Thursday, April 30, 2020

श्री गुरु अमरदास जी


जीवन परिचय श्री गुरु अमरदास जी
जन्म    : मई 5, 1479  गाव बासरके, जिला अमृतसर
पिता        : भाई तेज भान जी
माता        : माता लखमी जी
पत्नी         : माता मनसा देवी
साहिबजादे    : बाबा मोहन, बाबा मोहरी , बीबी दानी, बीबी भानी
जोति जोत    : सितम्बर 1, 1574

गुरु का दर्शन
आप की आयु उस समय 61 साल थी जब आप गुरु अंगद देव जी कि सेवा में हाजिर हुए| श्री गुरु अंगद साहिब जी की सुपुत्री बीबी अमरो श्री अमरदास जी के भतीजे से विवाहित थी| आप ने बीबी अमरो जी को कहा की पुत्री मुझे अपने पिता गुरु के पास ले चलो| मैं उनके दर्शन करके अपना जीवन सफल करना चाहता हूँ| पिता समान वृद्ध श्री अमरदास जी की बात को सुनकर बीबी जी अपने घर वालो से आज्ञा लेकर आप को गाड़ी में बिठाकर खडूर साहिब ले गई| गुरु अंगद देव जी ने सुपुत्री से कुशल मंगल पूछा और कहा कि बेटा! जिनको साथ लेकर आई हो, उनको अलग क्यों बिठाकर आई हो| गुरु जी उन्हें अपना सम्बन्धी जानकर आगे आकर मिले| पर अमरदास जी कहने लगे कि मैं आपका सिक्ख बनने आया हूँ| आप मुझे उपदेश देकर अपना सिक्ख बनाए| लंगर के तैयार होते ही आपको लंगर वाले स्थान पर ले गये| लंगर में मॉस भी था| अमरदास जी मन ही मन में सोचने लगे मैं तो कभी मांस नहीं खाता, अगर खा लिया तो प्रण टूट जायेगा| लेकिन अगर वापिस कर दिया तो गुरु अपना अनादर समझकर नाराज़ हो जायेगें| हाँ! अगर ये गुरु अंतर्यामी हैं तो अपने आप ही मेरे दिल की बात जान लेंगे और लांगरी को मेरे आगे मांस रखने को मना कर देंगे| अभी आप के मन में ऐसा विचार आ ही रहा था कि श्री गुरु अंगद देव जी ने लंगर बाँटने वाले को इनके आगे मांस रखने को मना कर दिया और फरमाया कि यह वैष्णव भोजन ही करते हैं| इतना सुनते ही अमरदास जी की खुशी का ठिकाना ना रहा और मन ही मन कहने लगे गुरु जी अंतर्यामी, घट-घट की जानने वाले हैं इनको ही गुरु धारण करना चहिये|
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गुरु गद्दी मिलना
गुरु अमरदास जी बचपन से ही परमार्थी ख्याल के थे| कहते है उन्होंने 12 बारी नंगे पाँव चलकर हरिद्वार में गंगा-स्नान किया था| साधू और फकीरों के साथ बड़ा प्रेम था| मगर 62 वर्ष की उम्र हो चुकी थी, किसी को गुरु धारण नहीं किया था| फकीरों और संतो के मार्ग में जो निगुरे होते है वे पवित्र नहीं समझे जाते| एक बार जब हरिद्वार को जा रहे थे तो एक ब्रह्मचारी से भेंट हो गई| ब्रह्मचारी ने इनके चेहरे के लाल को देखकर कहा –आप को तो राजा होना चाहिए| अमरदास जी ने उनकी बातों से खुश होकर कुछ दान देना चाहा| उसने कहा कि आपका गुरु कौन है? अमरदास जी बोले अब तक गुरु धारण करने का मौका नहीं मिला| तब ब्रह्मचारी ने कहा कि मैं ऐसे आदमी के हाथ से दान नहीं लूँगा, तुमको गुरु धारण करना चाहिए| यही वजह है कि अभी तक तुम्हारे रूहानी संस्कारो ने पलटा नहीं खाया| ब्रह्मचारी की इन बातों से अमरदास जी के रूहानी संस्कार जाग उठे| मन में चिंता जाग उठी| ब्रहमचारी ने कहा जिसके वचन सुनकर तुमको सुकून आवे, विश्वास आवे उसको जाकर गुरु धारण करो| फिर मैं जब कभी मिलूँगा तभी आप के हाथ से दान कबूल करूँगा| ब्रह्मचारी तो यह कहकर अपनी राह चला गया| अमरदास जी को गुरु धारण करने का ख्याल हुआ| उस वक़्त हिन्दू साधू और मुस्लिम फ़कीर बहुत थे| वे सब के पास गए, श्रद्धा और भक्ति से मिले मगर ब्रह्मचारी की बताई हुई कसौटी पर कोई न चढ़ा| आखिर उदास होकर घर वापिस चले आये, लेकिन चिंता दूर नहीं हुई| मगर कुदरत का करिश्मा अलग ही होता है जिसकी तलाश बाहर की जाती है उसका सामान अक्सर घर में ही मिल जाता है| अमरदास जी का एक भतीजा गुरु अंगद साहिब जी की सुपुत्री से ब्याहा हुआ था| उस लड़की का नियम था कि जब सब लोग सोये होते थे, वह नहा-धोकर गुरुनानक जी की अमृत वाणी का प्रेम के साथ पाठ किया करती थी| उसके शब्द की भनक अमरदास जी के कानो में पड़ी| आहा! इस वाणी में तो अमृत का स्वाद है| वे शौंक से और प्रेम से दो-चार दिन सुनते रहे आखिर उनसे रहा न गया| लड़की के पास जाकर बोले बेटी! यह किस महापुरुष की वाणी है? लड़की ने उत्तर दिया यह शब्द गुरुनानक देव  जी के है जो जगत को तारने आये थे| मेरे पिता जी गुरु अंगद देव जी अब उनकी गद्दी पर है और मेरी माता ने यह वाणी मुझको याद कराई थी| अमरदास जी ने कहा –बेटी! मुझको भी तेरे पिता की दर्शन की अभिलाषा है| वह बोली वँहा तो हमेशा दरबार लगा रहता है| धर्म के भूखे प्यासे हजारो की तादाद में वहाँ आते है| आप जल्दी कीजिये, वक़्त को व्यर्थ खोना अच्छा नहीं, क्या जाने आज और कल के बीच क्या हो जाए? लड़की सच कह रही थी, वक़्त आ चुका था और प्रेरणा कराने वाला मालिक उस लड़की के मुहँ से बोल रहा था| अमरदास जी उसको साथ लेकर गुरु अंगद देव जी के दर्शनों को गए| दर्शन करते ही दिल चरणों की तरफ झुका| गुरु अंगद देव जी ने सम्बन्धी जानकर सम्मान किया| मगर इस सिलसिले में जो वचन उनकी जुबान से निकले| वे तीर का काम कर गए और अमरदास जी के कलेजे के पार हो गए| अमरदास जी गुरु अंगद देव जी के चेले हो गए कि फिर वापिस घर का रुख नहीं किया और गुरु दरबार में रहकर पूरे 12 वर्ष तक निस्वार्थ प्रेम से गुरु की सेवा करते रहे और एक पल के लिए भी सेवा से दूर नहीं हुए जिस प्रेम से और जिस सच्चाई से ये गुरु की सेवा करते थे उसकी मिसाल वे आप ही थे| कोई कहाँ तक बयान  करे, अमरदास जी ने रात-दिन गुरु की सेवा की| उनका यह नियम था कि आधी रात को उठाकर चार कोस के फासले से एक गागर पानी की नदी से भर कर लाते थे और गुरु अंगद जी को स्नान कराते थे| अमरदास जी का अदब इस कदर था कि दरिया पर जाते वक़्त उलटे पाँव चलते थे ताकि पीठ फेरने की बेअदबी न हो| दिन भर लंगर खाने में सेवा में व्यतीत होता था जब गुरु साहिब आरामगृह में जाते थे तब ये भी थोड़ी देर के लिए बैठे–बैठे आराम कर लेते थे| यह बारह बरस तक एक दम इनका नियम बन गया था| एक मौके का जिक्र है| सर्दियों के दिन थे, रात सख्त अँधेरी थी, हाथ को हाथ नहीं सूझता था और मूसलाधार बारिश हो रही थी| नियमानुसार आंधी रात के वक़्त ये उठे, भला सेवा में कैसे फर्क आवे| सर्दी से हाथ-पाँव ठिठुर रहे थे| किसी तरह हिलते-कांपते हुए दरिया के किनारे पर पहुँचे| बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए आखिरकर इन्होने किसी तरह गागर भर ली और वँहा से चले| अमरदास जी के दिल में गुरु के चरणों का प्रेम था और गुरु महाराज जी की भी यह आखिरी कसौटी थी| गागर सिर पर उठाए जब गुरु साहिब के घर के नजदीक पहुँचे उस वक़्त बारिश तो थम गई थी मगर गड्डे, खेत, मैदान सब पानी से भर गए थे| वहाँ एक जुलाहे का मकान था| उसके नजदीक पाँव डगमगाया अमरदास जी एक गड्डे में गिर पड़े| मगर उन्होंने गागर को सम्भाल लिया| क्योंकि वह गुरु की खिदमत की चीज थी| धमाके की आवाज़ सुनकर जुलाहे ने अपनी पत्नी से कहा, ऐसा मालूम होता है कि बाहर कोई गिर पड़ा है ऐसे अँधेरे में कौन उठा होगा? वह बोली अनाथ अमरु बेचारे के सिवाय दूसरा कौन उठ सकता है| वही गरीब रोज व्यास नदी से पानी भरकर लाता है वो ही गिरा होगा| जुलाहे की बात गुरु अंगद देव जी के कानो तक पहुंची| उस वक़्त तो कुछ न बोले, मगर चेले की खिदमत से निहायत खुश हुए| यहाँ तक की आँखों में प्रेम के आंसू खुद बखुद टपकने लगे| शौंक के साथ स्नान किया| जब दरबार लगा और सब लोग दर्शन को हाजिर हुए| गुरु साहिब जी ने कहा –जिस जुलाहे ने अमरदास जी की शान में नामुनासिब बातें कही है उसको हाजिर करो| वह डरती कांपती हुई आई| गुरु साहिब जी ने कहा बाई! आज प्रातःकाल तूने हमारे प्रेमी अमरदास जी के बारे में क्या कहा था? ड़र के मारे जुलाहे के चहरे का रंग उड़ गया| गुरु जी ने फरमाया –खोंफ न कर, जो कुछ तूने कहा सच–सच सुना दे, मैं उसको सुनना चाहता हूँ| उस समय अमरदास जी वहां उपस्थित नही थे| जुलाही बोली –महाराज! हम गरीब लोग है, हमको बात बताना भी नहीं आता| आज सवेरे आपका चेला हमारी खंड में गिर पड़ा तो मैंने अपने पति के पूछने पर यह कहा कि सिवाय अनाथ अमरु के दूसरा कौन इस वक़्त उठ सकता है? वो ही गरीब रोज ब्यास नदी से पानी लाया करता है, वही गिरा होगा| महाराज बात सिर्फ इतनी थी अब आप चाहे तो मुझे सजा दे सकते है| यह बात अभी खत्म ही हुई थी कि अमरदास जी आ पहुँचे| गुरु अंगद जी खुश होकर सिंहासन से उठे और आँखों से प्रेम का जल बरसाते हुए उस सभा के बीच अमरदास जी को अपनी छाती से लगा लिया और गदगद वाणी से सभा में सब को सुना कर कहा –सुनो! यह अमरु नहीं है, गुरु अमरदास है| यह अनाथ नहीं है, अनाथो का नाथ है, यह गरीब नहीं है, इसके पास परमार्थ का कीमती खज़ाना है| यह बेचारा नहीं है, यह लावारिसो का वारिस है, बेकसों का दस्तगीर है| उसी दिन गुरु अंगद देव जी ने गुरु अमरदास जी को अपनी गद्दी बक्श दी| गुरु अंगद देव जी ने अपना अन्तिम समय जानकर संगत को प्रगट कर दिया कि अब अपना शरीर त्यागना चाहते हैं| आपके यह वचन सुनकर आस पास की संगत इक्कठी हो गई और खडूर साहिब अन्तिम दर्शनों के लिए पहुँच गई| श्री गुरु अंगद देव जी ने इसके पश्चात एक सेवादार को भेजकर श्री अमर दास जी को खडूर साहिब बुला लिया| श्री अमर दास जी के आने पर गुरु अंगद देव जी ने सेवादारो को आज्ञा दी कि इनको स्नान कराओ और नए वस्त्र पहनाकर हमरे पास ले आओ| हमारे दोनों सुपुत्रो और संगत को भी बुला लाओ| इस तरह जब दीवान सज गया तो गुरु अंगद देव जी ने श्री अमर दास जी को सम्बोधित करके कहा - हे प्यारे पुरुष श्री अमर दास जी! हमे अकालपुरुख का बुलावा आ गया है| हमने अपना शरीर त्याग कर बाबा जी के चरणों में जल्दी ही जा विराजना है| आपने गुरु नानक जी की चलाई हुई मर्यादा को कायम रखना है| यह वचन कहकर आप जी ने 26 मार्च, 1552 को पांच पैसे और नारियल श्री अमर दास जी के आगे रखकर माथा टेक दिया और बाबा बुड्डा जी की आज्ञा अनुसार आप जी के मस्तक पर गुरुगद्दी का तिलक लगा दिया| इसके पश्चात गुरु अंगद देव जी ने तीन परिक्रमा की और श्री अमर दास जी को अपने सिंघासन पर सुशोभित करके पहले आपने नमस्कार किया फिर सब सिक्खों और साहिबजादो को भी ऐसा करने को कहा| अब यह मेरा रूप हैं| मेरे और इनमे कोई भेद नहीं है| गुरु जी का वचन मानकर सारी संगत ने माथा टेका|
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भला जी और भुला जी
श्री गुरु अमरदास जी ने वृद्धावस्था में बारह वर्ष तक श्री सतगुरु देव जी  की सेवा की थी| अन्य सेवा-कार्य के साथ वे गुरुदेव के स्नान के लिए जल भरकर भी लाया करते थे| अहंकार उनमे नाम का  भी नहीं था| वे दीनता की जीवान्त मूर्ति थे| जो भी सेवा कार्य करते, उसमे हार्दिक प्रेम एवम्  अपूर्व श्रद्धा –विश्वास की झलक होती थी| वे अत्यंत मित भाषी थे| उनके मुख से केवल ये दो शब्द ही निकलते थे भला जी और भूला जी| जब श्री गुरुदेव उन्हें कोई काम करने का आदेश देते, तो वे हाथ जोडकर कर कहते भला जी अर्थात् सत्यवचन और जब गुरुदेव पूछते कि अमुक कार्य उस तरह क्यों किया? इस तरह क्यों नहीं किया? तो वे अत्यंत विनीत भाव से क्षमा-याचना के स्वर में कहते –भुल्ला जी अर्थात् भूल हो गई| उनका ऐसा अप्रतिम सेवाभाव सद्गुरुदेव जी की अपार प्रसन्नता का कारण बना| वे तीसरी पादशाही जी के स्वरुप में श्री गुरु अमरदास जी के पावन नाम से सुशोभित हुए |
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लगड़े की टांग ठीक करनी
तलवंडी का रहने वाला एक लंगड़ा खत्री सिक्ख गुरु जी के भोजन के लिए बड़ी श्रद्धा के साथ दही लाता था| एक दिन रास्ते में गाँव के चौधरी ने उसकी बैसाखी छीन ली और मजाक उड़ाने लगा कि रोज दुखी होकर अपने गुरु के लिए दही लेकर जाता है, तेरा गुरु तेरी टांग नहीं ठीक कर सकता?  ने कहा मेरा गुरु एक क्षण में सब कुछ ठीक कर सकता है| उनकी अपनी इच्छा है, वे ठीक भी कर सकते है, और नहीं भी| मैंने खुद उनको कुछ नहीं कहना| अपनी बैसाखी लेकर भगत सिक्ख वहाँ से निकल पड़ा| वहाँ गुरु अमरदास जी थाल रखकर प्रेमी कि प्रतीक्षा कर रहें थे| दही लेकर गुरु जी ने भोजन खाया और लेट पहुँचने का कारण भी पूछा| सिक्ख ने सारी बात गुरु जी के आगे रख दी कि किस प्रकार रास्ते में आते हुए चौधरी ने उसकी बैसाखी छीन ली और कहा कि अगर तेरा गुरु समर्थ है तो तेरी टांग क्यों नहीं ठीक कर सकता? इतना सुनते ही गुरु जी उस सिक्ख से कहने लगे कि शाह हुसैन के पास चला जा और जाकर कह, मुझे गुरु जी ने यहाँ  आपके पास टांग ठीक कराने के लिए भेजा है| गुरु जी का ऐसा वचन आते ही गुरुसिक्ख उसी ओर ही चल दिया जहाँ गुरु जी ने भेजा था| शाह हुसैन जी के पास पहुंचकर सिक्ख ने वहाँ आने का कारण बताया कि आप मेरी लंगडी टांग ठीक कर दे| हुसैन ने एकदम हाथ में मोटा डंडा उठा लिया और गुस्से से कहने लगा कि यहाँ से भाग जा नहीं तो तेरी दूसरी टांग भी तोड़ दूँगा व लंगड़ा बना दूँगा| वह सिक्ख डंडे की मार से डरता हुआ जल्दी से उठकर भाग पड़ा| भागते-२ उसकी दूसरी टांग भी ठीक हो गई| तब वह पीछे मुड़कर हुसैन जी के चरणों में गिर पड़ा और धन्यवाद करने लगा| हुसैन जी कहने लगे कि करने वाले गुरु जी आप है, मेरी तरफ से गुरु जी को नमस्कार करना| गुरु जी कि ऐसी रहमत को देखकर हँसते-२ गुरसिक्ख गुरु घर की ओर चल दिया|
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पदम् रेखा बताने वाले को पंडित को वरदान
हरिद्वार से 20वी तीर्थ यात्रा करके पंडित दुर्गा प्रसाद ने जब गुरु अमरदास जी के पाँव में पदम देखकर कहा था कि आपके शीश पर जल्दी ही छत्र झूलेगा, जब उसने यह सुना कि आप गुरुगद्दी पर आसीन हुए है तो अपना मुँह माँगा वरदान लेने के लिए गुरु अमरदास जी के पास आये| उन्होंने गुरु जी को अपना वरदान पूरा करने की मांग की| गुरु जी कहा, हम अपना दिया हुआ वचन अवश्य पूरा करेंगे, जो मांगना है मांग लीजिए| पंडित ने खुश होकर कहा, महाराज अगर मैं संसारी सुख मांगूगा तो नरको का भागी बनूँगा और अगर परलोक का सुख माँग लूँगा तो यहाँ संसार में गरीबी के दिन काट कर दुखी रहूँगा| इसलिए आप मुझे दोनों लोकों के सुख वरदान में दीजिए| आप तो समर्थ है| गुरु जी उसकी बुद्धिमता पर बहुत प्रसन्न हुए और हँस कर वचन किया अच्छा पंडित जी आपको दोनों लोको का सुख प्राप्त होगा| आप यहाँ भी सांसारिक सुख भोगोगे और परलोक में भी बैकुंठ धाम में निवास करोगे| इस प्रकार गुरु जी की महिमा गाता हुआ वह अपने घर को चल दिया|
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शेखों को उनके किए हुए फल
मुग़ल बादशाह के समय दिल्ली व लाहौर के रास्ते में व्यास नदी से पार होने के लिए गोइंदवाल का पत्तन बहुत प्रसिद्ध था| बड़ी -2 सराय शाही सेनाओ के लिए यहाँ बनी हुई थी| यहाँ कुछ शेखों के घर भी थे जोकि गुरु के सिक्खों से सदैव नोक झोक लगाईं रखते थे| वे पानी के घड़े गुलेले मार कर तोड़ देते थे व सिक्ख स्त्रियों को भला बुरा भी कहते थे| जब गुरु जी को यह बात पता लगी तो कहने लगे, करतार पुरख आप  ही इनको बंद करेंगे, आप शांत रहें| कुछ दिनों में पठान सैनिकों का दल वहाँ उतरा| उस रात तूफ़ान के कारण खूब उथल पुथल हुई, जिस कारण शेखों ने पठानों की खच्चर घेर ली| सुबह जब पठानों ने अपनी खच्चर को गुम पाया तो ढूँढना शुरू कर दिया| वह खच्चर शेखों के घर में से निकली| उन्होंने शेखों पर चोरी का इलजाम लगाकर खूब मारा और उनके घर भी लूट लिए| जब यह बात गुरु जी को बताई गये तो आप ने वचन किया, जो निरवैर पुरुष से सीना जोरी करता है, वह आप ही दुःख पाता है| इस प्रकार गुरुसिक्खों को तंग करने की शेखों को अपने आप ही सजा मिल गई|
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काबुल की एक पति व्रता माई
बाउली की कार सेवा में भाग लेने के लिए सिक्ख बड़े जोश के साथ दूर दूर से आने लगे| इस तरह काबुल में एक प्रेमी सिक्ख की पति व्रता स्त्री को पता लगा| वह प्रातः काबुल से चलकर आती है,  कार सेवा करती और सायंकाल काबुल पहुँच जाती| कुछ सिक्खों ने माई को सेवा करते हुए हाथ से भी संकेत करते देखा| कुछ दिन इसी तरह ही बीत गये तो एक दिन सिक्खों ने गुरु जी को कहा महाराज एक माई रोज सुबह संगतों के साथ सेवा करती है और रात के समय देखते ही देखते लुप्त हो जाती है, एक और बात भी यह माई करती है कि कार सेवा करती-करती अपना हाथ पलकर पीछे कर लेती है ऐसा लगता है कि जैसे किसी चीज़ को हिला रही हो| हमें समझ नहीं आता कि यह माई कौन है| गुरु अमरदास जी ने माई को अपने पास बुलाया और पूछा कि तुम कहाँ से आती हो? और काम करते-करते हाथ से किस चीज़ को हिलाती हो? माई ने बताया मैं सुबह काबुल से आती हूँ और कार सेवा करके शाम को घर चली जाती हूँ| गुरु जी ने कहाँ यह शक्ति तुम कहाँ से लाई हो माई ने कहाँ महाराज यह शक्ति मैंने अपने पति व्रता धर्म से पाई है| इसी के बल से मैं काबुल से आती हूँ और वापिस चली जाती हूँ| सुबह आते समय मैं अपने छोटे बच्चे को पंघूढ़े में सुला आती हूँ और यहाँ हाथ मारकर पंघूढ़े को हिलाती रहती हूँ| जिससे यह सोया रहता है और खेलता ही रहता है| माई से यह सुनकर सिक्खों ने उसे धन्य माना और गुरु अमरदास जी ने खुश होकर पति पत्नी के परलोक को सुहेला कर दिया|
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भक्ति के प्रकार
भाई खानू, मईया और गोबिंद गुरु अमरदास जी के पास आए| इन्होने प्रार्थना की हमें भक्ति का उपदेश दो ताकि हमारा कल्याण हो जाये| गुरु जी ने कहा भक्ति तीन प्रकार की होती है नवधा, प्रेमा और परा|
नवधा भक्ति :-
1. गुरु जी के वचनों को श्रद्धा सहित सुनकर दिल में बसाना| 
2. कथा कीर्तन के द्वारा परमात्मा के गुन गायन करना| 
3. सत्यनाम का सुमिरन श्वास-२ करना| 
4. परमात्मा व गुरु चरणों का ध्यान करना व सन्तो का चरण धोकर 
   चरणामृत लेना|
5. पवित्र भोजन करना और गुरु निमित सेवा देना|
6. गुरु स्थल पर जा कर नमस्कार करनी और परिकर्मा करनी| 
7. धूप, दीप व फूल माला चढ़ाना| 
8. परमेश्वर को मालिक व खुद को सेवक जानना| 
9. अपने मन को स्थिर रखना| प्रभु के हुकम को अच्छा संयम कर  
   मानना| 
10. पदार्थो की माया छोड़कर सब कुछ प्रभु को जानना|
इस नवधा भक्ति का एक गुण भी धारण हो जाये तो बंदे का उद्धार हो सकता है| मगर सभी गुण धारण करके बंदे का कल्याण हो सकता है| 
प्रेमा भक्ति :-जिस प्रकार वृक्ष का फल पहले हरा होता है, उसका स्वाद भी कड़वा होता है फिर यह खट्टा हो जाता है और फिर वृक्ष से रस लेकर रसीला हो जाता है मीठा बन जाता है| इसी तरह ही प्रेमा भक्ति वाले पुरुष का पहले रोने का जी करता है उसको अपने प्रियतम के दर्शनों की लालसा बढती है| कभी परमेश्वर के गुण गाता है और कभी चुप धारण कर लेता है| इस अवस्था में वह सांवला हो जाता है| जैसे जैसे प्रेम बढता है खाना थोड़ा होता जाता है, रात दिन प्रेम में मस्त रहता है| मुँह का रंग पीला हो जाता है| जब सत्य संग ज्यादा हो जाता है तो पूरण प्रभु को सब जगह देखता है| इस दिशा में मुख का रंग लाल हो जाता है, मन ज्ञानमय हो जाता है|
परा भक्ति :-उच्च अवस्था में पहुँच कर परा भक्ति शुरू होती है| तब पुरुष ब्रहम स्वरुप हो जाता है, यही कल्याण का स्वरुप है| इस प्रकार तीनों ही आनंद अवस्था भक्ति को प्राप्त हुए|
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भाई जग्गे को निहाल करना
एक दिन भाई जग्गा गुरु जी के दर्शन करने आया| उसने प्राथना की सच्चे पादशाह जी मुझे एक दिन जोगी ने बताया कि कल्याण तभी हो सकता है अगर घर-बाहर, स्त्री, पुत्र आदि का त्याग किया जाये| जोकि बंधन है| इसके बाद ही मेरे से उपदेश लेना, मगर मैं किसी भी वस्तु का त्याग नहीं कर पाया| अब आप ही मुझ पर कृपा करे और बताये कि मुक्ति किस तरह मिल सकती है? गुरु जी ने उसका श्रद्धा व प्रेम भाव देखा और फरमाया गुरुसिक्ख गृहस्थ में ही रह कर मुक्ति प्राप्त कर लेता है| गृहस्थ धर्म ही सबसे अच्छा है क्योंकि इसमें वह खुद कमाई करके खाता है और दान करता है और जो साधु ग्रहस्थियो से मांगकर खाता है वह अपने जप तप की कमाई में कमी डाल देता है, ग्रहस्थी जो कि अन्न वस्त्र की सेवा करता है उसकी कमाई से भी हिस्सा ले लेता है| हे भाई जग्गा!
शरीर के साथ संतो की सेवा करना और मन से हरि की भक्ति करना| इस तरह शीघ्र ही कल्याण हो जायेगा| इस प्रकार गुरु जी ने मुक्ति का मार्ग सभी बंधनों को तोड़ कर नहीं अपितु ग्रहस्थ आश्रम में रहते हुए ही मुक्ति को प्राप्त करना बताया|
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मृत राजकुमार को जीवित करना
एक दिन बल्लू आदि सिक्खों ने गुरु जी से विनती की महाराज! अनेक लोग यहाँ दर्शन करने आते है, पर उनके रहने के लिए कोई खुला स्थान नहीं है| इसलिए कोई खुला मकान बनाना चाहिए| यह विनती सुनकर गुरु जी ने बाबा बुड्डा जी व अपने भतीजे सावण मल के साथ पांच सिक्खों को रियासत हरीपुर के राजा के पास भेजा और कहा वहाँ से मकानों के लिए लकड़ी के गठे बांधकर ब्यास नदी के रास्ते से भेजने का प्रबंध करो| सावण मल ने कहा महाराज पहाड़ी लोग गुरु की पूजा करने वाले नहीं है वे मूर्ति पूजक है| लकड़ी खरीदने के लिए बहुत सा धन चाहिए| गुरु जी ने कहा कि अब सब शक्तियाँ ही आपके अधीन होंगी तुम जिस तरह भी चाहोगे उनका प्रयोग करके राजा को गुरु घर का प्रेमी बना लेना फिर वह अपने आप ही आपकी जरूरत को पूरा कर देगा| यह बात कहकर गुरु जी ने अपने हाथ का रुमाल सावण मल को देते हुए कहा कि इसको हाथ में पकड़कर तुम जो कुछ भी चाहोगे वो हो जायेगा| आपकी इच्छा यह रूमाल पूरी करेगा| रूमाल लेकर सावण मल अपने साथ पांच सिक्खों को हरीपुर ले गया| उस दिन एकादशी का व्रत था जिसमे राजा की तरफ से आज्ञा थी कि कोई अन्न को हाथ ना लगाये| परन्तु सावण मल और उसके साथियों ने प्रसाद तैयार करके खाया और आने वाले को भी दिया| राजा को खबर हुई तो उसने अन्न खाने व व्रत ना रखने का कारण पूछा| सावण मल ने कहा गुरु जी का लंगर सदैव ही चलता रहता है| वह किसी भी तरह के भ्रमों में विशवास नहीं रखते| यह उत्तर सुनकर राजा के गुरु एक वैरागी साधु ने कहा इनको कैद कर लो| अपने गुरु के कहने पर राजा ने सावण मल को कैद कर लिया| दूसरे ही दिन राजा के पुत्र को हैजा हो गया और वह मृत्यु को प्राप्त हो गया| मंत्री ने कहा आपने गुरु के निर्दोष सिक्ख को कैद किया है, यह उन्ही के निरादर का फल है जिससे राजकुमार को मौत हासिल हुई है| शीघ्र ही कैद से निकालकर क्षमा मांगो| राजा ने ऐसा ही किया तब सावण मल ने कहा अगर राजा गुरु का सिक्ख बन जाये तो मैं उसके पुत्र को जीवित कर दूँगा| जब राजा को इस बात का पता लगा तो उसने कहा अगर मेरा पुत्र जीवित हो गया तो मैं और मेरा परिवार गुरु जी के सिक्ख बन जायेगें| जब सावण मल को महल में बुलाया गया तब सावण मल ने राजा को कहा आप चुपचाप बैठकर सतनाम का स्मरण करो और रोना धोना बंद कर दो| इसके पश्चात सावण मल ने जपुजी साहिब का पाठ मृत लड़के के पास जाकर करना शुरू कर दिया और गुरु जी के रूमाल का कोना धोकर लड़के के मुँह में डाला और फिर रूमाल पकड़कर उसके सिर पर सत नाम कहते हुए घुमाया तो राजकुमार उठ कर बैठ गया| गुरु जी के ऐसे कौतक को देखकर राजा व रानी सावण मल के चरणों में गिर पड़े| उसने सावण मल को बहुत सा धन और वस्त्र भी भेंट किये| इसके पश्चात सारे रियासत के लोग ही गुरु के सिक्ख बन गये| दो चार दिन तो खुशी में ही बीत गये| तो एक दिन राजा ने सावण मल को यहाँ आने का करण पूछा| सावण मल ने कहा, महाराज ब्यास नदी के किनारे गोइंदवाल नगर में गुरु अमरदास जी के दर्शन करने के लिए दूर-2 से सिक्ख सेवक आते है उनके लिए मकान बनवाने के लिए बहुत सी लकड़ी की जरुरत है राजा ने उसी समय अपने आदमियों को हुकुम दिया कि मकानों में काम आने वाली दियार आदि लकड़ी काटकर उनके बेड़े पर बांधकर ब्यास में तैरा दो| इस प्रकार बहुत सी लकड़ी गोइंदवाल पहुँच गई| उसी समय सावण मल को गुरु जी की बात याद आ गई और ऐसे कौतक को देखकर वह मन ही मन गुरु की उपमा करने लगे|
       गुरु अमरदास जी ने सावण मल को लकड़ी की जरूरत पूरी होने के पश्चात गोइंदवाल वापिस बुलाया| परन्तु सावण मल मन ही मन सोचने लगा अगर मैं चला गया तो गुरु जी मुझसे वह रुमाल ले लेंगे जिससे मृत राजकुमार जीवित हुआ था| इससे मेरी कोई मान्यता नहीं रहेगी| सारी शक्ति वापिस चली जायेगी| अच्छा तो यही रहेगा कि मैं गोइंदवाल ही ना जाऊँ| ऐसा विचार मन में आते ही सावण मल ने गुरु की आज्ञा का उलंघन कर दिया| गुरु जी ने उसकी सारी शक्ति वापिस खींच ली| शक्ति चले जाने से सावण मल बहुत पछताया और अपनी भूल की क्षमा माँगने के लिए गोइंदवाल जाने को तैयार हो गया|
     इस प्रकार गुरु घर का निरादर करके सावण मल शक्तियों से भी हाथ धो बैठा| जिस शक्ति के जाने के भय से वह रियासत को नहीं छोड़ रहा था गुरु जी ने उसके उसी रियासत में बैठे ही वह शक्ति उससे छीन ली और उसके अहंकार को भी तोड़ दिया|
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रानी का पागलपन दूर करना
सावण मल की प्रेरणा से हरीपुर के राजा व रानी गुरु अमरदास जी के दर्शन करने के लिए गोइंदवाल आए| सावण मल ने माथा टेककर गुरु जी से कहा कि महाराज हरिपुर के राजा व रानी आपके दर्शन करने के लिए आये है गुरु जी ने आगे से कहा राजा पहले लंगर से प्रसाद खाकर हमारे पास आए, अगर उसकी रानियाँ भी आना चाहे तो पहले व सफेद वस्त्र पहनकर आए| याद रहे ना ही कोई रंगदार वस्त्र पहने और ना ही कोई मूँह ढ़के| राजा व रानी ने गुरु जी का आज्ञा का पूरी तरह से पालन किया| परन्तु एक रानी ने गुरु जी के पास बैठे हुए एक सिक्ख को देखकर घूँघट निकाल लिया| गुरु जी उसको देखकर कहने लगे ये पागल किसलिए आई है क्या इसको हमारे दर्शन करने अच्छे नहीं लगते? आप जी के ऐसे वचन सुनकर रानी ने अपनी सुध बुध खो ली व चीखे मारती हुई बाहर को भाग गई| यह देखकर राजा बड़ा चिंतित हुआ| गुरु जी ने सावण मल को वह वर शक्ति फिर प्रदान कर दी और कहा कि हरीपुर जाकर गुरु सिखी का प्रचार करो| फिर कभी इस शक्ति का अहंकार ना करना| उसी पागल रानी की शादी गुरु जी ने अपने एक सिक्ख सचन के साथ कर दी जो कि लंगर के लिए लकडियां लाता था| गुरु जी ने अपनी कृपा दृष्टि से पागल रानी को भी ठीक कर दिया|                  
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मिट्टी छानना
एक मुसलमान दरवेश एक बार तीसरी पादशाही श्री गुरु अमरदास जी के दर्शनों को आये तो देखा तो आप भजन में लीन थे| तब वे दरवंश इस प्रतीक्षा में बैठ गए कि जब वे उठेंगे तो वार्तालाप करेंगे| थोड़े समय पश्चात गुरु महाराज जी समाधि से उठे| तब उस दरवंश ने चरणों में नमस्कार किया और पूछा-हजूर! अब तो आप गुरु पदवी के मालिक है क्या अब भी आपको भजन, बंदगी की आवश्यकता है? उत्तर में गुरु महाराज जी ने फ़रमाया –सुनो फ़कीर साहिब, एक कंगाल मनुष्य को मिट्टी छानने की आदत थी| वह कभी किसी भी मार्ग में बैठकर मिट्टी छाना करता था | एक दिन उस मिट्टी से उसे लाल मिला|
     वह लाल को पाकर कंगाल तो न रहा, बल्कि अमीर बन गया, परन्तु मिट्टी छानने के अमल को उसने न छोड़ा| लोगो ने पूछा –भाई! अब तो आप सेठ हो, अब आप मिट्टी को क्यों छानते रहते हो? तब आगे से उसने उत्तर दिया –भाइयो! इस मिट्टी छानने कि बदोलत मुझे लाल मिला है और कंगाल से धनवान बन गया हूँ, इस कारण मुझे मिट्टी छानने से प्यार है| इसी प्रकार दरवेश साहिब! भजन बंदगी के करने से मुझे गद्दी कि बख्शीश हुई है, इसलिए मुझे भजन, बंदगी से प्यार है|
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शिष्यों के मन में संशय
कहते है जब गुरु अमरदास जी को गद्दी का मालिक बना दिया गया तो गुरु अमरदास जी अपने शिष्यों के साथ गोविन्द्वाल की धरती पर जा रहे थे| उस समय शिष्यों के मन में संशय चल रहा था कि इन्होने तो गुरु की सेवा हमारे से भी बाद आकर की है पर इन्हें पहले ही गद्दी का मालिक बना दिया गया| तभी श्री गुरु महाराज जी के चरण रस्ते में एक हड्डी पड़ी थी उस पैर पड़े| चरण पड़ते ही उस हड्डी में से एक व्यक्ति निकला और वह श्री चरणों में गिर गया कहने लगा कि महाराज आपके चरण लगने से मेरा चौरासी का चक्र कट गया| तब उन शिष्यों को विश्वास हो गया कि गुरु अमरदास पूर्ण गुरु है| तब उन्होंने गुरु महारज जी के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी|
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एक माई का पुत्र जीवित करना
श्री गुरु अमरदास जी के समय की बात है गुरु महाराज जी सवेरे-2 अमृत वेले ध्यान पर बैठे थे| तभी एक वृद्ध महिला अपने मृतक बेटे के शरीर को लेकर वही पर (गोविन्दवाल की धरती) आ गई और विलाप करने लगी | श्री गुरु जी ने भाई बल्लू को भेजा कि देख कौन रो रहा है ? तो भाई बल्लू बाहर आया और उस माई से पूछा माई तू क्यों रो रही है? रो मत गुरु महाराज जी सिमरण में विघ्न डलता  है| तब उसने बताया कि मेरा बेटा मर गया| मैं यह अरदास लेकर आई हूँ कि गुरु महाराज जी मेरे बेटे को जीवित कर दे| जब भाई बल्लू ने जाकर गुरु चरणों में यह अरदास रखी तो गुरु महाराज जी ने फरमाया कि जाकर उसे ये कह कि ये तो अकालपुर का भाना है भाने में रह| जो आया है उसे तो जाना ही है| जब बल्लू ने जाकर यह बात कही तो माई रोने लगी की मेरा एक ही बेटा था| मैं तो यही उम्मीद से आई हूँ कि गुरु महाराज जी मेरे बच्चे को जिन्दा कर देंगे| मै तो यहाँ से नहीं जाउंगी| जब बल्लू ने जाकर सारी  बात गुरु अमरदास जी को बताई तो गुरु अमरदास जी ने बल्लू को कहा कि तू जाकर माई को कह कि कल सुबह जब सूरज निकल जाए तब आये| बल्लू ने ऐसा ही किया माई वहाँ से चली गई और सूरज निकलने के पश्चात् श्री गुरु महाराज के चरणों में पहुँची और विनय की महाराज मेरा एक ही बेटा है उसे जीवित कर दो| तब गुरु महाराज जी ने फरमाया कि ये तो अकालपुरख का भाना है जो संसार में आया है उसे एक दिन तो जाना ही है| तब माई ने कहा कि नहीं महाराज मैं तो आपके वचनों को सच माना था| आपने ही कहा था कि सुबह तेरे बच्चे को जीवित कर देंगे|
तब श्री गुरु महाराज जी ने कृपा करके फरमाया कि ठीक है आज के बाद गोइंदवाल की धरती पर कोई भी माँ अपने बच्चे के मरने के विलाप में नहीं रोएगी | किसी भी माँ के जीते जी उसका बच्चा नहीं मरेगा| तब माई ने पूछा कब तक? तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया जो न पूछती तो सदा मदा तक यह रहता| लेकिन अब जब तूने पूछा है जो जब तक हम जिन्दा है तब तक| तब गुरु अमरदास जी ने जल का छिडकाव बच्चे पर किया और फरमाया जप सतनाम श्री वाहेगुरु तब उस लड़के ने मुख से उच्चारण किया कि सतनाम श्री वाहेगुरु और खड़ा हो गया
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जत्थेदार की सेवा
श्री गुरु अमरदास जी के समय की बात है उनका एक शिष्य जो कि नाम से तो जत्थेदार था लेकिन सेवा में बहुत आगे था सबको बड़े ही प्रेम से लंगर खिलाया करता था| एक समय की बात है जत्थेदार बड़े प्रेम से सबको लंगर खिला रहा था लंगर खिलाने के बार उसने सबसे पूछा कि कोई रह तो नहीं गया| तब उसकी नज़र दूर वृक्ष के नीचे बैठे कौड़ी पर पड़ी| तब जत्थेदार ने जाकर उस कौड़ी से पूछा कि तूने लंगर खाया है? तब उस कौड़ी ने कहा कि मुझे तो कौड़ होने के कारण हाथ पैर सब गल चुके है, मैं तो लंगर नहीं खा सकता| तब जत्थेदार ने कहा कि अगर तेरे हाथ काम नहीं करते तो क्या हुआ गुरु ने मुझे तो हाथ दिए है, मैं तुझे  खिला देता हूँ| तब जत्थेदार ने अपने हाथो से कौड़ी को भोजन खिलाया| कौड़ी ने जत्थेदार से पूछा कि आपकी वाणी बड़ी मीठी है आप यहाँ के वासी नहीं हो आप तो कोई रब के बन्दे लगते हो| तब जत्थेदार ने बताया कि मेरे गुरु अमरदास जी है मैं उन्ही का शिष्य हूँ| तब कौड़ी ने कहा कि जब शिष्य इतना मीठा बोलता है तो गुरु कितना प्यारा होगा| उस कौड़ी ने विनय कि मुझे भी अपने गुरु के दर्शनों के लिए ले चलो| कौड़ी ने बताया कि मैं पहले बहुत धनवान था लेकिन कुसंगत की वजह से मेरा सब कुछ लूट गया सगे-सम्बन्धी सभी ने मुझे छोड़ दिया| गलत कामो से मेरा शरीर भी कौड़ से भर गया| हो सकता है कि अब गुरु के दर्शन करके मेरा जीवन सफल हो जाये| तब जत्थेदार ने कहा कि हम तुम्हे गुरु के दर्शनों के लिए ले चलते है| जत्थेदार व उसके साथियों ने कौड़ी को उठा लिया और उसको गुरु अमरदास जी के दर्शनों के लिए ले गए| जब वे गुरु के दरबार में पहुंचे तो जत्थेदार ने कौड़ी को बाहर बिठा दिया क्योंकि उसके शरीर में से दुर्गन्ध आ रही थी| जब जत्थेदार और उसके साथी कौड़ी को बाहर बिठा कर अन्दर दर्शनों के लिए पहुँचे तो जैसे ही गुरु अमरदास जी ने जत्थेदार को आता देखा तो उठ खड़े हुए और जत्थेदार को अपने गले से लगा लिया और फरमाया कि जत्थेदार आज तूने कौड़ी को लंगर नहीं खिलाया तूने मुझे लंगर खिलाया है| आज तूने कौड़ी की सेवा नहीं की मेरी सेवा की है| अब उस कौड़ी को लाये हो तो बाहर क्यों छोड़ दिया? अन्दर लेके आओ| तब जत्थेदार ने कहा कि महाराज उसके शरीर से दुर्गन्ध आ रही है तब गुरु अमरदास जी ने फरमाया की उस कौड़ी को वहां स्नान करवाओ जहाँ पर हम स्नान करते है| जब उस कौड़ी को वहां स्नान करवाया गया तो उसके शरीर का कौड़ खत्म हो गया अब कौड़ी की कंचन जैसी काया और रूप हो गया| जब वह गुरु अमरदास जी के पास आया तो उनके दर्शन कर मन प्रसन्न हो गया| उनके चरणों में गिर गया और कोटि –कोटि धन्यवाद् किया| अमरदास जी ने कहा कि देखो इसका कितना सुन्दर रूप हो गया है आज से इसका नाम हमने मुरारी रखा| गुरु अमरदास जी ने वहाँ पर बैठे सभी लोगो से कहा कि ले आओ भाई किसी के घर में कन्या है तो इसकी शादी करवा देते है| तब एक गुरु सिक्ख ने विनय की महाराज मेरे घर में एक कन्या है जो विवाह योग्य है| उस कन्या को वह सिक्ख ले आया| उसका नाम माधो था| तब गुरु अमरदास जी ने माधो और मुरारी दोनों को आशीर्वाद दिया| माधो की माता लंगर में सेवा कर रही थी तो जब उसे पता चला कि उसकी लड़की का विवाह किसी कौड़ी से हो गया है तो वह गुरु दरबार में दौड़ी चली आई| उसने गुरु अमरदास जी से विनय की महाराज मैंने सुना है कि आपने मेरी कन्या का विवाह किसी कौड़ी से करवा दिया है| तब गुरु अमरदास जी ने उसको मुरारी का रूप दिखाया और कहा कि देख ये अब कौड़ी नहीं रहा इसका रूप कंचन की तरह हो गया है| माधो की माँ ने फिर पूछा कि इसकी जात तो पुछ लेते तब गुरु अमरदास जी ने कहा कि इसकी जात वही है जो हमारी जात है| फिर उसने पूछा कि इसके माता-पिता कौन है? तो गुरु अमरदास जी ने फरमाया कि इसका पिता भी मैं हूँ और माता भी मैं ही हूँ| फिर गुरु अमरदास जी ने माधो और मुरारी को आशीर्वाद दिया और फरमाया कि संसार में जाकर अपना जीवन सफल करो|
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गुरु अमरदास जी की महानता
श्री गुरु अंगद देव जी के सुपुत्र दासू और दातू श्री अमरदास की महिमा दूर-दूर होते देख ईर्ष्या से भर गए| वे गुरुगद्दी संभालने के लिए गोइंदवाल चल पड़े| गुरु साहिब संगत में गद्दी पर विराजमान थे| परन्तु दातू ने बड़े ही गुस्से से गुरु जी की पीठ पर लात मारी, जिसके कारण वह गद्दी से गिर पड़े| दातू अभी कुछ ओर करते, श्री गुरु अमरदास जी दातू का पैर पकड़ कर दबाने लगे और कहने लगे कि मेरा शरीर वृद्ध होने के कारण कठोर है, आप जी के कोमल चरण को चोट न लगी हो| आप मुझे दबाने दें| आप मेरे गुरुदेव के बेटे हैं| मुझे उठकर आप का आदर करना चाहिए था| मुझे माफ करे| मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है| यह कहकर श्री गुरु अमरदास जी अपने निवास स्थान पर आ गए| दातू जी गुरु की गद्दी पर बैठ गए| दूसरे दिन जब कोई सिक्ख दातू जी के पास भेंट लेकर माथा टेकने न गया तो शाम के समय उदास होकर कीमती समान व इकट्ठी माया को खच्चर पर लादकर खडूर को चल पड़े| रास्ते में रात के समय यह सब कुछ चोरों ने लूट लिया| दातू जी को खाली हाथ ही खडूर पहुंचना पड़ा| इसके अतिरिक्त एक बात और हुई कि जो टांग दातू जी ने गुरु जी को मारी थी उस में भी काफी दर्द शुरू हो गया
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सेठ गंगू शाह
सत्पुरुष श्री गुरु अमरदास महाराज जी के समय की बात है|  लाहौर में एक व्यापारी रहता था जो गंगू शाह के नाम से विख्यात था|  उसके पास अपार धन था जिसका उसको अहंकार भी था| किन्तु यह धन सदा तो किसी के साथ तो नहीं रहता| गंगू के साथ भी यही हुआ कि दुर्भाग्य ने उसे ऐसा घेरा कि उसे व्यापार में बार-बार घाटा उठाना पड़ा, जिससे वह कंगाल हो गया| उसके निर्धन होते ही सबने उससे आँखे फेर ली| उस निराशा के समय उसे परमात्मा की याद आई| गंगू ने सत्पुरुष श्री गुरु अमरदास की बड़ी महिमा सुनी थी अत: उनकी शरण में पहुँच गया और उनके चरणों में गिरकर रोने लगा और विनय की! "सच्चे पादशाह व्यापार में लगातार हानि होने से मेरा व्यापार, मेरी धन सम्पदा, मेरी मान इज्जत सब कुछ नष्ट हो गया है| हे दीनानाथ! आप दीनो एवं बेसाहारो के सच्चे सहारे है| मेरी सहायता कीजिये और मुझे इस दयनीय स्थिति से उबारिये| सतगुरु दीनदयाल जी ने फ़रमाया कि तुम पुनः व्यापार आरम्भ करो| तुम्हारा व्यापार खूब फूले- फलेगा और तुम फिर से धनवान व्यक्ति बन जाओगे| किन्तु धन पाकर अहंकार के नशे में चूर मत हो जाना, अपितु साधू संतो की सेवा करना और दीन-दुखियों की सहायता करना| गंगू ने विनय की- "सच्चे पादशाह!  मै आपके वचनों को सदा याद रखूंगा| उसने दिल्ली जाकर व्यापार आरम्भ किया! महापुरुषों की कृपा से उसके व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति हुई और उसकी गिनती बड़े व्यापारियों मे होने लगी| उन्ही दिनों एक निर्धन ब्राह्मण सहायतार्थ श्री अमरदास जी के चरणों में उपस्थित हुआ! कुछ ही दिनों के बाद उसकी पुत्री का विवाह था! श्री गुरु महाराज जी ने गंगू के नाम पत्र लिखकर उस ब्राह्मण को दिया और उसे दिल्ली जाने के लिए कहा! श्री गुरु महाराज जी ने पत्र में लिखा कि इस ब्राह्मण की सहायता करना और इसे जो कुछ भी हो, दे देना| ब्राह्मण दिल्ली पहुंचा और उसने पत्र गंगू राम को दिया| किन्तु गंगू पर अब फिर से अहंकार का भूत संवार हो गया था| वह महापुरुषों के वचनों को फिर से भूल गया था! उसने मन में विचार किया कि यदि मै इसकी मदद कर दूंगा तो गुरु महाराज जी रोज ही कोई न कोई व्यक्ति यहाँ भेजते रहेंगे| मै किस किस की सहायता करूंगा| यह सोचकर उसने ब्राह्मण की सहायता करने से साफ़ इन्कार कर दिया! ब्राह्मण ने लौट कर सारा वृत्तांत निवेदन किया| श्री गुरु महाराज जी ने किसी और से धन दिलवाकर उसकी सहायता की| इससे कुछ ही दिनों के पश्चात गंगू के भाग्य ने फिर पलता खाया| व्यापार में निरंतर घाटा होने के कारण उसका दीवाला निकल गया और वह फिर से कंगाल हो गया! उसने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में अपनी भूल के लिए श्रमा मांगी और शिष्यत्व ग्रहण कर शेष जीवन उनकी आज्ञानुसार व्यतीत किया! इसलिए धन अहंकार कभी नहीं करना चाहिए|
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