जीवन परिचय श्री गुरु हरगोबिन्द जी
जन्म : जुन 19,
1595 वडाली गाँव अमृतसर पंजाब
पिता : गुरु
अर्जुन देव जी
माता : माता गंगा जी
पत्नी : माता नानकी
जी, माता दमोदारी जी, माता महादेवी जी
साहिबजादे : बाबा गुरदिता जी, बाबा वीरो जी, बाबा अनीराय
जी,
बाबा अटल
राय जी, बाबा तेग बहादुर जी
जोती जोत : फरवरी 28, 1644
गुरु गद्दी मिलना
जहाँगीर
ने श्री गुरु अर्जुन देव जी को सन्देश भेजा| बादशाह
का सन्देश पड़कर गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक समझकर अपने सपुत्र श्री
हरिगोबिंद जी को गुरुत्व दे दिया| उन्होंने
भाई बुड्डा जी, भाई गुरदास जी आदि बुद्धिमान सिखों को घर बाहर का काम सौंप दिया| इस
प्रकार सारी संगत को धैर्य देकर गुरु जी अपने साथ पांच सिखों-
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भाई जेठा जी
·
भाई पैड़ा जी
·
भाई बिधीआ जी
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लंगाहा जी
·
पिराना जी
को
साथ लेकर लाहौर पहुँचे| इस प्रकार श्री गुरु अर्जुन देव जी लाहौर
जाने से पहले ही श्री हरिगोबिंद जी को मई 25, 1606 को
गुरु गद्दी सौंप गए थे|
परन्तु श्री गुरु
अर्जुन देव जी की रसम क्रिया वाले दिन आपको पगड़ी बांधी गई और आप जी गुरु गद्दी पर
सुशोभित हुए| गुरु घर की मर्यादा के अनुसार आप ने सेली टोपी के जगह सिर पर
जिगा कलगी और मीरी-पीरी की दो तलवारे धारण की| आप
ने कहा अब सेली टोपी पहनने का समय नहीं है| हमारे
पिता जी श्री गुरु अर्जुन देव जी जो कि शांति के पुंज थे उनके साथ अत्याचारी राजा
के अधिकारियों ने जो कुछ किया है उसका बदला और धर्म की रक्षा शस्त्र के बिना नहीं
की जा सकती| इस जगह पर बैठकर जहाँ आप गुरु गद्दी पर सुशोभित हुए वहाँ आप जी
ने अकाल बुग्गे की नीव रखी| अकाल बुग्गे की तैयारी आरम्भ करके श्री गुरु हरिगोबिंद जी ने
सब मसंदो और सिखों को हुक्मनामें लिखवा दिए कि जो सिक्ख हमारे लिए घोड़े और शस्त्र
भेंट लेकर आएगा, उस पर गुरु की बहुत मेहर होगी| इसके बाद गुरु जी ने आप भी घोड़े और शस्त्र खरीदे| उन्होंने
कुछ शूरवीर नौकर भी रखे|
गुरु जी के हुक्मनामे
को पड़कर बहुत तेजी से घोड़े और शस्त्र भेंट आनी शुरू हो गई| इस
तरह थोड़े ही समय में गुरु जी के पास बहुत घोड़े और शस्त्र इकट्ठे हो गए|
अपने सिखों को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए गुरु जी ने एक ढाडी अबदुल को नौकर
रख लिया| दूसरे पहर के दीवान में वह शूरवीरों की शूरवीरता की वारे सुनाता| वारे
और घोड़ सवारी का अभ्यास कराने के लिए रोज ही जंगल में शिकार खेलने के लिए ले जाता| इस
प्रकार योद्धाओ का युद्ध अभ्यास बढता गया और सेना भी बढती गई
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पुत्र का वरदान
एक दिन गुरु हरिगोबिंद जी के पास माई देसा जी जो कि पट्टी की
रहने वाली थी| गुरु जी से आकर प्रार्थना करने लगी कि महाराज मेरे घर संतान
नहीं है| आप कृपा करके मुझे पुत्र का वरदान दो| गुरु
जी ने अंतर्ध्यान होकर देखा और कहा कि माई तेरे भाग में पुत्र नहीं है| माई
निराश होकर बैठ गई| भाई गुरदास जी ने माई से निराशा का कारण पूछा| उसने
सारी बात भाई गुरदास जी को बताई कि किस तरह गुरु जी ने उसे कहा है कि उसके भाग्य
में पुत्र नहीं है| भाई गुरदास जी ने उसे दोबारा से गुरु जी को प्रार्थना करने को
कहा| अगर गुरु जी वही उत्तर देंगे तो आप उन्हें कहना की महाराज यहाँ
वहाँ आप ही लिखने वाले है| अगर
पहले नहीं लिखा, तो अब यहाँ ही लिख दो| आप
समर्थ हैं|दूसरे दिन गुरु जी घोड़े पर सवार होकर शिकार के लिए जाने लगे| जल्दी
से माई ने आगे हो कर गुरु जी से कहा कि महाराज किरपा करके मुझे एक पुत्र का वरदान
दो कृपा बक्श कर मेरी आशा पूरी करो| गुरु जी ने फिर वही उत्तर दिया कि माई तेरे
भाग्य में पुत्र नहीं लिखा| माई
ने कलम दवात गुरु जी के आगे रखकर कहा कि सच्चे पादशाह अगर आपने वहाँ नहीं लिखा तो यहाँ लिख दो|
यहाँ वहाँ आप ही भाग्य विधाता हो|
माई की यह युक्ति की बात सुनकर गुरु जी हँस पड़े और कहा माई तेरे घर पुत्र होगा| माई
ने कलम दवात गुरु जी के आगे कर दी और कहा महाराज यह वचन मेरे हाथ पैर लिख दो, ताकि
मेरे मन को शांति हो| गुरु
जी ने कलम पकड़कर जैसे ही माई के दाये हाथ पर लिखने लगे तो नीचे से घोड़े के पाँव
हिलने से एक की जगह सात अंक लिखा गया| गुरु
जी ने हँस कर कहा माई तुम एक लेने आई थी परन्तु स्वाभाविक ही सात लिखे गए हैं| अब
तुम्हारे घर सात पुत्र ही होंगे| माई
देसो गुरु जी की उपमा करती हुई खुशी-खुशी अपने घर आ गई|
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एक दिन झंगर नाथ गुरु हरिगोबिंद जी से कहने लगे कि आप जैसे
गृहस्थियों को हमारे साथ, जिन्होंने संसार के सब पदार्थों का त्याग कर रखा है उनके साथ झगड़ा
करना अच्छा नहीं है| इस लिए आप हमारे स्थान गोरख मते को छोड़ कर चले जाये| गुरु
जी हँस कर कहने लगे, आपका मन ममता में फँसा हुआ है| किसी
स्थान व पदार्थ में अपनत्व रखना योगियों का काम नहीं है| आप
अपने आप को त्यागी कहते हुए भी मोह माया में फँसे हुए है|
गुरु जी की यह बात सुनकर योगी अपनी करामात दिखाने के लिए आकाश में उड़ कर पत्थरो
की वर्षा और आग की चिंगारियां उड़ाने लगे| मिट्टी
कंकरो की जोरदार आंधी चल पड़ी|
बड़े -2 भयानक रूप धारण करके मार
लो मार लो की आवाजे निकाल करके सिखों को डराने लगे| साथ
ही साथ शेर और सांप के भयंकर रूप धारण करके फुंकारे मारने लगे| गुरु
जी ने सिखों को चुपचाप तमाशा देखने को कहा| इनकी
सारी शक्ति अभी नष्ट हो जायेगी|
गुरु जी ने ऐसे वचन करके जब ऊपर देखा तो सिद्ध जो जिस आकार में था, वहाँ
ही उसको आग जलाने लगी|
इस अग्नि से व्याकुल
होकर सिद्ध भाग कर गोरख नाथ के पास चले गए और रख लो, रख लो की दुहाई देकर उसकी शरण
पड़ गए| गोरख ने कहा की हमने आपको पहले ही समझाया था कि गुरु नानक कि
गद्दी से झगड़ा करना ठीक नहीं| परन्तु
आपने हमारी बात नहीं मानी,
अब मान गँवा कर भागे
आये हो| इस तरह गोरख ने उनको
लज्जित किया|
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जले पीपल को फिर से हरा-भरा करना
एक दिन एक सिक्ख गुरु
जी के पास आया और कहने लगा की महाराज! गुरु स्थान नानक मते का सिद्ध लोग घोर
अनादर कर रहे है| आप कृपा करके जल्दी
वहाँ पहुँच कर नानक साहिब
की यादगार को नष्ट होने से बचाओ सिक्ख
की`यह प्रार्थना सुनकर
गुरु जी ने बाबा बुड्डा
जी आदि सिखों से कहा कि हम नानक मते जाकर गुरु साहिब कि यादगारे पीपल और मीठा रीठा सिद्धों
से बचाना चाहते है| अगर हम वहाँ नहीं
गए तो सिद्ध इसे मिटा देंगे| रास्ते में अनेक प्राणियों का उद्धार करते हुए
गुरु जी नानक मते पहुंच गए| गुरु
जी ने भाई अलमस्त से सारी बात
सुनी| योगियों द्वारा
पीपल जलाये जाने की बात सुनकर गुरु जी ने स्नान किया| शस्त्र-वस्त्र सजाये और पीपल के पास
दीवान सजा कर सोदर की चौकी पढ़ कर
अरदास की| इसके पश्चात निर्मल जल मंगवा कर उसमें
केसर और चन्दन घिसवा कर मिलाया और
सतिनाम कह कर जले हुए पीपल पर डाल दिया
जो कि सिद्धों ने इर्ष्या करके,
गुरु घर की निशानी मिटाने के
लिए जला दी थी| दूसरे दिन उसे पीपल
में से हरी- हरी शाखाएँ
और पत्ते निकल आये| ऐसा देखकर सभी भगत
खुश हो गए व गुरु जी की जय-जयकार
करने लगे| इस पीपल पर आज तक केसर के निशान और
चन्दन के सफ़ेद निशान साफ़ दिखाई
देते है|
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जब शाहजहाँ को घोड़े के बारे में पता लगा
काबुल के एक श्रद्धालु सिक्ख ने अपनी कमाई में से दसवंध इक्कठा
करके गुरु जी के लिए एक लाख रूपए का एक घोड़ा खरीदा जो की उसने ईराक के सौदागर से
खरीदा था| जब वह काबुल कंधार की संगत के साथ यह घोड़ा लेकर अटक दरिया से
पार हुआ तो शाहजहाँ के एक उमराव ने वह घोड़ा देख लिया|
वह शाहजहाँ के लिए अच्छे घोड़े खरीदा करता था| उसने
घोड़े को देखा और कहने लगा कि यह घोड़ा तो शाहजहाँ के लिए ही बना है| उसने
सिक्ख से कहा तुम मुझसे इसकी कीमत ले लो| परन्तु
सिक्ख जिसने बड़ी श्रद्धा के साथ वह घोड़ा खरीदा था कहने लगा कि यह घोड़ा तो मैंने
गुरु जी के निमित खरीद कर उनको भेंट करने जा रहा हूँ| मैं
इसे आपको नहीं बेच सकता| जब शाहजहाँ को घोड़े के बारे में पता लगा तो उसने अपने सिपाही
भेजे| सिपाहियों ने घोड़ा जबरदस्ती लेकर तबेले में बांध लिया| तो
गुरु का सिक्ख दुखी हो गया| वह
दुखी मन से गुरु जी के पास पहुँचा| पास
पहुँच कर उसने गुरु जी को अपनी सारी व्यथा सुनाई| उसकी
बात सुनकर गुरु जी कहने लगे, गुरु
के सिक्ख तुम चिंता ना करो, तुम्हारी भेंट हमे स्वीकार हो गई है| घोड़ा
हमारे पास जल्दी ही आ जाएगा|
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घोड़े का इलाज़
शाहजहाँ घोड़े को देख कर बहुत खुश हो गया| उसकी
सेवा व देखभाल के लिए उसने सेवादार भी रख लिया| परन्तु
घोड़ा थोड़े ही दिनों में बीमार हो गया| उसने
चारा खाना और पानी पीना छोड़ दिया| एक
पाँव जमीन से उठा लिया और लंगड़ा होकर चलने लगा| शाहजहाँ
के स्लोत्री ने घोड़े को देखकर सलाह दी कि इसे जल्दी जी तबेले से बाहर निकाल दो| अगर
इसे बाहर नहीं निकाला तो इसकी मुँह खुर की छूत वाली बीमारी से दूसरे घोड़ों के
बीमार होने का डर है|
बादशाह ने उसकी सलाह
मानकर घोड़ा पने काजी रुस्तम खां को दे दिया| काजी
घोड़ा लेकर बहुत खुश हुआ और इलाज करने लगा| एक
दिन भाई सुजान जी जो यह घोड़ा काबुल से लाए थे उन्होंने यह घोड़ा काजी के पास देख
लिया| उन्होंने गुरु जी को भी यह बताया कि घोड़ा काजी के पास है और
कुछ बीमार भी लगता है|
गुरु जी ने काजी को
अपने पास बुलाया और घोड़ा खरीदने की बात की| उन्होंने
कहा हम इसका दस हजार रुपया देंगे| इलाज
करके हम इसे स्वस्थ भी कर लेंगे| काजी
ने गुरु जी को घोड़ा बेच दिया|
गुरु जी ने घोड़े का इलाज अपने स्लोत्री से कराया| घोड़ा
जल्दी ही स्वस्थ हो गया|
वह घास दाना भी खाने
लगा| उसने अपनी लंगडी टांग भी जमीन पर लगा दी| भाई
सुजान को अपना घोड़ा स्वस्थ देखकर बहुत खुशी हुई| गुरु
जी ने उसके ऊपर सुनहरी पालना डलवा कर जब सवारी की तो भाई सुजान जी कहने लगे,
गुरु जी अब मेरा मनोरथ पूरा हो गया है| आपने
मेरी भावना पूरी कर दी है| गुरु जी बोले भाई सुजान तुम निहाल हो गए हो| तेरा प्रेम और
श्रद्धा धन्य है| इस प्रकार भाई सुजान अपनी मनोकामना पूरी करके अपने देश काबुल
चला गया|
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गुरु जी का चालीसा काटना
बादशाह जहाँगीर के साथ गुरु जी के मेल मिलाप बढ़ गए| ऐसा
देखकर चंदू बहुत तंग था|
वह उस मौके की तलाश
में था जब किसी भी तरह मेल मिलाप को रोका जाये या तोड़ा जाये| एक
दिन जहाँगीर को बुखार हो गया| चंदू
ने एक ज्योतिषी को बुलाया|
उसे पांच सौ रूपये भी
दिए और साथ-साथ यह भी सिखाया कि बादशाह को कहो कि आपके घर घोर कष्ट की घड़ी आई है| जिसके
कारण और दुःख मिलने की संभावना है| इसका
उपाय जल्दी करना चाहिए| जब ज्योतिषी ने यह बात बताई तो राजे ने पूछा इसका क्या उपाय
करना चाहिए? ज्योतिषी ने सब कुछ वैसा ही बोल दिया जैसे चंदू ने सिखाया था| उसने
कहा कि जो परमात्मा का नाम लेने वाला प्रभु का प्यारा बंदा, जो
लोगों में पूजनीय हो अगर वह 40 दिन
ग्वालियर के किले में एकांत बैठकर आपके निमित माला फेरे और प्रार्थना करे तो ही
आपका कष्ट दूर हो सकता है वरना नहीं|
राजा ने जैसे ही यह बात सुनी उसने अपने अहिलकारो को कहा ऐसे गुणों वाले बंदे को
जल्दी लाओ| इस समय चंदू जो वही पास बैठा था झट से बोल पड़ा जहापनाह श्री
हरगोबिन्द जी इस इस काम के लिए योग्य है| अगर
आप उनको प्रार्थना करे तो वह आपकी प्रार्थना को स्वीकार कर लेंगे और किले में चले
जाएगें और आपका कष्ट भी टल जाएगा|
बादशाह जो सहमा बैठा था वह झट से ही उसकी बात मान गया| उसने
गुरु जी को बुलाया और सारी बात बताई| उसने
यह भी कहा कि आप मेरी भलाई के लिए एक चालीसा ग्वालियर के किले में बिताए| गुरु
जी जो कि अन्तर्यामी थे भविष्य की वार्ता को जानते थे| इस
बात को स्वीकार करते हुए पांच सिखों सहित ग्वालियर के किले में प्रवेश के गए| जहाँगीर, जिसका
गुरु जी के साथ प्यार था किले के दरोगा हरिदास को लिखा कि गुरु जी मेरे लिए किले
में चालीसा काटने आ रहे है, इनको किसी प्रकार की कोई तकलीफ न होने देना| इनके
हुकम का पालन करना|
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बादशाह को भ्रम हो गया
श्री गुरु हरिगोबिंद जी
जब ग्वालियर के किले में चालीसा काट रहे थे तो उनको चालीस दिन से भी ऊपर हो गए, तो सिखों को बहुत चिंता हुई| उन्हें यह चिंता सता रही थी कि बादशाह ने गुरु जी को बाहर
क्यों नहीं बुलाया| उधर बादशाह को भी
भ्रम हो गया| और उसे रात को डर लगना शुरू हो
गया| वह रात को उठ-उठ कर
बैठता| दुबिस्तान मजहब ने
अपने पुस्तक में लिखा है
कि हजारों सिक्ख जो गुरु जी के रोज दर्शन करने आते थे और अन्य जो घर बैठे ही गुरु जी
के दर्शन को तरस रहे थे उनकी आह और बदअसीस से बादशाह को भ्रम हो गया| बादशाह को भयानक शेर आदि की शक्ले रात
के समय दिखाई देने लगी| जिसके
कारण वह भयभीत होकर डर-डर
कर उठने लगा| एक
दिन बादशाह ने पीर जलाल दीन को इसका कारण पूछा| पीर ने कहा तुमने किसी प्रभु के प्यारे
को दुःख दिया है जिसका फल तुझे यह मिल रहा है| इसके पश्चात पीर मीया मीर जी ने भी
दिल्ली जाकर बादशाह से उसके रोग का कारण यही बताया| मीया मीर जी ने चंदू की वह सारी बात
सुनाई जिसके कारण उसने श्री गुरु
हरिगोबिंद जी के पिता श्री गुरु अर्जुन देव जी को कष्ट देकर शहीद किया था| अब तुम चंदू के कहने पर ही उनके सुपुत्र
गुरु हरिगोबिंद जी को कैद किया हुआ है इसका फल अशुभ है और तुझे परेशानी हो रही है| यह भी लिखा है कि भाई जेठा जी अपनी सिद्धियों के बल के
कारण रात को शेर बनकर आता है और बादशाह को डराता है| जब इस बात का पता गुरु जी को लगा तो आपने भाई
जेठे को इस काम से रोक दिया|
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चंदू की करनी का फल
एक दिन जहाँगीर ने गुरु जी के हाथ में कपूरों और मोतियों की एक
माला देखकर कहा कि इसमें से एक मनका मुझे बक्शो| मैं
इसे अपनी माला का मेरु बनाकर आपकी निशानी के तौर पर रखूँगा| गुरु
जी ने जहाँगीर की पूरी बात सुनी और कहने लगे पातशाह इससे भी सुंदर और कीमती 1080 मनको
की माला जो हमारे पिताजी के पास थी वह चंदू के पास है| उसने
यह माला हमारे पिताजी से तब ली थी जब उसने पिताजी को हवेली में कैद करके रखा था| वह
माला आप चंदू से मँगवा लो| जहाँगीर ने अपने आदमी को चंदू के पास भेजा| जब
चंदू दरबार में आ गया,
तो बादशाह ने कहा कि
आप हमें वह माला दे जो आपने गुरु अर्जुन देव जी से लाहौर में ली थी| यह
आज्ञा सुनकर चंदू ने कहा जहापनाह मैंने जहाँपनाहसे मैंने कोई भी
माला गुरु जी नहीं ली| ना ही मेरे पास कोई माला है| फिर
गुरु जी के कहने पर ही बादशाह ने उसके घर आदमी भेजे और तलाशी ली| माला
चंदू के घर से ही प्राप्त हुई|
चंदू का झूठ पकड़ा गया|
जहाँगीर को बहुत
गुस्सा आया| उसने गुरु जी से कहा कि यह आपका अपराधी है जिसने आपके निर्दोष
पिता को घोर कष्ट देकर शहीद किया है| इसको
पकड़ो, आपके जो मन में आये इसको सजा दो| बादशाह की आज्ञा सुनकर भाई जेठा जी आदि सिखों ने चंदू को पकड़
लिया| उसके हाथ पैर बांध दिए| बांध
कर उसे डेरे मजनू टिले ले आये| इसके
पश्चात बादशाह ने चंदू के पुत्र और स्त्री को भी पकड़ लिया| उनको
पकड़कर गुरु जी के पास मजनू टिले भेज दिया| ताकि
इनको भी गुरु जी मर्जी के अनुसार सजा दे सके| परन्तु
गुरु जी ने कहा इनका कोई दोष नहीं है| इनको
छोड़ दो| अतः वह दोनों माँ बेटा गुरु जी की महिमा करते हुए अपने घर को
चले गए|
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भाई
कंठा
श्री गुरु हरगोविंद
सिंह जी के समय की बात है उनका एक शिष्य भाई कंठा जो कि आँखों से देख नहीं सकता अपने
गुरु को रात दिन याद करता है और मन में यही अभिलाषा है कि कब मुझे मेरे गुरु के
दर्शन होंगे| एक दिन भाई कंठा अपने घर से चलता-चलता काफी दूर तक निकल गया| जब वह
वापिस घर जाने लगा तो रास्ता भूल गया| धूप भी बहुत जोरो की पड़ रही थी| भाई कंठा
वही किसी जगह पर तपती धूप में बैठ गया और अपने गुरु को याद करने लगा विनय करने लगा
कि प्रभु दर्शन दो| उधर श्री गुरु महाराज जी के एक भक्त सांई दास जी ने श्री चरणों
में विनय की थी कि महाराज मैंने घर बनाया लेकिन मैं उसमे तभी जाकर रहूँगा जब आप
उसमे चरण रखोगे| श्री गुरु महाराज जी उस दिन भक्त सांई दास जी के घर घोड़े पर सवार
होकर पहुँच गए और भक्त से कहने लगे कि सांई दास मकान को ताला क्यों लगाया है? खोल
हम आ गए है| सांई दास जी के मकान का ताला खोला| इधर भाई कंठा अरदास कर रहा है श्री
गुरु महाराज जी को याद कर रहा है| गुरु हरगोविंद जी ने भाई सांई दास से कहा कि हम
चलते है हमारा भक्त हमे याद कर रहा है| भक्त सांई दास जी ने कहा कि महाराज इतनी
तपती धूप में आप कैसे जाओगे? आप आदेश करो हम आपके भक्त को लाते है| तब हरगोविंद जी
ने कहा कि, नहीं हम खुद जाएंगे और घोड़े पर सवार होकर उधर को निकल पड़े जहाँ भाई कंठा
अपने गुरु को याद कर रहा है| जब श्री गुरु महाराज जी भाई कंठा के पास पहुंचे तो
दूर से आवाज़ लगाई भाई कंठा हम आ गए है| कंठा उठा और अपने गुरु की तरफ बढ़ा जैसे ही
आगे बढ़ा तो किसी पत्थर से ठोकर खाकर गिर गया| श्री गुरु महाराज जी ने उसे उठाया और
अपने गले से लगा लिया| श्री गुरु महाराज जी ने वचन किये कि इस तरह हमे कोई भी याद
नहीं करता हम तेरे से बहुत खुश है, मांग क्या मांगता है? तब कंठा जी ने विनय कि
महाराज मैंने आपको स्पर्श तो कर लिया लेकिन मैं आपको देख नहीं सकता, मैं एक बार
आपके दर्शन करना चाहता हूँ| श्री गुरु महाराज जी ने कहा बस इतनी सी बात जैसे ही
भाई कंठा ने गुरु के कहने पर आँखे मली तो उसकी आँखे वापिस आ गई| गुरु के दर्शन
अपनी आँखों से कंठा जी ने किये तो तन मन प्रसन्न हो गया| श्री गुरु महाराज जी ने
कंठा से कहा कि भाई कंठा अभी हमारा मन नहीं भरा, मांग कुछ और मांग| तब भाई कंठा जी
ने कहा कि अब मन की कोई चाह नहीं| आपके दर्शन करके सब कुछ मिल गया है अगर देना
चाहते हो तो मेरी आँखे वापिस ले लो क्योंकि जिन आँखों से आपके दर्शन कर लिए उन
आँखों से कुछ देखना बाकि ही नहीं रह गया| तब श्री गुरु महाराज जी ने कहा कि हम
आँखे तो वापिस नहीं ले सकते तो भाई कंठा जी ने विनय की अगर आँखे वापिस नहीं ले
सकते तो मेरे प्राण ही ले लो क्योंकि अब मेरे जीने की सारी इच्छाएँ पूरी हो गई|
आपका दर्शन पा लिया अब मुझे सब कुछ मिल गया है| जब भाई कंठा जी ने श्री चरणों में
शीश रखा तो चरणों में ही प्राण निकल गए| श्री हरगोविंद जी ने स्वयं अंतिम संस्कार
किया| जब श्री गुरु महारज जी चिता को अग्नि दे रहे थे तो निकलता हुआ धुआं भी यही
अरदास कर रहा था “सेवक की अरदास
प्यारे जप जीवा प्रभु चरण तुम्हारे”|
मतलब यह है कि स्वामी! मेरी यही अरदास है कि मैं सदा आपके चरणों का ध्यान करता
रहूँ |
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साकेत मंडी का राजा
साकेत मंडी के राजा ने श्री गुरु
हरगोबिन्द साहिब जी से नाम दीक्षा प्राप्त की थी ! एक बार जब वे
सतगुरु जी के प्रवचन सुन रहे थे तो उनके मन में सन्देह
उत्पन्न हुआ| प्रवचन यह हो रहे थे की चाहे
कोई कुछ भी करे उसे अपने कर्मो का बोझ उठाना पड़ता है ! राजा ने सोचा, यदि उसे अपने कर्मो का बोझ उठाना ही
पड़ेगा तो फिर सदगुरु की शरण में आने का क्या लाभ है| उसी रात उसने स्वप्न देखा की वह एक चण्डाल
परिवार में पैदा हुआ है| बड़ा होकर उसे गावं का मुखिया बना| उसके छोटे-छोटे बच्चे
थे और कुछ समय उपरांत उसकी मृत्यु हो गई तथा उसे दफना दिया गया| इसी स्वप्न ने राजा के मन में हलचल मचा दी राजा ने सोचा कि वह यह तो कभी सोच भी नही सकता की वह एक चण्डाल
परिवार में जन्म लेगा| तब उसे यह स्वप्न क्यों दिखाई दिया? दो तीन दिन इसी संशय और भ्रम
की स्थिति में व्यतीत हो गये| तीसरे दिन गुरु जी राजा को साथ लेकर शिकार खेलने गये| शिकार का पीछा करते हुए राजा उनसे बिछुड़
गया और रास्ता भूल गया| उसे उस जंगल में कुछ दूरी पर प्रकाश की किरण दिखाई दी| तो वह उसी दिशा की ओर चल पड़ा| वहाँ पहुँच कर
उसे पता चला की यह एक चांडालो का गावं है| चुकिं उस समय उसे कोई अन्य स्थान नही सुझ
रहा था| इसलिये उसने उसी गावं में प्रवेश किया| ग्रामीण निवास घोड़े की टाप को
सुनकर घरो से बहार निकल आये| जैसे ही उन्होंने राजा को देखा, वे प्रसन्नता से उछल पड़े| प्रत्येक ने
कहा, हमारा मुखिया फिर
से जीवित हो गया है| छोटे बच्चे उसके पैरों से लिपट कर चिल्लाने लगे -पिताजी आप कहा चले
गये थे? शीघ्र ही एक स्त्री
बहार आई जिसने स्वंय को राजा की पत्नी बताया| राजा असमंजस में पड़ गया| यही
स्वप्न उसने देखा था| मन ही मन वह
प्रार्थना करने लगा - हे सतगुरु! मुझे बचा लो| आप मुझे अकेला क्यों छोड़ गये हो| हे प्रभु! ये सब मुझसे
अपना -अपना नाता जोड़ रहे
है| मै इन्हे कैसे समझाऊ की मै वह नही हूँ जो यह सोच रहे है| मै इन्हे कैसे कहूँ
की मै साकेत मण्डी का राजा हूँ| राजा ने ग्रामवासियो को यह विश्वास दिलाने की बहुत कोशिश की कि वह उनके गावं मै नही रहता
तथा वह राजा है| जो यहाँ केवल अपना रास्ता भूल जाने के कारण आया है| ज्योंही राजा ने आन्तरिक कुरुण पुकार से
सतगुरुदेव जी के चरणों में प्रार्थना
की, उसी समय गुरु जी वहाँ पहुँचे गए| राजा गुरुदेव के चरणों
में
गिर पड़ा| हे प्रुभो! मुझे बचा लो| सतगुरु ने ग्रामीणों की ओर देखा और कहा कि यह साकेत मण्डी का राजा
है| इस गावं के मुखिया का देहान्त हो चुका है| जाओ उसे कब्र को खोदकर देखो, जहाँ तुमने उसे दफनाया था| उन्होंने वैसा ही किया| तब उन्होंने राजा को जो
उनके गावं के मुखिया की तरह दिखाई पड़ रहा था,
छोड़ दिया मार्ग में राजा ने प्रार्थना की, हे प्रभो! यह सब मै स्वप्न में देख चुका
हूँ| इस सम्पूर्ण वार्ता का क्या रहस्य है| उन्होंने फ़रमाया - हे राजन! यह तुम्हारे भाग्य में लिखा
था कि तुम सौ साल तक चण्डाल का जीवन व्यतीत करोगे| लेकिन सतगुरु की शरण में आने से
तुम्हारे ये कर्म भस्म हो गये है| राजा के मन से सब भ्रम दूर हो गये और उसने
सतगुरु के चरणों में गिर कर क्षमा याचना की| इस प्रकार सतगुरु अपने शिष्य की सहायता हर तरह से
करते है| वे अपनी कृपा से सूली का कांटा बना देते|
****
गुरु की दयालुता
छठी
पातशाही श्री गुरुगोबिन्द साहिब जी की, उस समय के देहली के बादशाह शाहजहान से मित्रता थी। कभी कभी
बादशाह शाहजहान आपको अपने साथ शिकार में शामिल होने का निमन्त्रण भी दिया करते थे, एक बार ऐसा हुआ कि शाहजहान के निमन्त्रण पर श्री
गुरु जी उनके साथ शिकार के लिये निकले। शिकार के लिये जंगल में खैमे लगाये गये।
सप्ताह दो सप्ताह तक के लिये जंगल में डेरा था। संयोग की बात कि श्री गुरु जी और
शाहजहान के खैमें (तम्बू) पास-पास थे। बीच में फकत एक छोटा सा जंगल था। इन बड़े
खैमों के दोनों तरफ छोटे छोटे तंबओं में एक ओर शाहजहान के सिपाही, दरबारी और अन्य लाव-लश्कर आदि के लोग तथा दूसरी ओर
श्री गुरु जी के शिष्य सेवक थे।
श्री
गुरु जी का डेरा लाहौर के जंगल के पास होने की खबर आस-पास के गाँवों में हो गई।
लाहौर के निकटवर्ती किसी एक गाँव का रहने वाला एक गरीब घसियारा था, जो श्री गुरु जी पर अपार श्रद्धा रखता था। उसके मन
में उनका परम-पवित्र दर्शन पाने की बड़ी लालसा थी, किन्तु निर्धन होने के कारण वह उनके दर्शन पाने
अमृतसर साहिब तक न जा सकता था। निर्धन इतना कि सारा दिन घास खोदकर बेचता, तो बड़ी कठिनाई से चार या पाँच पैसे वसूल होते थे।
उन्हीं में उसकी गुज़र बसर होती थी। उस ज़माने में अन्न सस्ता था और पैसे का मूल्य
आज के ज़माना से कहीं अधिक था। तब चार पाँच पैसे में स्त्री-पुरुष दोनों की गुज़रान
चल ही जाती थी।
उस निर्धन प्रेमी को किसी के द्वारा जब पता चला कि गुरु जी यहीं निकट ही जंगल में पधारे हुये हैं, तो श्री दर्शन के लिये अच्छा अवसर जानकर उसने श्री चरणों में पहुंचने का इरादा किया। चित्त में सतगुरु की अपार श्रद्धा थी, पवित्र प्रेम था और सच्ची भक्ति थी। भक्त बहुत ही भोला-भाला और सीधा-साधा था। उसने सुन रखा था कि गुरु की शरण में जाने से भक्ति और मुक्ति का वरदान मिलता है,चौरासी के बन्धन से छूट जाता है और जीव सभी कष्टों-क्लेशों से मुक्त होकर सच्चे आनन्द को प्राप्त होता है। यही सोचकर श्री दर्शन की तीव्र इच्छा उसके मन में जाग पड़ी थी कि श्री गुरु जी के दर्शन पाकर अपने जीवन का कल्याण कर लूँ और जन्म सफल हो जाये। जाने का इरादा किया तो सोचा कि खाली हाथ कैसे जाऊँ तथा यदि ले जाऊं तो क्या भेंट लेकर जाऊँ? उस दिन का खोदा हुआ घास बेचकर उसे केवल पाँच पैसे मिले थे। वही लेकर चल पड़ा और वहाँ जा पहुँचा, जहाँ जंगल में श्री गुरु जी और शाहजहाँ के खैमे-डेरा साथ-साथ लगे हुये थे। सामने ही दो एक सन्तरी पहरा दे रहे थे। उसने आगे बढ़कर उनसे नम्रतापूर्वक पूछा,""प्यारे भाईयो! मैं सच्चे पादशाह का दर्शन करना चाहता हूँ, उनके दर्शन कहाँ होंगे?''
नोटः-पाठकों को मालूम रहे कि सिख-सेवक आमतौर पर गुरु जी को सच्चे पातशाह के नाम से सम्बोधन किया करते हैं।
ये सन्तरी जिनसे प्रश्न किया गया था, बादशाह शाहजहाँ के पहरेदार थे और उस समय उन्हीं के खैमें के सामने पहरा दे रहे थे। उन्होने समझा कदाचित यह आदमी बादशाह सलामत (शाहजहाँ) की बाबत पूछ रहा है। एक सन्तरी ने हाथ के इशारे से शाहजहाँ का खैमा उसे बता दिया। प्रेमी सेवक (घसियारा) खैमें के भीतर जा पहुँचा। सामने ही एक जड़ाऊ सिंहासन पर तकिया लगाये हुये बादशाह शाहजहाँ बैठे थे। उनके तन पर मखमली पोशाक थी और सिर पर रेशमी पगड़ी में कलगी जड़ी थी, जो कि बादशाहों का खास निशान है। उस प्रेमी ने समझा-यही गुरु जी हैं। उसने आगे बढ़कर वही पाँच पैसे, जो वह साथ लाया था, भेंट रख दिये और दण्डवत् करता हुआ उनके आगे गिर पड़ा। साथ ही उसने अरदास की,""सच्चे पातशाह जी! मैं आपकी शरण में हूँ, सेवक को भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।'' शाहजहाँ यद्यपि बादशाह थे, तो भी गुरु जी के साथ मित्रता होने से यह भली प्रकार जानते थे कि उनके चरणों में प्रेमी शिष्य सेवक आकर इसी प्रकार अरदास किया करते हैं। इस प्रेमी की विनय सुनकर समझ गये कि भोला-भाला प्रेमी धोखा खा गया है। और गुरु जी के बदले यहाँ आन पहुँचा है। उस समय एक गुलाम शाहजहाँ के आगे हाथ बाँधे खड़ा था। उन्होंने उसे इशारे से बुलाकर समझाया कि इस प्रेमी से कह दो- ""सच्चे पातशाह का खैमा यह नहीं है। यह तो दिल्ली के बादशाह का खैमा है। सच्चे पातशाह का खैमा पास में दूसरा है, यह वहाँ जाये।'' गुलाम ने उस दण्डवत् करते हुये सेवक को उठाया और इशारे से सच्चे पातशाह का खैमा बतला दिया। सेवक ने उठकर तुरन्त अपनी भूल का अनुभव किया। उसने वे भेंट के लिये, लाये हुये पाँच पैसे वापिस उठा लिये और श्री गुरु जी के खैमे की तरफ चल पड़ा। अब शाहजहाँ के मन में उत्सुकता बढ़ी कि देखें श्री गुरुजी के साथ इस प्रेमी की क्या बातचीत होती है। दोनों खैमे पास ही पास तो थे, वे खैमे से कान लगाकर उधर की वार्ता सुनने लगे। भोला भाला प्रेमी दिल में सच्ची श्रद्धा और भक्ति को लिये हुए गुरु जी के चरणों में पहुँचा और वही पाँच पैसे, जोकि उसकी सारी पूँजी थी, उनकी भेंट रखकर श्री चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से प्रेम के अश्रु झर-झर गिर रहे थे और मुख से अरदास कर रहा था, ""सच्चे पातशाह जी! मैं भूला-भटका आपकी शरण में आन पड़ा हूँ। भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।''
श्री गुरु जी ने सेवक की सच्चाई और उसके पवित्र प्रेम को देखा। महापुरुष तो प्रेम और सच्चाई के वश में ही होते हैं। इस सच्चे सेवक की हार्दिक श्रद्धा से वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और बोले, ""उठो प्रेमी! तथास्तु।'' निकट के खैमें में बैठा हुआ शाहजहाँ यह सब वार्ता सुन रहा था। उसके बाद श्री गुरुजी ने कुछ देर श्री मुख से उस सेवक के प्रतिपवित्र वचन-विलास किया। वह सच्चा प्रेमी निहाल और मालामाल होकर चला गया। उस प्रेमी के चले जाने के बाद बादशाह शाहजहाँ श्री गुरु जी से मिलने को आये। श्रीगुरुजी ने उनके लिये अलग मसनद लगवा दी। बादशाह बैठ गये तो बोले, ""गुरु जी! मैं आपसे एक बात पूछने आया हूँ। यह आपने मुक्ति का सौदा तो बहुत ही सस्ता लगा रखा है। सिर्फ पाँच पैसे में ही आप लोगों को मुक्ति का दान बख्श देते हैं। यह क्या भेद है?'' श्री गुरु जी ने उत्तर दिया, ""बादशाह सलामत! यह मुक्ति का सौदा तो सस्ता हरगिज़ नहीं। यह तो बहुत ही महँगा है। मैने इस प्रेमी को पांच पैसों के बदले मुक्ति नहीं दी, बल्कि उसके त्याग, बलिदान, उसकी अपार श्रद्धा, उसकी सच्चाई और उसके हार्दिक प्रेम के बदले ही मुक्ति बख्शी है। एक सच्चे प्रेमी की सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उसके हार्दिक प्रेम के मूल्य का तो अंदाज़ा लगाया ही नहीं जा सकता। उसका मूल्य तो इतना बड़ा है कि एक मुक्ति तो चीज़ ही क्या है, यदि हज़ारों मुक्ति भी उसके बदले में दी जावें, तो कम हैं। दूसरी बात यह कि आप जिन पाँच पैसों को तुच्छ मान रहे हैं, यही इस बेचारे की सारी पूँजी है। मानों उसने अपना सर्वस्व भेंट करके मुक्ति का दान माँगा है। उसने आज भोजन भी नहीं किया। क्योंकि आज के घास के पैसे जिससे वो अपना राशन खरीद कर भोजन करता था। वे सारे पैसे भेंट कर दिये और स्वयं भूखा रह गया। इससे आप समझ सकते हैं कि उसकी कुर्बानी कितनी बड़ी है? अगर कोई हमें अपना सारा राज्य भी भेंट कर दें तो भी भक्ति-मुक्ति का अधिकारी नहीं हो सकता। अगर उसमें श्रद्धा प्रेम नहीं है। श्री गुरु जी का यह उत्तर सुनकर शाहजहाँ अति प्रसन्न हुये और अपने खैमे में लौट गये।
उस निर्धन प्रेमी को किसी के द्वारा जब पता चला कि गुरु जी यहीं निकट ही जंगल में पधारे हुये हैं, तो श्री दर्शन के लिये अच्छा अवसर जानकर उसने श्री चरणों में पहुंचने का इरादा किया। चित्त में सतगुरु की अपार श्रद्धा थी, पवित्र प्रेम था और सच्ची भक्ति थी। भक्त बहुत ही भोला-भाला और सीधा-साधा था। उसने सुन रखा था कि गुरु की शरण में जाने से भक्ति और मुक्ति का वरदान मिलता है,चौरासी के बन्धन से छूट जाता है और जीव सभी कष्टों-क्लेशों से मुक्त होकर सच्चे आनन्द को प्राप्त होता है। यही सोचकर श्री दर्शन की तीव्र इच्छा उसके मन में जाग पड़ी थी कि श्री गुरु जी के दर्शन पाकर अपने जीवन का कल्याण कर लूँ और जन्म सफल हो जाये। जाने का इरादा किया तो सोचा कि खाली हाथ कैसे जाऊँ तथा यदि ले जाऊं तो क्या भेंट लेकर जाऊँ? उस दिन का खोदा हुआ घास बेचकर उसे केवल पाँच पैसे मिले थे। वही लेकर चल पड़ा और वहाँ जा पहुँचा, जहाँ जंगल में श्री गुरु जी और शाहजहाँ के खैमे-डेरा साथ-साथ लगे हुये थे। सामने ही दो एक सन्तरी पहरा दे रहे थे। उसने आगे बढ़कर उनसे नम्रतापूर्वक पूछा,""प्यारे भाईयो! मैं सच्चे पादशाह का दर्शन करना चाहता हूँ, उनके दर्शन कहाँ होंगे?''
नोटः-पाठकों को मालूम रहे कि सिख-सेवक आमतौर पर गुरु जी को सच्चे पातशाह के नाम से सम्बोधन किया करते हैं।
ये सन्तरी जिनसे प्रश्न किया गया था, बादशाह शाहजहाँ के पहरेदार थे और उस समय उन्हीं के खैमें के सामने पहरा दे रहे थे। उन्होने समझा कदाचित यह आदमी बादशाह सलामत (शाहजहाँ) की बाबत पूछ रहा है। एक सन्तरी ने हाथ के इशारे से शाहजहाँ का खैमा उसे बता दिया। प्रेमी सेवक (घसियारा) खैमें के भीतर जा पहुँचा। सामने ही एक जड़ाऊ सिंहासन पर तकिया लगाये हुये बादशाह शाहजहाँ बैठे थे। उनके तन पर मखमली पोशाक थी और सिर पर रेशमी पगड़ी में कलगी जड़ी थी, जो कि बादशाहों का खास निशान है। उस प्रेमी ने समझा-यही गुरु जी हैं। उसने आगे बढ़कर वही पाँच पैसे, जो वह साथ लाया था, भेंट रख दिये और दण्डवत् करता हुआ उनके आगे गिर पड़ा। साथ ही उसने अरदास की,""सच्चे पातशाह जी! मैं आपकी शरण में हूँ, सेवक को भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।'' शाहजहाँ यद्यपि बादशाह थे, तो भी गुरु जी के साथ मित्रता होने से यह भली प्रकार जानते थे कि उनके चरणों में प्रेमी शिष्य सेवक आकर इसी प्रकार अरदास किया करते हैं। इस प्रेमी की विनय सुनकर समझ गये कि भोला-भाला प्रेमी धोखा खा गया है। और गुरु जी के बदले यहाँ आन पहुँचा है। उस समय एक गुलाम शाहजहाँ के आगे हाथ बाँधे खड़ा था। उन्होंने उसे इशारे से बुलाकर समझाया कि इस प्रेमी से कह दो- ""सच्चे पातशाह का खैमा यह नहीं है। यह तो दिल्ली के बादशाह का खैमा है। सच्चे पातशाह का खैमा पास में दूसरा है, यह वहाँ जाये।'' गुलाम ने उस दण्डवत् करते हुये सेवक को उठाया और इशारे से सच्चे पातशाह का खैमा बतला दिया। सेवक ने उठकर तुरन्त अपनी भूल का अनुभव किया। उसने वे भेंट के लिये, लाये हुये पाँच पैसे वापिस उठा लिये और श्री गुरु जी के खैमे की तरफ चल पड़ा। अब शाहजहाँ के मन में उत्सुकता बढ़ी कि देखें श्री गुरुजी के साथ इस प्रेमी की क्या बातचीत होती है। दोनों खैमे पास ही पास तो थे, वे खैमे से कान लगाकर उधर की वार्ता सुनने लगे। भोला भाला प्रेमी दिल में सच्ची श्रद्धा और भक्ति को लिये हुए गुरु जी के चरणों में पहुँचा और वही पाँच पैसे, जोकि उसकी सारी पूँजी थी, उनकी भेंट रखकर श्री चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से प्रेम के अश्रु झर-झर गिर रहे थे और मुख से अरदास कर रहा था, ""सच्चे पातशाह जी! मैं भूला-भटका आपकी शरण में आन पड़ा हूँ। भक्ति-मुक्ति का वरदान मिले।''
श्री गुरु जी ने सेवक की सच्चाई और उसके पवित्र प्रेम को देखा। महापुरुष तो प्रेम और सच्चाई के वश में ही होते हैं। इस सच्चे सेवक की हार्दिक श्रद्धा से वे अत्यन्त प्रसन्न हुये और बोले, ""उठो प्रेमी! तथास्तु।'' निकट के खैमें में बैठा हुआ शाहजहाँ यह सब वार्ता सुन रहा था। उसके बाद श्री गुरुजी ने कुछ देर श्री मुख से उस सेवक के प्रतिपवित्र वचन-विलास किया। वह सच्चा प्रेमी निहाल और मालामाल होकर चला गया। उस प्रेमी के चले जाने के बाद बादशाह शाहजहाँ श्री गुरु जी से मिलने को आये। श्रीगुरुजी ने उनके लिये अलग मसनद लगवा दी। बादशाह बैठ गये तो बोले, ""गुरु जी! मैं आपसे एक बात पूछने आया हूँ। यह आपने मुक्ति का सौदा तो बहुत ही सस्ता लगा रखा है। सिर्फ पाँच पैसे में ही आप लोगों को मुक्ति का दान बख्श देते हैं। यह क्या भेद है?'' श्री गुरु जी ने उत्तर दिया, ""बादशाह सलामत! यह मुक्ति का सौदा तो सस्ता हरगिज़ नहीं। यह तो बहुत ही महँगा है। मैने इस प्रेमी को पांच पैसों के बदले मुक्ति नहीं दी, बल्कि उसके त्याग, बलिदान, उसकी अपार श्रद्धा, उसकी सच्चाई और उसके हार्दिक प्रेम के बदले ही मुक्ति बख्शी है। एक सच्चे प्रेमी की सच्ची श्रद्धा, भक्ति और उसके हार्दिक प्रेम के मूल्य का तो अंदाज़ा लगाया ही नहीं जा सकता। उसका मूल्य तो इतना बड़ा है कि एक मुक्ति तो चीज़ ही क्या है, यदि हज़ारों मुक्ति भी उसके बदले में दी जावें, तो कम हैं। दूसरी बात यह कि आप जिन पाँच पैसों को तुच्छ मान रहे हैं, यही इस बेचारे की सारी पूँजी है। मानों उसने अपना सर्वस्व भेंट करके मुक्ति का दान माँगा है। उसने आज भोजन भी नहीं किया। क्योंकि आज के घास के पैसे जिससे वो अपना राशन खरीद कर भोजन करता था। वे सारे पैसे भेंट कर दिये और स्वयं भूखा रह गया। इससे आप समझ सकते हैं कि उसकी कुर्बानी कितनी बड़ी है? अगर कोई हमें अपना सारा राज्य भी भेंट कर दें तो भी भक्ति-मुक्ति का अधिकारी नहीं हो सकता। अगर उसमें श्रद्धा प्रेम नहीं है। श्री गुरु जी का यह उत्तर सुनकर शाहजहाँ अति प्रसन्न हुये और अपने खैमे में लौट गये।
भाव का
भूखा हूं मैं और भाव ही बस सार है।
भाव से
मुझको भजे तो भव से बेड़ा पार है।।
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