(परमसंत श्री अनाथदास जी)
v सुर दर्श आदर्श ज्यों, होत अगन उद्योत|
तैसे गुरु परसाद से, अनुभव
निर्मल होत||
जिस प्रकार आतिशी शीशे पर सूर्य की किरणें पड़ने से
उसमे अग्नि उत्पन करने की शक्ति आ जाती है, इसी प्रकार गुरु की कृपा से शिष्य का
अनुभव निर्मल हो जाता है| अर्थात् गुरुदेव सूर्य हैं तो शिष्य आतिशी शीशा बनकर
गुरुदेव से आत्मिक शक्ति रुपी धन पाकर शक्तिशाली बन जाता है| ऐसा केवल पूर्ण शिष्य
अर्थात् गुरुदेव जी की प्रसन्ता प्राप्त करने वाला शिष्य ही कर सकता है|
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