(परमसंत
दादू दयाल जी)
v जग में जीना है भला, जब लग ह्रदय नाम|
नाम बिना जग जीवना, सो दादू किस काम||
v इन्द्री स्वारथ सब किया, मन माँगे सो दीन्ह|
जा कारण
प्रभु सिरजिया, सो
दादू कहु न कीन्ह||
v दादू आपा जब लगै, तब लग दूजा होइ|
जब यहु आपा मिटि गया, तब दूजा नहिं कोइ||
अर्थ
–जब तक खुदी है, तब तक परमात्मा का स्वरूप भिन्न रूप नजर आता है| जब अहंकार मिट
गया तो आत्मा और परमहात्मा का एक ही स्वरूप दिखाई देने लगा |
vसतगुरु मिलै तो पाइयै,भक्ति मुक्ति भण्डार।
दादू सहजै
देखिये, साहिब
का दीदार।।
अर्थः-""जिस जिज्ञासु को अपने मालिक के दर्शनों की अभिलाषा है
तो वह पहले सन्त सद्गुरुदेव जी से मिलाप करे-वे ही इसे भक्ति और मुक्ति का अक्षय
धन दे देंगे और फिर उसे बिना किसी कठिनाई के प्रभु का दर्शन दीदार हो जायेगा।'' अतः सन्त सद्गुरुदेव जी की सहायता
की बड़ी आवश्यकता होती है। इस ब्राहृ-ज्ञान के मार्ग पर पग बढ़ाते हुए जब तक उनका
गहरा सम्पर्क प्राप्त न होगा, उनके चरण-कमलों में दृढ़ अनुराग
न होगा उनके समीप बैठकर ब्राहृविद्या की गम्भीर गुत्थियों को सुलझाया न जाएगा और
उनके बताये हुए सुरत-शब्द-योग के अभ्यास की साधना न की होगी तब तक ऊपर गिनाये हुए
गुण केवल पाठ-मात्र होंगे। वे अपने अन्तःकरण में ठहर न सकेंगे। और जब तक सन्त
सत्पुरुषों की संगति न मिलेगी और अपने में सद्गुणों की ज्योति न जगेगी तब तक अपने
आसन पर बैठना (आत्मस्थिति) असम्भव हो जायेगा।
v मिसरी मिसरी कीजिए, मुख मीठा नाहीं।
मीठा तब ही होइगा, छिट कावै माहीं।।
बातों ही पहुँचौ नहीं, घर दूरि पयाना।
मारग पन्थी उठि चलै, "दादू'
सोह सयाना।।
भाव यह कि मिश्री-मिश्री करने से किसी का मुँह कभी मीठा हुआ है? ओ! मुँह तो तभी
मीठा होगा जब उसमें मिश्री की डली डालोगे। चलने से तो डरे और दूर रहे केवल बातों
से क्या कोई घर पहुँचा है? पथिक तो चतुर वही कहा जायेगा
जिसने चुपचाप अपना मार्ग पकड़ लिया।
v दादू नैनहूँ भरि नहिं देखिये, सब माया का रूप|
तहँ लें नैना राखिये, जहँ हैं तत्त अनूप ||
इस माया के स्वरूप को आँखों में नहीं बसाना, लेकिन
व्यहवार रूप में इसे देखना है इन आँखों में, मालिक का जलवा बसाना है| अपनी दृष्टि
को सदा अपने लक्ष्य पर रखना है| उस परम सुन्दर तत्व (आत्मा ) की ओर अपना ध्यान
लगाए रखना है ताकि आत्म स्वरुप में ध्यान जुड़कर आत्मय ही हो जाये|
v छलावा छलि जाइगा, सुपिना बाजी सोइ |
दादू देखि न भूलिये, यहु निज
रूप न होइ ||
यह संसार स्वपन्वत् छलावा है| जीव को जल्दी से छल
लेता है| सन्त दादू जी फरमाते हैं कि इस संसार को देख कर भूलना नही चाहिए| यह उसका
असली रूप नहीं है| यदि जन्म जन्म इस छलावे में छला गया तो फिर चौरासी लाख योनियों
के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त न होगा |
v प्रीत जो मेरे पीव की, पैठी पिंजर माहीं |
रोम रोम पीव पीव करै, दादू दूसर
नाहीं ||
अर्थ---जब
प्रियतम का प्रेम ह्रदय में बस गया तो रोम-रोम में से इष्टदेव के नाम की ध्वनी
निकलने लगी | इसके सिवाय और कुछ नही रहता | ऐसा ही आपका प्रेम था |
v बधया मुक्ता करि लिया, उरझाया सुरझि समान |
बैरी मीता करि लिया | दादू
उत्तम ज्ञान ||
झुठा साचा करि लिया, काचा कंचन
सार |
मैंला निर्मल करि लिया, दादू
ज्ञान बिचार ||
अर्थात जिसने अपने आपको सांसारिक उलझनों में न
फंसकर, मन और माया रुपी शत्रुओं को अपना मित्र बनाकर स्वयं को आवगमन के बन्धन से
मुक्त कराने का साधन कर लिया, उसने ही वास्तव में उतम ज्ञान को प्राप्त कर किया|
जिसने जगत को झूठा जानकर मालिक के सच्चे प्रेम को पा लिया तथा माया को कांच समझकर
मालिक के सार -शब्द रुपी हीरे की प्राप्ति कर ली और जन्म- जन्मान्तरो के मैंले मन
को निर्मल कर लिया, उसी ने ही वास्तविक विद्या को पड़ा और जाना है| यह विद्या सन्त
महापुरूष की चरण -शरण में जाने से ही प्राप्त होती है |
v सतगुरू बरजै सिष करै, क्यों करि बंचै काल |
दह दिसि देखत बह गया, पानी फोड़ी
पाल ||
जिस
काम के लिए सद्गुरु मना करे और शिष्य वही काम करे तो वह काल से कैसे बच सकता है|
जिस प्रकार बांध टूटने पर पानी दसों दिशाओं में फ़ैल जाता है, इसी प्रकार वह जहाँ
भी जाएगा, काल की परिधि वहाँ होगी |
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