जीवन परिचय श्री गुरु रामदास जी
जन्म : सितम्बर 24, 1534
पिता : बाबा हरि दास जी
माता : माता दया कौर जी
पत्नी : बीबी बानी जी
साहिबजादे : प्रिथी चन्द जी, महादेव जी, अर्जुन देव
जी
जोती जोत : सितम्बर 1, 1581 गोइंदवाल
बचपन का नाम : जेठा जी
बीबी भानी को आशीर्वाद
बालपन में ही इनकी माता दया कौर जी का देहांत हो गया| जब
आप सात वर्ष के हुए तो आप के पिता श्री हरिदास जी भी परलोक सिधार गए| इस
अवस्था में आपको आपकी नानी अपने साथ बासरके गाँव में ले गई| बासरके
आपके ननिहाल थे| यहाँ आकर आप भी अन्य बालकों की तरह घुंगणियाँ (उबले हुए चने)
बेचते थे| जब श्री गुरु अमरदास जी 1 सितम्बर, 1574 को गुरुगद्दी पर आसीन
हुए तो आप जेठा जी का और भी ख्याल रखते थे| आपकी
सहनशीलता, नम्रता व आज्ञाकारिता के भाव देखकर गुरु अमरदास जी ने अपनी छोटी
बेटी की शादी जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) से कर दी| श्री
रामदास जी के घर तीन पुत्र पैदा हुए:
·
श्री बाबा प्रिथी
चँद जी
·
श्री बाबा महादेव
जी
·
श्री (गुरु) अर्जन
देव जी
विवाह के बाद भी श्री (गुरु) रामदास जी पहले की तरह ही गुरु घर
के लंगर और संगत की सेवा में लगे रहते|
बीबी भानी अपने गुरु जी की बहुत सेवा करती| प्रातःकाल
उठकर अपने गुरु पिता को गरम पानी के साथ स्नान कराती और फिर गुरुबाणी का पाठ करके
लंगर में सेवा करती| एक दिन बीबी ने देखा कि चौकी का पावा टूट गया है जिसपर बैठकर
गुरु जी स्नान करते हैं|
उस पावे के नीचे बीबी
ने अपना हाथ रख दिया ताकि गुरु जी के वृद्ध शरीर को चोट ना लगे| बीबी
के हाथ में पावे का कील लग गया और खून बहने लगा| जब
गुरु जी स्नान करके उठे तो बीबी से बहते खून का कारण पूछा| बीबी
ने सारी बात गुरु जी को बताई| बीबी
की बात सुनकर गुरु जी प्रसन्न हो गए और आशीर्वाद देने लगे कि संसार में आपका वंश
बहुत बढ़ेगा जिसकी सारा संसार पूजा करेगा
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गुरु गद्दी मिलना
गुरु
अमरदास जी की दो बेटियां बीबी दानी व बीबी भानी जी थी| बीबी
दानी जी का विवाह श्री रामा जी से और बीबी भानी जी का विवाह श्री जेठा जी (श्री
गुरु रामदास जी) के साथ हुआ| दोनों
ही संगत के साथ मिलकर खूब सेवा करते| गुरु
जी दोनों पर ही खुश थे|
इस कारण दोनों में से
एक को गुरुगद्दी के योग्य निर्णित करने के लिए आपने उनकी परीक्षा ली|
एक दिन सांय काल गुरु जी ने बाउली के पास खड़े होकर रामा को कहा कि एक तरफ चबूतरा
बनाओ जिसपर बैठकर हम बाउली की कार सेवा देखते रहें| फिर
बाउली के दूसरी तरफ जाकर जेठा जी को एक चबूतरा तैयार करने की आज्ञा दी| दूसरे
दिन दोनों ने ईंट गारे के साथ चबूतरे बनाए| गुरु
जी ने पहले रामा जी का चबूतरा देखकर कहा यह ठीक नहीं बना| रामा
ने कहा महाराज! मैंने आपके बताये अनुसार ठीक बनाया है| पर
गुरु जी ने उसे दोबारा चबूतरा बनाने की आज्ञा दे दी| दूसरी
ओर गुरु अमरदास जी ने जेठा जी का चबूतरा देखकर कहा, तुम
हमारी बात नहीं समझे|
इन्हें भी दोबारा
बनाने की आज्ञा दे दी|
जेठा जी ने चुप-चाप
बिना कुछ कहे उसी समय ही चबूतरा तोड़ दिया और हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं
अल्पबुद्धि जीव हूँ मुझे फिर से समझा दो| गुरु
जी ने छड़ी के साथ लकीर खीचकर कहा कि इस तरह का चबूतरा बनाओ| दूसरे
दिन जब गुरूजी फिर दोनों के द्वारा बनाए गए चबूतरो को देखने के लिए गए तो फिर पहले
रामा जी तरफ गए| गुरु जी ने फिर से वही कहा इसे गिरा दो और कल फिर बनाओ| रामा
जी ने चबूतरा गिराने से इंकार कर दिया| परन्तु
गुरु जी ने एक सेवक से चबूतरा गिरवा दिया| फिर
गुरूजी जेठा जी के पास गए|
गुरु जी का उत्तर
सुनते ही उन्होंने चुप-चाप चबूतरा गिरा दिया और कहा मुझे क्षमा कीजिये मैं भूल गया
हूँ| आपकी आज्ञा के अनुसार ठीक चबूतरा नहीं बना पाया| गुरु
जी फिर दोनों को समझाकर चले गए| तीसरे
दिन जब फिर दोनों ने चबूतरे तैयार कर लिए तो गुरु जी ने रामा के चबूतरे को देखकर
कहा तुमने फिर उस तरह का चबूतरा नहीं बनाया जिस तरह का हमने कहा था| इसको
गिरा दो, परन्तु उसने कहा मुझसे और अच्छा नहीं बन सकता आपको अपनी बात याद
नहीं रहती, फिर मेरा क्या कसूर है? आप
किसी और से बनवा लो| गुरु जी उसका उत्तर सुनकर, चुप-चाप जेठा जी की तरफ चल पड़े| गुरु
जी ने जेठा जी को भी वही उत्तर दिया कि तुमने ठीक नहीं बनाया, आप
हमारे समझाने पर नहीं समझे| जेठा
जी हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं कम बुद्धि करके आपकी बात नहीं समझ सका| आप जी की कृपा के बिना मुझे कुछ समझ नहीं आ सकता| आपका
यह उत्तर सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि हमें आपकी यह सेवा बहुत
पसंद आई| आप अहंकार नहीं करते और सेवा में ही आनन्द लेतें हैं| एक
दिन गुरु जी अपने ध्यान स्मरण से उठे और बीबी भानी से कहने लगे, पुत्री!
हम आप दोनों की सेवा से बहुत
खुश है, इसलिए हम अपनी बाकि रहती आयु श्री रामदास जी को देकर बैकुन्ठ
धाम को चले जाते है| इसके पश्चात् रामदास जी को कहने लगे कि आपकी निष्काम भक्ति ने
हमें प्रभावित किया है|
अब हम दोनों में कोई
भेद नहीं है| हमारी बाकि आयु 6 साल 11 महीने और 18 दिन है,
आप हमारे आसान पर बैठ कर गुरु घर की मर्यादा को चलाना| यह
वचन करके आप ने पांच पैसे और नारियल श्री रामदास जी के आगे रखकर गुरु नानक जी की
गुरु गद्दी की तीन परिक्रमा करके माथा टेक दिया| अपने
पुत्रों व सारी संगत के सामने कहने लगे कि आज से गुरुगद्दी के यह मालिक है| इन्ही
को माथा टेको| मोहरी जी गुरु कि बात मान गये, मगर
मोहन जी ने ऐसा करने से मना कर दिया कि गुरु गद्दी पर हमारा हक है, यह
कहकर माथा नहीं टेका|
तत्पश्चात सारी संगत
ने श्री रामदास जी को गुरु मानकर माथा टेक दिया|
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गुरु
दरबार की सेवा
जिन दिनों गुरु रामदास जी जो गुरु दरबार की सेवा करते थे उन्हीं
दिनों की बात है कि एक बार उनके गांव के कुछ लोग वहां आये और आपके सामने ही आपस
में बातें करने लगे कि देखो, अब कैसे साध बन बैठे हैं। कुछ दिन पहले तक जब ये
व्यवहार में फँसे थे तो न जाने कितने झूठ बोलते थे। उनकी बातें सुन कर आपने ये
शब्द पढ़े।
हम अपराध पाप बहु कीने करि दुसटी चोर चुराइआ।
अब नानक सरणागति आए, हरि राखहु लाज हरि भाइआ।।
गुरुवाणी गौड़ी म.-4
भाइयो! आपकी सब बातें सत्य हैं। यह सब महिमा मेरे श्री गुरु
महाराज जी की है जिन्होने दया करके मुझ जैसे अपराधी को भी अपनी चरण-शरण में
रखकरअपनी अपार कृपा से सच्चा साध बनाया है। लोहे का कोई मूल्य नहीं होता, परन्तु पारस से छूकर वह मूल्यवान बन जाता है, वह स्वर्ण बन जाता है। फिर उसे कोई लोहा नहीं कहता।
हम भी जब से श्री गुरु महाराज जी की शरण में आये हैं, तब से उन्होने अपने नाम को देखकर हमारी लाज रख ली
है। यह सुनकर वे लोग बहुत लज्जित हुए और चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। जितने भी
महापुरुष कमाई वाले हुए हैं, उन्होने कभी भी अपनी महिमा नहीं की। उन्होने सदैव
अपने श्री सद्गुरुदेव जी की महिमा का ही गान किया। श्री गुरु अर्जुनदेव जी के वचन
हैं-
कहु नानक हम नीच करना, सरणी परे की राखहु सरमा।।
एक और स्थान पर वे फरमाते हैं-
मूरख मुगध अनाथ चंचल बलहीन नीच अजाणा।
बिनवन्ति
नानक सरणि तेरी रखि लेहु आवण जाणा।।
भक्ति की अमूल्य दात को पाने के लिये उन्होने कितनी नम्रता धारण
की। इसी कसौटी से हम अपनी निरख-परख करें कि हमारे भीतर कितनी नम्रता और सहनशीलता
है। जितने अधिक ये गुण हमारे भीतर होंगे, उतनी ही अधिक हमें शान्ति प्राप्त होगी। चाहे हम
केवल पांच दिनों से सेवा कर रहे हों अथवा पचास बरसों से। संसार की दृष्टि में हम
चाहे मामूली सेवक हों या बड़े से बड़े। प्रकृति हर एक को अपनी अपनी भावना का फल देती
है। इसलिये श्री गुरु महाराज जी हमें आज्ञा देते हैं कि जिन कर्मों के करने से
गुरुमुख की भक्ति बढ़ती हो, दृढ़ विश्वास से वही कर्म करके पूर्बले मलीन
संस्कारों के फल को दग्ध करना है। ऐसा करने से निश्चित रुप से तुम भक्ति के अनमोल
धन को प्राप्त करोगे।
श्री
गुरु रामदास जी का वैराग्य
सतगुरु
का परलोक गमन सुनकर सभी भगत जन गुरु जी के पास दूर-२ से आकार माथा टेकते तो मोहन
जी व मोहरी जी इसे अच्छा नहीं समझते थे| गुरु
रामदास जी एकांत कमरे में जा कर बैठ गये और सतगुरु के वियोग में सात शब्द उच्चारण
किए, जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी के पन्ना 94 पर दर्ज है| शब्द
की पहली पंक्ति यहाँ दर्ज है|
मझ महला 4 चउ पदे
घरु 1 ||
1.हरि हरि नामु मै
हरि मनि भाइिआ||
वडभागी हरि नामु
धिआइिआ||
2.मधुसूदन मेरे मन
तन प्राना ||
हउ हरि बिनु दूजा
अवरु ना जाना||
3.हरि गुण पड़ीए
हरि गुण गुणीए ||
हरि हरि नामु कथा
नित सुणीए||
4.हरि जन संत मिलहु
मेरे भाई||
मेरा हरि प्रभु
दसहु मै भुख लगाई||
5.हरि गुरु गिआनु
हरि रसु हरि पाइिआ||
मनु हरि रंगि राता
हरि रसु पीआइिआ||
6.हउ गुण गोविंद
हरि नामु धिआई||
मिलि संगति मनि
नामु वसाई ||
7.आवहु भैणे तुसी
मिलहु पिआ री आं||
जो मेरा प्रीतमु दस
तिसकै हउ वारीआं||
आप जी कि जीवन कथा
में लिखा है कि इन वैरागमयी शब्दों को पड़कर आप के नेत्रों से जल धारा बह निकलती
थी, जिस लिए प्रेमी सिक्ख चांदी की कटोरियां आप की
आँखों के नीचे रख देते थे,
ताकि आप के वस्त्र गीले ना होँ|
यथा-
हउ रहि न सका बिनु
देखे प्रीतमा, मै नीरू वहैं वहि
चलै जीउ ||
(पहला
शब्द पन्ना 84)
जब
ऐसे ही कुछ समय बीत गया तो संगतो में निराशा फ़ैल गयी| संगत
की ऐसी दशा देखकर बाबा बुड्डा जी व मोहरी जी गुरु जी के पास आकार विनती करने लगे
कि संगतो को दर्शन दें|
तब आप जी ने बाहर
आकार संगतो को शांत किया|
****
घुंगणियाँ बेचना
श्री
गुरु रामदास जी चतुर्थ पादशाही जी जब छोटे थे तभी उनके माता-पिता जी उन्हें छोड़कर
चले गए थे| उनकी नानी जी ने उन्हें पाला-पोसा| उनकी नानी घुंगणियाँ (उबले हुए चने) रामदास जी को देती थी फिर रामदास जी उन्हें बाज़ार में बेचकर आते थे तभी उनके घर का
निर्वाह चलता था| एक दिन जब वह घुंगणियाँ को
लेकर बेचने के लिए निकले तो रास्ते में एक फ़कीर मिल गया| उसको भूख लगी थी तो
रामदास जी ने सारा घुंगणियाँ उस फ़कीर को दे
दिया|
उन्होंने
कुछ भी न सोचा| जब वह घर पहुंचे और अपनी नानी को सारी बात बताई तो नानी जी रोने
लगी तो गुरु रामदास जी ने नानी से पूछा कि वह क्यों रो रही है? तो उनकी नानी ने
कहा कि भगवान ने तेरे को दिल तो बहुत बड़ा दिया है लेकिन हमारे पास कुछ भी नहीं है|
तब गुरु रामदास जी ने वचन फरमाए कि नानी तू क्यों रो रही है? क्या मैंने किसी से कुछ माँगा है? मांगने वाला रोता है,
भिखारी तो वह है जो मांगता है लेकिन मैं तो देकर आया हूँ देने वाला तो दाता होता
है|
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भाई आदम को पुत्र का वरदान
भाई
आदम जिला फिरोजपुर गाँव बिन्जू का रहने वाला था| वह
पीरो व फकीरों की खूब सेवा करता था,
परन्तु उसकी मुराद कही पूरी ना हुई, उसके
घर में पुत्र पैदा न हुआ|
एक दिन उसे गुरु का
सिक्ख मिला| आदम ने उसे श्रद्धा सहित पानी पिलाया और प्रार्थना की कि मेरे घर संतान नहीं
है| आप गुरु जी के आगे अरदास करो कि मेरे घर पुत्र पैदा हो| सिक्ख
ने कहा इस समय गद्दी पर गुरु रामदास जी सुशोभित हैं| तुम
उनके पास गुरु के चक पर चले जाओ| उनके
पास तुम्हारी मुराद पूरी हो जायेगी| भाई
आदम सिक्ख की बात मानकर पत्नी को साथ लेकर गुरु के चक आ गया| भाई
आदम जंगल से रोज दो गठरी लकड़ी लाता और लंगर में दे देता और एक अपने घर में जमा
करता| एक दिन सर्दी के मौसम में वर्षा के कारण सूखी लकड़ी कही न मिली| तब
भाई आदम ने गुरु जी को खुशी प्रदान करने के लिए अपने घर की सारी सूखी लकड़ी जरूरत
मंदों में बाँट दी| सर्दी से ठिठुर रहें लोग सूखी लकड़ी जलाकर खुश हो गए| गुरु
जी भाई आदम की मिल बाँट कर प्रयोग करने वाली प्रवृति को देखकर प्रशंसा करने लगे|
संगते भी बहुत खुश थी|
गुरु जी ने भाई आदम
को बुलाया और कहा सिक्ख गुरु नानक जी की संगत तेरे ऊपर खुश हुई है| तुम
अपने मन का मनोरथ बताओ,
जो पूरा किया जा सके| परन्तु
भाई आदम संकोच कर गए और कहने लगे महाराज मुझे दर्शन दो यही मेरा मनोरथ है| गुरु
जी ने तीन बार पूछा और तीनो बार ही आदम ने कहा “दर्शन दो”| तब अन्तर्यामी गुरु ने कहा भाई तुम कल अपनी
पत्नी को साथ लेकर आना और फिर जिस मकसद से तुमने गुरु घर की सेवा की वह बताना| आपका मनोरथ गुरु नानक जी पूरा करेगें| इसके
पश्चात आदम ने डेरे में जाकर सारी बात अपनी पत्नी को बताई और दूसरे दिन पत्नी को
साथ लेकर गुरु दरबार पर आ गया| गुरु
जी ने वचन किया कि आज अपना मनोरथ निसंकोच बताओ| पत्नी
ने हाथ जोड़कर कहा महाराज हमे पुत्र की दात प्रदान करो| इसी मनोरथ के साथ हम गुरु
दरबार में आए थे| गुरु जी ने ध्यान में बैठकर वचन किया कि हम आपकी श्रद्धा, भक्ति
और निष्काम सेवा पर बहुत खुश हैं| गुरु
नानक जी की कृपा से आपके घर प्रतापी पुत्र होगा| उसका
नाम भगतु रखना| अब आप अपने घर
जाओ और गुरु यश का आनंद प्राप्त करो| गुरु
जी की आज्ञा के अनुसार भाई आदम अपने गाँव चला गया और उनके घर लड़के ने जन्म लिया
और जिसका नाम भगतु ही रखा गया| भाई
भगतु जी बड़े नाम रसिक और करनी वाले प्रतापी पुरुष हुए हैं| इस
प्रकार आदम और उसकी पत्नी का गुरु दर पर विश्वास और बढ़ गया|
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एक तपस्वी का भ्रम दूर करना
श्री गुरु रामदास जी प्रभु प्यार में सदैव मगन रहते| अनेकों
ही सिक्ख आप जी से नाम दान लेकर जपते थे| गुरु सिखी की ऐसी रीति देख कर एक इर्शालु
तपस्वी आपके पास आया|
गुरु जी ने उसे
सत्कार देकर अपने पास बिठाया और पूछा तपस्वी जी किस तरह आए हो? तपस्वी ने कहा
मैंने सारे धर्मों के भक्तों को देखा है, तीर्थों
की यात्रा करते हुए भी बहुत लोग देखे हैं परन्तु आपके सिखों जैसा मैंने कोई
अभिमानी नहीं देखा| क्योंकि वह और किसी मत के साधु सन्त को नहीं मानते और ना ही यह
वेद शास्त्रों की शुभ रीति को ग्रहण करते हैं| आपके
सिक्ख तो केवल आपको और आपकी बाणी को ही मानते हैं और पूजा भी आपकी ही करते हैं| इस
प्रकार वेद बाणी का त्याग करके इनका उद्धार किस तरह होगा?
गुरु जी ने पूछा तपस्वी जी तीर्थ स्नान व वेद वाणी के पाठ का क्या फल होता है? तपस्वी ने कहा इनका फल बहुत बड़ा है| तीर्थ
स्नान से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्तिम समय स्वर्ग की प्राप्ति होती है| अगर
बात करे वेदों की तो वेदों के पाठ से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है| गुरु
जी ने कहा तपस्वी जी हमारे
सिक्ख, संगतों की सेवा करके जो सुख प्राप्त करते है वह आपको प्राप्त नहीं हो सकता| आपने मूल तत्व की
पहचान नहीं की और अपनी सारी आयु तीर्थ स्नान और वेद पाठ के झूठे अहंकार में लगा दी| यह
अहंकार गुरु के मिलने से ही दूर होता है| तपस्वी
ने आगे से फिर कहा जब तीर्थ स्नान की महिमा को सब ऋषि मुनियों ने उत्तम माना है और
आप इसको तुच्छ और साधु संगत की महिमा को बड़ा किस तरह कहते हो?
इस
प्रथाए गुरु रामदास जी ने इस शब्द का उच्चारण किया
मलारू
महला ४||
गंगा जमुना गोदावरी सरसुती ते करहि उदमु धुरि साधु की ताई ||
किलविख मैलु भरे परे हमरै विचि हमरी मैलु साधू की धूरि गवाई ||१||
तीरथि अठसठि मजनु नाई ||
सति संगति की धूरि परी उडि नेत्री सभ दुरमति मैलु गवाई ||१|| रहाउ
||
जा हरनवी तपै भागीरथि आणी केदारु थापिओ महसाई ||
कांसी क्रीसनु चरावत् गाऊ मिलि हरि जन सोभा पाई||२||
जितने तीरथ देवी थापे सभि तितने लोचहि धूरि साधू की ताई||
हरि का संतु मिलै गुर साधू लै तिसकी धूरि मुखि लाई ||३||
जितनी सृसटि तुमरी मेरे सुआमी सभ तितनी लोचै धूरि साधू को ताई||
नानक लिलाटि होवै जिसु लिखिआ साधू धूरि दे पारि लंघाई ||४||२||
इस शब्द के भाव समझकर तपस्वी ने कहा मेरा सौभाग्य है जो मैंने
आपके वचन सुने हैं मेरा भ्रम दूर हो गया है| इसके
उपरांत गुरु जी के वचनों पर श्रद्धा धारण करके तपस्वी ने सिक्खी धारण कर ली और सदा
सत्संग करता रहा|
****
भाई हिन्दाल को वरदान
भाई
हिन्दाल गुरु घर में बड़ी श्रद्धा के साथ आटा मांजने की सेवा करता था| एक
दिन अचानक ही गुरू जी लंगर में आए| उस
समय भाई हिन्दाल जी आटा मांजने की सेवा कर रहें थे| उन्होंने
जैसे ही गुरु रामदास जी को देखा तो शीघ्र ही उठकर आटे से भरे हुए हाथो को अपनी पीठ
के पीछे कर दिया| ऐसा करते हुआ उन्होंने अपना शीश गुरु के चरणों पर रख दिया| गुरु
जी उसके माथा टेकने के इस रूप को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और वरदान निमित एक
अंगोछा दिया| जब भाई ने अंगोछा लेकर अपने सिर पर रखा तो उसको तीनों लोकों की
सोझी प्राप्त हो गई और वह रिद्धियो सिद्धियों को हासिल कर गया| उसकी प्रेमा भक्ति
पर खुश होकर गुरू जी ने वचन किया कि अब तुम घर जाकर नाम जपना और औरों को जपा कर
सिखी मार्ग को और आगे बढ़ाना| गुरु
जी का वचन मानकर भाई हिन्दाल अपने गाँव जंडियाला चला गया| स्वंय
नाम जपता और औरों को जाप कराता हुआ परमगति को प्राप्त हो गया| इस
प्रकार गुरु के दिये हुए वरदान के कारण उस इलाके के लोग भाई हिन्दाल को गुरु मानकर
पूजने लगे| ऐसा केवल गुरु के वरदान के कारण ही संभव हो पाया|
****
पिंगले और रजनी का प्रसंग
दुनीचंद
खत्री जो कि पट्टी नगर में रहता था उसकी पांच बेटियां थी| सबसे
छोटी प्रभु पर भरोसा करने वाली थी| एक
दिन दुनीचंद ने अपनी बेटियों से पूछा कि आप किसका दिया हुआ खाती व पहनती हो| रजनी
के अलावा सबने यही कहा कि पिताजी हम आपका दिया हुआ ही खाती व पहनती हैं| पर
रजनी ने कहा, पिताजी सबको देने वाला परमात्मा है| दुनीचंद ने कहा मैं देखता
हूँ कि तेरा परमात्मा तुझे कैसे देता है| कुछ
दिन रुक कर दुनीचंद ने रजनी का विवाह कुष्ट पिंगले के साथ कर दिया|
रजनी ने परमात्मा का हुकम मानकर और पति को परमेश्वर समझकर एक टोकरे में डालकर सिर
पर उठा लिया और माँग कर अपने और पति का पेट पालने लगी| इस
तरह मांगती हुई गुरु के चक आ गई और दुःख भंजन बेरी के नीचे कच्चे सरोवर के पास
अपने पति का टोकरा रखकर लंगर लेने चली गई| पिंगले
ने देखा उस सरोवर में कौए नहाकर सफेद हो गए हैं| यह
चमत्कार देखकर पिंगला भी अपने टोकरे से निकलकर रींग -2 कर पानी में चला गया| अच्छी तरह नहाने के बाद उसका शरीर सुन्दर और आरोग हो गया| वह
उठकर टोकरे के पास बैठ गया|
इतनी देर में उसकी पत्नी भी आ गई| उसने
उस पुरुष से अपने पति के बारे में पूछा जिसे वह वहाँ छोड़ कर गई थी| उस
पुरुष ने कहा कि मैं ही तुम्हारा पति हूँ जिसे तुम यहाँ छोड़ कर गई थी| उसने
सारी बात अपनी पत्नी को बताई कि किस तरह कौए नहाकर सफेद हो गए और मैंने भी कौए को
देखकर ऐसा ही किया और आरोग हो गया|
परन्तु रजनी को उसकी बात पर यकीन ना हुआ और वह दोनों ही गुरु रामदास जी के पास चले
गए| गुरु जी ने पिंगले कि बात सुनकर कहा ये ही तेरा पति है तुम भ्रम
मत करो| यह तुम्हारे विश्वास, पतिव्रता
और तीर्थ यात्रा की शक्ति का ही परिणाम है कि वह आरोग हो गया है| गुरु
साहिब के वचनों पर यकीन करके वह दोनों पति- पत्नी सेवको के साथ मिलकर सेवा करने लगे| तभी उसे अपने पिता की बात याद आई कि वह पिता को ठीक ही कहती थी
कि परमात्मा ही सब कुछ देने और करने वाला है| इंसान
के हाथ में कुछ नहीं है|
अपने सतगुरु की ऐसी
मेहर देखकर दोनों ने अपना जीवन गुरु को अर्पण कर दिया|
****
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