जीवन परिचय श्री गुरु गोबिंद सिंह जी
जन्म : दिसम्बर 22,
1666 पटना साहिब, बिहार
पिता : गुरु तेग बहादुर जी
माता : माता गुजरी
जी
पत्नी : माता
सुन्दरी जी, माता जीतो जी, माता साहिब कौर जी
साहिबजादे : बाबा
अजीत सिंह जी, बाबा जुझार सिंह जी, बाबा जोरावर
सिंह जी, बाबा फतह सिंह
जोति जोत : अक्टूबर 7, 1708 नांदेड
जन्म
समय
माता
नानकी जी ने अपने पौत्र के जन्म की खबर देने के लिए एक विशेष आदमी को चिट्ठी देकर
अपने सुपुत्र श्री गुरु तेग बहादर जी के पास धुबरी शहर भेजा| गुरु
जी ने चिट्ठी पड़कर जब राजा राम सिंह को खुशी भरी खबर सुनाई तब राजा ने अपने फौजी
बाजे बजवाए| तोपों की सलामी दी तथा गरीबों को दान दिया| चिट्ठी
लेकर आने वाले सिक्ख को गुरु जी ने बहुत धन दिया उसका लोक परलोक संवार दिया| इसके
पश्चात गुरु जी ने माता जी को चिट्ठी लिखी कि माता जी इस समय हम किसी काम रूप
धुबरी शहर ठहरे हुए है| राजा राम सिंह का काम संवार कर जल्दी वापस आप के पास पटने
आ जाएगे| गुरु
नानक साहिब आपके अंग संग है| आपने चिंता नहीं करनी| साहिबजादे का नाम “गोबिंद राय “
रखना| यह
आशीष और धैर्य पूर्ण चिट्ठी पड़कर माता जी और परिवार के अन्य सदस्य बहुत खुश हुए|
जो कोई भी भिखारी और
प्रेमी माता जी को बधाई देने घर आता माता जी उसको धन, वस्त्र
और मिठाई आदि से प्रसन्न करके घर से भेजते| माता
जी ने साहिबजादे के सोने व खेलने के लिए एक सुन्दर पंघूड़ा बनवाया जिसमे साहिबजादे
को लेटाकर माता जी लोरियाँ देती व पंघूड़ा हिलाकर मन ही मन खुश होती| आपके
हाथों के कड़े, पाँव के कड़े और कमर की तड़ागी के घुंघरू खन-खनाते रहते| माता
नानकी जी बालक गोबिंद राय को स्नान कराकर सुंदर गहने व कपड़े पहनाते|
पटने से आनंदपुर साहिब बुलाकर श्री गुरु तेग बहादर जी ने अपने सुपुत्र श्री गोबिंद
राय जी को घुड़ सवारी,
तीर कमान, बन्दूक
चलानी आदि कई प्रकार की शिक्षा सिखलाने का प्रबंध किया| बच्चो
के साथ बाहर खेलते समय मामा कृपाल जी को आपकी निगरानी के लिए नियत कर दिया| इस
प्रकार श्री गुरु तेग बहादर जी के किए हुए प्रबंध के अनुसार आप शिक्षा लेते रहे|
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श्री गुरु गोबिंद सिंह जी - खालसा पंथ की साजना
पाँच
प्यारों का चुनाव करना
वैसाखी
संवत वाले दिन एक बहुत बड़े पंडाल में गुरु जी का दीवान सजा| सभी
संगत एकत्रित हो गई| संगत आप जी के वचन सुन ही रही थी कि गुरु जी अपने दाँये हाथ में
एक चमकती हुई तलवार ले कर खड़े हो गए|
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऊँची आवाज में कहा कि कोई सिक्ख हमे अपना शीश भेंट दे|आप
जी के यह वचन सुनकर भाई
दया राम जी उठ कर खड़े हो गए और प्रार्थना कि गुरूजी मेरा शीश हाजिर है|गुरु जी बाजू
पकड़कर तम्बू में ले गए| कुछ
समय के बाद रक्त से भीगी तलवार लेकर तम्बू से बाहर आ गए|
गुरु जी ने फिर एक और सिक्ख के शीश की मांग की| फिर भाई धर्म जी
हाथ जोड़कर खड़े हो गए| उसे भी गुरु जी हाथ पकडकर अंदर ले गए| खून
से भीगी तलवार लेकर गुरु जी ने फिर से शीश की माँग की| अब
मुहकम चंद जी व
चौथी बार भाई साहिब चंद जी आये| गुरु जी ने फिर वैसे ही किया|
हाथ पकड़कर अंदर ले गए व फिर खून से भीगी तलवार लेकर शीश की माँग| अब पांचवी
बार हिम्मत मल जी हाथ जोड़कर खड़े हो गए| गुरु
जी उन्हें भी अंदर ले गए| गुरु जी ने तलवार
को म्यान में डाल दिया और सिंघासन पर बैठ गए| तम्बू में ही पाँच
शीश भेंट करने वाले प्यारों को नयी पोशाकें पहना कर अपने पास बैठा कर संगत को कहा
की यह पाँचो मेरा ही स्वरूप है और मैं इनका स्वरूप हूँ| यह पाँच मेरे
प्यारे है|
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अमृत
तैयार करके छकाना
तीसरे पहर गुरु जी
ने लोहे का बाटा मँगवा कर उसमें सतलुज नदी का पानी डाल कर अपने आगे रख दिया| पाँच प्यारों को
सजा कर अपने सामने खड़ा कर लिया|
फिर अपने बांये हाथ से बाटे को पकड़कर
दाँये हाथ से खंडे को जल में घुमाते रहे| मुख से जपुजी
साहिब आदि बाणियो
का पाठ करते रहे| पाठ की समाप्ति के
बाद अरदास करके पांच प्यारो को पहले अमृत के पाँच -2 घूंट पिलाये| फिर पांच बार हर
एक की आँखो में इसके छींटे मारे| पांच -2 घूंट ले हर एक के केशो में डाला| हर बार
‘वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतह’ पहले आप कहते फिर अमृत पीने वालो से
कहलवाते|
इस तरह गुरु जी ने
अमृत पिला कर हर एक प्यारो को सिंह प्रदान किया जैसे-
१भाई
दया सिंह जी (
२. भाई धर्म सिंह जी (
३. भाई मुहकम सिंह जी
४. भाई साहिब सिंह जी (
५. भाई हिम्मत सिंह जी (
इस
तरह पाँच प्यारों को हर प्रकार की शिक्षा से तैयार करके गुरु गोबिंद जी ने
आप अमृत छका और अपने नाम के साथ भी श्री गोबिंद राय से श्री गुरु गोबिंद सिंह जी कहलाये| जिस स्थान पर आप
जी ने यह सारा कौतक रचा, उसका
नाम केशगढ़ रखा| जो इस समय तख़्त केशगढ़ के नाम से आनंदपुर साहिब में सुशोभित है|इस
सारे उत्साह भरपूर चरित्र को देखकर और भी हजारों सिखों ने खंडे का अमृत छककर सिंह
सज गए| सब सिखों ने अमृत छक कर पाँच ककार की रहत धारण करके अपने नाम के
साथ "सिंह" रख लिया|
****
पूर्ण सिक्ख के लक्षण व सिक्खी धारण योग्य बातें
श्री
गुरु गोबिंद सिंह जी ने वचन किया कि हे सिखों जिस का मर्यादा के अनुसार जीवनं धर्म
के लिए है और अपना आचरण अच्छा रखता है, वही पूरण सिक्ख है| गुरु जी आगे कहने लगे
कि सिक्ख
अपनी कमाई में से गुरु के निमित दशवंध दे|सिक्खी की रहत में
रहे, स्नान
और ध्यान
स्मरण में लग कर समय व्यतीत करे|
परायी स्त्री व पराये धन का त्याग करे| गुरुबाणी का पाठ
करे, गुरु
पर विश्वास रखे|
सिक्ख के धारण
योग्य बाते:
·
सिक्ख भ्रम ना करे
·
सम्बन्धी के मरने
पर रोना पीटना न करे
·
खोटे पुरुष के साथ
कभी प्रीति ना करे
·
वाहेगुरु की ओर से
विमुख होकर आहे ना भरे
·
गुरूद्वारे जाते
समय नाखुनो तक सारे पैर धोकर अन्दर जाए
·
रोटी खाने के बाद
पेट ना बजाये
·
अन्न खा कर उसकी
निंदा ना करे
·
बदचलन स्त्री से प्रीति
न करे
·
धर्म पुस्तकों को
पढकर व सुन कर अपना अहंकार दूर करे
·
जीवन की
जिम्मेदारियों को धैर्य से निभाए
·
मन को प्रभु की याद
में लगाये
·
खट्टा भोजन ना करे
जो
सिक्ख अपने व्यवहार तथा खाने पीने को शुद्ध रखता है उसका घर धन से भरपूर रहता है
****
अरदास
का महत्व
एक दिन उजैन शहर के रहने वाले एक सिक्ख बशंबर दास ने गुरु जी के
आगे प्रार्थना की कि सच्चे पातशाह मुझे धन की बख्शिश करे| मेरे घर बड़ी गरीबी है| सतगुरु
जी ने फ़रमाया कि सिक्ख को हर कार्य के प्रारम्भ के समय कड़ाह प्रसाद तैयार करके
उसे चौकी पर रख कर ऊपर साफ़ कपड़े से ढक कर पास बैठ कर पूरी पवित्रता से जपुजी
साहिब का पाठ करना या करवाना चाहिए| इसके पश्चात कार्य
की सफलता के लिए खड़े होकर हाथ जोड़कर नम्रता से अरदास करनी अथवा करवानी चाहिए| फिर जो भी कार्य
होगा अवश्य सिद्ध होगा|
घर जाकर भी तुम इस तरह की ही अरदास करवाना, तेरे घर बहुत धन और
सुख सम्पदा की बख्शिश होगी| हे बशंबर दास हर एक की यह अरदास होनी चाहिए| बशंबर दास
ने कहा, गुरु जी महलो और दुशालो में रहे या गरीबी में हर हालत में मेरे ह्रदय में
आप जी के चरणों का प्यार ज्यो का त्यों बना रहे| मेरा मन सिक्खी भरोसे से न डोले|
****
एक दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी दीवान की ओर आ रहे थे कि
रास्ते में एक सिक्ख दीवार पर लेप कर रहा था| दीवार
के ऊपर लेप मारते समय उससे गुरु जी के पाजामे के ऊपर चिकड़ के छींटे पड़ गए| गुरु
जी ने सेवकों से कहा इस लिपाई करने वाले को जोर से थप्पड़ मारो| यह
बात सुनकर कई सिखों ने जोर से थप्पड़ लगा दिए| बहुत
थप्पड़ों की मार से वह गरीब सिक्ख बेहोश हो गया| उसकी
यह दशा देखकर गुरु जी ने अपने सेवकों को कहा मैंने एक सिक्ख को थप्पड़ मारने की
आज्ञा दी थी| परन्तु आप सब ने तो इस गरीब को एक-एक थप्पड़ मारकर बेहोश कर
दिया है| सिखों ने कहा महाराज हमने तो आपका हुकुम माना है| गुरु
जी ने कहा यदि हमारा हुक्म मानते हो तो इस सिक्ख को कोई अपनी लड़की का रिश्ता दे
दो| गुरु जी का यह वचन सुनकर सब चुप हो गए| सबको
चुप देखकर गुरु जी ने कहा, गुरु
का हुकुम तब ही यथार्थ है यदि गुरु के सारे हुक्म माने जाए| परन्तु तुमसे सिक्खी
दूर है| आसान
हुकुम मान लेते हो तथा कठिन समय चुप धारण कर लेते हो|
गुरु जी के यह वाक्य सुनकर कंधार के एक सिक्ख अजायब सिंह ने अपनी लड़की का रिश्ता उस गरीब सिक्ख को दे दिया तथा गुरु की अटूट खुशी प्राप्त की|
गुरु जी के यह वाक्य सुनकर कंधार के एक सिक्ख अजायब सिंह ने अपनी लड़की का रिश्ता उस गरीब सिक्ख को दे दिया तथा गुरु की अटूट खुशी प्राप्त की|
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लंगर की परीक्षा करनी
आनंदपुर में सिक्ख संगत ने अपने-अपने डेरों में लंगर लगाए हुए
थे| गुरू जी ने जब इनकी शोभा सुनी कि गुरु की नगरी में आने वाला कोई
भी रोटी से भूखा नहीं रहता तो एक दिन रात के समय गुरु जी आप एक गरीब सिक्ख का वेष
धारण करके इनकी परीक्षा लेने चल पड़े| एक
सिक्ख के डेरे पर जाकर आपने कहा हमें जल्दी भोजन दो, भूख लगी है| उसने कहा कुछ देर
बैठ जाओ भोजन तैयार हो रहा है,
मिल जाएगा| उससे हटकर आप जी दूसरे सिक्ख के डेरे गए और वहाँ भी भोजन माँगा| परन्तु उसने कहा
दाल भाजी तैयार हो रही है, फिर
आकर भोजन छक लेना|
फिर इसके पश्चात गुरु
जी तीसरे व चौथे सिक्ख के डेरे भोजन के लिए गए| तो एक ने कहा आनंद
साहिब का पाठ करके लंगर बटेगा| दूसरे ने कहा सारी संगत एकत्रित हो जाए, तो पंक्ति लगाकर
लंगर बाँटा जाएगा, आप
बैठ जाओ|
इसके पश्चात आप जी भाई नन्द लाल जी के डेरे भोजन के लिए गए| आप
ने वहाँ जाकर भी भोजन माँगा| भाई के पास जो कुछ
तैयार था गुरु जी के आगे लाकर रख दिया| गुरु जी छक कर बहुत
प्रसन्न हुए और अपने महलों में आ गए| दूसरे दिन जब सिखों के लंगर की बातें चली तो गुरु जी ने अपनी
रात की सारी वार्ता सुनाकर बताया की हमे केवल भाई नन्द लाल के लंगर से ही भोजन
मिला है| बाकी सबने कोई ना कोई बात करके हमें लंगर नहीं छकाया| जो
सिक्ख भूखे को शीघ्र ही भोजन देने का यत्न करता है, वही सिक्ख हमें
प्यारा है| भूखे
को रोटी पानी देने के लिए कोई समय नहीं विचारना चाहिए| जिस अन्न के दाने
से प्राण बच जाते है, उसका
पुण्य फल सभी दानों से अधिक है|
सतगुरु जी की तरफ से अन्न दान महिमा सुनकर सबने प्रण कर लिया कि
आगे से किसी को भूखा नहीं भेजा जाएगा|
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गधे को शेर की पौशाक पहना कर सिखों को शिक्षा
एक दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को शिक्षा देने के
लिए शेर की खाल रात के समय एक गधे को पहना दी| उस
गधे को बाहर खेतों में छोड़ दिया| हरे
खेत खाकर गधा बहुत मस्त हो गया| एक
दिन रात के समय वह अपने ही मालिक कुम्हार के घर आकर खड़ा हो गया| कुछ
देर बाद कुम्हार के गधे हींगे तो वह भी बाहर से हींगने लगा| कुम्हार
ने जब उसकी यह आवाज़ सुनी तो गधे से ऊपर
से शेर की खाल उतार दी|उसे दो चार डंडे भी मारे और दूसरे गधों के साथ बांध दिया| यह
बात सारे लोगों में फ़ैल गई कि जिसको शेर समझकर उससे डरते थे, वह
कुम्हार का गधा था| जिस पर से खाल उतरकर कुम्हार ने उस पर छट लाद दी है| यह
बात सुनकर गुरु जी ने सिखों को बताया कि यह तुम्हें बाणा उदहारण के द्वारा समझाया
है कि जिस तरह एक गधा शेर का बाणा धारण करके लोगों के खेत खाता रहा और उसे शेर
समझकर उसके पास कोई न गया| परन्तु
जब वह अपने भाईयों से मिलकर अपनी भाषा बोला तो उसको कुम्हार ने डंडे मारकर आगे लगा
लिया और पीठ पर छट लादकर अन्य गधों के साथ बांध दिया| इसी तरह सिक्खी
बाणा है, जो
इसको धारण करके इस पर कायम रहेगा,
उससे सारे लोग भय खायेंगे|
परन्तु
जो सिक्खी बाणे पर असूलों को त्याग देगा, उस पर सब कोई अपने
हुक्म की छट लादेगा और खरी खोटी बोली के डंडे मारेगा| यह दृष्टांत सुनकर सारे सिखों ने प्रण किया कि वह कभी भी सिक्खी
बाणे और असूलों का त्याग नहीं करेंगे|
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श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने ब्राहमणों का चुनाव करने के लिए
दूर दूर के क्षेत्रों से जैसे कश्मीर, मथुरा, प्रयाग
व काशी आदि दक्षिण पूर्व दिशा से सारे पंडितो को आनंदपुर आने के लिए अपने सिक्ख
भेजकर बुलवाया|
बहुत से पंडित एकत्रित हो गए| गुरु जी ने उनके
लिए एक ओर लंगर में खीर, पूड़े
तथा लड्डू आदि तैयार करवाए| दूसरी
ओर गुरु जी ने मासाहारी भोजन तैयार करवाया| इसके पश्चात गुरु
जी ने सबको कहा कि जो वैष्णव भोजन खीर पूड़े आदि खायेगा उसे पांच रूपये दक्षिणा
मिलेगी तथा जो मांस वाला भोजन खायेगा उसे पांच मोहरे दक्षिणा मिलेगी| गुरु जी के यह वचन सुनकर बहुत से पंडित मांस खाने वाले लंगर में
जाकर बैठ गए| बाकी थोड़े से ही वैष्णव भोजन खीर पूड़े वाले लंगर में रह गए| दोनों
लंगर में सबने भोजन खा लिया| गुरु
जी ने मासाहारी ब्राहमणों को सम्बोधित करके कहा कि तुमने लोभवश होकर अपना ब्राहमण
धर्म भ्रष्ट किया है| मांस
खाना क्षत्रियों का धर्म है ब्राहमणों का नहीं|इस करके तुम्हे
पांच-2 मोहरों की जगह पांच -2 रुपये दक्षिणा दी जाती है| इसके पश्चात गुरु जी ने
वैष्णवों को कहा कि तुमने लोभवश होकर अपना ब्राहमण धर्म नहीं छोड़ा जो कि लोक व
परलोक में सहायक होता है| तुम्हें
शाबाश है| उनको
गुरु जी ने प्रसन्न होकर पांच -2 मोहरे दक्षिणा दी|
*****
जेब काटने वाले चोर को शिक्षा
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दरबार में सदा एक मेला सा लगा रहता
था| एक दिन चार सिक्ख गुरु जी के पास आए| उन्होंने
आकर प्रार्थना की कि किसी ने उनकी जेब काट ली है व पैसे नकदी निकाल लिए हैं| उनकी
बात सुनकर गुरु जी ने सिखों को हुक्म दिया कि संगत की भीड़ में एक आदमी जिसने सिर
पर लाल पगड़ी बांधी है,
कमर पर धोती है तथा
उसके हाथ में माला व माथे पर चन्दन का सफ़ेद तिलक लगा हुआ है, उसे
पकड़कर हमारे पास ले आओ|
सिखों ने गुरु जी की
बात सुनी व गुरु जी की बताई निशानी के अनुसार उस आदमी के हाथ पैर बांधकर गुरु जी
के समक्ष ले आए| गुरु जी ने उसकी तलाशी करवाई| चुराया
हुआ सारा समान व धन उसके पास से ही निकला| तब
गुरु जी ने उस जेब कतरे को कैद में डलवा दिया|
कुछ दिनों के बाद आपने उसे बुलाकर कहा तूने जेब काटने के लिए हमारी आराधना करके
प्रण किया था, मैं तीन जेबें काटकर फिर यह काम नहीं करूंगा| परन्तु
तूने अपने प्रण से फिर कर चौथी बार जेब क्यों काटी? इसलिए
तुम्हें कैद की सजा दी जाती है| परन्तु
यदि अब तुम यह प्रण हमारे सामने कर लो कि आगे से कोई ऐसा काम नहीं करोगे, तो
तुम्हें छोड़ देते हैं| उस चोर ने गुरु की बात सुनकर उनसे क्षमा माँगी व यह प्रण किया
कि वह आगे से ऐसा कोई काम नहीं करेगा| गुरु
जी ने उसे बुलाकर उपदेश दिया व कैद से निकाल दिया|
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एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी गंगा में नाव की सैर कर रहे थे| सैर
करते हुए आपके हाथ से सोने का कड़ा दरिया में गिर गया| आप
जब घर पहुँचे तो माता जी ने आपसे पूछा बेटा आपका कड़ा कहा है? तब आपने माता जी को उत्तर दिया, माता
जी वह दरिया में गिरकर खो गया| माता जी फिर से पूछने लगी कि बताओ कहाँ गिरा है? गुरु
जी माता जी को लेकर गंगा नदी के किनारे आ गए| उन्होंने
अपने दूसरे हाथ का कड़ा भी उतारकर पानी में फैंक कर कहा कि यहाँ गिरा था| आप
की यह लापरवाही देख कर माता जी को गुस्सा आया| वह
उन्हें घर ले आई| घर आकर गुरु जी ने माता जी को बताया कि माता जी! इन
हाथों से ही अत्याचारियों का नाश करके गरीबों की रक्षा करनी है| इनके साथ ही अमृत
तैयार करके साहस हीनों में शक्ति भरकर खालसा साजना है| यदि इन हाथों को
माया के कड़ो ने जकड़ लिया, तो
फिर यह काम जो अकाल पुरख ने करने की हमें आज्ञा की है वह किस तरह पूरे होंगे? जुल्म को दूर करने
के लिए इन हाथों को लोहे जैसे शक्तिशाली मजबूत करने के लिए लोहे का कड़ा पहनना
उचित है| अतः
खालसा पंथ सजाकर आपने सिखों को लोहे का कड़ा ही पहनने का हुक्म किया, जो जगत प्रसिद्ध है| गंगा
नदी के जिस घाट पर आप जी खेलते व स्नान करते थे, उसका
नाम गोबिंद घाट प्रसिद्ध है|
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कबूतर की रक्षा
दशम पादशाही श्री
गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज का दरबार लगा हुआ था| सभी भक्तजन अपने सतगुरु जी के
दिव्य दर्शन कर रहे थे| एक कबूतर जिसका पीछा एक बाज कर रहा था उनकी गोद में अपनी
सुरक्षा के लिए आ गया| उस बाज ने प्रार्थना कि-हे सच्चे पादशाह! कृप्या आप इस
कबूतर को छोड़ दे, यह मेरा शिकार है| मैं इससे अपने तीन जन्मो का बदला लेना चाहता
हूँ| हे सतगुरु! पूर्व जन्म में यह कबूतर एक वजीर था और मैं जमीदार था| इसने मेरे
नगर को तीन बार निर्दयता से नष्ट कर दिया था जिसे मैंने कठिन प्रयत्नों से बनाया
था, लेकिन तीनो बार इसने मुझे अत्यंत दुःख और संताप की पीड़ा में धकेल दिया| अंत
में हम दोनों का देहांत हो गया| हे प्रभु ! अब यह मेरा अवसर है मैं इसे तीन जन्मो
तक निरंतर खत्म करता रहूँगा| सतगुरु ने उसकी आंतरिक विनय को सुना और उपदेश दिया
–हे बाज! तुम्हारी विनय स्वीकार है परन्तु इस कबूतर ने मेरी शरण ग्रहण की है अपनी
चोंच से तीन बार तुम इसका मांस नोच लो और अपने तीन जन्मो का बदला ले लो| तब बाज ने
वैसा ही किया| अब दर्शन करने जो आये थे उनमे से एक के मन में संशय उठा कि सतगुरु
इतने निर्दयी है, उन्होंने कबूतर को अपने हाथ में पकड़ रखा है और बिना किसी रुकावट
के कोमल कबूतर को बाज से पीड़ित होने दिया| सतगुरु जी ने उस भक्त के संशय को भाप
लिया और फरमाया –गुरमुख! तुम हमे निर्दयी समझते होंगे किन्तु इस कबूतर को इसी जन्म
में मोक्ष की प्राप्ति होगी अन्यथा ये बदले की भावना कबूतर तथा बाज को जन्म - मरण
के चक्कर में जकड़े रखती| तब सद्गुरू जी ने उनके पूर्व जन्मो के विषय में बताया| वह
भक्त सद्गुरू जी के चरण कमलो में पश्चाताप करता हुआ क्षमा याचना करने लगा|
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भाई कन्हैया
श्री गुरु गोविन्द
सिंह साहिब के जमाने की एक कथा है शत्रु के साथ युद्ध हो रहा था| गुरु महाराज की
सेना के सिपाही शत्रु को जब मुर्छित करते थे तो इसी सेना का एक सिक्ख जिसका नाम
कन्हैया जी था, उन मुर्छित हुए शत्रुओ के मुंह में पानी डालकर उनकी घबराहट को दूर
करता था और उनको सचेत बनता था| इस पर सिखों ने गुरु महाराज जी के चरणों में शिकायत
की कि भाई कन्हैया जी ऐसा करते है| गुरु महाराज जी ने भाई कन्हैया जी को बुलाकर
पूछा –भाई कन्हैया आपकी शिकायत आई है क्या तुम ऐसा करते हो? तब भाई कन्हैया की के
नेत्रों में अश्रु आ गए उन्होंने हाथ जोड़कर गुरु जी के चरणों में मस्तक निवाकर
विनय की –दीनदयाल! मैं किसी शत्रु के मुंह में पानी नहीं डालता और न मुझे कोई
शत्रु दिखता है जिस समय मैं पानी पिला रहा होता हूँ, उस समय मुझे यही दिखाई दे रहा
होता हैं कि आपको प्यास लगी हैं और मैं आपको पानी पिलाने की सेवा कर रहा हूँ| भाई
कंहैया जी की ऐसे वाणी सुनकर गुरु महाराज जी की प्रसन्नता की कोई सीमा नहीं रही|
उस प्रसन्नता में गुरु महाराज जी ने फरमाया –भाई कन्हैया! पहले तो आप पानी पिलाते
थे लो, अब ये मरहम पट्टी की डिब्बी भी ले लो और जहाँ जरूरत समझो साथ ही मरहम पट्टी
भी कर दिया करो| हम आपकी ऐसे अवस्था पर बहुत खुश हैं |
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पिछले
जन्म का भुगतान
कहते है कि एक बार
गुरु गोविन्द सिंह जी अपने भक्तो के साथ कहीं जा रहे थे तो रास्ते में उन्होंने
देखा कि एक सांप के ऊपर कई सारी कीड़ीया चिपकी हुई थी| तो गुरु गोविन्द सिंह जी ने
फरमाया की ये देखो ये जो सांप है इसने पिछले जन्म में मान–बढाई में अपने शिष्य बना
लिए उन्हें भव से पार ले जाने का वायदा करता था| लेकिन अब जब वायदा पूरा न हो पाया
तो खुद भी दण्ड भुगत रहा है और इन्हें भी भुगतवा रहा है| तभी तो कीड़ीया इसे काट
रही है कि तुमने अपना वायदा पूरा नहीं किया |
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किस्मत से अधिक
गुरु गोविन्द जी के
समय की बात है उनके दरबार में एक गरीब व्यक्ति आया| उसने गुरु महाराज जी से विनय की
महाराज मैं बड़ा गरीब हूँ मेरी गरीबी दूर करो| गुरु महाराज जी ने दया की और फरमाया
की जा तुझे राज बक्शा| वही पर एक सिक्ख ने जब यह देखा कि श्री गुरु महारज जी आज
बड़े दयाल है तो उसने भी विनय कि महाराज मुझे भी कुछ चाहिए| तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया की
बता तुझे भी राज चाहिए? तब उसने विनय की महाराज आपकी कृपा से धन बहुत है लेकिन
मेरे घर में संतान नहीं है तब श्री गुरु महाराज जी ने दया कर फरमाया कि अपने तो
चार शहीद करवाऊंगा लेकिन तेरी झोली जरुर भरूँगा| श्री गुरु महाराज जी ने उसे संतान
होने का आशीर्वाद दिया| वही दरबार में एक मुसलमान काजी था जो कि गुरु गोविन्द जी
का बहुत बड़ा शिष्य था उसने जब गुरु महाराज जी को देते हुए देखा तो उसके मन में
संशय उठा तो उसने गुरु महाराज जी से पूछा कि महाराज जिन-जिन को आपने दात बक्शी है
अगर किस्मत में पहले से ही था तो आपने कैसे दे दी और इनकी किस्मत में पहले से ही
नहीं थी तो आपने कहाँ से दे दी?
तब श्री गुरु महराज जी ने अपने शिष्य को कहा
कि मोहर लगाने वाली रबड़ ले आओ| जब वह रबड़ आई तो गुरु महाराज जी ने काजी से पूछा कि
देख इस मोहर लगाने वाली रबड़ पर अक्षर कैसे है? तो काजी ने कहा उलटे है| लेकिन जब
वह स्याही में लगा कर कागज़ पर पड़ी तो अक्षर सीधे हो गए| तब गुरु महाराज जी ने काजी
से पूछा अब अक्षर कैसे है? तब काजी ने कहा कि महाराज सीधे| तब गुरु महाराज जी ने
वचन फरमाये, इसी तरह जब व्यक्ति गुरु घर से नहीं जुड़ा होता तो किस्मत उलटी होती है
लेकिन जब गुरु घर से जुड़ता है तो गुरु की कृपा से सारी रेखाएं सीधी हो जाती है फिर
वो भी मिल जाता है जो किस्मत में नहीं होता|
****
भाई
जोगा जी
सत्पुरुष श्री गुरु
गोविन्दसिंह जी महाराज के समय की बात है एक बार सतगुरु जी आनन्दपुर साहिब में
विराजमान थे कि पेशावर की संगत उनके श्री दर्शन करने के लिए आई| उन प्रेमियों में
12 -13 वर्ष का एक लड़का भी था जिसका नाम जोगा था| वह अपने पिता के साथ सतगुरु जी
के दर्शन करने के लिए आया था| वह लड़का बड़े प्रेम और श्रद्धा भावना के साथ संगत की
सेवा करता था| सतगुरु जी उसकी ऐसी लगन देख कर बहुत प्रसन्न हुए| एक दिन जबकि दरबार
लगा हुआ था, सतगुरु जी ने उसे पास बुलाकर बड़े प्रेम से पूछा – बेटा! तुम्हारा नाम
क्या है? उस लड़के ने सतगुरु जी के चरणों में मस्तक नवाया और फिर हाथ जोड़कर
बोला-सच्चे पादशाह! मेरा नाम जोगा है| पंजाबी भाषा में जोगा का अर्थ “लिए
अथवा वास्ते” भी होता है| अतः
सतगुरु जी ने हंसकर पूछा –अच्छा! तू किसके जोगा अर्थात किसके वास्ते है? जोगा ने
हाथ जोड़कर पुनः उत्तर दिया-सच्चे पादशाह! मैं आपके जोगा हूँ अर्थात आपके लिए हूँ|
सतगुरु जी ने मुस्कराते हुए फ़रमाया –अच्छा भाई जोगासिंह! यदि तू हमारे लिए है तो
फिर हम भी तुम्हारे लिए हुए| पेशावर की संगत कुछ दिन आनन्दपुर साहिब रहकर तथा
सतगुरु जी के पावन दर्शनों का लाभ प्राप्त करके वापिस चली गई, परन्तु जोगा के पिता
से कहकर सतगुरु जी ने उसे अपने पास रख लिया| जोगा सिंह बड़ी श्रद्धा एवम् लगन के
साथ दरबार में रहकर सेवा करने लगा| उसके प्रेम, श्रद्धा, लगन को देखकर सतगुरु जी
उस पर बड़े प्रसन्न होते| इसी तरह कुछ वर्ष बीत गए और जोगासिंह आनन्दपुर साहिब रहकर
दरबार की सेवा करता रहा| तब एक दिन जोगा का पिता आनन्दपुर साहिब आया| उसने सतगुरु
जी के सामने विनती की –सच्चे पादशाह! हमने
जोगासिंह का रिश्ता तय कर दिया है| अब शीघ्र ही इसका विवाह है इसलिए आप इसे घर
जाने की आज्ञा देवे ताकि हम यह कार्य सम्पूर्ण कर सके| यह सुनकर सतगुरु जी ने
जोगासिंह से पूछा-भाई! तेरी क्या इच्छा है? जोगासिंह ने हाथ जोड़कर विनय की –सच्चे
पादशाह! मैं तो आपका सेवक हूँ जो आपकी आज्ञा होगी, मैं उसी अनुसार काम करूंगा|
सतगुरु जी ने फ़रमाया-भाई जोगासिंह! इस समय तो तू अपने पिता के साथ घर जा, बाद में
हम आज्ञा भेजेंगे, उसी के अनुसार कार्य करना| सतगुरु जी की आज्ञा मानकर जोगासिंह
अपने पिता के साथ घर चला गया| कुछ इन पश्चात् उसके विवाह का दिन तय हो गया| इधर
सतगुरु जी ने क्या किया कि जोगासिंह के आनन्दपुर साहिब से जाने के बाद एक सिक्ख को
पेशावर भेज दिया| सतगुरु जी ने उस सिक्ख को एक पत्र दिया आज्ञा की कि जिस समय
जोगसिंह का विवाह हो रहा हो और वह दो फेरे ले चुका हो तब यह पत्र उसे दे देना| वह
सिक्ख पेशावर चला गया और समय पर जोगासिंह की बारात के साथ गया| जब विवाह की रस्म
शुरू हुई और जोगासिंह दो फेरे ले चूका,तब उस सिक्ख ने सतगुरु जी का पत्र जोगासिंह
के हाथ में देकर कहा कि यह सतगुरु जी का पत्र है| सतगुरु जी का पत्र जानकार
जोगासिंह ने उसे मस्तक और नेत्रों से लगाया फिर खोलकर पड़ने लगा| उसमे सतगुरु जी ने
आज्ञा की थी कि जिस पल तुम हमारा पत्र खोलकर पडो, उस समय चाहे दिन हो या रात,
तुरंत आनन्दपुर साहिब के लिए चल पड़ना जो भी काम तुम उस समय कर रहे हो चाहे उसे बीच
में छोड़ना पड़े| यह आज्ञा पड़कर भाई जोगासिंह फेरे बीच में ही छोड़कर जाने के लिए
तैयार हो गया| तब उसके पिता, ससुर तथा अन्य सम्बधियो ने इसका कारण पूछा तो
जोगासिंह ने उनको सतगुरु जी कि आज्ञा पढ़कर सुनाई और कहा कि मैं सतगुरु जी की आज्ञा
का उलंघन नहीं कर सकता| अब शेष फेरे मैं नहीं लूँगा, क्योंकि सतगुरु जी के पत्र
में साफ़ लिखा है कि “जिस
पल तुम हमारा पत्र खोलकर पढो, उस समय चाहे दिन हो या रात हो आनन्दपुर साहिब के लिए
चल पढना, जो भी काम उस समय कर रहे हो उसे बीच में ही छोड़ना पढ़े’ इसलिए सतगुरु जी
कि आज्ञा सर मस्तक पर, अब मैं आनन्दपुर जा रहा हूँ|”
जोगासिंह के पिता तथा अन्य लोगो ने समझाया कि तू बाकी फेरे पूरे कर ले, फिर चाहे आनन्दपुर
साहिब चले जाना हम नहीं रोकेंगे| बीच में फेरे छोड़कर मत जा वरना हमारी बड़ी बदनामी
हो जाएगी परन्तु जोगासिंह ने किसी की एक न सुनी| उसने कहा कि मेरे लिए सतगुरु जी
कि आज्ञा सबसे पहले है, मैं उस आज्ञा को टाल नहीं सकता हूँ| आप लोग ऐसा करो कि
मेरे यह वस्त्र ले लो बाकि के फेरे इसी के साथ कर दो| मैं तो अब आनादपुर साहिब जा
रहा हूँ| यह कहकर वह विवाह की रस्म को बीच में छोड़कर आनादपुर साहिब कि तरफ चल पड़ा|
चलते-२ मार्ग में जोगासिंह के मन में विचार आया कि भला मेरे जैसा आज्ञाकारी शिष्य
और कौन हो सकता है? जिसने सतगुरु जी के आदेश का पलना करते हुए अपनी होने वाली
पत्नी का भी त्याग कर दिया| मुझ जैसा सयंमी, त्यागी, आज्ञाकरी अन्य कोन हो सकता
है? इस प्रकार अहंकार रूपी पक्षी उसकी भक्ति का फल खाने के लिए आ पहुंचा| और अकेला
ही नहीं आया अपने साथ एक और साथी –काम को भी ले आया| ये दोनो ऐसे बलवान शत्रु है
जिनकी मार से बच पाना जीव के वश बात नहीं है| मालिक आप ही कृपा करे तो जीव बच सकता
है जैसा कि सतगुरु जी ने भाई जोगासिंह कि रक्षा तथा सम्भाल की| अहंकार से फुला हुआ
भाई जोगासिंह होशियारपुर जा पहुंचा और रात्रि व्यतीत करने के लिए एक धर्मशाला में
डेरा लगाया| वैसे तो भाई जोगासिंह बहुत ही भक्तिवान पुरुष था और उसके विचार भी बड़े
शुद्ध थे, परन्तु जैसा कि प्रारम्भ की वाणी में श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया है
कि जब भक्ति का फल पकने पर आता है तो भक्तिमान पुरुष की कमाई को नष्ट करने के लिए
माया भी अपना प्रयत्न शुरू कर देती है परिणामस्वरूप ये अहंकार आदि शत्रु आ धमकते
है| अपने बल-बूते पर इनसे बचना बड़ा कठिन है, इसलिए जिज्ञासु को पल-2 पूर्ण सतगुरु
का ध्यान करते रहना चाहिए| उनकी कृपा से ही माया से बचा जा सकता है| जोगासिंह को
भी चिताने और उसे इन शत्रुओ से बचाने के लिए सतगुरु जी ने एक अनोखा कौतुक रचा|
जोगासिंह धर्मशाला में जा रुका| जिस कमरे में वह ठहरा, उसके पिछली तरफ एक खिड़की थी
जो पिछले रस्ते कि और खुलती थी| सांझ ढल चुकी थी, जोगासिंह खिड़की खोलकर अपने कमरे
में बैठा था कि उसकी द्रष्टि मार्ग के दूसरी और बने मकान पर गई| उसने देखा कि मकान
के ऊपर की मंजिल के कमरे में एक अत्यंत सुन्दर स्त्री हार-श्रंगार किये हुए बैठी
है| उसके हाव-भाव से जोगासिंह ने जान लिया था कि वह कोई गणिका है| जोगासिंह का मन
उसके सुन्दर शरीर, उसके हाव-भाव देखकर भटक गया और वह उस गणिका से मिलने के लिए व्याकुल
हो उठा| जब एक पहर रात बीत गई तब वह अति व्याकुल हो अवस्था में उस गणिका के मकान
में जा पहुंचा| देखता है कि वहां एक शाही चोबेदार खड़ा था और उसके हाथ में चांदी का
डंडा भी था और वह फाटक पर पहरा दे रहा है| उस चोबेदार को देखकर जोगासिंह ने सोचा
कि लगता है कोई राजा अथवा रहीस आदमी उस गणिका के पास ऊपर गया हुआ है, तभी तो यह
चोबेदार यहाँ खड़ा पहरा दे रहा हैं ताकि कोई दूसरा आदमी ऊपर न जा सके| वह लौटने
लगा, परन्तु उसका दिल न माना और वह उस फाटक के अन्दर घुसने लगा| तभी चोबेदार ने
उसे अन्दर जाने से रोक दिया और कहा –अभी तुम अन्दर नहीं जा सकते| यह सुनकर
जोगासिंह वापिस मुड़ गया| उसने सोचा कि कुछ देर बाद जब यह अमीर आदमी चला जाएगा, तब
आऊंगा| वापिस तो वह आ गया परन्तु अन्दर से वह उस गणिका से मिलने के लिए इस कदर
आतुर था कि उसकी आँखों कि नींद उड़ गई| जब आधी रात बीत गई तो वह फिर वापिस उस गणिका
के घर पहुंचा परन्तु क्या देखता है वह चोबेदार अभी भी वहां मौजूद है| वह निराश
होकर फिर वापिस चला लौट आया|
इसी
प्रकार तीसरी बार वह फिर वहां गया, परन्तु इस बार भी निराशा ही उसके हाथ लगी|
अंततः ब्रह्म मुहूर्त का समय हो गया| उसने निश्चय किया कि अब तो वह चाहे कुछ भी
हो, मैं उस गणिका के पास अवश्य ही जाऊंगा| यह विचार करके जब वह फाटक के पास पहुंचा
तो उसने देखा कि चोबदार अभी भी फाटक पर खड़ा पहरा दे रहा है| उसका रोबदार चेहरा
देखकर जोगासिंह का साहस न हुआ कि वह फाटक के अन्दर जाये, अतः वह वापिस हो लिया|
तभी चोबदार ने उसे संबोधित करते हुए कहा हे भले पुरुष! तू तो कोई गुरु सिक्ख मालूम
पड़ता है| तू यहाँ बार-बार किसलिए आता है? जा अमृत वेला हो गया है| जाकर स्नान कर
और तन-मन निर्मल परमेश्वर का सिमरन कर| चोबेदार का ये शब्द सुनकर जोगासिंह को झटका
लगा| वह अपनी इस करनी पर अति लज्जित होकर मन ही मन अपने आप को धिक्कारने लगा कि
मैं किस नर्क में गिरने जा रहा था|यदि यह चोबेदर फाटक पर न खड़ा होता, तो मुझसे
बहुर बड़ा अनर्थ हो जाता| मैं सतगुरु जी को मुंह दिखाने के योग्य भी न रहता| भला हो
इस चोबदार का जिसने मुझे न केवल नरक गामी होने से बचाया है बल्कि मुझे सचेत भी
किया| उसने धर्मशाला में आकर स्नान किया, फिर परमेश्वर के सिमरन में बैठ गया जिससे
धीरे-२ उसका मन शांत हुआ| सिमरन से उठकर वह आनन्दपुर साहिब की ओर चल दिया| जब वह
आनन्दपुर साहिब पहुंचा उसने सतगुरु जी के चरणों में मत्था टेका और सामने बैठ गया|
कुछ देर बाद उसने देखा कि सतगुरु को नींद के झोंके आ रहे है| उसे यह देखकर बड़ी
हैरानी हुई| सोचने लगा कि सारी रात मैं जगा हूँ और नींद सतगुरु जी को आ रही है|
अन्तर्यामी सतगुरु जी ने उसके ह्रदय कि बात जान ली और उसे अपने पास बुलाकर फ़रमाया-
भाई जोगासिंह नींद के झोंके हम इसलिए ले रहे है क्योंकि आपने सारी रात हमसे सेवा
करवाई है|
तुम्हारे
लिए हमें सारी रात उस गणिका के मकान के फाटक पर चोबेदार बनकर पहरा देना पड़ा|
सतगुरु जी का यह वचन सुनकर जोगासिंह काँप उठा और सतगुरु जी के चरणों में गिर पड़ा|
वह बहुत रोने लगा और कहने लगा –मैं बहुत बड़ा पापी हूँ जिसने आपको इतना भारी कष्ट
दिया| मुझ पापी को नरकगामी होने से बचाने के लिए आप सारी रात चोबेदार बनकर पहरा
देते रहे| हे कृपा के सागर-मेरे अवगुणों को बक्शो और मुझे सदा अपने चरणों का आसरा
दे दो| मैं हमेशा आपके चरणों में लीन रहूँ| इस प्रकार भाई जोगासिंह बड़ी देर तक
सतगुरु जी के चरणों को पकड़ कर रोता रहा और विनती करता रहा| तब सतगुरु जी ने उसे
अपना आशिर्वाद दिया|
****
गुरु के आगे अरदास
एक
दिन एक सिक्ख, गुरु गोविन्द सिंह जी के पास आया और कहा साहिब- हम 10 गुरु साहिब
में से अरदास किसके आगे करे? तो साहिब ने फ़रमाया कि एक दिया लेकर आओ| वह ले आया|
फिर बोले 9 दिये ओर लेकर आओ| सिक्ख 9 दिये ले आया तब गुरु गोविन्द सिंह जी ने कहा
कि 1 दीये से 9 दीये जलाओ| सिक्ख ने वो 9 दीये जलाये, तब गुरु गोविन्द सिंह जी ने
फ़रमाया कि अब बताओ कि कौन से दीये में ज्यादा रौशनी है? तो सिक्ख ने कहा कि सब में
एक जितनी रोशनी है| तो गुरु जी ने कहा कि इसी तरह आप जिस भी गुरु के आगे अरदास
करोगे तो वो एक परमात्मा के पास ही जाएगी|
****
रीछ
का जन्म
एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के दरबार में एक मदारी अपने
रीछ के साथ प्रस्तुत हुआ| मदारी के द्वारा सिखाए गए करतब रीछ ने संगत के सामने
प्रस्तुत करने शुरू किए| कुछ
खेल इतने हास्य से भरपूर थे कि संगत की हसी रोके से ना रुक रही थी| करतब देख गुरु जी भी मुस्कुरा रहे थे| एक सिख के ठहाकों से सारा
दरबार गुंजायमान था वो सिख था गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज पर चवर झुलाने की सेवा
करने वाला भाई किरतिया!
भाई किरतिया! आप इन करतबों को देख, बड़े आनंदित हो| गुरु साहब जी ने कहा! महाराज इस रीछ के करतब हैं ही इतने हास्यपूर्ण| सारी संगत ठहाके लगा रही है| मुस्कुरा तो आप भी रहें हैं दातार| भाई किरतिया ने कहा!
हम तो कुदरत के करतब देख कर मुस्कुरा रहे हैं| भाई किरतिया कुदरत के करतब? कैसे महाराज! भाई किरतिया क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है? नही दाता! ये बाते मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ? भाई किरतिया! रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और कोई नही| आप का पिता भाई सोभा राम है, भाई किरतिया जी को जैसे एक आघात सा लगा, सर से लेकर पाँव तक सारा शरीर कांप गया, कुछ संभला तो हाथ में पकड़े चवर साहब को गुरु पिता के चरनों में रख दिया और बोलें.
सारा संसार जानता है, मेरे पिता भाई सोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की| उन्होंने एक दिन भी गुरु सेवा के बिना व्यतीत नही किया, अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है तो गुरु जी! सेवा करने का कोई लाभ नही
भाई किरतिया! आपके पिता भाई सोभाराम ने गुरु घर में सेवा तो खूब की लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नही मिटाया| अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा| एक दिन हमारा एक सिख अपनी फसल बैलगाड़ी पर लाद कर मण्डी में बेचने जा रहा था| राह में गुरुद्वारा देख मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई| बैलगाड़ी को चलता छोड़| वो सिख गुरुघर में अंदर आ गया| गुरबानी का पावन हुक्मनामा चल रहा था| हुक्म सम्पूर्ण हुआ, भाई सोभाराम ने प्रसाद बाँटना शुरू किया| भाई सोभाराम जी, मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये, मेरे बैल चलते चलते कहीं दूर ना निकल जाएं सिख ने विनती की! मेरे सेवक के मैले कपड़ो से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए तेरे पिता भाई सोभाराम ने कहा अच्छा, अच्छा, थोड़ा परे हो कर बैठ, बारी आने पर देता हूँ| बैलगाड़ी की चिंता, सिख को अधीर कर रही थी, सिख ने दो तीन बार फिर बिनती की तो तेरे पिता भाई सोभाराम ने प्रसाद तो क्या देना था मुख से दुर्वचन दे दिए कहा ना, अपनी जगह पर बैठ, समझ नही आती क्या, क्यों रीछ के जैसे उछल उछल कर आगे आ रहा है
तेरे पिता के ये कहे अपशब्द मेरे सिख के साथ साथ, मेरा हृदय भी वेधन कर गए| सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी, उसी कण को गुरुकृपा मान अपने मुख लगा सिख तो अपने गन्तव्य को चला गया| तेरे पिता की सर्व चर्चित सेवा को गुरु नानक साहब ने स्वीकार नही किया| उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम आज रीछ बन कर संसार में लोगो का मनोरंजन करता फिरता है| इसका उछलना, कूदना, लिपटना, आंसू, सब के लिए मनोरंजन है| भाई किरतिया! ने विनय की कि गुरु पिता, मेंरे पिता को इस शरीर से मुक्त कर के अपने चरणों में निवास दीजिये कृपा करें, मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें| गुरु जी ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया, भाई सोभाराम ने रीछ का शरीर त्याग, गुरु चरणों में स्थान पाया| गुरु जी से क्षमा मांग, चवर को उठा भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगें।
भाई किरतिया! आप इन करतबों को देख, बड़े आनंदित हो| गुरु साहब जी ने कहा! महाराज इस रीछ के करतब हैं ही इतने हास्यपूर्ण| सारी संगत ठहाके लगा रही है| मुस्कुरा तो आप भी रहें हैं दातार| भाई किरतिया ने कहा!
हम तो कुदरत के करतब देख कर मुस्कुरा रहे हैं| भाई किरतिया कुदरत के करतब? कैसे महाराज! भाई किरतिया क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है? नही दाता! ये बाते मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ? भाई किरतिया! रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और कोई नही| आप का पिता भाई सोभा राम है, भाई किरतिया जी को जैसे एक आघात सा लगा, सर से लेकर पाँव तक सारा शरीर कांप गया, कुछ संभला तो हाथ में पकड़े चवर साहब को गुरु पिता के चरनों में रख दिया और बोलें.
सारा संसार जानता है, मेरे पिता भाई सोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की| उन्होंने एक दिन भी गुरु सेवा के बिना व्यतीत नही किया, अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है तो गुरु जी! सेवा करने का कोई लाभ नही
भाई किरतिया! आपके पिता भाई सोभाराम ने गुरु घर में सेवा तो खूब की लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नही मिटाया| अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा| एक दिन हमारा एक सिख अपनी फसल बैलगाड़ी पर लाद कर मण्डी में बेचने जा रहा था| राह में गुरुद्वारा देख मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई| बैलगाड़ी को चलता छोड़| वो सिख गुरुघर में अंदर आ गया| गुरबानी का पावन हुक्मनामा चल रहा था| हुक्म सम्पूर्ण हुआ, भाई सोभाराम ने प्रसाद बाँटना शुरू किया| भाई सोभाराम जी, मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये, मेरे बैल चलते चलते कहीं दूर ना निकल जाएं सिख ने विनती की! मेरे सेवक के मैले कपड़ो से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए तेरे पिता भाई सोभाराम ने कहा अच्छा, अच्छा, थोड़ा परे हो कर बैठ, बारी आने पर देता हूँ| बैलगाड़ी की चिंता, सिख को अधीर कर रही थी, सिख ने दो तीन बार फिर बिनती की तो तेरे पिता भाई सोभाराम ने प्रसाद तो क्या देना था मुख से दुर्वचन दे दिए कहा ना, अपनी जगह पर बैठ, समझ नही आती क्या, क्यों रीछ के जैसे उछल उछल कर आगे आ रहा है
तेरे पिता के ये कहे अपशब्द मेरे सिख के साथ साथ, मेरा हृदय भी वेधन कर गए| सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी, उसी कण को गुरुकृपा मान अपने मुख लगा सिख तो अपने गन्तव्य को चला गया| तेरे पिता की सर्व चर्चित सेवा को गुरु नानक साहब ने स्वीकार नही किया| उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम आज रीछ बन कर संसार में लोगो का मनोरंजन करता फिरता है| इसका उछलना, कूदना, लिपटना, आंसू, सब के लिए मनोरंजन है| भाई किरतिया! ने विनय की कि गुरु पिता, मेंरे पिता को इस शरीर से मुक्त कर के अपने चरणों में निवास दीजिये कृपा करें, मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें| गुरु जी ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया, भाई सोभाराम ने रीछ का शरीर त्याग, गुरु चरणों में स्थान पाया| गुरु जी से क्षमा मांग, चवर को उठा भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगें।
****
भाई नंदलाल जी
भाई नंदलाल जी का गुरु गोबिंद सिंह जी में बहुत प्रेम था। भाई
नन्द लाल जी जब तक गुरु गोबिंद सिंह जी के दर्शन नहीं कर लेते थे, तब तक अपना दिन नहीं शुरू करते थे। एक दिन भाई
नन्द लाल जी ने जल्दी कहीं जाना था, लेकिन गुरु साहिब सुबह 4 वजे दरबार में आते थे । उन्होंने सोचा चलो गुरु साहिब जहाँ आराम
करते हैं, वहीं चलता हूं... दरवाज़ा खटखटा करके मिल के ही
चलता हूँ। सुबह 2 वजे गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी अपने ध्यान में
बैठे थे, तब नन्द लाल जी ने दरवाजा खटखटाया|
गुरु साहिब जी ने पूछा कौन है बाहर?
नन्द लाल जी - मैं हूँ !
फिर पूछा - कौन है बाहर?
नन्द लाल जी ने कहा मैं हूँ !
गुरु साहिब ने कहा जहाँ जहाँ ''मैं -मैं'' होती है वहाँ गुरु का दरवाज़ा नहीं खुलता। भाई
नन्द लाल जी को महसूस हुआ, कि मैंने ये क्या कह दिया| और फिर दरवाजा खटखटाया ।
तब गुरु साहिब जी ने फिर पूछा कौन है..?
नन्द लाल जी ने कहा ''तूँ ही तूँ '' ।
गुरु साहिब ने कहा इस में तो तेरी चतुराई दिख रही है... और जहाँ
चतुराई
होती है| वहाँ भी गुरु का दरवाज़ा नहीं खुलता। ये सुन के नन्द
लाल जी रोने लग गये कि इतना ज्ञानी होके
भी तुझे इतनी अकल नहीं आयी| (नन्द लाल जी बहुत ज्ञानी थे, 6 भाषा आती थी , उच्च कोटि के शायर थे,) उनका रोना सुन कर, गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने
पूछा बाहर कौन रो रहा है? अब नन्द लाल रोते हुए बोले| क्या कहूं सच्चे पातशाह! कौन हूँ? ‘मैं’ कहु तो हौमे(अहंकार) आता है ‘तूँ’ कहूं तो चालाकी आती है अब तो आप ही बता दो के मैं कौन हूँ? और दरवाज़ा खुल गया, आवाज़ आयी बस यही नम्रता होनी चाहिए जहाँ ये नम्रता है, भोलापन है वहाँ गुरु घर के दरवाज़े हमॆशा खुले हैं
और गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने भाई नन्द लाल को गले से लगा लिया|
****
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बच्चे पर कृपा
श्री गुरु गोविन्द सिंह जी के समय में रोज सत्संग होता था| वहीं
पर एक छोटा बच्चा जो कि रोज सत्संग में पहुँच कर बड़ी ही दृढ़ता के साथ बैठता था| एक
दिन श्री गुरु महाराज जी ने मौज में आकर उस बच्चे को बुलाया और उसे मस्तक पैर एक
बिंदी लगा दी| पास में खड़े सेवकों ने श्री चरणों में प्राथना कि की स्वामी जी इसका
क्या रहस्य है तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया की कि इस बच्चे के उम्र जो है 9
वर्ष तक ही है| लेकिन इसकी श्रद्धा भावना को देखते हुए हम इसी जन्म में ही इसकी
भक्ति पूरण करवाना चाहते है इसलिए इसके मस्तक पर शून्य लगा दिया, बिंदी लगा दी अब
इसकी उम्र 90 वर्ष हो गई|
****
गुरु जी की आज्ञा
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी "दशमेश' महाराज ने एक दिन आज्ञा दी कि यह जो अपार सम्पत्ति हमारे पास
पड़ी है उसे नदी में बहा दिया जाय। उन सेवकों में कई सिक्ख जो पैसे को बड़ा महत्त्व
देते थे वे गुरु महाराज जी की माता जी के निकट गये और निवेदन किया कि यह धन हमें
दिलवा दो-श्री माता जी ने श्री गुरु महाराज जी से प्रार्थना की कि यह तुम्हारे
शिष्य अति निर्धन हैं। इस धन को नदी में फैंकने की अपेक्षा इन्हें ही दे दो। श्री
गुरु महाराज जी ने उत्तर दिया कि माता जी!हम तुम्हें कहें कि चार आने का विष लेकर
हमारे भोजन में डाल दो तो क्या तुम ऐसा कर दोगी? माता जी ने उत्तर दिया कि बेटा!यह तो मैं कभी भी न करुँ। इस पर
श्री दशमेश जी बोले-तो यह काम मुझ से भी नहीं हो सकता। ये क्योंकि मेरे आत्मिक
बालक हैं। यह धर्मार्थ धन इनकी भक्ति की घोर हानि करेगा। इससे यह बहुत अच्छा है कि
ये लोग भक्ति भजन करें चाहे इन्हें अत्यन्त कठिनाई से जीवन निर्वाह करना पड़े।
इसमें इनका परम कल्याण है। यह सुनकर माता जी अवाक् हो गर्इं। भक्ति के मार्ग पर
सच्चाई की नितान्त आवश्यकता है।
****
गुरु घर की सेवा
एक बार श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज जी का दरबार लगा हुआ
था| श्री गुरु महाराज जी ने सब से फरमाया कि हमें प्यास लगी है तभी सभी भक्त जन
पानी का गिलास भर कर ले आये| जब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि जिसके हाथ
पवित्र है वहीं आगे आये तब एक लड़का आगे आया जब उसने श्री गुरु महाराज जी को पानी
दिया तो उसके हाथ बड़े ही कोमल थे| श्री गुरु महाराज जी ने पूछा कि तुम्हारे हथ तो
बड़े ही कोमल है क्या तुम गुरु घर की सेवा करते हो तब उस लड़के ने फरमाया कि मुझे
सेवा करने की जरुरत ही नहीं पड़ती मैं तो सेवा करवाता हूँ| तब श्री गुरु महाराज जी
ने उसी समय पानी का गिलास नीचे गिरा दिया और वचन फरमाएकि जो सेवा नहीं करता उसके
हाथ पवित्र कैसे हो सकते है|
****
आनंद भया मेरी माये
एक दिन एक सेवक ने श्री चरणों में विनय की कि हे सच्चे पातशाह
मुझे शब्द गाना नहीं आता आप कृपा करके मुझे शब्द सिखवा दे ताकि मैं भी सादग संगत
में आकर शब्द का गायन कर सकूँ| तब श्री गुरु महाराज जी ने अपने एक सिख की सेवा
लगाईं कि तुमने इस भक्त को शब्द सिखाना है अब जिस समय उस सिख ने सेवक को शब्द
सिखाने के लिए बुलाया वह सेवक उसी समय पहुँच गया अब पहले दिन उस सिख ने सेवक को
शब्द सिखाया| उस सेवक ने शब्द को सिखा और वहाँ से चला गया और फिर दोबारा शब्द
सिखने के लिए नहीं आया| कुछ समय के पश्चात् श्री गुरु महाराज जी ने उस सिख से पूछा
कि वह सेवक जो शब्द सिखना चाहता था| उसने कितना शब्द सिख लिया है तब उस सिख ने
श्री चरणों में विनय की कि स्वामी जी वह तो केवल एक ही दिन शब्द सिखाने आया उस के
बाद वह आया ही नहीं| तब श्री गुरु महाराज जी ने उस सेवक को बुलवाया और उससे पूछा
कि तुम तो शब्द सिखना चाहते थे लेकिन तुम तो केवल एक ही दिन शब्द सिखने आये उसके
बाद तो आये ही नहीं| तब उस सेवक ने श्री चरणों में विनय की कि हे सच्चे पातशाह जो
शब्द मैंने पहले दिन सुना उसे सुनने के बाद मुझे कुछ शब्द याद करने कि जरुरत ही
नहीं पड़ी| तब श्री गुरु महाराज जी ने पूछा कि वो कौन सा शब्द थे तब सेवक के कहा कि
“आनंद
भया मेरी माये सतगुरु मैं पाया” जब मैंने सतगुरु को पा लिया अब और कुछ पाना बाकी ही नहीं रह
गया|
****
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ज्योति ज्योत समाना
श्री
गुरु गोबिंद सिंह जी दोनों समय दीवान लगाकर संगत को उपदेश देकर निहाल करते थे| इस
समय दो युवक पठान भी दीवान में उपस्थित होकर श्रद्धा भाव से गुरु जी के वचन सुनते|
एक दिन शाम के समय जब गुरु जी अपने तम्बू में विश्राम कर रहे थे तो इनमें से एक
पठान गुलखां ने समय ताड़ कर आप जी के पेट में कटार के दो वार कर दिए| गुरु
जी ने शीघ्र ही अपने आप को सँभालते हुए उसका सिर एक वार से धड़ से अलग कर दिया| गुलखां
का साथी रुस्तमखां जो तम्बू से बाहर खड़ा था उसे पहरेदारों ने मार दिया| इसके
पश्चात सिंघो ने नादेड़ नगर से जराह को बुलाकर आपके जख्मों की मरहम पट्टी कराई| तथा
रोज ही आप की आरोग्यता के लिए बाणी का पाठ व अरदास करने लगे|
जब गुरु जी के जख्म गहरे होने के कारण ठीक होने की आशा न रही तो सिहों ने बेबस
होकर प्रार्थना की कि सच्चे पातशाह हमे आप किस के सहारे छोड़कर सच्च खंड की तयारी
कर रह हो? आपके पीछे हमारी रखवाली कौन करेगा| सिहों
की प्रार्थना सुनकर गुरु जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश करवाया तथा पांच
तैयार सिंह हजूरी में खड़े करके आपने तीन परिक्रमा करके पांच पैसे व नारियल श्री
गुरु ग्रंथ साहिब के आगे रखकर माथा टेक कर वचन किया कि आज से देहधारी गुरु का
सिलसिला समाप्त करके इस वाणी को आत्म प्रकाश करने वाली बड़े गुरु साहिब तथा प्रभु
के भक्तों ने उच्चारण की हुई है,
उसे गुरु नानक साहिब जी की गुरु गद्दी
पर स्थापित कर दिया| हमारे
बाद यह गुरु युगों-युग तक अटल रहेगा| जिसने हमारे आत्मिक
दर्शन करने हों, वह
इस शब्द गुरु के दर्शन करे और जिसने हमारे पांच भूतक शरीर के दर्शन करने हों, तो वह हमारे तैयार
बर तैयार खालसे के दर्शन करे| आप जी ने खालसा पंथ को श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के सम्मुख
करके यह वचन किया|
दोहरा ||
गुरु ग्रंथ जी
मानिओ प्रगट गुरां की देह ||
जो प्रभ को मिलबो
चहै खोज शबद में लेह ||
गुरु
स्थापना की मर्यादा करके गुरु जी ने सिहों को हुक्म दिया कि हमारा अंगीठा तैयार
करो तथा उसके चारों तरफ कनात लगा दो| सिखों
ने वैसा ही किया|
गुरु जी ने सिहों को बड़ा उदास देखा और
प्रेम से वचन किया हे प्यारे सिंहो अकाल पुरख के नियम है कि यह अस्थुल शरीर मिलते
और बिछुड़ते रहते है, इनका
प्यार कभी नहीं निभता| श्री
गुरु ग्रंथ साहिब की बाणी हमारा ह्रदय है| रात दिन इनके मिलने
से प्रभु के गुणों को अपने मन में जोड़ना| इनकी उपस्थिति में
पांच सिंह जो हुक्म करेगें, उसे
गुरु का हुक्म मानकर स्वीकार करना|
गुरबाणी का पाठ और
शास्त्रों का अभ्यास करना|
गुरु साहिब का इतिहास
सुनना| पांच रहितवान सिहों को मेरा रूप समझना| जो
श्रद्धा से पांच सिहों से अरदास कराएगा, उसके
सभी मनोरथ पूरे होंगे| सिहों को धैर्य उपदेश देकर जब आधी रात बीत गई तो आप जी ने पहले "जपुजी साहिब" फिर –
"हरि
हरि जन दुइि ऐक हैं ||
बिब बिचार किछु
नाहि ||
जल ते उपज तरंगि
ज्यों जल ही बिखै समाहि ||”
आदि
पांच दोहरे पढ़कर अरदास की और इसके पश्चात मखमल का कमर कस्सा करके किरपान, धनुष, तीर
तथा हाथ में बंदूक पकड़कर सिक्ख वीरो को हाथ जोड़कर "वाहिगुरू जी का
खालसा || वाहिगुरू
जी की फतहि ||" बुलाई|
इस समय सिक्ख संगत जल
भरे नेत्रों से आपको नमस्कार करने लगी, तो
उनको आपके शरीर की कोई छुह प्राप्त न हुई| मगर
शरीर करके आपके दर्शन सबको हो रहे थे| इस
कौतक को अनुभव करके सब संगत ने हाथ जोड़कर धरती पर शीश रखकर आप जी को नमस्कार किया| अन्तिम समय आप जी ने अपने सिहों को कहा कि अब तुम सब अपने -2 घर
चले जाना और जथेदार संतोख सिंह को आज्ञा की कि तुम यहाँ रहकर हमारे स्थान की सेवा
करना, जो धन आ जाए उससे लंगर चलाना|
यह वचन करके आप जी कनात अन्दर चले गए और चिखा ऊपर चौकड़ा मारकर बैठ गए| इसके
पश्चात चिखा को अग्नि प्रचंड करा कर ज्योति में ज्योत मिलाकर अनंत में लीन हो गए|
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