(परमसंत धनी धर्म दास जी)
v असन वसन वाहन अरु भूषण |
सुत दारा निज पारिचारक गण ||
कर सब भेंट गुरु के आगे |
भक्ति भाव उर में अनुरागे ||
अर्थात श्री सद्गुरुदेव जी के श्री चरणों में श्रधा
–प्रेम से परिपूर्ण होकर जाना चाहिए | जो कुछ वें दे, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए|
कई बार भक्त लोग अच्छे वस्त्र व कई प्रकार की वस्तुएँ आपको भेंट कर सेवन के लिए
विवश करते, लेकिन आप फरमाते –जो कोई श्रेष्ठ पदार्थ पाऊं, सो गुरु चरणन आन चढ़ाऊँ|”
आप हमें भेट करते हो तो हम अपने इष्टदेव श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों में
भेट करेंगे |
v भक्ति प्रभाव मिटी सकल धर्मदास की पीर|
कोटि
जन्मों के पुन्य से सतगुरु मिले कबीर||
अर्थात धनी धर्मदास से फरमा रहे है कि भक्ति के
प्रभाव से कोटि जन्मों के पुन्य से उन्हें सतगुरु मिले और उनके जन्मों जन्म की पीर
मिटी गई|
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