जीवन परिचय श्री गुरु अंगद देव जी
जन्म : मार्च 31, 1504 हरीके (जिला फिरोजपुर
पंजाब)
पिता : भाई फेरु जी
माता : माता दया कौर जी
पत्नी : माता खीवी जी (मत्ते की सराए, जिला
फिरोजपुर)
साहिबजादे : बीबी अमरो, बीबी अनोखी, बाबा दासू, बाबा
दातू
ज्योति जोत : 29 मार्च, 1552 गोइंदवाल, पंजाब
बचपन का नाम :
लहणा जी
गुरु गद्दी मिलना
एक बार गुरुनानक
देव जी ने बड़ा वैराग रूप धारण कर लिया| आप आगे-आगे और संगत पीछे-पीछे जा रही थी|
आगे जाकर क्या देखा कि तांबे का ढेर पड़ा है तब गुरुनानक देव जी ने संगत को फरमाया
कि ले जाओ तांबा और अपने घर का निरवा करो हमारे साथ आकर आपको क्या मिलेगा? कई लोग
जो तांबे के इच्छुक थे वे तांबा लेकर वापिस चले गए| आगे चले तो चाँदी के ढेर लगे
हुए थे| गुरुनानक जी ने फरमाया कि ले जाओ चाँदी, हमारे साथ आकर आपको क्या मिलेगा?
आगे चले तो सोने का ढ़ेर पड़ा था| गुरु जी ने फरमाया ले जाओ झोलिया भरके अपने घर| आगे
चले तो हीरे, मोती के ढ़ेर पड़े थे| हीरे, मोती के चाहने वाले हीरे, मोती ले गए| अब
जब गुरु नानक जी ने पीछे मुड़ कर देखा तो भाई लहणा जी अकेले रह गए तो गुरु नानक जी
ने फरमाया कि आप भी कुछ ले जाते, हमारे साथ आकर आपको क्या मिलेगा? तब भाई लहणा जी
ने कहा की स्वामी जी जो तांबा, चाँदी, हीरे, मोती ले गए हैं उनका परिवार है घर,
गृहस्थी है समाज में भी रिश्ते, नाते है लेकिन मेरा तो आपके सिवा और कोई भी नहीं
है| मैं इसका क्या करूँगा? यह सुनकर गुरु नानक जी ने लहणा जी को गले से लगा लिया|
लहणा को अपने अंग से लगा उसे अंगद बना दिया तभी से वे गुरु अंगद देव जी के नाम से
जाने गए|
इस तरह आपको अपनी गद्दी का योग्य अधिकारी जानकर सितम्बर 7, 1539
को पांच पैसे व नारियल आप जी के आगे रखकर तीन परिक्रमा की और पहले खुद माथा टेका,
फिर संगत से टिकवाया|
उसके पश्चात् वचन
किया कि आज से इन्ही को मेरा ही रूप समझना, जो
इनको नहीं मानेगा वो हमारा सिक्ख नहीं है| गुरु
जी की आज्ञा मानकर सभी ने गुरु अंगद देव जी को माथा टेक दिया मगर दोनों साहिबजादों
ने यह कहकर माथा टेकने से इंकार कर दिया कि हम अपने एक सेवक को माथा टेकते अच्छे
नहीं लगते|
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गुरु नानक जी से
मुलाकात
दूसरी पाद्शाही
श्री गुरु अंगद देव जी महाराज का पहला नाम भाई लहणा जी था| यह पहले देवी माता के
उपासक थे और हर वर्ष संगतो के साथ माता के दर्शनों को जाया करते थे| सुन रखा था कि
करतारपुर में गुरु प्रकट हुए है जिनको लोग नानक निरंकारी कहते है, किन्तु दर्शन
नहीं किये थे और न कोई पहचान थी| एक बार अंगद देव जी घोड़ी पर सवार होकर अपने
साथियो के साथ देवी के दर्शन को जा रहे थे| मार्ग में जब करतारपुर के निकट से गुजर
रहे थे तो साथियों से पूछा कि यह कौन सा शहर है? उत्तर मिला कि –यह करतारपुर है| मालिक
की मौज का समय आ चुका था| पूर्व जन्मो के दबे हुए संस्कारो ने पलटा खाया और लालसा
हुई कि क्यों न गुरु के दर्शन भी करते चले? साथियो को वहीँ छोड़ा और अपनी घोड़ी का रुख करतारपुर की ओर मोड़ लिया| तब
आगे से एक सज्जन मिले| लहणा जी ने उनसे पूछा –भले पुरुष! मुझे गुरु जी के दर्शन को
जाना है, आप मुझे उनके दरबार की निशानी बता दीजिये| वे भले पुरुष कौन थे? स्वयं
गुरु महाराज जी घूमते –फिरते हुए अपने जानशीन को रास्ता दिखाने तथा स्वागत के लिए
आये हुए थे| उन्होंने कहा हम आगे –आगे चलते हैं और आप घोड़ी को हमारे पीछे –पीछे ले
आइये| शहर में पहुंचकर हम आपको सब कुछ बतलाएँगे| मालिक के भेदों को कौन जान सकता
है? जो गुरु है वे आगे-आगे मार्ग दिखाते हुए पैदल जा रहे है और जो शिष्य है वह
घोड़ी पर सवार होकर पीछे-पीछे जा रहे है| जब दरबार के निकट पहुंचे तो भाई लहणा जी
को ऊंगली के ईशारे से एक रास्ता बतलाकर फरमाया कि इस रास्ते से अन्दर चले जाओ आपको
गुरु महाराज जी के दर्शन हो जाएंगे लेकिन स्वयं दूसरे मार्ग से अन्दर जाकर सिंहासन
पर विराजमान हो गए|
भाई
लहणा जी ने गली में घोड़ी को एक खूंटे से बाँधा और बड़ी ऊँची श्रद्धा-भावना के साथ
प्रसाद भेंट हाथ में लेकर अन्दर पहुंचे तो सिंहासन के आगे दंडवत प्रणाम किया| जब
आज्ञा पाकर उठे तो क्या देखते है कि यह तो वही स्वरुप है जो मुझे मार्ग दिखा रहा
था| गुरु महाराज जी ने पहला वचन किया –भाई! तेरा नाम क्या है? इन्होने हाथ जोड़कर
विनय की- दीनदयाल! मेरा नाम लहणा है| तो आगे फरमाते हुए-अच्छा भाई! तुमने लेना है
तो हमने देना है| गुरु के इस वचन से उनकी आँखे खुल गई| पूर्व के दबे हुए रूहानी
संस्कार उभर आये और मन की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही| लेकिन साथ ही उनको एक
दुःख हुआ कि मुझ से बड़ी भूल हुई| अगर मुझे पता होता कि यही मेरे इष्टदेव है जो
मुझे मार्ग दिखला रहे थे तो मैं इनको घोड़ी पर बिठाता और खुद पैदल चलता| इस भूल के
कारण वे मन में बार बार पछताते और झुक-झुक कर क्षमा मांग रहे थे| गुरु महाराज जी
उनकी मन की अवस्था को जान रहे थे| हुकुम दिया-अच्छा भाई लहणा! सेवा में लग जाओ|
गुरु का हुकुम पाकर कुछ दिन वहां रहते हुए सेवा और दर्शन का लाभ उठाया| फिर आज्ञा
पाकर वापिस अपने गाँव आ गए| कुछ दिन घर में रहे लेकिन फिर गुरु के दर्शन की लालसा
ने जोर मारा| गुरु के लंगर के निमित आटा, दाल, घी, चावल आदि सिर पर उठाया और गुरु
के दर्शन को चलने लगे| उनका एक भान्जा जो घर में रहता था, कहने लगा मामा जी, सामान
का बोझ अधिक है, आप अकेले इस सामान को नहीं ले जा सकेंगे, आधा मेरे सिर पर रख
दीजिये, मैं आपके साथ जाकर पहुँचा आऊंगा| वह बोले- बेटा! अगर किसी को ज़र मिल जाये
तो क्या वह दूसरो को देता है? गुरु की सेवा तो ज़र है, यह मैं खुद ही उठा कर ले
जाऊंगा| सीधा सामान सिर पर उठाया और गुरु दरबार में जा पहुँचे और फिर से गुरु
महाराज जी की सेवा में लग गए|
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कीकर
के पेड़ से मिठाई
एक
बार लगातार बारिश के कारण लंगर का प्रबंध ना हो सका| गुरु जी ने सबको कहा कि इसी सामने वाले
कीकर के वृक्ष पर चढ़कर उसे हिलाकर मिठाई झाड़ो| सब ने कहा, महाराज! कीकरों पर भी मिठाई होती है, जो हिलाने पर नीचे गिरेगी? संगत के सामने हमे शर्मिंदा क्यों
करवाते हो? तब गुरु जी ने भाई
लहणा को कहा, पुरुष! तुम ही कीकर
को हिलाकर संगत को मिठाई खिलाओ| संगत
भूखी है| गुरु जी का आदेश
मान कर भाई जी ने वैसा ही किया| वृक्ष
के हिलते ही बहुत सारी मिठाई नीचे गिरी, जिसे
खाकर संगत तृप्त हो गई|
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मृत
चूहिया
एक
दिन गुरु जी के निवास स्थान पर चूहिया मरी पड़ी थी| गुरु जी ने लखमी दास व श्री चंद के साथ और सिक्खों को
भी कहा कि बेटा! यह मृत चूहिया बाहर फैक दो|
बदबू के कारण किसी ने भी गुरु जी की
बात की परवाह नहीं की| फिर
गुरु जी ने कहा, लहणा यह मृत चूहिया
फैक कर फर्श साफ कर दो| तब
भाई लहणा जी ने शीघ्रता से चूहिया पकडकर बाहर फैक दी और फर्श धोकर साफ कर दिया|
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कीचड़
का गठ्ठर
एक दिन भाई लहणा जी
अपने गाँव से करतारपुर श्री गुरुनानक देव जी के श्री दर्शन के लिए गए| जब ड़ेरे पर
पहुँचे तो गुरुनानक देव जी ड़ेरे पर मौजूद नहीं थे| माता सुलक्षिनी जी से पुछने पर
पता चला की श्री गुरु महाराज जी खेतो में घास निकलवा रहे है| भाई लहणा जी के ह्रदय
में दर्शन की तड़प थी, अतः वह खेतो की ओर चल दिए| उस समय वे मूल्यवान एवं साफ़-
सुथरे वस्त्र धारण किये हुए थे| भाई लहणा जी खेत में पहुंचे और गुरुनानक देव जी के
चरणों में मस्तक निवाया| तत्पश्चात भाई लहणा जी ने विनती की सच्चे पादशाह! आज्ञा
हो तो मैं भी घास निकालू? गुरुनानक देव जी ने फरमाया आप घास मत निकालो, बल्कि घास
का यह गठ्ठर उठाकर ड़ेरे पर ले चलो| भाई लहणा जी ने आज्ञा मानकर तुरंत गठ्ठर सिर पर
उठा लिया| उस समय उनके दिल में यह विचार तक नहीं आया कि मैंने इतने मूल्यवान रेशमी
वस्त्र पहन रखे है| उनके लिए तो गुरुमहाराज जी की आज्ञा ही मुख्य थी| चूँकि घास
गीली भी थी और कीचड से लतपत भी थी अतः उसमे पानी के कीचड़ से सनी बूँदे गिर-गिर कर
भाई लहणा जी के साफ़ सुथरे वस्त्रो पर गिरने लगी, जिससे वस्त्रो पर धब्बे ही धब्बे
हो गए| भाई लहणा जी ड़ेरे पर पहुंचे और घास का गठ्ठर नीचे उतारा| पीछे-पीछे गुरुनानक
देव जी पहुँच गए| भाई लहणा जी के वस्त्र देखकर माता सुलक्षिनी जी ने गुरु नानक देव
जी के चरणों में विनती की गरीब निवाज! यह आपने क्या किया? इस भले आदमी के सिर पर
आपने कीचड़ से भरी घास रखवा दी| देखिये! कीचड़ की बूंदो से इसके कपडे खराब हो गए है|
श्री गुरुनानक जी ने हँसते हुए फरमाया- यह जो घास का गठ्ठर इन्होने उठाया है यह
गठ्ठर नहीं है, बल्कि त्रिलोकी का छत्र है| वस्त्रो पर गिरे हुए ये छींटे कीचड़ की
नहीं, केसर की छींटे है| गुरुनानक देव जी के ये वचन सुनकर भाई लहणा जी गुरु जी के
चरणों में गिर पड़े| श्री गुरुनानक देव जी ने उन्हे उठाकर गले से लगा लिया और अपना
रूप बना लिया| समय आने पर भाई लहणा जी दूसरी पादशाही श्री गुरु अंगद देव जी के
पावन नाम से सुशोभित हुए और उनका यश चारो तरफ छा गया| यह सब गुरुवचनो को
श्रद्धापूर्वक पालना करने के परिणाम स्वरुप ही सम्भव हुआ|
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लोटा गंदे नाले में
से लाना
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी ने एक लोटा गंदे नाले में फैक दिया और अपने पुत्रो से उसे निकाल
के लाने को कहा तो उनके बच्चो ने कहा कि स्वामी जी आपके पुत्र होकर गंदे नाले में
हाथ मारे तो गंदे हो जाएंगे| अभी कोई सिक्ख आता है, सेवादार आता है उसे कह देंगे|
तभी भाई लहणा जी वँहा आ पहुँचे| गुरुनानक देव जी ने उन्हें लोटा निकालने के लिए
कहा| उन्होंने बिना कुछ विचार किये नाले में लोटा निकालने के लिए हाथ डाल दिए| तब
श्री गुरुनानक देव जी ने फरमाया-किसी को कीचड़ में से निकलने के लिए खुद भी कीचड़
में जाना पड़ता है| उनकी कृपा से अनेको का उद्धार होता है| जब समय आया तो भाई लहणा
जी दूसरी पादशाही बन गए |
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रात के समय कपड़े
धोने जाना
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी ने अपने भक्तो को रात के
समय घाट पर जाकर कपड़े धोकर उनको सुखाकर लाने के किये कहा तो सभी ने सोचा कि इतनी
रात को हम कहाँ जाएंगे? गुरुनानक देव जी से कहा कि आपके पास और भी वस्त्र है तो वो
पहन लेना, तो सभी ने मना कर दिया| पर भाई लहणा जी ने वह वस्त्र लिए और घाट की तरफ
चल पड़े जब वह घाट पर पहुँचे तो वहां तो उजाला था, दिन निकला पड़ा था| उन्होंने कपडे
धोए और सुखाकर फटा-फट ले आये जब वह वापिस आये तो सबने उससे पूछा की तू तो बहुत
जल्दी आ गया तो उन्होंने बताया की वहाँ तो दिन निकला हुआ था| ये तो गुरु महाराज जी
की लीला थी वे पूर्ण संत है रात को दिन, दिन को रात कुछ भी कर सकते है |
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गुरु अंगद देव जी
पर कृपा
एक बार गुरु अंगद
देव जी से भाई बाला जी ने पूछा कि आप हमारे से भी बाद आये, सेवा भी हमारे बाद की|
हमने भी बड़े भाव से गुरुनानक देव जी की सेवा की परन्तु आप पर इतनी कृपा कैसे बरसी?
तब गुरु अंगद देव जी ने फरमाया की भाई बाला जी आपने गुरुनानक देव जी की पूजा, उनकी
सेवा उन्हें क्या समझ कर की? तब भाई बाला जी ने कहा कि मैंने गुरुनानक जी की सेवा
उन्हें पूर्ण संत समझ कर की| तब उन्हें गुरु अंगद देव जी ने कहा कि आपने उनकी सेवा
पूर्ण संत समझकर की है तो कौन से आप पूर्ण संत से कम है| तब बाला जी ने पूछा कि
आपने क्या समझ कर सेवा की? तब उन्होंने फरमाया कि मैंने उन्हें पारब्रह्म
परमेश्वर, निरंकार समझकर उनकी सेवा की, तो वही रूप बना गए है |
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अंगूठे को श्राप
कहते है जब श्री
गुरु अंगद देव जी को गद्दी पर बिठाया गया तब गुरु नानक देव जी ने उन्हें गद्दी पर
बैठा कर उनके चरणों में झुककर नमस्कार किया| तब गुरु अंगद देव जी को यह अच्छा ना
लगा तो उन्होंने अपने पैर के अंगूठे की तरफ देखकर कहा कि तू अपने गुरु के सामने
कैसे आ गया? तेरे को कोढ़ हो जाये| तब से उनके पैर के अंगूठे पर कोढ़ हो गया| उनके
अन्दर इतनी नम्रता थी| फिर जब गुरु अमरदास जी को पता चला कि गुरु अंगद देव जी के
अंगूठे पर कोढ़ हो रखा है तो जब गुरु अंगद देव जी ध्यान पर बैठते थे तो गुरु अमरदास
जी उनके अंगूठे को मुँह में ले लेते थे| ताकि गुरु अंगद देव जी को भक्ति में तकलीफ
न हो|
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खडूर के चौधरी को मिरगी का रोग था| वह
शराब का बहुत सेवन करता था| एक
दिन गुरु जी के पास आकर विनती करने लगा कि आप तो सब रोगियों का रोग दूर कर देते हो, आप
मुझे भी ठीक कर दो| लोगों की बातों पर मुझे विश्वास तब आएगा जब मेरा मिरगी का रोग
दूर हो जायेगा| गुरु जी कहने लगे चौधरी अगर तू शराब पीना छोड़ दे तो तेरा मिर्गी
का रोग दूर हो जायेगा| पर यदि तू फिर शराब पीने लग गया तो यह रोग तुझे फिर लग
जायेगा| चौधरी गुरु जी को शराब ना पीने का वचन देकर चला गया| उसे
फिर मिरगी का रोग ना हुआ| समय बीतता गया| एक
दिन उसने फिर शराब पी ली,
और शराबी होकर अपने
मकान की छत पर चढ़ गया|
छत से ही गुरु जी की
तरफ मुख करके जोर जोर से कहने लगा गुरु
जी मैंने आज फिर शराब पी ली है मुझे कोई मिरगी का रोग नहीं हुआ| गुरु
जी कहने लगे, सावधान हो जाओ तुम्हें मिरगी का रोग लग चुका है| तब
उसी ही पल चौधरी को मिरगी का दौरा पड़ा| वह
अपनी छत से उलटकर नीचे आ गिरा और उसकी मौत हो गई| इस
तरह वह चौधरी गुरु जी के वचनों को भुलाकर, मनमत
में आकर अपनी जिंदगी से ही हाथ धो बैठा|
****
हरीके गाँव का अहंकारी चौधरी
गुरु
जी अपने पुराने मित्रों को मिलने के लिए कुछ सिक्ख सेवको को साथ लेकर हरीके गाँव
पहुँचे| गुरु जी की उपमा सुनकर बहुत से लोग श्रद्धा के साथ दर्शन करने
आए| हरीके के चौधरी ने अपने आने की खबर पहले ही गुरु जी को भेज दी
कि मैं दर्शन करने आ रहा हूँ| गाँव
का सरदार होने के कारण उसमे अहम का भाव था| गुरु
जी ने उसके बैठने के लिए पीहड़ा रखवा दिया व चादर बिछवा दी| चौधरी
ने पीहड़े पर बैठना अपना अपमान समझा| वह
पलंघ पर गुरु जी के साथ सिर की ओर बैठ गया| गुरु
जी से वार्तालाप करके वह तो चला गया पर सिक्ख शंका ग्रस्त हो गये और कहने लगे
महाराज चौधरी तो आप से ऊँचा होकर आपके साथ ही बैठ गया उसमे कितना अहंकार का भाव है, जिसे
बड़ो का आदर करना नहीं आता|
सिक्खों की बात सुनकर गुरु जी कहने लगे जो बड़ो का निरादर करता है वह छोटा ही रहता
है, और जो बड़ो का आदर करता है वह अपने आप ही बड़ा हो जाता है| गुरु
जी के ऐसे वचनों से सरदार बड़ा होते हुए भी छोटा हो गया|
****
एक तपस्वी योगी की ईर्ष्या
एक
तपस्वी जो कि खडूर साहिब में रहता था जो कि खैहरे जाटो का गुरु कहलाता था| गुरु
जी के बढ़ते यश को देखकर आपसे जलन करने लगा और निन्दा भी करता था| एक
बार उसी जगह पर भयंकर सूखा पड़ा| लोग
दुखी होकर वर्षा कराने के उद्देश्य से तपस्वी के पास आए| पर
उसने कहना शुरू किया कि यहाँ तो उल्टी गंगा बह रही है| श्री
अंगद देव जी गृहस्थी होकर अपने को गुरु कहलाता है और अपनी पूजा कराता है| जब
तक आप इन्हें बाहर नहीं निकालोगे तब तक वर्षा नहीं होगी| मैं
आठ पहर में वर्षा करा दूँगा अगर इन्हें गाँव से बाहर निकाल दोगे| ऐसी
बात सुनकर गाँव के पंच आदि मिलकर गुरु जी के पास आए और कहने लगे कि गुरु जी आप या
तो वर्षा कराये नहीं तो हमारे गाँव से चले जाओ| गुरु
जी कहने लगे भाई! हम परमात्मा के विरुद्ध नहीं हैं, यदि
हमारे यहाँ से चले जाने से वर्षा हो जाती है तो हम यहाँ से चले जाते हैं| गाँव
खान रजादे की संगत को पूरी बात पता लगने पर वह गुरु जी को अपने साथ ले गई|
तपस्वी लोगो को दिलासा देता रहा पर जब आठ दिन तक वर्षा नहीं हुई तो लोग बहुत हताश
हो गये| एक दिन अचानक ही श्री अमरदास जी गुरु अंगद देव जी को मिलने खडूर
साहिब आए|
असलियत का पता लगते ही बहुत दुखी हुए और संगतो को समझाने लगे
अगर आप योगी तपस्वी को गाँव में से निकाल दोगे और गुरु जी से क्षमा माँग लोगे तो
बहुत जल्दी वर्षा होगी| गुरु अंगद देव जी गुरु
नानक देव जी की गद्दी पर सुशोभित है, जो
की बहुत शक्तिशाली है|
उनको प्रसन्न करके ही
वर्षा होने की आशा है|
गुरु घर का आदर न
करने से वर्षा नहीं होगी| भाई अमरदास जी के ऐसे वचन सुनकर ज़मींदारो ने तपस्वी को कहा कि
आप आठ दिनों में भी वर्षा नहीं करा सके और गुरु जी को भी गाँव से बाहर निकाल दिया| इसलिए
आप गाँव छोडकर चले जाओ|
हम अपने आप गुरु जी
को सम्मान सहित वापिस लाकर वर्षा करायेंगे| तपस्वी
को गाँव छोड़कर जाना पड़ा और सारी संगत गुरु जी से क्षमा मांगकर गुरूजी को वापिस
खडूर साहिब ले आई| लोगों की खुशी की सीमा ना रही तब आकाश पर बादल छाये और खूब
वर्षा हुई| गुरु जी के ऐसे कौतक को देखकर संगतो का विश्वास और पक्का हो गया|
****
श्री गुरु अंगद देव जी का छड़ी देना
एक
दिन गोंदे क्षत्रि ने गुरु जी के पास आकर प्रार्थना की, कि
सच्चे पातशाह! मेरा गांव जो कि व्यास नदी के किनारे स्थित है, वहां
भूतों का निवास है जिसके कारण वह गांव बस नहीं रहा|
कृपा करके आप वहां आकर बसे| मैं
आपके लिए सुन्दर मकान बनवा दूंगा और हर प्रकार से सेवा भी करूंगा| गुरु
जी ने पहले अपने बड़े सुपुत्र दासु फिर छोटे पुत्र दातु को वहां निवास के लिए भेजा| दोनों
पुत्रों ने मना कर दिया तो गुरु जी ने श्री अमरदास को कहा कि आप गोंदे के साथ चले
जाएं व इनकी मदद करें|
गुरु की आज्ञा मानकर
गुरु अमरदास जी झट से तैयार हो गए| तब गुरु जी ने जाते हुए एक छड़ी श्री अमरदास जी को दी और कहा कि
जब आप इस छड़ी को हवा में हिलाओगे तो इसको दूर से ही देखते ही भूत-प्रेत गांव छोड़कर
भाग जाएंगे| इस तरह जब अमरदास जी गोंदे के साथ हाथ में छड़ी लेकर जा रहे थे
तो हाथ में छड़ी हिलती देख सब भूत-प्रेत नगर खाली करके भाग गए|
****
हमायूँ बादशाह का अहंकार दूर करना
कन्नौज
के युद्ध में हारकर दिल्ली का बादशाह हमायूँ गुरु घर की महिमा सुनकर खडूर साहिब
में सम्राट का वर प्राप्त करने के लिए आया| गुरु
अंगद देव जी अपनी समाधि की अवस्था में मगन थे| पांच
दस मिनट खड़े रहने पर भी जब उसकी ओर ध्यान नहीं दिया गया तो उसने अपना निरादर समझा
क्यूंकि उसे अपने बादशाह होने का अहंकार आ गया| अपना
आदर ना होते देख उसने गुरु जी को मारने के इरादे से अपनी म्यान में से तलवार
निकाली| जैसे ही वह गुरु जी पर वार करने के लिए तैयार हुआ तो गुरु अंगद
देव जी उस ओर संकेत देकर कहा बादशाह शेरशाह के सामने जंग में जहाँ यह तलवार तुमने
चलानी थी वहाँ तो चलाई नहीं और अब फकीरों पर चलाने लगे हो| इन
शब्दों का हमायूँ पर गहरा असर हुआ|
उसने चरण पकडकर गुरु जी से क्षमा माँगी|
आगे से गुरु जी कहने लगे कि अगर तुम अपनी म्यान से तलवार ना निकालते तो तुम्हे
तुमारा राज्य शीघ्र प्राप्त होता| परन्तु
तुमने गुरु घर का निरादर करके अपने राज्य से भी हाथ धो लिया| ऐसा
तुमने अहंकार में आकर किया| अब
तुम्हे 12 साल बाद ही बादशाही मिलेगी| ऐसा
वचन सुनकर हमायूँ गुरु जी को नमन करके लाहौर की ओर रवाना हो गया|
****
बाबा रूप सिंह जी
रूप
सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की।
20 साल सेवा करते हुए बीत गए। गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता। गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ के कल बताता हूं। घर जाकर माँ से पूछा तो माँ बोली जमीन माँग ले। मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना। छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना। अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह। वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते।इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा:
गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है।
आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि "आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते हैं। अगर कभी आगे ऐसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी एक बार खाए तब भी हमारे मुख से
शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे। शुकर करने की दात दो।
इस बात से गुरु इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वो भी खाली हाथ नहीं जाएगा।
तो यह है शुक्र करने का फल।
20 साल सेवा करते हुए बीत गए। गुरु रूप सिंह जी पर प्रसन्न हुए और कहा मांगो जो माँगना है। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मुझे तो मांगने ही नहीं आता। गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह जी बोले मुझे एक दिन का वक़्त दो घरवाले से पूछ के कल बताता हूं। घर जाकर माँ से पूछा तो माँ बोली जमीन माँग ले। मन नहीं माना। बीवी से पुछा तो बोली इतनी गरीबी है पैसे मांग लो। फिर भी मन नहीं माना। छोटी बिटिया थी उनको उसने बोला पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना। इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले कल तू ही साथ चल गुरु से तू ही मांग लेना। अगले दिन दोनो गुरु के पास गए। रूप सिंह जी बोले गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह। वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी। रूप सिंह जी इतने गरीब थे के घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते।इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा:
गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप के हम लोगो पे बहुत एहसान है।
आपकी बड़ी रहमत है। बस मुझे एक ही बात चाहिए कि "आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते हैं। अगर कभी आगे ऐसा वक़्त आये के हमे चार पांच दिन में भी एक बार खाए तब भी हमारे मुख से
शुक्राना ही निकले। कभी शिकायत ना करे। शुकर करने की दात दो।
इस बात से गुरु इतने प्रसन्न हुए के बोले जा बेटा अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे। तू क्या तेरे घर पे जो आएगा वो भी खाली हाथ नहीं जाएगा।
तो यह है शुक्र करने का फल।
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