(परमसंत दया बाई जी)
v प्रेम पुँज प्रगटै जहाँ, तहाँ प्रगट हरि होय |
‘दया’
दया करि डेट हैं, श्री दरशन सोय ||
अर्थात जिस ह्रदय में अत्यधिक प्रेम प्रकट होता है
वहन भगवान् स्वयं प्रकट हो जाते है| संत दयाबाई जी कहती हैं की दया से उसे श्री
दर्शन हो जाते है परन्तु आवश्यकता है केवल यथार्थ प्रेम की|
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