(परमसंत
पलटू दास जी)
v सतगुरु सब को देत है, लेता नाहिं कोय|
पलटू पारस क्या करे, जब लोहा खोटा होय||
v पलटू कसती और की, नहीं और के साथ |
अपनी अपनी करनी, अपने अपने माथ ||
v पलटू तीरथ को गया, आगे मिल गये संत |
एक मुक्ति की खोज थी, मिल गई मुक्ति अनंत ||
v साहिब चौकीदार मगन होइ सोवन
लागे।।
दोनों
पाँव पसार देखि कै दुश्मन भागे।।
जाके सिर पर राम ताहि को वार न बांके।
जाके सिर पर राम ताहि को वार न बांके।
गर
ग़ाफिल में मैं रहों आपनी आपहु ताकै।।
हमको नाहीं सोच सोच सब उनको भारी।
हमको नाहीं सोच सोच सब उनको भारी।
छिन
भर परै न भोर लेत है खबर हमारी।।
लाज तजा जिन राम पर डारि दिया सिर भार।
लाज तजा जिन राम पर डारि दिया सिर भार।
पलटू
सोवे मगन में साहिब चौकीदार।।
सेवाधर्म का कितना सुन्दर और सरल
मार्ग है। लोक और परलोक दोनों का बोझ मालिक के ऊपर रख दो और स्वयं सुख की नींद
करो। पलटू साहिब का कथन है कि भगवान भक्तों के चौकीदार हैं। भला, जिसकी चौकीदारी
भगवान स्वयं करें उसे घाटा क्योंकर! संसार अज्ञानी है जो व्यर्थ में अपने ऊपर बोझ
उठाये फिरता है। जिन्होने अपना बोझ मालिक के कन्धों पर धर दिया और आप उसके हो रहे
उनके सदृश दूसरा संसार में कौन हो सकता है।
v सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल
सन्त।।
तैसे सीतल सन्त जगत की ताप बुझावैं।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं।।
धीरज सील सुभाव छिपा ना जात बखानी।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी।।
रहन चलन मुसकान ज्ञान को सुगंध लगावै।
तीन ताप मिट जायें संत के दर्सन पावैं।।
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरन्त।
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त।।
तैसे सीतल सन्त जगत की ताप बुझावैं।
जो कोइ आवै जरत मधुर मुख बचन सुनावैं।।
धीरज सील सुभाव छिपा ना जात बखानी।
कोमल अति मृदु बैन बज्र को करते पानी।।
रहन चलन मुसकान ज्ञान को सुगंध लगावै।
तीन ताप मिट जायें संत के दर्सन पावैं।।
पलटू ज्वाला उदर की रहै न मिटै तुरन्त।
सीतल चन्दन चन्द्रमा तैसे सीतल सन्त।।
अर्थः-जिस प्रकार चन्दन और
चन्द्रमा शीतल होते हैं, उसी प्रकार सन्त भी स्वभाव से अति शीतल होते
हैं। अपने शीतल स्वभाव से वे सांसारिक प्राणियों के तपते हुये ह्मदयों को शान्त
शीतल करते हैं। जो कोई उनकी शरण में आता है, अपने मधुर वचनों
द्वारा वे उसके ज्वलित ह्मदय को शान्त करते हैं। सन्तों में विद्यमान धैर्य एवं
क्षमा तथा उनके शील स्वभाव का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। उनके कोमल, मृदुल वचनों से पत्थर ह्मदय मनुष्य भी पिघल जाता है और दानवता त्यागकर
मानव बन जाता है। उनके मुखमंडल पर सदैव मधुर मुस्कान खेला करती है और वे सदैव
ज्ञान की सुगन्ध चहुँ ओर फैलाया करते है। जो कोई भी उनके पवित्र दर्शन करता है,
उसके तीनों ताप नष्ट हो जाते हैं। सन्त पलटूदास जी कथन करते हैं कि
जो प्राणी सन्तों की चरण शरण में आ जाता है, उसके अन्तर की
ज्वाला अर्थात् अशान्ति तुरन्त मिट जाती है जिससे उसका ह्मदय शान्तमय हो जाता है।
vदेखौ नाम प्रताप से सिला तिरै जल बीच।।
सिला तिरै जल बीच सेतु में कटक उतारी।
नामहिं के परताप बानरन लंका जारी।।
नामहिं के परताप ज़हर मीरा ने खाई।
नामहिं के परताप बालक प्रहलाद बचाई।।
पलटू हरिजस ना सुनै ता को कहियै नीच।
देखौ नाम प्रताप से सिला तिरै जल बीच।।
अर्थः-देखो तो सही कि मालिक के नाम के प्रताप से पत्थर जल में तैरते हैं।
नाम की ही शक्ति ने पत्थरों को जल में तैराकर पुल पर से बानर सेना को पार उतार
दिया। नाम के बल से ही एक बानर (हनुमान जी) ने लंका जैसी सुदृढ़ नगरी को जलाकर भस्म
कर दिया। जो अति बलवान राजा रावण की राजधानी थी तथा जहाँ प्रतिपल हज़ारों राक्षसों
का पहरा रहता था। नाम ही का यह प्रताप था कि मीराबाई ने हँसते हँसते विष से भरा
प्याला होंठों से लगा लिया और उसका कुछ भी न बिगड़ा। जब बालक प्रहलाद को उसके दुष्ट
पिता हिरण्यकश्यप ने मार डालने का निश्चय कर लिया था तब नाम के आधार ने ही
प्रह्लाद जी की प्राण रक्षा की। इसलिये श्री पलटू साहिब जी का कथन है कि जो मालिक
के नाम की महिमा को नहीं सुनता उसे नीच कहना ही उचित है। क्योंकि नाम के प्रताप से
ही पत्थर तक जल में तैर जाते हैं।
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