर औलिया मुल्ला काजी शेख।
 किसे शान्त न आया बिन सतगुरु के उपदेश।।

 

v  जो राखे श्री गुरु चरणन में श्रद्धा और विश्वास|

   सतगुरु की अनुकम्पा से पूरण हो सब आस||

 

v  जे जन हरी से बिछड़े, फिरे जलंत जलंत |

   जो सतगुरु की शरण है, उनको बारा मास बसंत ||

 

v सतगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

 

v  धोवत है संसार सब, गंगा माहिं पाप |

   पावन सतगुरु के चरण, गंगा पहुँचे आप ||

 

v  भक्ति पथ पर जो चले, सतगुरु आज्ञा मान |

   तिस सौभागी जीव का, निश्चय हो कल्याण ||

 

v  अवगुण से भरपूर हूँ, मैं मतिमंद अनजान |

   याचक हूँ तव दया का, सतगुरुदेव सुजान ||

 

v  जप तप संयम कछु नही, नही भक्ति नहिं ज्ञान |

   एक भरोसा आप का, सतगुरु कृपा निधान ||

 

v  रैन दिवस है कर रहे, सतगुरु परउपकार |

   विमल भक्ति धन बख्श कर, देते सुख अपार ||

 

v  जप तप तीर्थ नेम वर्त, साधन करे अनेक|

   आवागमन ना छुतहि, बिन सतगुरु की टेक||

 

v  सतगुरु के दरबार में कमी काहू की नाहिं|

   बंदा मौज न पावही चुक चाकरी माहिं||

 

v  सतगुरु प्रकटे जगत में, हुआ अज्ञान विनाश|

   चहुँ ओर सुख छा गया, ज्ञान का हुआ प्रकाश||

 

v  सतगुरु सिष की आत्मा, सिष सतगुरु की देहि  |

   लखा जो चाहे अलख को, इन ही में लाखि लेही ||

 

v सतगुरु के चरण ह्रदय बसाए

   दुःख दुश्मन तेरी हटे बलाये

 

vभक्ति धन सतगुरु धनी, बख्श रही दिन रैन |

   जो आवे चरणार में पावे सुख और चैन ||

 

v मोह की तृष्णा धार में, सब जग बहता जाए|

   चरण सहारा बख्श कर, सतगुरु आन बचाए||

 

v सब बातों की एक बात, वचन देई बताये|

   जो सतगुरु कृपा करें, सभी बात बन जाये||

 

v  सतगुरु नाम संजीवनी, करे जीव कल्याण |

  भव के रोग मिटाय कर, बख्शे सुख निदान||

 

v  सतगुरु सम इस जगत में, नहीं हितैषी आन|

  जो बख्शे सत्तनाम धन, सकल सुखो की खान||

 

v  प्रभु प्रेम हिय ऊपजे, सतगुरु के परसाद|

  जो पीवे प्रभु प्रेम रस, ताजे जगत के स्वाद||

 

v  स्वारथ वश संसार में, प्रीत करे सब कोय|

  बिना स्वार्थ की प्रीत तो, इक सतगुरु की होय||

 

v  सतगुरु के उपदेश से, होय ह्रदय परकाश|

  ज्ञान ज्योति घाट में जले, अज्ञान तिमिर हो नाश||

 

v  सतगुरु के पावन वचन, जो ले ह्रदय धार|

  सो यम से निर्भय भया, पावे मोक्ष द्वार||

 

v  सतगुरु प्रगटे जगत में, करने जीव कल्याण|

  कष्ट कलेश हरते प्रभु, देकर नाम का दान||

 

v  माया सब जग को ठगे, काल सबन को खाय|

  जो सतगुरु की शरण है, सो निश्चय बच जाय||

 

v  सतगुरु शरण में आय कर, काग हंस होय जाय|

  सेवा सत्संग नाम के, मोती चुग -2 खाय||

 

v  कई जन्मो के पुन्य जब, फल देने को आये|

   पूरण सतगुरु की शरण, तबहिं जीव यह पाय||

 

v  कृपा सागर सतगुरु, पूर्ण करो मेरी आस|

  प्रेम भक्ति का दान दो, पाऊ तव चरणन में वास||

 

v  माया सब जग को ठगे, काल सबन को खाय|

  जो सतगुरु की शरण है, सो निशचय बाख जाय||

 

v  सतगुरु के पावन वचन, सब ग्रंथो का सार|

  श्रद्धा से सेवन किये, आनंद मिले अपार||

 

v  बिगड़ी जनम अनेक की, पल ही में बन जाए|

   जो सतगुरु के हुक्म को, माथे शीश चढ़ाए||

 

v  हाथ जोड़ श्री चरण में, विनय करे यह दास|

  तव चरणन में सतगुरु, दृढ रहे मम विशवास||

 

v  जो माने सतगुरु वचन ताके दुःख सब दूर |

   सुख संपत्ति ताके सदा बनी रहे भरपूर ||

 

v  सतगुरु के प्रसाद से, कागा हंस हो जाय |

   मलिन विषय रस त्याग कर, गुरु के शब्द समाय ||

 

v  सतगुरु कृपा से जीव का, ज्ञान चक्षु खुल जाय |

   अटपट मार्ग छाड़ि कै, सूधो को अपनाय ||

 

v  बड़े भाग से पाईये, सतगुरु का सत्संग |

   रहे न फिर संशय भ्रम, लगे नाम का रंग ||

 

v  धरती जहाँ लख देखिया, तहाँ लग सभी भिखार |

   दाता केवल सतगुरु, देत न माने हाथ ||

 

v  सतुगुरु की कृपा बिना, होय न आत्म ज्ञान|

  ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, गावत वेद पुराण||

 

v  निंदक हमारा न मरे, जीवे आग जुगाद |

   हम तो सतगुरु पाया, निंदक के प्रसाद ||

 

v सुख के साधन बहुत कियेदुःख और चिन्ताबढ़ी।

सहजे ही सुख मिल गयाजब सतगुरु शरणगही।।

 

v  चंचल मन नहीं स्थिर रहता, लाख कोई समझावे|

  गुरु शब्द का चाबुक लागे, तब यह वश में आये||

 

v  गुरु शब्द दृढ नाव है, गुरु सेवा पतवार|

  कर्णधार गुरु देव है, तुरंत लगावे पार||

 

v  पाप ताप मिट जात है, मिट जाता संताप|

  जो जन श्रद्धा से करे , गुरु नाम का जाप||

 

v ईश कृपा बिन गुरु नहींगुरु बिना नहीं ज्ञान।

  ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहिं वेद पुरान।।

 

v  बिना कृपा गुरुदेव की, होय न आत्मज्ञान|

  ज्ञान बिना नहिं मुक्ति है, वेद पुराण प्रमाण||

 

v  जग की आशा छोड़कर, जो राखे गुरु आस|

  तिस सौभागी जीव के, सब कारज हो रास||

 

v  चौरासी छूटे नहीं, बिना कृपा गुरुदेव|

  ताते श्रद्धा प्रेम से, करो गुरु की सेव||

 

v  गुरु नाम प्रताप से, सब व्याधि टल जाय|

  श्रद्धा सहित सुमिरन किये, जीव परम पद पाय||

 

v  अडसठ तीर्थ गुरु चरण, कहते संत सुजान|

  सकल पाप धुल जात है, कर श्रद्धा से स्नान||

 

v  गुरु माता गुरु पिता है, गुरु भ्राता गुरु मीत |

   गुरु सम प्रीतम जगत में, मोहि न आवे चीत ||

 

v  गुरु को सब कुछ जानिएँ, किजिये निसदिन सेव |

   गुरु सहीं गुरु साइयाँ, गुरु है सच्चे देव ||

 

v  दीपक गुरु का वचन है, चले जो लेकर साथ |

   जगत अँधेरी कोठरी, कबुँह न भटके पाथ ||

 

v  ज्ञानी के हम गुरु है, अज्ञानी के दास |

   वह पकड़ेगा लाकड़ा, हम पकड़ेंगे घास ||

 

v  ध्यान मूलं गुरु मूर्ति, पूजा मूलं गुरु पदम |

   मन्त्र मूलं गुरु आज्ञा, मोक्ष मूलं गुरु कृपा ||

 

v  ज्ञान ध्यान अरु योग जप, गुरु सेवा सम नाहिं |

   भक्ति मुक्ति और परम पद, सब गुरु सेवा माहिं ||

 

v गुरु किरपा ते मन बसै, साचा हरि का नाम ।

   बड़भागी ते जीव हैं, जो सुमिरहिं आठों याम ।।

 

v  जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु है मैं नाहिं |

   प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं ||

 

v  गुरु तो ऐसा चाहिए शिष्य से कछु न ले |

शिष्य को ऐसा चाहिये की गुरु को सर्वस्व दे ||

 

v  वेद शास्त्र अरु भागवत  गीता पढ़े जो कोय |

   तीन काल संतुष्ट मन, बिन गुरु कृपा न होय ||

v  गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु:  गुरुर्देवो महेश्वरः |

   गुरु: साक्षात् परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

 

v  तीर्थ मज्जन गुरु दर्शन पाया|

   चरणी लागे ता पाप गवाया||

 

v  गुरु समरथ सर पर खड़े ,कहा कभी तोही दास |

   रिद्दी सिद्दी सेवा करे, मुक्ति न छाडे पास ||

 

v  मानुष जन्म की कीमत भारी, विरले गुरुमुख जाने|

   सत्पुरुषों के संग में आके, खुद को ये पहचाने||

 

v  गुरु लाग तब जनियेम, मिटे मोह तन ताप

   हर्ष शोक व्यापे नहीं, तब गुरु आपे आप

 

v यह मन वैरी सबल है, इसके साथी पाँच ।

जो जन सतगुरु शरण पड़े, कबहुँ न लागे आँच ।।

 

v  तन पवित्र गुरु सेवा से, धन पवित्र कर दान|

  मन पवित्र हरि भजन से, इस विधि होत कल्याण||

 

v  गुरुमुख के मन सदा, नित सेवा भक्ति की प्यास|

   मनमुख रहे झुरता, मन विषयन की आस||

 

v  गुरुमुख गुरु चरणार में, वारै तन अरु प्राण|

  अमर होय संसार में, पावै पद निर्वाण||

 

v  गुरुमुख ऐसा चाहिए जैसे सूरजमुखिया फूल |

   जो सतगुरु आज्ञा करे सदा रहे अनुकुल ||

 

v  माया भूलावे सब जग भूलया, विसरया करतारा|

   माया तजे भक्ति चित्त लावे, विरला गुरुमुख प्यारा||

 

v  जब नजरे करम हो सतगुरु की, तो मंजिल कुछ दुश्वार नही |

   हाँ! नजरे करम पाने के लिए, सतगुरु को रिझाना पड़ता है ||

 

v  श्री सतगुरु के दीदार कर, तृप्त भये दो नैन|

  तन मन शीतल हो गया, पाया सुख और चैन||

 

v सच्चे रक्षक जगत में सतगुरु दीन दयाल

लोक और परलोक में हर पल करे संभाल

 

v सेवा गुरु-दबार की, खुशनसीब ही पाते हैं ।

नेक नाम भी होता है, जन्म सफल कर जाते हैं ।।

 

v दिन को रोशन सूरज करता, रात को चाँद सितारे |

  हर दिल को रोशन करते, मेरे सतगुरु प्यारे ||

 

v जब जब भी मेरा दिल उदास हो है

मेरा सतगुरु मेरे साथ होता है

 

v  प्यार प्रभु का पा करके, सबका मन हर्षाया है

   हो लाखों लाख मुबारिक सबको, दर्शन ये प्यारा पाया है

 

v  दर्शन तेरे की प्रभु, लगी रहे आस|

  बन चकोर देखा करूँ, तुम्हे प्रभु दिन रात||

 

v  ऐसी अनुकम्पा करो, करू सदा गुण गान|

  दासनदास के चित्त बसे, सदा तुम्हारा ध्यान||

 

v दर्शन तुम्हारा सतगुरु सुखों का भण्डार है

   तेरे चरणों में सब खुशियाँ है तेरे चरणों में ही बहार है

 

v हर मुश्किल का हल निकलेगा, आज नहीं तो कल निकलेगा |

गुरु चरणों में कर ले भरोसा, पत्थर से भी जल निकलेगा ||

 

v सुनया सी की दर्शन करके मन दी प्यास है बुझ जांदी |

झूठ वे लोको झूठ है ऐ ते और जादा वधदी जांदी है||

 

v जिन्हें फिक्र थी कल की, वो रोते रहे रात भर |

जिन्हें सतगुरु पर भरोसा था, वो सोते रहे रात भर ||

 

v जहाँ सतगुरु नाम की हो रोशनी, वहाँ होता कभी भी अँधेरा नही

  तू ही तू की सदा धुन बजने लगे, वहाँ होता तेरा मेरा नहीं

 

v खुद याद तेरी आ जाती है, जब फूल कोई मुस्कुराता है|

  हर धड़कन में आवाज तेरी, आखों में रूप छा जाता है||

 

v  जीवों के कल्याण की खातिर महापुरुष अवतार धरे|

   नाम की नौका पर बिठलाकर कर भव सागर से पार करे||

 

v  जग तारण कारण प्रभु, लीन्हा है अवतार|

  अगम लोक त्याग के, आये प्रभु संसार||

 

v  ऐ एब्र ज़रा थम के बरस कही वो आ ना सके|

   जब वो आ जाए तो फिर इतना बरस के वो जा ना सके ||

 

v सतगुरु जी तुम दयालु बड़े अपने भक्तो के साथ सदा हो खड़े |

तेरे उपकार दाता इतने बड़े जितने गगन में है सितारे जड़े ||

 

v मैं सतगुरु का सतगुरु मेरे रिश्ता हो गया पक्का

धर्मराज जब खाता खोल्या रह गया हक्का बक्का

 

v  सेवा सत्संग नाम की, दी त्रिवेणी बहाय|

  सो तो भाव से टार गए, श्रद्धा से जो नहाय||

 

v भक्ति दान मोहे दिजिये, गुरु देवन के देव|

   और नहि कछु चाहिए, निशदिन तुम्हरी सेव||

 

v  अमिर वो नहीं जिनके सिर हीरो से जड़े होते है

   अमिर वो है जो सतगुरु के करीब होते है

 

v शिष्य ने गुरु ऊपर किया तन मन धन कुर्बान

सतगुरु दाता ने दिया भक्ति रत्न धन खान

 

v  सेवा गुरु दरबार की, करे जो मन चित्त लाय|

  नर तन को सफला करे, सुख आनंद को पाय||

 

v  सतगुरु तेरी याद में, हम सब थे बेचैन|

  पाकर दर्शन आपका, पाया सुख ओर चैन||           

 

v तैनू पावान दी चाह मैंनू इस जामे विच ल्याई

वरना मैंनू इत्थे आवन दी लोड़ नहीं सी कोई

 

v  जिस भाव से भजते मुझको, वैसा ही फल पाते है|

  अपनी भावना से ही वे सब, मुझसे  मिलना चाहते है||

 

v परमहंस के रूप में, प्रकटे श्री भगवान |

  श्री दरबार बनाइया, करने जगत कल्याण ||

 

v  श्री परमहंस के रूप में प्रकट भये जगदीश|

   श्री चरणन की छावं में करी भक्ति बक्शीश||

 

v  परमहंस का रूप धर, प्रभु जग में प्रकटाय|

   भवसागर में डूबते, रहे है जीव बचाये||

 

v  त्याग अनामी लोक को, प्रभु जगत में प्रकटाय|

   जीवो के दुःख हरण को, परमहंस बन आय||

 

v  कर्णधार बन आये है, श्री परमहंस अवतार|

  नाम जहाज चढ़ाय कर, कर रहे भव से पार||

 

v पारब्रह्म परमेश्वर सतगुर सुन भक्तों की करुण पुकार |

धुर धाम से आये धरा पर करने भव से पार ||

 

v  पांच नियम दरबार के, है ये सुख की खान|

  श्रद्धा से पालन किये, निश्चय हो कल्याण||

v  सतगुरु ने भक्ति के, नियम दिए है पांच|

  श्रद्धा से जो नित करे, ताको लगे ना आंच||

 

v पांच नियम भक्ति के बनाकर सतगुरु कीन्हा बहुत उपकार|

श्रद्धा सहित सेवन करते हो जाते भवसागर से पार||

 

v पांच नियम जो नित करे, दिल में श्रद्धा धार ।

  लोक और परलोक के, सतगुरु ज़िम्मेवार ।।

 

v पाँच नियम ये भक्ति के जो भी गुरु मुख रोज है करते |

महापुरुषों के प्यारे बनते, सतगुरु उनके दिल में बसते ||

 

vश्री आरती-पूजा होय जहाँ, श्री परमहँस विराजमान ।

  जेहि घर गुरु की भक्ति है, सो घर बैकुण्ठ समान ।।

 

v दरबार श्री आनंदपुर में दुःख दर्द मिटाए जाते है

हर गम के मारे जीव यहाँ सीने से लगाए जाते है

 

v  किरपा करके रच दिया, श्री आनंदपुर दरबार|

  सेवा भक्ति नाम , खोल दिया भण्डार||

 

v  हिलते हुए लब, हंसता चेहरा, मासूम नज़र, भोला मुखड़ा|

   तस्वीर का जब यह आलम है, वो नूरे- मुज्जस्म क्या होगा||

 

v  खाओ पियो ऐश करो पर बात ना भूलो एक,

   श्री आरती पूजा, सेवा, सत्संग, सिमरण और ध्यान|

   नित करो चाहे बाधा आए अनेक||

 

v अमर रहे तेरी जोत सदा, अमर रहे तेरा नाम |

  युगों -2 तक अमर रहे, श्री आनादपुर धाम ||

 

vसतगुरु के उपकार का बदला दिया न जाइ।

तीन लोक की सम्पदाभेंटत मन सकुचाइ।।

जैसे सतगुरु तुम करीमुझ से कछु न होय।

विष भाँडे विष काढ़ करिदिया अमी रस मोय।।

अर्थः-सतगुरु के उपकार का बदला नहीं दिया जा सकता। उनके उपकार के बदले में तीन लोक की सम्पदा भेंट करते हुये भी मन में संकोच का अनुभव होता हैक्योंकि उस उपकार की तुलना में तीनों लोक की सम्पत्ति और वैभव भी तुच्छ हैं। शिष्य गुरु के उपकार के मूल्य को जानता समझता है। इसलिये वह प्रार्थना करता है कि ऐ सतगुरु! जो आपने मुझ पर उपकार किया हैउसके बदले में मुझ से कुछ भी नहीं हो कता। आपने तो हमारे विष-भरे मन में से विषैली वासनाओं को निकालकर उनके स्थान पर प्रेमाभक्ति का अमृत भर दिया। भला इससे बड़ा उपकार और क्या हो सकता है?

 

v  सतगुरु ऐसा कीजिये, पड़े निशाने चोट|

   सुमिरण ऐसा कीजिये, जीभा हिले ना होठ ||

अर्थात ऐसे सतगुरु की शरण में जाओ जो तुम्हें तुम्हारे इच्छित लक्ष्य ‘मुक्ति’ की ओर ले जा सके| वे तुम्हें ‘नाम’ अभ्यास का रहस्य बतायेंगे जिसमे न जीभा और न होठ हिलाने की जरुरत है|

 

v  नम्र भाव अति प्रीति युक्त , चरण कमल शिर नाय|

   जो सतगुरु आज्ञा करे, लीजै शीश चढ़ाय||

सत्गुरुदेव जब भी अपनी मौज से किसी सेवक को कोई सेवा बख्शते हैं और सेवक गुरु आज्ञा को श्रद्धा पूर्वक शिरोधार्य कर सेवा के कार्य में जुट जाता है, तो सतगुरु की कृपा आशीर्वाद से प्रकृति की समस्त शक्तिया सेवक की सहायता करने के लिए तत्पर हो जाती है| सम्पूर्ण कार्य तो सतगुरु की आज्ञा से व शक्तियाँ ही करती परन्तु नाम सेवक का होता है, यदि सेवक यह समझता है की जो सेवा वह कर रहा है, वह अपनी बल और बुद्धि से, अपने सामर्थ्य से कर रहा है और ऐसा समझकर उसके मन में अहंकार आ जाता है तो यह उसकी भूल है| सच्चे सेवक को अहंकार से सदैव बहकना चाहिए, क्योंकि अहंकार ऐसा शत्रु है जो भक्ति की सारी कमाई को नष्ट कर देता है|

 

v  ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास |

   गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास ||

ज्ञान, सन्त - समागम, सबके प्रति प्रेम, निर्वासनिक सुख, दया, भक्ति सत्य - स्वरुप और सद् गुरु की शरण में निवास - ये सब गुरु की सेवा से मिलते हैं|

 

v सब साधन को मूल हैदुर्लभ सतगुरु प्रेम।

प्रेम बिना थोथे सभी ज्ञान ध्यान व्रत नेम।।

अर्थः-युगपुरुष सन्त सतगुरु का विशुद्ध प्रेम अति दुर्लभ है और यही समस्त साधनों का मूल भी है। ज्ञान-ध्यानव्रत-नियम आदि साधन तभी श्रेष्ठ हैंजबकि इनके द्वारा पवित्र प्रभु-प्रेम जाग्रत हो। अन्यथा यदि इन साधनों के द्वारा मालिक का सच्चा प्रेम पैदा नहीं होतातो फिर ये सब थोथे ही कहे जाने योग्य हैं। क्योंकि समस्त साधनों का उद्देश्य तो प्रेम की उपलब्धि ही है। मूल वस्तु यही पवित्र प्रेम हैअन्य साधन उसकी प्राप्ति के निमित्त मात्र हैं।

 

v सीस झुकायां गिर पड़े, बहु पापन की पोट।

   तातें सीस झुकाइये, लगे न जम की चोट।।

   सीस तुम्हारा जायेगा, कर सतगुरु की भेंट।

   नाम निरन्तर लीजिये, जम की लगे न फेंट।।

अर्थः-ऐ मित्र! सिर झुकाते ही पापों की गठड़ी के गिर जाने से तू महाकाल की चोट से बच जाएगा-अतः तू सदा अपना सिर सत्पुरुषों के चरणों में झुकाए रख-अपितु अपना सिर उनके समर्पित ही कर दे वरना इसे काल ही ले जायेगा। अगर तू लगातार नाम भक्ति में मग्न रहेगा तो यमराज तेरे निकट भी न फटकेगा।

 

v सतगुरु से  परिचय बिना, भरमत फिरै अन्धेर।

सूरज के निकसै बिना, कैसे होय सवेर।।

अर्थः-जब तक सन्त सतगुरु का परिचय नहीं मिला अर्थात् जीव जब तक उनसे यथार्थ दर्शन करने वाली दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं कर लेता; तब तक जीव मोह भ्रम के अन्धकार में भटकता रहता है। जिस प्रकार सूर्य के उदय हुए बिना दिन का उजाला नहीं होता; वैसे ही सतगुरु कृपा के बिना मोह अज्ञान और भ्रम का नाश नहीं हो सकता।

 

v गुरु से कर मेल गँवारा। का सोचत बारम्बारा।।

जब पार उतरना चहिये। तब केवट से मिलि रहिये।।

जब उतरि जाय भव पारा। तब छूटै यह संसारा।।

जब दरसन देखा चहिये। तब दर्पन माँजत रहिये।।

जब दर्पन लागत काई। तब दरस कहँ ते पाई।।

अर्थः-ऐ जीव! यदि संसार की कल्पना, क्लेश और अशान्ति से छुटकारा पाना है, तो गुरु से मिलने का जतन कर इसमें बार बार सोचने-विचारने की क्या आवश्यकता है? सीधी सी बात है कि जिसे पार उतरना हो, वह केवट से मिले। तथा जब तू मल्लाह से मिलकर भवसागर के पार हो जायेगा; तब संसार के जितने भी क्लेश हैं, वे सब अपने आप ही छूट जायेंगे। दूसरी बात जिसे अपना मुख देखने की इच्छा हो; उसे चाहिये कि दर्पण को माँझकर साफ करे, तब मुख साफ साफ देखने में अपने आप ही आ जायेगा। इसी प्रकार जब तक मन रुपी दर्पण पर मायावी संस्कारों की मैंल चढ़ी है, तब तक भला आत्म-स्वरुप कैसे देखने में आ सकता है? ज़रुरत है कि गुरु के शब्द की रगड़ से पहले मन के दर्पण को शुद्ध कर लिया जाये, तब स्वयंमेव अपने स्वरुप का साक्षात्कार हो जायेगा।

 

v या माया की चोट, सुर नर मुनि नहिं निस्तरै।

ले सतगुरु की ओट बिरले जन जग ऊबरै।।

अर्थः-सत्पुरुष कथन करते हैं माया की शक्ति इतनी प्रबल है कि इसकी चोट से देवता, मुनि और मानव कोई नहीं बच सका। इस प्रबल शक्ति ने समस्त संसार को अपनी लपेट में ले रखा है। इसका विस्तार लम्बा चौड़ा है और इसके प्रहार अत्यन्त गुप्त होते हैं। साधारणतया इस माया के प्रहारों से बच सकना अत्यन्त दुष्कर है। किन्तु  विरले ही ऐसे जीव संसार में होते हैं, जो सन्त सतगुरु की ओट लेकर माया के दाँव पेच से साफ बचकर निकल जाते हैं।

 

v जेहि सुख को खोजत फिरै, भटकि भटकि भ्रम माहिं।।

   भूला जीव न जानई, सुख गुरु चरणन आहि।।

अर्थः-जिस सच्चे सुख की खोज और तलाश में यह जीव भटक भटक कर अनन्त काल से धोखे और भरम के फेर में पड़ा हुआ है, उसको यह भूला जीव खुद नहीं जान सकता, जबकि वह सच्चा सुख, सच्ची खुशी और सच्ची शान्ति पूर्ण सतगुरु के चरणों में है।

 

v मम प्रिय गुरुदेव जी , निज मौज अनुसार ।

मधुर सरस कहे श्री वचन, शौच तीन प्रकार ।।

प्रथम तन की पवित्रता, होय द्वारा स्नान ।

बुरे कर्म के त्याग से, शौच दूसरा जान ।।

तृतीय चित से दग्धकर, शुभ अशुभ विचार ।

संकल्पो से रहित मन, आत्म दीदार ।।

भाव कि प्रथम शुद्धि शरीर के स्नान द्वारा होती है । दूसरी मानसिक पवित्रता जो मन को अशुभ विचारों से खाली कर देने से होती है । यह शुद्धि सत्संग श्रवण करने और साधु महात्माओं की सेवा से प्राप्त होती है । तीसरी है आत्मिक शुद्धि यह तब होती है जब चित की गहराई मे इष्टदेव के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का भी विचार न रहने पाये । चाहे व शुभ हो या अशुभ । यह शुद्धि परिपूर्ण सतगुरु की शरण संगति और पवित्र सेवा करने से होती है । सन्त सद्गुरु द्वारा प्रदान शब्द की कमाई करने से चित निर्मल हो जाता है तो घट में प्रकाश होने से समस्त शुभ अशुभ विचार दूर हो जाते है और चित एकाग्र होकर ब्रह्म मे लीन हो जाता है। यह शुद्धि उत्तम श्रेणी की है ।

 

v पहले गुरु भक्ति दृढ़ करो, पाछे और उपाय।

बिन गुरु भक्ति मोह जग, कैसे काटा जाय।।

अर्थः-जिज्ञासु और भक्ति के अभिलाषी के लिये परमसन्त श्री कबीर साहिब उपदेश करते हैं कि पहले गुरु की भक्ति में दृढ़ हो जाओ, और सब उपाय पीछे करना; क्योंकि जगत का मोह जाल बिना गुरु की भक्ति के नहीं काटा जा सकता। जब तक जगत की मोह ममता का फन्दा जीव के गले में पड़ा रहता है, तब तक सब  साधन निष्फल हो जाते हैं। मोह का फंदा काटने के लिये गुरु की भक्ति अत्यन्त आवश्यक है। मुक्त पुरुष सन्त सद्गुर की सेवा और कृपा के बिना आत्मा पर पड़े हुये मन-माया के बंधन कदापि नहीं कटते। बंधनों के कटे बिना कोई भी भवसागर के पार नहीं उतर सकता।

 

v लाखों सिर तू दे चुका यमराजा की भेंट।

   एक सीस अब खुशी से कर सतगुरु की भेंट।।

खुशी और शाश्वत आनन्द को प्राप्त करने के लिये तूने लाखों शरीर यमराज के अर्पित कर दिये हैं और अब तक तुझे सच्ची खुशी और आनन्द प्राप्त नहीं हुआ, दुःख और अशान्ति ही नसीब हुई है। अब भी अगर तू अपना ये जीवन सतगुरु के अर्पण कर दे, खुशी से भेंट कर दे तो तू निश्चय ही सच्ची खुशी और आनन्द को प्राप्त कर सकता है।

 

v जैसे लहर समुद्र की, सतगुरु कीन्हा वाक।

वाक हमारा फेर दिया, तो हम तुम कैसा साक।।

अर्थः-सतगुरु के ह्मदय सागर से एक मौज उठी-जो वचन के रुप में शिष्य पर उतरी। अगर शिष्य वह वचन नहीं मानता और उस वाक्य को वापस लौटा देता है तो परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि फिर गुरु और शिष्य में नाता क्या रहा? यह सम्बन्ध तो वचन और आज्ञा का है और वचन मानकर आज्ञानुसार सेवा करने से सेवक के अन्दर स्वयं ही भक्ति प्रेम व सच्चाई और रुहानियत घर करने लगती है इसके विपरीत यदि श्रद्धाभावना में थोड़ी सी भी कमी आ जाय तो सेवक का पैर सेवा की सीढ़ी से फिसल पड़ता है और जीव कहाँ से कहाँ जा गिरता है क्योंकि सेवक की पूँजी तो सेवा ही है जो सेवक को स्वामी से मिलाकर रखती है।

 

v  सतगुरु पावै भेद बतावै, ज्ञान करें उपदेस|

   तब कोयला की मैंला छूटै, आगि करै प्रवेस||

जैसे आग का अंगारा अगिन से दूर करने पर कोयला बन जाता है, यदि उसी कोयले को आग के बीच रख दिया जाए तो वही कोयला अंगारा रूप बनकर चमकने लगेगा, इसी तरह से यह जीव भी मालिक से अलग होकर माया में उलझ कर कोयला रूप बन गया है | सद्गुरू के उपदेश से, ज्ञान की अग्नि से यह जीव प्रकाश रूप बनकर मालिक के साथ मिल सकता है, जहाँ से यह अलग हुआ है| परन्तु जीव इस काम को स्वयं नहीं कर सकता | सद्गुरू ही जीव को निज स्वरूप का ज्ञान कराते हैं, तब इस जीव को वास्तविक का पता लगता है कि मैं ईश्वर का अंश हूँ, मुझे ईश्वर के साथ मिलना है| ईश्वर के साथ मिलने पर ही जीव सुख व आनंद का अनुभव करता है| इसलिए सद्गुरू से नाम -उपदेश की प्राप्ति करके जीव मालिक के साथ मिलने का प्रयत्न करना चाहिए | जीव को सद्गुरू द्वारा बताये हुए मार्ग पर चलने की अत्यंत आवश्यकता है |

 

v जितना हेत कुटुम्ब स्यौ, उतना गुरु सों होइ।

   चला जाय बैकुण्ठ में, पल्ला न पकड़ै कोइ।।

अर्थः-सन्तों ने कहा है कि कुटुम्ब के साथ जितना नेह है, उतना ही यदि गुरु के पावन चरणों में जीव का हो जाये; तो अबाध गति से बैकुण्ठ में चला जा सकता है। सतगुरु के प्रेम का इतना बड़ा प्रताप  है।

 

v  ढ़िग रहा तो क्या भया, जो नेक ण समझी सैन |

   सुआ समझ कर उड़ गया, सुन सतगुरु के बैन ||

यदि कोई शिष्य अपने सद्गुरुदेव जी के निकट रहकर भी उनकी मौज और इशारों को नहीं समझ पाटा तो उसे उनके सामीप्य का क्या लाभ? किन्तु संस्कारी रूहें तो दूर अति दूर रहती हुई भी लाभ उठा लेती है- जैसे पिंजरे में पड़े हुए तोते ने गुरुमुख के मुख से सद्गुरु के इशारे को सुनकर व समझकर और उसपर आचरण कर कैद से मुक्ति पाई|

 

v  द्रव्य खर्च सत पात्र में, जन्म जाये गुरु देव |

   हरि सिमरण में चित्त जेहि, सो पंडित श्रुति भेव ||

अर्थ :-  ‘धन वही सफल है, जो सत्पात्र में खर्च किया जाए| जन्म वही सफल है, जो गुरु की सेवा और भक्ति में व्यतीत होवे| तथा वेदों के रहस्य को जानने वाला पंडित वह है जिसका चित्त मालिक के सिमरन में रमा हुआ है |

 

v गुरु प्रेम में मानवा, तन मन सभी रंगाय।

फिर तू देखु विचारि करि, मोह लोभ कत जाय।।

अर्थः-ऐ मनुष्य! अपने तन मन को एक बार गुरु-प्रेम के रंग में पूरी तरह रंगा ले। तत्पश्चात तू स्वयं अपने अन्तर्मन में झाँककर देख कि लोभ-मोहादिक जिन विकारों ने तुझे चिरकाल से परेशान कर रखा था, किस प्रकार प्रेम प्रताप से पराजित होकर अपने आप ही भागने लग जाते हैं।

 

v  तब लग योगी जगत गुरु जब लग रहे निराश |

जब योगी आशा करे , जगत गुरु वह दास ||

साधु के मन में अपने निर्वाह की चिंता का होना ही उसके पतन का कारण है | यदि साधु ठीक साधु है तो संसार और उसके पदार्थ धक्के खाते उसके पीछे आयेंगे और फिर साधू उसे स्वीकार नहीं करेगा | आशा का बने रहना ही दुःख का कारण है | गुरु तब तक गुरु है जब कोई आशा न रखे | यदि दूसरे की जेब का ही ध्यान बना रहा तो वे गुरु किस बात का हुआ ?

 

v  मन समसरि शत्रु नहीं, गुरु समान नहिं सज्जन |

   गुरु को मन अर्पण करै, बड़भागी सो भक्तजन ||

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु अपना मन ही है तथा संत सद्गुरु के बिना जीव का अन्य सज्जन अथवा मित्र नहीं है| सज्जन अथवा मित्र उसी को कहा जाता है जो शत्रु का सामना करने में सहायता प्रदान करे तथा शत्रु के आक्रमण से रक्षा करे| इस दृष्टि से देखा जाए तो मन के घातों से जिव को संत सद्गुरु के अतिरिक्त कोई भी नहीं बचा सकता, ण ही मन पर नियंत्रण रखने में कोई अन्य सहायक हो सकता है|

v  “गुरु बिन गत नहीं और शाह बिन पत नही” |

अर्थात-“जिस प्रकार संसारिक कार्य व्यवहार में किसी बड़े साहूकार के बिना पत अथवा साख नही बनती उसी प्रकार भक्ति एवं परमार्थ में भी पूर्ण सतगुरु का शिष्य सेवक हुए बिना सद्गति प्राप्त नही होती| इसलिए जो मनुष्य भक्ति का अभिलाषी है, उसके लिए पूर्ण सतगुरु का आश्रय ग्रहण करना अत्यंत आवश्यक है|

 

v हैं  कान लगे मुर्शिदे-कामिल की  तरफ,

 नूरे-उरफां  है मोजज़न  दिल  की  तरफ।

 हंगामा-ए-हस्ती में है सालिक की नज़र,

   और अहकामे-तरीक़त के मसाइल की तरफ।।

   गो  मजमा-ए-हस्ती  में घिरा  रहता है,

   मगर मुर्शिद  के इशारों पे फ़िदा रहता है।।

   दुनियां  के  तरानों  से  जिसे  साज़  नहीं,

   उस  हर्फ से  कान  आशना रहता है।।

अर्थः-सच्चे भक्त के कान हर समय परिपूर्ण सन्त सद्गुरु के वचन सुनने की प्रतीक्षा में रहते हैं और उसके ह्मदय में ब्राहृज्ञान का प्रकाश झलकता रहता है। यद्यपि वह बाह्रदृष्टि से संसार के बखेड़ों में फँसा हुआ है, परन्तु साथ-साथ वह भक्ति के नियमों पर भी दृढ़ रहता है। देखने में वह निस्सन्देह सांसारिक कार्य-व्यवहार में गहरा फँसा हुआ है, किन्तु गुरु का तनिक सा संकेत पाते ही उन पर प्राण न्यौछावर करने को तत्पर रहता है। संसार के राग-रंग से उसे कुछ भी लगाव नहीं होता। उसके कानों में तो वही शब्द (जो उसे गुरु ने पढ़ाया है) हर समय गूंजता रहता है। उसे मालिक और मृत्यु सदैव स्मरण रहते हैं, इसलिये वह संसार में रहता हुआ भी अलिप्त एवं न्यारा रहता है। इसलिये हमारे विचार में तो सगुण साकार की पूजा करने वाले भक्त का पद ही उच्च है।

 

v  नारि पुरुष सब ही सुनो, यह सतगुरु की साख।

 विष फल फले अनेक हैं, मत कोई देखो चाख।।

सत्पुरुष सबको सम्बोधित करते हुये फरमाते हैं कि संसार में अनेक प्रकार के फल विद्यमान हैं जो प्रकट में अत्यन्त मनमोहक और ह्मदयग्राही दृष्टि होते हैं, परन्तु उनके अन्दर विष भरा हुआ है। इसलिये सन्त सद्गुरु का तुम्हें यह उपदेश है कि इन्हें मत चखना। महापुरुषों ने इस प्रकार के संकेत अपनी-अपनी वाणियों में दिये हैं। जो सौभाग्यशाली जीव महापुरुषों के संकेतों को समझ कर मनमति का त्याग करते हैं, वे धोखा खाने से बच जाते हैं। इसके विपरीत जो मनमति पर चलते हैं,वे काल और माया की चक्की में पिसते रहते हैं

 

v  सुभग मृदुल पद पद्म में, शत शत कोटि प्रणाम |

   उदित हुए नव सूर्य सम, सतगुरु सुख के धाम ||

  घना तिमिर था छा रहा, माया मोह कराल |

  प्रकटे प्रथम स्वरूप में श्री परमहंस दयाल ||

  तव चरणन में वन्दना, करहूँ बारम्बार |

  भक्ति- पथ दर्शावाने, लिया दिव्य अवतार ||

  भक्तजन हिय पुलकित भया, निरखत ब्रह्म स्वरूप|

  प्रेम भक्ति का सरल पथ, दर्शा दिया अनूप ||

 

v  कोटि कोटि मम वन्दना, सन्तन के सरताज |

   प्रकटे द्वितीय रूप में, श्री परहंस महाराज ||

   अनुपम तेज़ ललाट पर, अरुणाधर मुसकान ||

   रसना से मुदु मधु वचन, करत अजान सुजान ||
   जन जन में भरते रहें, आत्मा ज्योति अपार |

   तिमिर अविधा का मिटा, अतुल किया उपकार ||
   एक मेक जब होइ है, ध्याता ध्येय अरु ध्यान |

   तब ही प्रभु को पाइये, यह तुम दीन्हा ज्ञान ||

 

v  कोटिन कोटि वन्दना, दण्डवत् बारम्बार |

   तृतीय रूप में प्रकट हुए, श्री परमहंस अवतार ||

   प्रेम भण्डारी सतगुरु, प्रेम स्वरूप सुहाय |

   अनुपम सुख से भर दिया, प्रेम अमिय बरसाय ||

   सेवा भक्ति नाम का, खोल दिया भण्डार |

   भ्रमर बने प्रेमी ह्रदय, पाकर करुणागार ||

   पुष्प वृष्टि करें देवगण, दिव्य हुई झंकार |

   चौकुण्ठी यशोगान की, गूँजी जय जयकार ||

 

v  परमहंस दिव्य ज्योति यह, सुखसिंधु प्रणतपाल |

   प्रकटे चतुर्थ रूप में, श्री सद्गुरु दीं दयाल ||

   अंतदृष्टि उघाड़ने, मंजुल भेद बताय |

   ह्रदय कन्दरा छा गया, प्रखर तेज निरुपाय ||

   तव किरपा की कोर से, उधरहिं नयन विवेक |

   अति अगम भाव जलधि में, दीन्ही सतगुरु टेक ||

   मम प्रणाम चरणार मे, हे मेरे करुणेश |

   जिन के काह्र्ण स्पर्श से, भजत सकल कलेश ||

 

v श्री चतुर्थ रूप में प्रकट हुए श्री परमहंस दीन दयाल |

भक्ति का धन बक्श कर कीन्हा सबको निहाल ||

प्रेम भक्ति की अमर ज्योति से घाट में की रोशनाई |

सतगुरु के अवतार की सबको लाखों लाख बधाई ||

 

v  अमर ज्योति रहै अमर जग, मुखरित होय विशाल |

   प्रकटे पंचम रूप में, श्री सद्गुरु दाता दयाल ||

   परम पुरुष पूरण धनी, शरणागत प्रतिपाल |

   एकहि किरपा दृष्टि से, सेवक करै निहाल ||

   वन्दौ श्री गुरु पद कमल, मगल मोड़ निधान |

   परमब्रह्म साकार हो, सर्व सुखों की खान ||

   जन मन अति हर्षित भया, भक्ति सुधा को पाय|

   प्रेम –भक्ति अति महा महिम, चहुँ दिशि रही लहराय||

 

v घना तिमिर था छा रहा, माया काल कराल |

 सूर्य सदृश तब प्रकटे हुए श्री परमहंस दयाल ||

5 अप्रैल 1846, शुभ दिन रविवार |

श्री राम नवमी के दिन, लिया प्रभु अवतार ||

धन्य धरती बिहार की, धन -2 छपरा ग्राम |

श्री तुलसी राम पाठक जी के घर, प्रकटे स्वंय भगवान् ||

देवताओ ने वंदन किया, पुनि -2 शीश झुकाए |

नव मंडल से धरा धाम पर, प्रेम पुष्प बरसाए ||

 गूँज उठे सब मंदिरों में, शंक और घड़ियाल |

  जीव कल्याण हित प्रकट हुए, श्री परमहंस दयाल ||

प्रेमियों भक्तो के मन मंदिर में गूंज उठी शहनाई |

आनंद -2 छा गया सब देने लगे बधाई ||

  

v प्रेमी भक्तो के अन्तर मन की सुनी जो करुण पुकार

बहने लगी भगवान के ह्रदय करुणा की अमृत धार

दया का रूप किया धारण करने जगत उद्दार

श्री परमहंस दयाल जी प्रकट हुए बोलो जय जय कार

प्रेमी भक्तो के मन में छाई ख़ुशी अपार

श्री परमहंस दयाल जी अवतार लिया बधाई लाखों बार

 

v  जीवों के कल्याण हित हुए प्रभु साकार |

   पंचम रूप में प्रकट हुए शिर परमहंस अवतार ||

   10 जून 1970 गूंज उठी जयकार |

   इस अनमोल घड़ी की सबको बधाई बारम्बार ||

 

v  क्या कहिये नजारा कैसा, अद्भुत रंग था छाया |

   कि दो युग पुरुषों के संगम में, लहरता सिन्धु उमड़ आया ||

   ह्रदय खुशियाँ असीमित, स्वात्म रूप को पाया |

   परमार्थ के दिवाकर बन, पथ भक्ति का दर्शाया ||

   गुरु ने शिष्य को पाया, शिष्य ने गुरु को अपनाया

   नूरे-इलाही का जलवा, सकल सृष्टी में प्रकटया ||

 

v  उठी जब मौज परमार्थ की, नई दुनिया बसाने को |

   जन्मों से भटकी रूहों को, भक्ति मग दर्शाने को ||

   अमर ज्योति की किरणे दिव्य, घट घट में जगाने को |

   चले सम्राट आनंदपुर के, बिछुड़ी रूहें मिलाने को ||

   चले धरती की पुकार सुनकर, एक वन में आ पहुँचे |

   आए है राहनुमा बनकर, राह दिखाने आ पहुँचे ||

   अहो! यह कितना शांत स्थल, कुदरत ने बनाया है |

   करुणा कर प्रभु ने यहाँ, श्री संत नगर बसाया है ||                                                                     

v  संतन का स्वभाव यह, परोपकार पथ अपनाए |

   जैसे सूरज के तेज़ से, सकल विश्व चमकाए ||

   कमल कुमुदिनी का नेह, गगन में सूरज व चन्दा |

   पाकर निज निज इष्ट, होत हिय अति आनन्दा ||

   अपने ही स्वभाव से, बादल मेंह बरसावे |

   पाकर स्वाति बुंद, पपीहा प्यास बुझावे ||

   ऐसे संत जन जगत की, करैं सदा भलाई |

   ज्योति अनामी लोक की, अर्शों से उतर कर आई ||

 

v  आते अनामी लोक से प्रभु, स्वरूप साकार का धर|

   करते उद्धार सुधार अति, उपकार जन जन पर ||

   दिखाते पथ निज धाम का, परमार्थ पर चला कर |

   जो चरण शरण दृढ़ कर गहे , छूट जाये माया का डर ||

   जगत में सत्यता व धर्म की, धवजा फहराई है |

   भक्ति पथ दर्शावन को, परमहंस ज्योति आई है ||

   सुख आनद की वृष्टि करुणाकर बरसाई है |

   अमर आभा से चौकुण्ठी, अनूठी जगमगाई है ||

 

v  ऐ आधारी! योगिन बन, तू प्रभु के ध्यान में लींन रहे |

   अडिग हिमालय की भाँति, तू एक जगह आसीन रहे ||

   जड़ होकर भी प्रेम का अद्भुत, सब को पाठ पढाती है |

   प्रीति निभाने की रीति का, ढ़ग विचित्र बताती है |

 

v  युग युगों में चलता आता, गुरु शिष्य का नाता |

   कृपा करें अधिकारी शिष्य पर, पूर्ण सद्गुरु दाता  ||

   सतगुरु स्वयं आत्म-प्रकाशी, पूर्ण तत्व ज्ञाता |

   पूर्ण शिष्य निज रूप बनावें, गुण सम्प्त्र सुजाता ||

 

v  जन- मानस में भर जाय, भक्ति का उजियारा |

   फँसे जीव न विकट माया में, उतरें भवजल पारा ||

   युग युगों तक बहे धरा पर, अमर सत्य की धारा |

   बन्धन मुक्त कराने को, प्रकटैं सर्गुण अवतारा ||

 

v  सृष्टि में मोह तम अति छाए | रजो तमो विस्तार फैलाए ||

   भक्तन की कछु बनि नहिं आवे | धर्म सत्य न काहु सुहावे ||

   विप्र-धेनु का होहिं अपमाना | कुटिल पाखण्डी करहीं ज्ञाना||

   धरा –धाम बने नरक द्वारा | कर्म धर्म का रहे न विचारा ||

   भक्त – विप्र - धरा करहिं दुहाई | तजहु न प्रभु अपनी प्रभुताई ||

   काल चक्र परिस्थिति अनुसारा| प्रगटत प्रभु सर्गुण अवतारा ||

 

v 10 जुलाई 1919, दिन बृहस्पतिवार |

परम जोति परम जोति से, हो गई एकाकार ||

भक्त अमीरचंद के घर, लीनी महा समाध |

श्री स्वामी दूसरी पादशाही जी को दे कर दात रूहानी ||

दृतीय रूप में प्रकट हुए, श्री परमहंस महाराज |

श्रद्धा से शीश झुकाए सबने, की दंडवत बारम्बार ||

श्री आनंदपुर दरबार बनाया, भव तारन को जहाज |

चौकुंठी में महिमा फैली हो रही जय -2 कार ||

 

v वेद शास्त्र और संत सत्पुरुष भक्ति की महिमा गाते है|

सच्चे दिल से जो भक्ति करते वे ही भगवान् को पाते है||

जप से तप से नियम वर्त से ना अन्य कसी साधन से |

भक्ति मिलती है केवल सत्पुरुषों के चरणों से ||

भक्ति के दाता इस युग में श्री परमहंस दयाल है|

चरण शरण में जो भी आते करते मालो माल है||

जो भी उनकी शरण में आये उसके दुःख सब हरते है |

प्रेमी भक्तो के दामन में सच्ची खुशियाँ भरते है ||

 

v जीवों के कल्याण की खातिर प्रभु लिया अवतार |

सब जीवों के दुखड़े हरने धर कर आये रूप साकार |

जीवों को भाव पार लगाने लिया श्री परमहंस अवतार ||

श्रद्धा से जो शीश झुकाता लगाते उसको श्री चरणार |

रहमत अपनी बक्श कर, देते भक्ति अमोलक सार ||

सतगुरु जैसा और जगत में, कोई ना देखा तारणहार |

पल -2 क्षण -2 रे मन कर गुरु चरणों से प्यार ||

पापी से भी पापी गर श्रद्धा से शीश झुकाता श्री चरणार |

दिल से करता है पछतावां, करता माफ़ी की पुकार ||

सतगुरु अपनी रहमत करके बख्शे दोष अपार |

पावां श्री चरणों से लगाकर देते भक्ति का धन सार ||

ये महापुरुषों की महिमा है, हैं अनंत अपार |

शेष शारदा भी है हारे पार ना सके पारा वार ||

है श्री परमहंस अवतार ये, दे रहे पावां दीदार |

इन सुंदर घड़ियों की सबको हो मुबारक बारम्बार ||

 

vआये धरा पर सुख बरसाने, संतो के सिरताज

 लोक परलोक के सच्चे साथी, श्री परमहंस अवतार

 भक्ति व् मुक्ति का सच्चा, ये दरबार बनाया है

 खुशियों से सबकी झोलियाँ भरदी, जो भी चरण शरण में आया है

 

v  परउपकारी दया के सागर सतगुरु संत महान|

   युगों युगों तक अमर रहेगा श्री परमहंसों का दिव्य नाम||

   हम सब सेवक चरणों में आकर खुशियाँ सदा मनायेगे|

   श्रद्धा प्रेम से सेवा कर के गीत सदा हम गायेगे||

 

v भक्ति धन को बख्श कर करते मालोमाल |

जीवों के कल्याण हेत प्रगटे श्री परमहंस दयाल ||

सेवा नाम और सत्संग की कृपा की अपार |

सुंदर सिंहासन पर विराज रहे श्री परमहंस अवतार ||

 

vशाह पातशाह तेरे दर के सवाली, खुला सबके लिए दरबार ये आली

 सब अवतारों से तेरी शान निराली, एक श्रण में भर जाये आवे जो खाली

 इस युग के अवतार श्री परमहंस देव, जग के तारनहार श्री परमहंस देव

 

vसो दिन कैसा होयगा, गुरु गहैंगे बाँहि।

  अपना करि बैठावहीं, चरन कमल की छाँहि।।

   सुख देवे दुःख को हरे, करे पाप का अंत|

  कहत कबीर वे कब मिले, परम स्नेही संत||

   वो दिन अब है आ गया, सतगुरु पकड़ी बाह |

   अपना कर बिठला लिया चरण कमल की छावं ||

   सुख दिए सब दुःख हरे दूर किए अपराध |

   दासन दासों को मिल गए श्री परमहंस अवतार ||

 

vश्री आनंदपुर के कण -2 में हो रही मधुर झंकार

झूम रहा है है पत्ता -2 झूम रही हर डार

झूम रहा है धरती अम्बर, झूमे सकल संसार

झूम रहे है प्रेमियों के ह्रदय, गूंजी भक्ति गुंजार

सुन भक्तों के अन्तर मन की, करुणा भरी पुकार

कलि काल में आये नारायण धर कर रूप साकार

जीव कल्याण हेतु बनाया श्री आनंदपुर दरबार

श्री पंचम रूप में विराज रहे श्री परमहंस अवतार

 

v श्री परमहंस दयाल जी प्रगटे जगतारण |

प्रेमीजन मिल कर रहे श्रद्धा सुमन अर्पण ||

नाम भक्ति की जोत से घट-२ किया रोशन |

देश विदेश में कर दी भक्ति ध्वजा रोहन ||

चौकुंठी में हो रही महिमा का गायन |

श्री परमहंसों के कर दी सभी वचन पूर्ण ||

बड़भागी हम जीव है पाए प्यारे दर्शन |

प्रेम दिया इतना प्रभु बस गए अन्तर मन ||

अनंत -२ उपकार है करूँ जैसे वर्णन |

कोटि -२ वंदना कोटिन कोट नमन ||

 

v जो मान सरोवर में रहते है उन्हें हंस कहते है

जो प्रेमियों के मन के सरोवर में रहते है

उन्हें श्री परमहंस दयाल जी श्री पंचम पादशाही जी कहते है

 

v भटकते फिरते थे जग में कही ना सुख का सार मिला |

झूठी दुनिया झूठे नाते झूठा उनसे प्यार मिला ||

सतपुरुषों की संगत पाई सांचा नाम आधार मिला |

काल माया का बंधन छूटे भाव से तारण हार मिला ||

त्रिलोकी में सबसे प्यारा श्री आनंदपुर दरबार मिला |

कोमल ह्रदय दया का सागर श्री परमहंस अवतार मिला ||

 

v परम हितैषी जगत में सतगुरु दीन दयाल |

खुशियाँ ही खुशियाँ बख्श रहे कर रहे मालोमाल ||

आनंदपुर धाम की पूण्य धरा पर छटा अनोखी छाई है |

आज के दिव्य दर्शनों की सबको लाखों लाख वधाई है ||

 

v खुशनसीबी है हमारी जो भक्ति का भण्डार मिला |

  21वीं शताब्दी में भी श्री चरणों का प्यार मिला ||

  एहसान मंद रहेंगे हम अपने सतगुरु देव महाराज जी के |

  जिनकी कृपा से इतना सुंदर श्री आनंदपुर दरबार मिला ||

 

v ये सतगुरु का पावन दरबार है, विराजे सृष्टि के अवतार है

सुनकर जीवों की पुकार है, लिया धरती पर अवतार है

धर कर आये रूप साकार है, ये जीवों के पालनहार है

घट -2 की जाननहार है, करते भवसागर से पार है

जो आता श्री चरणार है, दण्डवत करता बारम्बार है

प्रभु लगाते श्री चरणार है, रहमत देते बेशुमार है

ये श्री आनंदपुर दरबार है, इनकी महिमा अगम अपार है

कोई पा ना सका पारावार है ये श्री परमहंस अवतार है

दे रहे पवन दर्शन दीदार है, इन सुंदर घड़ियों की सबको मुबारिक बारम्बार है

 

v  मंदिर गया तो मूरत में जड़ा था |

   मस्जिद में गया तो खाली पड़ा था ||

   चर्च गया तो सूली पे टंगा था |

   श्री आनंदपुर गया तो साक्षात खड़ा था ||

 

v सतगुरु जी सब ठीक करों, मुझे श्री आनंदपुर आना है

  करनी है दो बाते तुमसे प्यारा दर्शन पाना है

  श्री आनंदपुर की गलियां मुझे याद बड़ी ही आती है

  तुमसे मिलने की चाह रह रह कर दिल को तडपाती है

  नम है आखें दिल है सूना ऐसे ना चल पाना है

  सतगुरु जी सब ठीक करों, मुझे श्री आनंदपुर आना है

  न सोचा था सपने में भी ऐसे भी दिन आयेंगे

  बिन श्री दर्शन तड़पेंगे घरों में बंध जायेंगे

  विनती यही हमारी सतगुरु इस बंधन से मुक्त करो

  स्वामी जी सब ठीक करों हमें श्री आनंदपुर आना है

 

v  बैकुण्ठ से भी सुंदर श्री आन्दपुर दरबार

   सच्ची खुशिया मिलती उसको आये जो चरणार

   प्यार अपना लुटा रहे है, श्री परमहंस अवतार

   सारी दुनिया गा रही इनकी जय -2 कार

 

v श्री आनंदपुर में छाई है, चहुँ दिश ऋतू बसंत |

सन्मुख दर्शन दे रहे श्री सतगुरु आनंद कन्त ||

जगतारण हित प्रकट हुए, साक्षात् पारब्रह्म |

श्री आनंदपुर दरबार बनाया, धर कर रूप श्री परमहंस ||

चहुँ और छाई है खुशिया, बजी शहनाई गगन |

कोटि बधाई शुभ अवतरण दिवस की, सब प्रेमी हुए धन -2 ||

 

v  भवसागर बड़ा विशाल सुना, जिसको तरना दुश्वार सुना|

   जीवों को भय दिखलाता है, इस नाते ही इतराता है||

   मुझको कोई ना लाध सके, ना रोंक सके, ना फांध सके|

   सब माया में फंस जाते हैं, और मुझ में ही समाते है||

   अभी मिला बाहर मुझको, कुछ चिंतातरं कुछ थका-२

   चेहरे का रंग पीला उसका, और अंग उसका ढीला उसका

   था अपने आप से बोल रहा, सुनिए सभी जो उसने कहा||

   श्री आनंदपुर वाले सतगुरु जी, ये ऐसी रहमत करते हैं|

   ये दात ना जाने क्या देते, भक्तों को निर्भय करते हैं||

   हर शहर में इनकी कुटिया है, हर गली में इनके भगत खड़े|

   मुझको तो चिंता होगी ही, भक्तों की गिनती रोज बड़े||

   सत्संग की गंगा नित बहती, और रोज भण्डारे होते हैं|

   मुझ भवसागर से कौन डरे, यहाँ हर घडी जयकारे होते हैं||

   ना फ़िक्र कोई ना गम कोई, जो इनके दर पर आता है|

   यहाँ संतो ने तो डरना क्या,मुझे भगत खुद भी आँख दिखता है||

   लो एक जहाज ये और बना, जो भव से पार ले जाऐगा|

   ख़ुशी-ख़ुशी निज घर पहुंचेगा, ठौर यहाँ जो पाएगा||

 

v  श्री परमहंसों की महा महिमा को किस विधि करे बखान

   भक्तों को भव पार लागने आये स्वयं भगवान

   अमर रहेगा इस दुनिया में श्री आनंदपुर दरबार प्यारा

   धरती पर बैकुण्ठ बनाने आया सतगुरु हारा वाला

   काल माया से जीव छुड़ाने संत रूप अवतार लिया

   ऋषि मुनि और देवों ने भी आपका जय -2 कार किया

   सुन पुकार प्रेमी भक्तों की आप सदा हर्षाते है

   भक्ति का अमृत बरसाने पास में उनके जाते है

 

v जब तक सूरज चंदा तारे, धरती और आसमान रहे

श्री आनंदपुर दरबार की ऊँची, चौकुण्ठी में शान रहे

सकुशल रहे सेहत आपकी, मुख पर मधुर मुस्कान रहे|

सजा रहे ये दिव्य सिंघासन, श्री परमहंस विराज मान रहे

सेवा भक्ति और नाम का मिलता सदा वरदान रहे

गुरु ज्ञान की दिव्य जोती, हर दिल में विराजमान रहे

भक्त और भगवन का नाता जन्मों जन्म परवान रहे

श्री चरणों की निज सेवा में, हम दासों का भी नाम रहे

श्री आनंदपुर श्री प्रयागधाम भक्ति के खोले भण्डार |

चौकुण्ठी में हो रही है इनकी जय-2 कार ||

भक्ति का झंडा सतगुरु देश विदेश फैलाया |

नूरी जलवा तेज औलकिक पंचम रूप धर आया ||

अपने तन पैर कष्ट उठा कर भक्तो के कष्ट निवारे |

युगों -2 तक याद रहेंगे सतगुरु उपकार तुम्हारे ||

श्री प्रयागसर में स्नान करवाकर, बक्शा सबको प्यार |

विराज रहे है छठे पादशाह, खोल दया का द्वार ||

भक्तों के जीवन के रक्षक, भक्तों के प्राण प्यारे |

सभी प्रेमी आज देख रहे है, दर्शन के अजब नज़ारे ||

अपने प्रेम का आशीर्वाद देकर, कर रहे हर दिल को शाद |

श्री दर्शन की श्री स्नान की सबको मुबारिक बाद ||

 

v  धरती पर हरियाली छाई, कली-२ मुस्काई है |

   देवताओं ने अमृत बरसाया , मधुर चली पुरवाई है ||

   श्री आनंदपुर की पुण्य धरा पर, प्रगटी जोत ईलाही है |

   सतगुरु के अवतार की सबको, लाखों लाख बधाई है ||

 

v  रहमत का है सागर उमड़ कर है आ गया

   हर प्रेमी का ह्रदय है आज जगमगा गया

   श्री प्रयाग धाम की धरती ने गीत ये गाये है

   बधाईयां -2 सबको, प्रभु घर में आये है

 

v जे सतगुरु बसे प्रयाग धाम

  और सेवक बसे विदेश

  एक पलक विसरे नहीं

  जो गुण होए विशेष

 

v  तीर्थराज श्री आनन्दसर पर , अनुपम छटा सुहाई है  |

   इष्टदेव कुल मालिक ने यह , रचना मधुर रचाई  ||

   अम्बर धरती दसों दिशायें, गूंजी जय जयकारों से |

   झूम उठे प्रेमी के ह्रदय , रंग भर कर प्रेम फुआरों से ||

   चन्द्र सूर्य तारागण ने, मुक्ता के हार सजायें है |

   रमेश, सुरेश, महेश, गणेश, सब पूजा करने आये है ||

   श्री आनंद्सर के तट पर, बज उठी हर्ष शहनाई है|

   तीन लोक चौदह भवनों से, मिल रही आज बधाई है ||

   नभ मंडल में पुष्प हैं झरते, दिग्वधुएँ झूम झुमाई है |

   रवि ने अर्जन- पूजन के हित, आरती खूब सजाई है ||

   इस सुषमा को मात करे को, यह अद्भुत लासानी है|

   प्रकटी ज्योति इलाही जग में, महिमा न जाये बखानी है||

 

v प्यारे सतगुरु ने कृपा कर श्री प्रयाग सरोवर कि अनुपम रचना रचाई है |

अडसठ तीर्थ आये यहाँ लहर लहर -2 लहराई है ||

देवी देवताओं ने मिलकर महिमा उपमा गई है |

दर्शन करने दूर-ऐ से संगत चल कर आई है ||

श्री प्रयाग सरोवर के तट पर छटा अनूठी छाई है |

रजत जयंती महोत्सव की सबको लाख बधाई ||

 

v श्री आनंद शांति कुंज है, परम शांति का धाम |

धुर दरगाही निज मौज से, श्री प्रभु विराजे आन ||

श्रद्धा से जो करेगा सुमिरन और ध्यान |

परम शांति को पाए वह दिना ये वरदान ||

शत -2 कोटि वन्दना कोटिन कोटि प्रणाम |

ह्रदय विराजे रहों सदा प्यारे श्री भगवान् ||

 

v  श्री आरती शांति कुञ्ज में महा प्रभु है विराजमान

     मन्त्र मुक्त हुए प्रेमी सब, कर दिव्य रूप का ध्यान

    परम शांति रस बरस रहा, निशदिन आठों याम

    सतगुरु दाता दे रहे रहे, भक्ति प्रेम वरदान

    शत -2 लोटी वंदना कृपा सिन्धु भगवान

    ह्रदय में आसीन रहों प्रभु नयनाभिराम

 

v  दूर हुआ मन का अँधियारा सतगुरु दर्शन पाए है

     प्रेमी जनों ने ह्रदय मंदिर में प्रेमी के दीप जगाए है

    ऐसे पावन शुभ अवसर पैर हर दिल की कली मुस्काई है

    प्रेमी जन ऐसे खुश है जो वस्तु अमोलक पाई है

   श्री सतगुरु के चरणों में आज सच्ची दिवाली मनाई है

भाग्यशाली है गुरुमुख जन सबको लाख बधाई है

 

v दीवाली की बाहरी खुशियों में, सब लोग मशग़ूल हैं।

दिल से मालिक के नाम को भुलाकर, सच्ची खुशियों से महरूम हैं ।।

सही मायनों में सच्ची दीवाली उसकी है,

जिसने सच्चे नाम से लिव लगाई है।

छोड़ के झूठी ममता जग की,

मालिक के नाम की प्रीत दिल में बसाई है ।।

 

v मोह की रात अमावस वाली, करती है अंधियारा |

ज्ञान का दीप जगाते सतगुरु, हो जाता उजियारा ||

सतगुरु के वचनों को जो भी, प्रेम से दिल में धारे |

सतगुरु दाता कृपा करके, भाव से पार उतारे ||

श्री चरणों के दास बने हम सतगुरु स्वामी हमारे |

कोटि -2 मुबारिक सबको सब बोलो जय -2 कारे ||

 

v जग मग दीप जले है, चहूँ और रोशनाई है |

सुंदर सिंहासन विराजे सतगुरु ख़ुशी अनुपम छाई है ||

प्रेमी जनों ने मन मंदिर में प्रेम की जोत जगाई है |

दीवाली त्यौहार की सबको लाखों लाख बधाई है ||

 

v पिछले साल की गलतियाँ दीजों पप्रभु विसार|

     नए साल में दीजिए सेवा भक्ति प्यार ||

     पिछले साल की गलतियाँ फिर न कभी दोहराऊं |

     श्री आज्ञा में दृढ़ रहूँ पूर्ण प्रसन्नता पाऊं ||

 

v  नव वर्ष नव संवत की छटा अनुपम छाई है

    श्री मंदिर जी का शुभ मुहूर्त किया सतगुरु रहमत बरसाई है

    हर एक मन में आनंद छाया गूंज रही शहनाई है

   अनमोल घड़ी की सबको लाखों लाख वधाई है

 

v  नवसंवत के शुभ अवसर की घड़ी सुहानी आई है

    सतगुरु जी का दर्शन पाया सबको लाख वधाई है

 

vकोटि –कोटिन मम वंदना सतगुरु दीना नाथ

 बीते वर्ष के कीजिये क्षमा सभी अपराध

 नए वर्ष में दीजिये ऐसा आशीर्वाद

 मन भक्ति में दृढ़ रहे कभी ना भटके दास

 

v आज है श्री गुरु पूर्णिमा का, परम पावन त्यौहार

     भक्ति भाव से सजा हुआ, है श्री आनंदपुर दरबार

    झूम रहा है पत्ता -2, झूम रही हर डार

    झूम रहे प्रेमियों के ह्रदय, बरसी प्रेम फुहार

    तख़्त रूहानी विराज रहे, श्री परमहंस अवतार

    रोम -2 पुलकित हुआ, मनोहर छवि निहार

    श्री दर्शन व् आशीष दे प्रभु, किया महा उपकार

    धन्य-2 हुए गुरुमुख सारे आये जो श्री चरणार

   कोटि जन्म के पुन्य कर्म से पाए प्रभु साकार

   कोटि वधाई श्री गुरु पूनम की बोला जय -2 कार

 

v प्रेम श्रद्धा की राखी बना कर बाँधी सतगुरु की कलाई

  रक्षा बंधन पर्व की सबको लाखों लाख बधाई

 

v रक्षा बंधन पर्व की पावन वेला है आई |

लोक और परलोक में सतगुरु है संग सहाई ||

प्रेम श्रद्धा से गुंथी राखी बाँधी सतगुरु की कलाई |

रक्षा बंधन पर्व की सबको लाखों लाख बधाई ||

 

v आषाढ संक्रांति चहुँ दिश छाई बहार |

    श्री सतगुरु दाता दे रहे प्यारा -2 दीदार ||

   रोम -2 पुलकित हुआ सुंदर छवि निहार |

   धन्य-2 हो प्रेमी सब कर रहे जय -2 कार ||

   बरस रहा भक्ति का सावन अमृत तुल्य प्यार |

   आषाढ संक्रांति श्री दर्शन की सबको बधाई बारम्बार ||

 

v श्री सतगुरु जी की कृपा से ये घड़ी सुहानी आई है |

सक्रांति पर शुभ दर्शन पाए सबको लाख बधाई है ||

 

v दिव्य तेज शुभ्र भाल पर, सूरज चन्द्र लजाए |

आनंद -२ बरस रहा, भक्तन हिय पुलकाए ||

जग के पालन हार प्रभु, त्रिलोकी के नाथ |

तक्त रूहानी विराज रहे, श्री पंचम श्री महाराज ||

जय-२ कर गूंज उठी बजे शंक और नाद |

स्वर्णिम आनंद महोत्सव की सबको लाखों लाख मुबारिक बाद||

 

v आज का दिन है 20 सितम्बर, आज का दिन है ज्योतिर्मान |

कलिकाल में प्रकट हुए, साक्षात् श्री भगवान ||

अद्भुत तेज श्री मुख मंडल पर, हुआ आलौकिक सकल जहान |

देवी देवता वंदन करते, ऋषि मुनि योगि करते ध्यान ||

युगों युगों तक होता रहेगा महिमा उपमा का गुणगान |

कोटि बधाई जन्म दिवस की, प्यारे सतगुरु कृपा निधान ||

 

v आज है 20 सितम्बर का दिन, आज का दिन है बहुत महान

कलिकाल में प्रकट हुए है, भक्तों के प्यारे भगवान

दिव्य तेज है मुख मंडल पर, मधुर -2 मीठी मुस्कान

संत मण्डली मध्य है विराजे, कृपा सिन्धु नयनाभिराम

तन पे लाखों कष्ट है सहते, पल भर न करते विश्राम

दुःख हारते सुख रूप बनाते, देकर नाम भक्त का दान

देवी देवता नभ मंडल से, शत -2 कोटि कर प्रणाम

शेष शारदा ऋषि मुनि योगी, कर रहे गुरु महिमा का गान

रोम -2 पुलकित है सबका, कर श्री दर्शन का अमृत पान

कोटि बधाई जन्म उत्सव की, मिल गए सतगुरु पूरण सुजान

 

v 20 सितम्बर 1926 दिन अति प्यारा -2

    रायपुरकलां में प्रकट हुआ सृष्टी का तारनहारा है

    देव लोक से देवगणों ने खुशियों भरा झंकार किया

    श्री परमहंस अवतार जी ने पंचम रूप अवतार लिया

   ऋषि मुनि योगी संत जनों ने हाथ जोड़ नमस्कार किया

    घर -2 बजने लगी वधाई सबने मिल जय -2 कार किया

    धन्य मात श्री ज्ञान देवी जी, धने पिता अर्जुन दास हुए

    धन्य हुए सब बंधू बांधव, ग्राम वासी सब धन्य हुए

    धन्य रावी नदी का वह तट जहाँ निशदिन ध्यान लगाते थे

    धन्य महात्मा दया नन्द जी जो पूज्य रहबर कहलाते थे

    धन्य -2 वह धरा धन्य जहाँ सतगुरु चरण छुवांए है

    धन्य -2 हम गुरुमुख सारे जिन सुंदर दर्शन पाए है

 

v जगतारण के हेतु जगत में, जोति अलौकिक आई है

सतगुरु के अवतार की सबको लाखों लाख बधाई है

धन्य -2 रायपुर कलां, धन्य सेतिया वंश

धन्य माता ज्ञान देवी जी, धन्य पिता श्री अर्जुन

धन्य -2 रांवी का तट, धन्य मित्र सम्बन्ध

धन्य घड़ी 20 सितम्बर धन्य दिवस ऋतू धन

जग तारण के हेतु जग प्रकटे श्री भगवंत

पंचम रूप धरा मन भावन, सतगुरु श्री परमहंस

धन्य -2 श्री आनंदपुर जहाँ किन्ही लीला अनंत

धन्य-2 सब प्रेमी जन जिन पाए श्री दर्शन

झूम रही है दशों दिशाए झूमे धरती गगन

कोटिन कोटि बधाईयाँ आया प्यारा जन्मदिन

 

v विनीत धाम के प्रेमियों की सुनकर प्रेम पुकार |

सतगुरु ने कृपा करी आन दीयों दीदार ||

चहूँ और छाई है खुशियाँ, चहूँ दिश मंगलाचार |

इस अनमोल घड़ियों की सबको बधाई बार -2 ||

 

v लाखों प्रेमी भक्त, रहते हैं हरिद्वार ।

क्या कोई दावा कर सके, पहुँचा हो हरि-द्वार ।।

हरिद्वार में खुल गया- आज गुरु का द्वार ।

सहजे-सहजे पहुँचेंगे, सब प्रेमी हरि के द्वार ।।

 

v सत्य धाम के प्रेमियों के जाग उठे है भाग |

दर्शन देने आये है श्री सतगुरु देव भगवान ||

चहूँ दिश और छाई है खुशियाँ सजे है मंगल साज |

इस अनमोल घड़ी की सबको लाखों लाख मुबारिक बाद||

 

v आये है धुर धाम से लेकर भक्ति सन्देश |

जिनके दर्शन मात्र से मिट जाए सारे कलेश ||

महिमा जिनकी गा नहीं पाए ब्रह्मा विष्णु महेश |

विराजे है श्री सिंहासन पर आनंदपुर के नरेश ||

आनंदपुर के प्रेमियों पर कृपा खूब बरसाई है |

साक्षात विराजमान होकर दर्शन दे रहे सबको लाखों लाख बधाई है ||

 

v विध्न हरन सब सुख करन, करत सुमंगल काज|

दर्शन देने आये प्रभु, अलौकिक धाम में आज ||

चहुँ और छाई है खुशियाँ सजे है मंगल साज |

इस अमोलक घड़ी की सबको मुबारक बाद ||

 

vसंत नगर की पुन्य धरा पर छाई अजब बहार |

 बरस रहा भक्ति का सावन, अमृत तुली प्यार ||

 अपने प्रेमी भक्तो की, सुनकर करूँ पुकार |

 सनमुख दर्शन दे रहे, श्री परमहंस अवतार ||

 आनंद मगन हुए सब प्रेमी, पाकर के दीदार |

 प्रेम सहित अब कर रहे, प्रभु की जय-2 कार ||

 चहुँ और छाई है खुशियाँ , चहुँ दिश मंगलाचार |

 अनमोल घड़ी की सबको मुबारिक लाखों बार ||

 

v श्री संत नगर में विराज रहे संतान के सिरताज

  आनंद सुधा बरसाए कर दे रहे शुभ आशीर्वाद

  धन्य -2  ये घड़ी पल धन्य -2 है भाग

  धन्य धन्य है प्रेमी सब जिन पाए दर्शन आज

  चैत्र शुभ सक्रांति सज रहे mangal साज

  इस मगंलमय घड़ी की सबको लाखों लाख मुबारिक बाद

 

v श्री संत नगर में आये है संतन के सिरताज

   सन्मुख दर्शन दे रहे श्री सतगुरु देव महाराज

   धन्य -2 हुए प्रेमी जन, धन -2 संत समाज

   इस अनमोल घड़ी की सबको लाखों लाख मुबारिकबाद

 

v सिंगापुर की पावन धरा पर छाई अजब बहार |

भक्तों के सन्मुख बिराजे, आज प्रभु साकार ||

श्री मंदिर का हुआ मुहूर्त, हर दिल में बजी शहनाई |

दोनों जहां की खुशियाँ सभी ने आज यहाँ पर पाई ||

भक्ति का अमृत बरसाने आये सतगुरु प्यारे |

दिव्य दर्शन को पाकर प्रेमी बोले जय –जयकारे ||

अपने तन पर भक्तों के कष्टों को हरने, स्वयं तन पर कष्ट उठाते |

देश विदेश में कृपा करके भक्तों के के भाग जगाते||

हम सब पर उपकार किए जो हम दास है सदा अभारी|

खुशियों भरी इन घड़ियों की सबको मुबारिक है लाखों बारी||

 

v टोरंटो में छा रहा दसों दिशा उजियार

श्री सतगुरु जी बरसा रहे आशीर्वाद और प्यार

सतगुरु महिमा अनंत अनंत किया उपकार

अपने प्यारे प्रेमियों को जो आन दिया दीदार

धन्य हुए सब प्रेमीजन गूंज रही जयकार

इस अनमोल घड़ी कि सबको बधाई लाखों बार

v जयपुर के प्रेमियों की सुनकर करूण पुकार |

   दर्शन देने आये है सतगुरु करुणाधार ||

   हर प्रेमी के मन मंदिर में ख़ुशी अनुपम छाई है |

   सतगुरु के दीदार की सबको लाखों लाख वधाई है ||

 

v जयपुर की धरती पर श्री सतगुरु चरण छुआए है

   भाग्यशाली है गुरुमुख जन जिन सुंदर दर्शन पाए है

   हर प्रेमी के अन्तेर मन में ख़ुशी अनूठी छाई है

   सतगुरु जी का दर्शन पाया लाखों लाख वधाई है

 

v बालाघाट के प्रेमियों पर सतगुरु हुए दयाल

   दर्शन दे कर कर दिया सबको आज निहाल

   प्रेमी जन सब कर रहे ख़ुशी से जय -2 कार

   इस अनमोल घड़ी की सबको बधाई लाखों बार

 

v विवेक धाम में हो रहे सबको शुभ दर्शन

श्री दर्शन कर हो रहे प्रेमी आनंद मगन

आनंद मगन देख प्रेमियों को

श्री सतगुरु हो रहे प्रसन्न

चहुँ और छाई है खुशियाँ बजी शहनाई गगन

कोटि -2 बधाई संको पाए श्री दर्शन

 

v अयोध्या निवासी गुरुमुखों की विनय हुई स्वीकार

  दर्शन देने आये है श्री सतगुरु दीन दयाल

  पावन श्री आशीर्वाद दे किया महा उपकार

  आनंद मगन हुए प्रेमी सब कर रहे जय -2 कार

  अयोध्या नगरी की गली-2 में खिल उठा गुलजार

  इस अनमोल घड़ी की मुबारक बारम्बार

 

v दुबई निवासी प्रेमियों की सुनी जो दिल की पुकार

दर्शन देने आये प्रभु जग के तारनहार

नाम जहाज बनाए कर, किया महा उपकार

चरण शरण में आये लोग, करने भव से पार

धन्य हुए सब प्रेमी जन पाकर के दीदार

इस अनमोल घड़ी की सबको बधाई लाखों बार

 

v वेद तक भी भेद जिन भगवान का पा सकते नहीं |

योगियों के ध्यान में जो सहज आते नहीं ||

वहीं सच्चिदानंद प्रभु संम्मुख विराजमान है |

दे रहे अपने प्रेमियों को दिव्य दर्शन ज्ञान और आशीर्वाद है ||

इस कोट जन्म के पूण्य कर्म से घड़ी सुहानी आई है |

सतगुर के शुभ दर्शन की सबको लाखों लाख बधाई है ||

 

v दूर हुआ मन का अंधियारा, जब सतगुरु दर्शन पाए है|

प्रेमी जनों ने ह्रदय में प्रेम के दीप जालाये है ||

ऐसे शुभ अवसर पर कली -2 मुस्काई है |

प्रेमी जन ऐसे खुश है जैसे खोयी वास्तु पाई है ||

कोट जन्म के पूण्य कर्म से घड़ी सुहानी आई है |

सतगुरु के दीदार की सबको लाखों लाख बधाई है ||

 

v जीवों के कल्याण की खातिर जोती अलौकिक आई है

  सतगुरु के अवतार की सबको लाखों लाख बधाई है

 

v  सतगुरु आये खुशियाँ लाये सबके दिल को किया है शाद |

   इस अनमोल घड़ी की सबको लाखों मुबारिक बारम्बार||

 

v शुभ सिंहासन सुंदर बनकर धुर धाम से आया है

प्रेमी जनों ने प्रेम श्रद्धा से इसको खूब सजाया है

श्री परमहंस जी हुए सुशोभित अनुपम साज सुहाया है

भाग्य शाली है गुरुमुख जन जिन दर्शन प्यारा पाया है

श्री हजूर दाता दयाल जी ने प्रेम अमृत बरसाया है

कोटि कोटि बधाई सबको समय मुहूर्त का आया है

 

v  ऋषि मुनि योगि सारे, जिनका नित ध्यान लगाते है

   वेद शास्त्र और सब उनके गुण गाते है

   वहीं महाप्रभु संत रूप में धरा धाम पर आये है

   भाग्य शाली गुरुमुख जन है जिन सुंदर दर्शन पाए है

   जो कोई इनकी शरण में आये उनके दुःख सब हारते है

   प्रेमी भक्तों के दामन में सच्ची खुशियाँ भरते है

 

v हमारी गलतियाँ दिल को न लगाना, हम तो बालक है नादान

  भले बुरे अब जैसे भी है, है आपकी ही संतान

  आप हमारे रक्षक हो इसका हमकों बहुत है मान

  श्री दरबार बना कर के आपने, किया बड़ा एहसान

 

v  उदासी भी मुस्कान बन जायेगी|

   रूकती हुई सांसे भी जान बन जायेगी||

   निभा लीजिये श्री सतगुरु के पांच नियम|

   फिर देखना जिंदगी जन्नत से भी हसीन बन जायेगी||

 

v  सतगुरु करुणाभंडारी जी कर दया,

   दिन याचक आया द्वार तेरे |

   जन्म जन्मान्तरां तों मैं भटकदा हां,

   जगा देवो हुण भाग मेरे ||

   बारम्बार करां बेनती सतगुरु जी,

   कदों नज़र मेहर दातार होवे |

   बणा के साधू ते मन नूँ साध देवो,

   चरण कमलां च अर्ज स्वीकार होवे ||

 

vकाल माया की अँधेरी रात में, यह जीव है भटक रहा|

   बिना ज्ञान की रोशनी के, है बहुत दुःख उठा रहा||

   भाग से जब मिल गए सतगुरु, तो ज्ञान का उजियारा हो गया|

   अज्ञान का तिमिर सब मिट गया,सुख का सवेरा हो गया||

 

v सतगुरु ऐसा भेद बताया आया नज़र निराला|

   धागे मनके बाझों अंदर दम –दम फिरदी माला||

   तिलक निशानी त्रिकुटी अंदर डिट्ठा ख़ास उजाला|

   ‘दासनदास’ दया गुरु कीती मेटिया यम का पाला||

 

v जब भूल जाते है तो मार्ग दर्शाते है सतगुरु ही

जब जब हो जाते है निराश, तो ऊँचा उठते है सतगुरु ही

सतगुरु के भेष में खुद खुदा धरा पर आये है

भक्ति का मार्ग समझाने, वे उतर जमीन पर आये है

 

v  हरि कृपा से सतगुरु पाया, सतगुरु ने हरि मेल कराया

  वचन गुरु के है हितकारी, मिट गई मन की दुविधा सारी

  गुरु वचनों की महिमा न्यारी, गुरु वचनों पर जाये बलिहारी

 

v  सतगुरु पूरा जो मिले, ता पाइये रत्न विचार

   मन दीजे गुरु आपने, पाइये सर्व प्यार

   मुक्त पदारथ पाइये, अवगुण मेटंहार

   भाई रे गुरु बिन ज्ञान ना होए

   पूछे ब्रह्मे नारदे, वेद व्यास कोल

 

v  काल माया की अँधेरी रात में, ये जीव है भटक रहा|

   बिना ज्ञान की रोशनी के, है दुःख उठा रहा||

   भाग से मिल गए सतगुरु, ज्ञान का उजियारा हो गया|

   अज्ञान तिमिर सब मिट गया, सुखों का सवेरा हो गया||

 

vभक्ति भाव गुरु शरणाई, सदा -2 सुख रास

 दुनी विसारे नाम जपे, सोई कहिये दास

 नेह निभाईए भाव सो, सतगुरु के दरबार

 निर्मल मन से भक्ति करों, मेहर करे करतार

 

v सहारे मत बना ऐ दिल, सहारे छूट जाते है |

जोश लहरों में आता है, किनारे टूट जाते है ||

मुसीबत में कहा कोई, किसी का साथ देता है |

जहां वालों की आदत है, वे अकसर रूठ जाते है ||

उम्मीद छोड़ दुनियां की, शरण तू सतगुरु की ले |

जो डुबदी नईयां सभी की, किनारे से लगाते है ||

 

v कुछ सोच विचार ऐ मन में प्राणी |

इस जग में क्योंकर आया है ||

  क्या लक्ष्य है तेरे जीवन का |

  क्यों कर मानुष तन पाया है ||

  लाखों ही जन्म व्यतीत हुए |

  दुखों से अब तक छूटा ना ||

  प्रभु ने की दया कारण ही |

  बक्शा ये दुर्लभ मानुष जन्म ||

  मोह निद्रा से अब जाग जरा |

  सतपुरुषों की कर सब शरण ग्रहण ||

  सतगुरु शब्द के सुमिरन से |

  कट जाएगा चुरासी का बंधन ||

  जन्मों से बिछड़ी आत्मा का |

  मालिक से होगा मधुर मिलन ||

 

v  कर्मों की है बेड़ियाँ, जीव है  बंधता जाए

    क्या लोहे क्या स्वर्ण की मुक्ति कबहूँ न पाए

     निष्काम भक्ति की सतगुरु देते निशदिन सीख

     भव बंधन से मुक्त हो शरण आये जो जीव

v ध्यान इतना करों के गुरु अन्तर में उतर आये

  स्वांस भी लो तो आवाज सतगुरु की आये

  बांध लो प्रेम सतगुरु से इतना

  के जिधर देखो सतगुरु ही नजर आये

 

v  शर्ते मोहब्बत ये तो नहीं हर वक्त तेरा जिक्र हो

     दिल कि हर धडकनों में सतगुरु तुम्हीं हो बस तुम्ही हो

    अदा-ऐ-इश्क कहो या सजदा –ऐ- मोहब्बत

    नाम कुछ भी मेरे प्यारे सतगुरु तुम्हीं हो बस तुम्हीं हो

 

v  दुनिया में हर एक इन्सान, सुख और शान्ति का तलबगार है|

   मगर मिलता नहीं उसे सुख, वो दुःख और गम से बेजार है||

   सही मानो में उस गुरुमुख के, दिल में ख़ुशी समाई है|

   जिसने जग की तृष्णा छोड़ कर, नाम से लिव लगाईं है||

 

v दुनिया में हर एक इन्सान, सुख शान्ति का तलबगार है।

करता है यत्न बहुत, पर वो रहता बेक़रार है ।।

अपने ख्यालों को छोड़कर, जो सन्तों की शरण में आ गया ।

  भक्ति की सच्ची कमाई करके, वो भरपूर सुख को पा गया ।।

 

vदुनिया सराय फानी देखी

हर चीज यहाँ की आनी जानी देखी

आकर ना जाए सो बुढ़ापा देखा

जाकर न आए वो जवानी देखि

 

vदुर्लभु मानुष जन्म को पाकर, किसने लाभ उठाया है।

दुनिया की ममता छोड़कर, जो सन्त शरण में आया है ।।

गुरु शब्द की करके कमाई, सच्चा धन कमाया है ।

जीवन भी खुशियों से भर लिया, दरगाह में मान माया है ।।

 

v  अगर तुझको है सच्चे सुख की तलाश,

   तो दिल से हटा झूठी दुनिया की आस|

   गुरु शब्द को ले अपने दिल में बसा,

   पायेगा यक़ीनन सच्चे सुख को सदा||

 

v  हजारों ढ़ूढ़ते है पर खुदा नहीं मिलता

  यहाँ तो खुद ही चला आया है हमारे लिए

  बशर का भेष बन कर आया है हमारे लिए

 

v  जीवों के कल्याण की खातिर, प्रभु धरा धाम पर आते है

   बाजू सबकी पकड़ -2 कर, भव से पार लगाते है

   दिन रात उपकार हो करते, एक भी नहीं गिनाते हो

   माया से है कैसे बचना, प्रेम से सिखाते हो

 

v  हर झील में कमल नहीं खिला करते

   हर सीप में मोती भी नहीं मिला करते

   ये तो खुदा को हम पर तरस आ गया

   वरना ऐसे सतगुरु हर किसी को नहीं मिला करते

 

 

v  खुदाई नूर से मुर्वर है मेरे कामिल मुर्शिद |

   खुदा खुद बन कर आये मेरे कामिल मुर्शिद ||

   चश्मे दिल से किया जिसने दीदार मेरे कामिल मुर्शिद |

   हो गया दीवाना, बना दिया मेरे कामिल मुर्शिद ||

 

v  हम खुशनसीब है हमे सतगुरु प्यारे मिल गए

   कामना थी जो दिल में वो प्रीतम प्यारे मिल गए

   लोक और परलोक के फिर हमे सच्चे सहारे मिल गए

 

v  परवाने को मिलने कभी दीपक नहीं आता,

   चकोर को मिलने कभी चन्द्रमा नहीं जाता|

   मछली की तड़प देख न पानी कभी आये,

   स्वाति की बूँद में पपीहा मिट जाये||

   पर प्रेम सतगुरु का अजब ही निराला है,

   पहुँचते तुरंत है जब प्रेमियों ने दिल से पुकारा है|

   प्रेम की डोरी में बंधकर प्रभु आज खुद आये है,

   प्रेमियों ने आज अपने इष्ट देव पाये है ||

 

v जल परसे ठंडक ना आये ऐसा हो नहीं सकता |

फूल खिले खुशुबू ना आये ऐसा हो नहीं सकता ||

दिल से याद करों सतगुरु ना आये ऐसा हो नहीं सकता |

सतगुरु आये खुशियाँ ना बरसे ऐसा हो नहीं सकता ||

 

v  सबने दिल से चाहा है तुम्हें |

सबने दिल से सराहा है तुन्हें ||

एक झलक पाई जो तेरी दीद की |

मन के मंदिर में सजाया है तुम्हे ||

 

v  इन आखों में सदा तेरा ही दीदार रहेगा

    ये दिल तेरा ही तलबगार रहेगा

    जन्म बीते या युग मेरे सतगुरु

    हम दासों के साथ तेरा अमर प्यार रहेगा

 

v  जिनके दिव्य तेज से रोशन सूरज चाँद सितारे |

   मन के मंदिर में बसते है मेरे सतगुरु प्यारे ||

   अमिट यादों से सजे हुए अन्तर ह्रदय हमारे |

   सजल नयन से नमन करूँ मैं सतगुरु चरण तुम्हारे ||

 

v  मुहब्बत के तराने हवा ने सुनाये|

   उजड़े चमन में भी गुल मुसकुराये||

   सितारों के मोती फलक ने लुटाये|

   सहर आई जर्रींन आँचल उठाये||

   दाम--हवस से मिला छुटकारा|

   उरफ़ान का मिल गया जब द्वारा||

   वली बन सदगुरु ने अवतार धारा|

   डूबी थी कश्ती दिया आ सहारा||

 

v  गुरुमुख मनमुख दो है जग में, दोनों की मति न्यारी है|

   गुरुमुख गुरु की आज्ञा माने, मनमुख मनमति धारी है||

   गुरुमुख पल-पल सुमिरण करता, दोनों लोक सवारी है|

   मनमुख माया पाढ़े धावे, दोनों लोक बिगारी है||

 

v  कौन है तेरा इस दुनिया में, जिसका इतना मान करे|

   भाई बन्धु माल खजाना, आखिर में न कोई तेरे संग चले||

   गुरु का शब्द रखवाले, लोक परलोक तेरे संग रहे|

   अजहूँ समझ जा नाम भज, जन्म मरण की बाधा टरे||

 

v  नाम इतना जपों गुरु कण -2 में उतर जाये

   सांस भी लो तो खुशबू गुरु दरबार की आये

   गुरु का नाम ह्रदय में इतना छा जाये

   की बात कोई भी करो नाम गुरु -2 ही आये

 

v दुनिया के काम करों बेशक, पर सूरत शब्द में लीन रहे |

 मन मंदिर में इष्ट देव बसे, चित्त ध्यान सदा लवलीन रहे ||

 फिर गुरु कृपा से ऐ दासा , हो जाएगा तेरा सफल जन्म |

 जन्मों से बिछड़ी आत्मा का, मालिक से होगा मधुर मिलन ||

 

v  गुरु की आज्ञा दृढ़ करि गाहिये| गुरु की आज्ञा में ही राहिये||

   गुरु आज्ञा बिन काज न कीजै| हानि होय तो होने दीजै||

   गुरु की आज्ञा बिघ्न न कोई| गुरु की आज्ञा गुरुमुख होई||

   गुरु की आज्ञा भक्ति बढ़ावै| गुरु की आज्ञा पार लंघावै||

   गुरु की आज्ञा सकल सिरोमन| गुरु की आज्ञा चलै सो हरिजन||

   गुरु आज्ञा मानै सोई साधु| गुरु आज्ञा पद भेद अगाधु||

   जो कोई गुरु की आज्ञा भूलै| फिर फिर कष्ट गर्भ में झूलै|| 

 

 

v  जो सुख एक पल गुरु दर्शन, सो दोना जहाना ना दिसे

  जिसते मेहर होवे सतगुरा दी, ऐ सुख आवे तिसदे हीसे

  दर्श करत मन ठण्डा होवे, दुःख दरिद्र सब नसे

  संत रैन भालन इस सुख नू, पर लधा किसे-2

 

v  कोई आखदा भागवन्त ओ जग विच,

   जिसदे कोल दौलत बेशुमार होवे|

   कोई आखदा भागवन्त ओ जग विच,

   जिसदा खूब वड्डा परिवार होवे,

   कोई आखदा भागवन्त ओ जग विच ,

   जिसनू दुनिया च हासल वक्कार होवे ,

   कोई आखदा भागवन्त जिहदे ताई

   शारीरिक सुखां दा लगा अबार होवे

   पर सच पूछो तो भगवंत ओ प्राणी ,

   जिसदा नाम ते भक्ति नाल प्यार होवे

   जिसदे दिल विच सतगुरु दा ध्यान वसे

   जुड़ी सतगुरु नाल सूरत दी तार होवे ||

 

v  तुम्हारी मेहरबानी मुझ पे येह सरकार हो जाये|

   कि दिल में मुझको ऐ सतगुरु तेरा दीदार हो जाये||

   सुना है तेरी रहमत से संवर जाती है तकदीरे|

   निगाह इक डाल दे जिंदगी मेरी गुलजार हो जाये||

   तू मुझपे इतनी सी बख्शीश ऐ मेरे सतगुरु कर दे|

   मोहब्बत तेरी से दिल मेरा पुर अनवार हो जाये||

   पनाह में आया हूँ तेरी मैं दुनिया छोड़ कर सतगुरु|

   तू बन जाये नाखुदा मेरा तो बेड़ा पार हो जाये||

   तेरी ही राहनुमाई में चलूँ सही राह पर हरदम|

   यही एहसान मुझ पे ऐ मेरे गमख्वार हो जाये||

   तू रहमत कर दे 'दासनदास' पे इतनी से ऐ सतगुरु|

   कि दिल बस तेरा ही तेरा ही तलबगार हो जाये||

 

v  है दुनिया मतलबी सारी, यहाँ कौन अपना है|

   गरज के मीत है सारे, यहाँ पर कौन अपना है||

   जब आया वक्ते-मुश्किल तो, न कोई साथ तब देगा|

   हकीकत तब खुलेगी यह, यहाँ पर कौन अपना है||

   जिन्हें तू समझे है अपना, है बेगाने ऐ प्यारे|

   कौन साथी हुआ है कब, यहाँ पर कौन अपना है||

   ये जितने रिश्ते- नाते है, सभी दो दिन का मेला है|

   तमाशाई है यहाँ पर सब, यहाँ पर कौन अपना है||

   यह दुनिया इक सराय है, यहाँ सब ही मुसाफिर है|

   सुबह चल देंगे राह अपनी, यहाँ पर कौन अपना है||

   सिवा सतगुरु के दुनिया में, न कोई हमदर्द देखा|

   सिवा उनके बता 'दासा', यहाँ पर कौन अपना है||

 

v  स्वास्थ से भरा संसार है सब, नही कोई सच्चा मीत यहाँ ||

  अपने मतलब के साथी सब, झूठी है सबकी प्रीत यहाँ ||

   सतगुरु ही सच्चे मीत फकत, वे ही सच्चे उपकारी है ||

   है परम सुह्रद सब जीवों के, और सबके परम हितकारी है ||

   सतगुरु में और परमेश्वर में, नही कोई भिन्न भेद प्यारे ||

   दुःख कष्ट मिटाने जीवों के , प्रभु स्वयं धरा पर अवतारे ||

   स्वारथ से भरी इस दुनिया के, है ओट आसरे सब कच्चे ||

   है सच्ची ओट श्री सतगुरु की, वे ही है मददगार सच्चे ||

   उन्हें सच्चा मीत समझ अपना , उनसे ही सच्ची प्रीत करो ||

   झूठे संसार की आस त्याग , ऐ प्राणी गुरु की शरण गहो ||

 

v  कृपा है तेरी मुझ पर, किया मुझे स्वीकार प्रभो|

   डूब रही थी नैया मेरी, दिया उसे आधार प्रभो||

   जर्जर थी जीवन की नैया, नहीं सहाई था कोई|

   तुमने संभाली नैया मेरी, बन के खेवनहार प्रभो||

   दुनिया सारी स्वार्थ भरी, विपदा में कोई मीत नहीं|

   दीन दुखी के तुम हो वाली, तुम ही हो गमख्वार प्रभो||

   मोह अज्ञान की नींद में सोकर, जन्म-जन्म भटका हूँ मैं|

   इस गफलत की गहरी नींद से, तुमने किया बेदार प्रभो||

   दुखो गमो और चिंताओ से, घिरा था रहता मैं हरदम|

   तुमने नाम की दौलत देकर, बक्शा चैनो-करार प्रभो||

   विषयों का विष पी कर हरपल, जीवन नष्ट था करता मैं|

   तुमने पिलाकर भक्ति सुधारस, किया जीवन गुलजार प्रभो||

   जन्म- जन्म से मेरे मन में घोर अँधेरा छाया था|

   तुमने ज्ञान की दात बख्श कर दिल में किया उजियार प्रभो||

   तुम्हारे उपकारो का बदला, हरगिज दे न पाउँगा|

   है अनगिनत उपकार तुम्हारे, जिनका नहीं शुमार प्रभो||

   ऐसी ही किरपा सतगुरु जी, सदा बनाये रखना तुम|

   जन्म-जन्म बनू 'दास' तुम्हारा, मिले सदा तेरा प्यार प्रभो||

 

v चंचल मन नहीं स्थिर रहता लाख कोई समझावे

गुरु शब्द का चाबुक लागे तब यह वश में आवे

बड़े -२ सुर और योद्धा, इससे सब घबराए

दुनिया पर जो विजय है करते, इससे भय बे खाए

रावण जैसा सुरमा देखा जिससे काल बलि था डरता

मन के मारे वो भी मर गए मन पर वश नहीं चलता

कौन है ऐसा दुनिया में जो मन को मार भगावे

जन्म -२ से दुखिया रूह का इससे पीछा छुड़ावे

पारब्रह्म पूर्ण सतगुरु धरा धाम पर आते

देखर अपने नाम का अंकुश मन पर वार लगाते

जो कोई इसनकी शरण में आता युक्ति है बतलाते

सुमिरन ध्यान सत्संग व सेवा ये नियम सिखलाते

जो भी इन पर अमल है करता उनका मन वश आवे

रूह को मिले सच्ची शांति, परम आनंद को पावे

ऐसा जन्म अमोलक मानुष तन बार नहीं पावे

सतगुरु नाम को जप ले प्राणी भौर जन्म न आवे

सतगुरु की जब कृपा होवे तब यह अवसर मिलता

जन्म -२ का बिछड़ा प्राणी प्रीतम संग है मिलता

ऐसे सतगुरु देव के मैं बार -२ बलि जाऊं

जिनकी कृपा दृष्टि से मैं भवसागर तर जाऊं

 

 

 

 

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