(परमसंत सुथरा जी)
v अख पकडनी ना मिले ते मुख विच रहे गिराह |
लख लानत
ई सुथरया जे पल दा करे विसाह ||
अर्थ :- ‘जीवन तो ऐसा क्षणभंगुर है कि पता नही आँख
भी झपकने को मिलेगी या नही और जो ग्रास मुख में है वह निगला भी जायेगा या नही| ऐसे
जीवन के एक पल का भी यदि तू विश्वास करेगा तो तुझे धिक्कार है |’
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