Wednesday, April 29, 2020

श्रीमद्भागवद्गीता जी (दोहावली)

(श्रीमद्भागवद्गीता जी)

 

v  प्रेमी के मैं कर बसहु, यह तो मेरा असूल |

   चार मुक्ति दूँ ब्याज में, दे न सकूँ मूल ||

भगवान कहते हैं मैं सदा प्रेमियों के हाथों में बसता हूँ अर्थात उनके अधीन हूँ, वह जहाँ चाहे मुझे ले जाए, मेरी बागडोर उनके हाथ में है| उनके प्रेम के बदले चारों मुक्ति तो उनको ब्याज में दे देता हूँ और उसका मूल तो दिया नही जाता| वह चार मुक्तियाँ है-

(1)सलोक मुक्ति- भगवान के लोक में प्रवेश करना |

(2)   सामीप मुक्ति- भगवान के समीप पहुँच जाना |

(3)   सारूप मुक्ति-  भगवान के रूप के साक्षात् दर्शन कर लेना |

(4)   सायुज मुक्ति-  भगवान के ध्यान में लीन हो जाना |

 

v पंचाली कउ राज सभा मैं राम नाम सुधि आई|

ता को दुःख हरिओ करुना मैं अपनी पैज बढाई||

अर्थात कौरवों की राजसभा में जब द्रौपदी ने प्रभु नाम का सुमिरन किया, तो करुणामय प्रभु ने अपने विरद की लाज रखते हुए उसके दुःख का तुरंत हरण किया|

 

v मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥                        

जिनकी कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ॥

 

v आत्मौपम्येन सर्वत्र, समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः।।

"ऐ अर्जुन! जो उपासक प्रत्येक प्राणी के सुख व दुःख को अपना सुख वा दुःख जानता है और सभी में एक समान आदर और प्रेम रखता है किसी प्राणी को सताता नहीं वह योगी मेरा परम भक्त हैं।''

 

v "समोऽहं सर्वभूतेषु, न में द्वेष्योऽस्ति न प्रियः'' 9/29

ऐ अर्जुन! मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ-मुझे न कोई प्रिय है और न अप्रिय है। इसी प्रकार सच्चा भक्त भी न किसी वस्तु या व्यक्ति से राग रखता है और न द्वेष ही। संसार मे समभाव से विचरण करने वाले पुरुष के अन्दर द्वन्द्व भावनाओं को कोई स्थान नहीं। ऐसा साधक ही आत्मा के साक्षात्कार का उत्तम अधिकारी बन सकता है।

 

v सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच: ।।

सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्याग कर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर ।।

 

v यौवनम, धन संपत्ति, प्रभुतंम, अविवेकता!

   एकमहि अनर्थय: किम यत्र चतुष्टयम:!!

यौवन ,धन संपत्ति ,सत्ता(प्द)) हो साथ मे अविवेकता हो तो इनमें से एक ही अनर्थ के लिए पर्याप्त है! और जहाँ चारों चीज़ हो वहाँ क्या परिणाम होगा !!

 

v अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥

हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमें अनन्यचित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य-निरंतर मुझमें युक्त हुए योगी के लिये मैं सुलभ हूँ अर्थात् उसे सहज हि प्राप्त हो जाता हूँ ।

v  यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत |

   अभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मान सृजाम्यहम् ||

अर्थात जब-2 धर्म की हानी होगी, जब जब धर्म गिरेगा तो मैं अवतार लूँगा| युग-2 में मेरा अवतार होगा| भगवान् श्री कृष्ण का जन्म केवल द्वापर में ही हुआ है| ऐसा मानकर हम चले और अब उनका अस्तित्व नही है तो यह हमारी महान भूल होगी| भगवान श्री कृष्ण तो हर समय है लेकिन उनको देखने के लिए प्रेम भरी दृष्टि की आवश्यकता है |

 

v अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।

   नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।।

अर्थः-विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्य के लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है। श्रद्धाहीन की बुद्धि संशयात्मक होने के कारण चंचल हो जाती है। वह न तो इस लोक में शान्ति से रहता है और न परलोक में ही उसे सुख-शान्ति की प्राप्ति होती है।

 

v युक्ताहारविहारस्य   युक्तचेष्टस्य   कर्मसु ।
  युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

अर्थः-""दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।''

 

v  पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।

   तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

भावार्थ : जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूँ॥

 

v मैंया मोहि जनि दोष लगावे, बार -2 यह मोहि बुलावे|

हाथ जोड़ कहे प्रभु आइयो, खीर खाँड का भोजन पियो||

तब मैं रह न सकूँ, उठ धाऊँ, या को राँधा भोजन खाऊ|

सुनत ही गढ़ मृदु हरी के बैना, खुल गये विप्र रोय के नैना||

हे मैंया, अब आप ही पंडित जी से पूछ लीजिए कि वे स्वयं तो  मुझे हाथ जोड़कर बुलाते है तथा जब मैं नहीं आता तो मेरी मिन्नतें करने लगते है और बड़ी श्रद्धा से बुलाते हैं| बार-2 खीर खाने का आग्रह करते है| आपके भय से मैं इनके पास जब नहीं आता तो फिर ब्राह्मण देवता पुन: मुझे भोग लगाने के लिए विवश करते है| इस पर जब मैं इनकी प्रार्थना स्वीकार कर खीर पूड़ी इत्यादि खाने लगता हूँ और ये प्रत्यक्ष में मुझे खाते देखते हैं तब आपको बुलाते हैं और चिल्लाने लगते हैं| भगवान श्री कृष्ण जी के मुख से यह वचन सुनकर ब्राह्मण देवता की आँखे खुल गई और अब वे मन-ही-मन अपनी करनी पर अति लज्जित हुए|

 

v कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणौव प्रलीयते ।

सुखं दुः खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।।

भगवान कहते हैं कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता हैं वैसा उसको फल मिल जाता हैं।

 

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