शांति वचन
v कोई व्यक्ति अगर भगवान की नजदीकी चाहता है तो वह पूर्ण सतगुरु की नजदीकी करे| पूर्ण सतगुरु की नजदीकी ही भगवान की नजदीकी
है|
v कहते हैं पितु से माता सौ गुना| माता से हरी सौ और हरी से गुरु
कोसो गुना| कि जितना प्यार बाप अपने बच्चे से करता है उससे
सौ गुना ज्यादा प्यार माँ अपने बच्चे से करती है और माँ से भी ज्यादा प्यार भगवान
अपने भक्तों से करते हैं| और भगवन से भी कई गुना ज्यादा
प्यार गुरु अपने शिष्यों से करते हैं|
v कहते हैं कि कोई व्यक्ति जेल में बंद हो तो कोई उसे
खाने को रोटी दे दे, कोई उसे पहनने को कम्बल दे दे, कोई उसे कोई अनमोल वस्तु दे
दे, तो कोई उसे जेल से आजाद करवा दे| तो सबमे से कौन बड़ा होगा| वही जो उसे जेल से आज़ाद करवायेगा| ठीक उसी तरह संसार में हमें तरह-तरह की वस्तु तो मिल जाती है सांसारिक
मनुष्य से| लेकिन इस संसार से मुक्ति कोई नहीं दिलवाता| वो तो सिर्फ और सिर्फ श्री सतगुरु ही करवा सकते हैं||
v जैसे लोहा लोहे वाले के पास , सब्जी सब्जी वाले के पास और कपडा कपड़े वाले के
पास मिलता है, ऐसे ही सुख भी सुख के सागर के पास मिलता है|
तुम भी नित्य सुख चाहते हो और खोजते उसके पास हो जो एक पल में सुखी दिखाई
देते हैं तो दूसरे पल दुखी , उनके पीछे लगकर ऐसे अपंना समय व्यर्थ गवांते हो|
सुखों के सागर सतगुरु है सच्चे मन से उनकी शरण में जाओ तो सुखी
होने में कोई देर नही है यदि देर है तो सिर्फ तुम्हारी तरफ से है| अन्य सभी आश्रय त्याग एक सतगुरु का आश्रय लो
| वे समर्थ है और अन्य सभी असमर्थ हैं|
v सच्चा गुरुमुख वही है जो हमेशा गुरु की आज्ञा में
रहे|
v जिस व्यक्ति की इच्छाएँ नहीं है| वह शाहों का शाह
है जिसकी इच्छाँए हैं वह अमीर होकर भी गरीब है|
v सतगुरु से हमेशा सतगुरु को ही माँगो|
v गुरुमुख को सदा ऐसा काम करना चाहिए की साधारण
व्यक्ति देख कर कहे धन्य है इनके गुरु|
v बाहर से को व्यक्ति आए और वो कुछ कमा के लेके आये
तो उसे भी ख़ुशी होती है और उसके घरवालों को भी ख़ुशी होती है अगर वह कुछ गवां के
जाये तो उसका मन भी अशांत होगा और घरवालों का भी मन उदास होगा इसी तरह इंसान अगर
तो संसार में आकर मालिक की भक्ति की कमाई करके जाता है तो उसे सुख मिलेगा ख़ुशी
होगी यहाँ भी ख़ुशी मिलेगी और परलोक में भी|
v नाम का अर्थ है मैं नहीं हूँ सतगुरु को अहंकार पसंद
नहीं है जहाँ अहंकार है वहा सतगुरु नहीं इसलिए सतगुरु की प्रसन्नता के लिए तू ही
तू करो मैं कभी नहीं|
v जो व्यक्ति ये कहता है कि मैं संसार में नाम कमाऊ
हर कोई मुझसे प्यार करे वह आत्मिक ज्ञान से बहुत दूर है|
v हर काम को परमार्थ के लिए करो स्वार्थ के लिए नहीं|
v भजन और सेवा से सतगुरु जल्दी प्रसन्न होते हैं पर
सेवा हमेशा निष्काम होनी चाहिए|
v कई लोग बाते तो ऐसे करते हैं कि भगवान् की
प्रसन्नता उन्ही से हो लेकिन देखे तो वे भक्ति मायावी प्रदार्थो के लिए करते हैं|
v भोला भाला और साफ़ मन वाला व्यक्ति ही भगवान् को पा
सकता है|
v हमे संसार में हर वस्तु को पाने के लिए मूल्य देना
पड़ता है तो सतगुरु जो संसार में हर वस्तु के मालिक है वो इतनी आसानी से थोडना मिल
जायेंगे| उसके लिए हमें अहंकार, स्वार्थ को त्यागना पड़ेगा यही भगवान को पाने का
मूल्य है|
v सबसे व्यर्थ का काम है जो हो चूका है या होने वाला
है उसकी चिंता करना|
v जब तक सेवक अपने मान या अपमान के बारे में सोचता है
तब तक वह सच्चा सेवक नहीं जब वह अपने मान अपमान को भूल जाएगा तो वह सच्चा सेवक बन
जाएगा|
v कभी भी किसी का दिल मत दुखाओ क्योंकि हर दिल में
कही ना कही भगवान का वास होता है|
v सेवक को कभी आलस नहीं करनी चाहिए उसके मन में सेवा
करने की इच्छा होनी चाहिए सतगुरु अपने आप शक्ति देते हैं|
v याद रखो जब तुम किसी की निंदा कर रहे होते हो तो
तुम्हारे शुभ कर्मो का फल उसके पास चला जाता है|
v ऐ गुरुमुख तुझसे कोई अनुचित व्यवहार करे तो तुम
क्रोधित ना होवो| सतगुरु का ध्यान करो उनके वचन याद करो|
v जिसको प्रभु प्राप्ति की अभिलाषा हो तो उसको सभी
इच्छाएँ त्याग देनी चाहिए|
v लोगों की बातों से भयभीत होकर सत्य से मुख न मोडो|
तुम्हारी मुक्ति लोगों के हाथ में नहीं है | करोड़ों लोगों को चाहे प्रसन कर लो
परन्तु मालिक की दृष्टी से वंचित रह गए तो समझो असफल होकर जा रहे हो|
v चाहे कितना भी मूल्य दो जीवन का एक स्वास नहीं बढ़ता
| ऐसे अमूल्य स्वासों की कदर करो, इन्हें गुरु शब्द में लगाकर सफल करो|
v जब सब कुछ एक दिन छोड़ जाना है तो शोकादि त्याग
प्रसन्नचित हो जीवन व्यतीत करना ही सत्संगी का स्वभाव होना चाहिए|
v एक बार एक बच्चे ने अपनी मम्मी से कहा कि मम्मी आज
मेरे सिर के ऊपर से ट्रेन निकल गई| तब मम्मी ने पूछा कि फिर तुझे कुछ हुआ क्यों
नहीं| तब उसने कहा कि मम्मी मैं पुल के नीचे खड़ा था| तब उसकी मम्मी ने कहा की पुल
के नीचे खड़े होकर तो तुझे कुछ भी नहीं हो सकता चाहे ऊपर कितनी ही ट्रेन निकल जाये|
इसी तरह सतगुरु के सेवक पैर भी श्री गुरु महराज जी अपनी छत्र छाया है जिससे उसे
कुछ भी नही हो सकता|
v कहते हैं कि अगर मुँह में नमक रखा हो और उसके बाद
व्यक्ति कुछ मीठा खाए तो ऐसा कभी नही हो सकता कि उसको मिठास मिले, इसी तरह अगर
इंसान के मन में पाप है चिंता है तो वो बेशक भक्ति करता हो उसको आनन्द नही मिलता |
v यदि परमार्थ में सफलता प्राप्त करना चाहते हो तो
सरल स्वाभाव वाले सत्यवादी बनो| सतगुरु की आज्ञा में मन की ना चलाओ|
v सतगुरु में विश्वास रखो, उदास कभी न होवो| वे
तुम्हारा दुःख अवश्य दूर करेंगे|
v एक तो मधुर बोलो दूसरा किसी के अवगुणों को प्रकट मत
करो अपितु अपने अवगुणों को सुधारों|
v निंदक और बहिमुर्खी व्यक्ति की संगत मत करो,
क्योंकि उसकी एक क्षण की संगति भी वर्षों की भक्ति नाश कर देती है
v जो सतगुरु के वचनों पर अमल नहीं करता वह भले ही
कितना पढ़ा लिखा हो| उसे यदि अनपढ़ कहा जाए तो गलत नहीं होगा|
v कहते हैं कि अगर एक तस्वीर है जिसमे एक वृक्ष बना
हुआ है जिसमे आम लगे हुए है तो अगर हम चाहे की तस्वीर में से निकल कर वो आम हमे
मिल जाए तो ऐसा नहीं हो सकता ठीक उसी प्रकार अगर हम ये आशा करे की संसार की चीजे
हमारी अपनी हो जाए तो ऐसा नहीं हो सकता | आप खुद ही देखते हो इंसान चीजे तो बहुत
इकठ्ठी करता है लेकिन अंत समय में वह वस्तुएँ अपनी नहीं रहती|
v कभी ये मत बोलो की भगवान भी हमारे हैं हमेशा यही
बोलो की भगवान् ही हमारे हैं|
v मालिक के प्रेमी कौन है? वह नहीं जो बहुत अधिक
जानते है, वह भी नहीं जो धन ऐश्वर्य में खेलते हैं, वह भी नहीं जो उच्चे पदों पर
नियुक्त हैं, परन्तु केवल वही प्रेमी है जो मालिक से अत्यधिक प्रेम करते हैं|
प्रेम अपराजय है कोई भी बंधन इतना शक्ति शाली नहीं जितना प्रेम का सुष्म बंधन,
जिससे मालिक भी बँध जाते हैं|
v एक बालक जिसने अपने पिता की अँगुली मजबूती से पकड़
रखी है, वह चाहे कितनी भीड़ में क्यों न हो, कभी गुम नहीं हो सकता | इसी तरह साधक
भी जिसने सतगुरु की शरण प्राप्त कर ली है, आंतरिक यात्रा के विध्न एवं बाधाँओं से
कभी भयभीत नहीं होता|
v कहते हैं कि जिस तरह से ग्रामीण लडकियाँ अपने सिरों
पर दो या कभी -2 तीन-2 पानी के घड़े रख कर चलती है वे परस्पर बाते तथा कई विषयों पर
चर्चा करती हुई चलती है, साथ में चलते -2 घड़ों का संतुलन भी बनाये रखती है चलते -2
उनके घड़ों से एक बूँद पानी भी नहीं छलकता उसी प्रकार श्री कबीर जी कहते हैं कि
साधक को भी जो कार्य उसे मिले हैं, उन्हें अवश्य पूरे करने चाहिए परन्तु साथ में
भीतर से अपना ध्यान अपने मालिक की ओर लगाना चाहिए|
v गुरु सेवा की अपनी पवृति बना लो जैसे किसी को नशे
की आदत हो वह उसके बिना नहीं रह सकता| वैसे ही तुम सेवा में संलग्न हो जाओ कि सेवा
के बिना तुम्हें संतोष ना मिले|
v तुम परमार्थ करो पर स्वार्थ न करो क्योंकि परमार्थ
तुम्हें ऊँचा उठाएगा और स्वार्थ तुम्हें नीचे गिरा देगा|
v जब तुमने सब नाते तोड़कर सतगुरु से सम्बन्ध जोड़ा है|
तब भी यदि किसी शारीरिक सम्बन्धी के जन्म या मृत्यु पर सुखी या दुखी होते हो तो
यही कहा जाएगा की तुमने सतगुरु से ऊपरी नाता जोड़ा है|
v कई कहते हैं हम भक्ति भी करते हैं और दुःख भी अधिक
भोगते हैं, वे अंतर्मुख होकर देखे कि वे भक्ति भगवान की नहीं अपितु पदार्थो,
सम्मानों और आशाओं की करते हैं
v मालिक ने यदि दुःख भेजे हैं तो उनमे भी सुख भरा
होगा कोई नोकदार डिब्बी में यदि सच्चे ह्रदय भरकर भेजे तो उसे खोलने में तनिक रक्त
भी
v
v निकल जाए तो खुलने के पश्चात् आजीवन आनंद भी तो मिलेगा|
v यदि तुम चाहते हो की सारा संसार तुमसे प्रेमपूर्वक
चले तो किसी एक के लिए भी अपने मन में घृणा ना रखो |
v महापुरुषों का आदेश है कि जो सतगुरु की आज्ञा पर
नियमानुसार चलते हैं, वे ही सच्चे सेवक हैं और जो केवल पूजा करते हैं लेकिन आज्ञा
पर नहीं चलते वे सच्चे सेवक नहीं हैं|
v कभी-2 एक दिन के लिए सही, अपने साथ एक प्रण कर लो
कि आज के दिन श्री गुरु महाराज जी मेरे साथ जो भी करेंगे, मैं उसको अपना भला मान
के शुकराना करूँगा| फिर देखना दिन के अंत में आप
कितने आनंद में रहेंगे|
v जो पूर्ण सतगुरु को साधारण मनुष्य समझते हैं वे
भाग्यहीन हैं|
v जब तक जीवन है तब तक त्यागी बनो और फल की आस कभी मत
करो
v पशु और मनुष्य में यही अंतर है की मनुष्य आत्मिक
उन्नति का साधन कर सकता है| लेकिन पशु नहीं जो मनुष्य जन्म को पाकर भी यह कार्य
नही करता, तो उसमे और पशु में फिर क्या अंतर हुआ |
v तुम नाम का सुमिरन करोगे तो सतगुरु की वास्तविक
शक्ति को जानोगे और हार्दिक आभार मानोगे|
v जब किसी को परदेश जाना होता हो तो अपने लिए रास्ते
का सामान तैयार कर लेता है | परन्तु आत्मा की यात्रा तो बहुत लम्बी है| उसके लिए
हमने कोई तैयारी नहीं की, उस यात्रा के लिए हमें नाम, सेवा और भक्ति का सामान साथ
लेना है
v सांसारिक पदार्थ जमा करके अपने आप को भाग्यशाली
समझना नादानी है| भाग्यशाली वह है जिसके पास सच्चा धन हो | सच्चा धन महापुरूषों ने
भक्ति का धन फरमाया है इसलिए भक्ति धन इकठ्ठा करने का यतन करो |
v दिखावा ना करो, कर्म को गुप्त रखना ही उन्नति का
साधन समझो |
v ऐसी चीज से प्यार करो जो कभी नाश नहीं होगी वो है
मालिक का नाम| बाकी हर चीज ने जो इस संसार में है एक ना एक दिन नाश हो जाना है|
v कहते हैं जो ज्यादा बोलता है वो अपने रहस्य खोलता
है जो कम बोलता है वो अकलमंद है
|
v सतगुरु अपने भक्त पर कभी आँच नहीं आने देते वे
हमेशा अपने भक्तों को याद रखते हैं|
v चिंता चिता से भी बुरी है चिता तो पल में जलाकर रख
कर देती है लेकिन चिंता बार -2 जलाती है लेकिन महापुरुष नाम का चिंतन करवाते है तो
जीव की चिंता भी मिट जाती है|
v जिस प्रकार डॉक्टर तो औषधि देता है परन्तु उसे
प्रयोग में लाने का कर्तव्य रोगी का है, उसी प्रकार श्री सतगुरु नाम की औषिधि देते
हैं तो उसका सेवन करना सेवक का कर्तव्य है|
v एक सेवक ने संत जी से कहा की बीस वर्ष बीत गए भक्ति
करते हुए भगवान ने एक पुत्र भी नहीं दिया| संत ने कहा बीस वर्ष पुत्र प्राप्ति के
लिए भक्ति की और पुत्र प्राप्ति से वंचित रह गए अब एक वर्ष उस अभिलाषा को त्याग कर
सच्चे मन से केवल भगवान की भक्ति करो तो सभी कामनायें स्वयं ही पूरी हो जाएँगी|
v इंसान सांसारिक चीजों के पीछे भागता रहता है जो
चीजें समय से पहले और मालिक की मर्जी के बगैर नहीं मिलनी और जो करनी चाहिए भक्ति
वो अपनी किस्मत पर छोड़ देता है कि यह मेरी किस्मत में नहीं है|
v महापुरूषों के वचन है कि हमेशा हमें दूसरों की
अच्छाई देखनी चाहिए| तब ही हमारे अंदर वह गुण आ सकेंगे | अगर हम बुराई देखंगे तो
हम भी बुरे बनते जायेंगे |
v आसमान में जितने तारे है इनकी तो साइंस कभी गिनती
कर भी ले लेकिन जो गुरु महाराज जी का नाम लेकर तरे है और तरेंगे उनको गिन पाना
नामुमकिन है|
v जैसे लोग अपने धन के बारे में किसी को नहीं बताते
की मेरे पास कितना धन है वैसे ही हमे अपनी भक्ति भी लोगों से छुपानी चाहिए इसे
जितना दिखाओगे लोगों को की मैं इतनी सेवा करता हूँ उतनी भक्ति कम होगी|
v गरीब कहता है इस दुनिया में अमीर सुखी, अमीर कहता
है इस दुनिया में राजा सुखी है | राजा कहता है इस दुनिया में महाराजा सुखी है मैं
भी सुखी नहीं हूँ| महाराजा कहता है मैं भी सुखी नहीं हूँ सुखी तो केवल इंद्र है जो
इंद्र लोक का मालिक है | इंद्र कहता है सुखी तो केवल भगवान विष्णु है| विष्णु जी
कहते हैं कि एक मेरा भक्त सुखी है बाकी सारे दुखी हैं|
v जिस तरह से गीले कपडे में हम जलती हुई माचिस की
तीली लगाये तो वह बुझ जाती है| क्योंकि कपड़ा पूरी तरह भीगा होता है| ठीक उसी तरह जब इंसान भक्ति के रंग में पूरी
तरह भीग जाता है| तो सांसारिक दुःख तकलीफे और सांसारिक आग का उस पर कोई फर्क नहीं
पड़ता|
v कहते हैं जब किसी वस्तु को जलाने के लिए माचिस की
तीली जलाई जाती है, तो आधी तो वो पहले ही जल जाती है | ठीक उसी प्रकार इंसान जब
किसी को कष्ट देने की सोचता है तो उसको भी तो मन में कही ना कही कष्ट झेलना पड़ता
है |
v किसी डॉक्टर ने कहा कि मैंने इंसान का पूरा शरीर
अंदर से देखा है मुझे तो उसमे कही आत्मा नाम की कोई चीज दिखाई नहीं पड़ी| तो किसी
सत्संगी से जवाब दिया कि माचिस की तीली में कही आग दिखाई नहीं देती लेकिन उसमे आग
देखने के लिए युक्ति लगानी पड़ती है ठीक उसी प्रकार आत्मा को देखने के लिए युक्ति
लगानी पड़ती है|
v दीपक की लौ की चमक –दमक पर लट्टू होकर पतंगे को
अपना सर्वनाश करके देखकर संसारी मनुष्य उसकी अज्ञानता पर तो हँसता है, परन्तु माया
की चमक दमक पर लट्टू होकर मनुष्य अज्ञानवश जो अपना सर्वनाश कर रहा है, इस बात का
उसे पता ही नहीं है; यह कितने खेद की बात है
v जिस प्रकार किसी शारीरिक रोग का निवारण किसी
चिकित्सक की शरण में जाने तथा उसके कहे अनुसार औषधि आदि का सेवन करने से होता है,
उसी प्रकार मानसिक रोगों से छुटकारा भी सतगुरु की शरण में जाने तथा उनके आदेशों का
पालन करने से होता है|
v मालिक से प्रेम करने का तरीका बिल्कुल वैसा ही होना
चाहिए जैसे एक प्रेमी प्रेमिका का होता है| तुम्हारे प्रेम को केवल प्रियतम ही
जाने, दूसरा कोई भी न जान पाए|
v महापुरुषों ने फरमाया है कि जो वस्तु हीरे रत्नों
सम कीमती है अर्थात मालिक की भक्ति, मालिक का सच्चा नाम जोकि कीमती वस्तु है उसको
इंसान छोड़कर झूठे संसार के सामानों में दिल लगा बैठा है, जो वस्तु यहाँ रह जानी,
अवश्यमेव छोड़नी है , उसके लिए परिश्रम करता है और मालिक का सच्चा नाम जो साथ
जाएगा, उसकी चिंता ही नहीं; ऐसा उल्टा मार्ग इंसान ने अपनाया है| अज्ञानता के
अँधेरे में पड़े हुए ऐसे जीव का कल्याण क्योकर होंगा
v मानुष जन्म की यह विशेषता है कि यह कर्ता भी है और
भोक्ता भी| दोनों काम कर सकता है शेष जितनी योनियाँ हैं सब भोक्ता है| पशु पक्षी,
कीट –पतंग आदि सब भोक्ता है | उनको यह ज्ञान नहीं है कि वे किस काम के लिए आये है|
उनको केवल खाना – पीना और जन्म बिताना है| मानुष जन्म की विशेषता है कि सत्पुरुषों
की संगति में जाकर यह ज्ञान प्राप्त करे, नाम और भक्ति की कमाई करे|
v आपने सुना होगा की बाल्मीकि डाकू था| मार्ग चलते
यात्रियों को लुटता भी था और जानलेवा भी बना हुआ था| अपने स्वार्थ के लिए लोगों को
दुःख देता था| जब संतो की संगति में आया तो वाही डाकू बाल्मीकि ऋषि बन गया | यदि
कोई खयालों को पलटना चाहता है और उन्नति करना चाहता है तो सत्पुरुषों की संगति
आवश्यक है|
v मानुष देही केवल मालिक से मिलाने के लिए मिली थी कि
सुरति को नाम में जोड़कर मालिक से एकाकार हो जाए| एकाकार करने का साधन संत महा
पुरुष बतलाते हैं| वह यह है की ऐ जीव| सुरती को नाम में जोड़ दे| इसी का ही ख़्याल दिल में बसा ले और अन्य
ख्यालों से दिल को हटा दे| बस फिर तेरी सुरती एकाग्र होकर मालिक से मिल जाएगी|
अन्य काम तेरे किसी लेखे में नहीं| वे अंत समय तेरे किसी काम न आयेंगे| इसलिए
महापुरुष चेतावनी देते हैं कि मानुष – जन्म का सच्चा लाभ यही है, भक्ति व नाम की
कमाई की ओर अपना रुख कर ले|
v यदि कोई रोगी निरोग होना चाहे और अपने ख्याल से
केमिस्ट की दुकान से दवाई लेकर खा ले तो क्या वह निरोग हो जाएगा? कदापि नहीं होगा|
यदि किसी योग्य डॉक्टर के निर्देशानुसार औषधि सेवन करेगा तो अवश्य ही निरोग हो
सकता है| केमिस्ट के पास लाखो ही दवाईयाँ रखी होंगी| इंसान स्वयं यह नहीं बता
सकता, इसका निर्णय नहीं दे सकता की अमुक दवाई से बिमारी ठीक हो जाएगी | इसी प्रकार
ही यदि इन्सान गम, चिंता एव फिक्र की बिमारी को दूर करना चाहता है तो सत्पुरुषों के
आदेशानुसार नियम अपनाने से ही सुखी होगा|
जो सुख को चाहे सदा, शरण राम की लेह|
कहु नानक सुनि रे मना, दुर्लभ मानुख देह||
v मधुमक्खी जब उपवन में जाती है तो वह पुष्पों के
सौन्दर्य को देखकर उनमे आसक्त नहीं हो जाती, अपितु अपना उद्देश्य पूरा करने अर्थात
रस संचित करने में संलग्न रहती है| इसी प्रकार संसार में बेशक रहो, संसार के
पदार्थो को आवश्यकता अनुसार उपयोग में भी लाओ, परन्तु उनकी चमक- दमक और मनमोहकता
में न फसकर अपने उद्देश्य की पूर्ति अर्थात भजन –सुमिरन में दत्तचित्त रहो|
v जैसे कई पथिक रात्रि हो जाने पर एक ही स्थान –सराय
आदि में रात्रि व्यतीत करने के लिए एक्रत्र हो जाते हैं और सब एक दूसरे के साथ
वार्तालाप भी करते हैं , परन्तु प्रात: होते ही उठकर अपने रस्ते पर चल देते हैं,
वैसे ही इस संसार को भी सराय जानो और संसार के लोगों को भी यात्री समझो जो एक दिन
इस संसार को छोड़कर चले जायेंगे| पुत्र, स्त्री, भाई तथा माता –पिता आदि का सम्बन्ध
भी कुछ ही दिनों का है इन में से कोई भी इस संसार से जाते समय साथ नहीं जाता |
एकमात्र प्रभु के भजन सुमिरन का शुभ कर्म ही अंत में साथ जाता है|
v एक रेल के इंजन में कितनी शक्ति है वह रेलगाड़ी के
कितने डिब्बों को मीलों तक खींचता चला जाता है उसमे वह ताकत है कि गाड़ी को कही भी
ले जाए, परन्तु उसमे यह ताकत नहीं की गाड़ी के रुख को दूसरी ओर बदल दे| दिल्ली वाली
गाड़ी कलकत्ता ले जा सके| वह दिल्ली ही जाएगी | परन्तु जब स्टेशन मास्टर उसका कांटा
बदल देता है तो दिल्ली वाली गाड़ी कलकत्ता पहुँच जाती है| इंसान का मन जो काल माया
के गलबे में आया हुआ विषयों की ओर दौड़ रहा है, चौरासी लाख योनियों का मिसालह
इकठ्ठा कर रहा है, नरको की ओर दौड़ रहा है महापुरुष उसी मन का कांटा बदल देते हैं|
मन जो इस जीव को चौरासी और नरको की ओर ले जा रहा था, उसका रुख भक्ति की तरफ, सच्चे
मालिक की तरफ कर देते हैं और वह भक्ति प्राप्त कर लेता है|
v जैसे समय बितने के साथ -2 जलते हुए दीपक का तेल
निरंतर कम होते -2 अंतत: समाप्त हो जाता है वैसे ही जीवन रूपी दीपक में भी जो
स्वांस रूपी तेल है वह पल -2, क्षण -2 करके कम हो रहा है और जब स्वांस रूपी तेल
समाप्त हो जाएगा, तो फिर जीवन रूपी दीपक भी बुझ जाएगा| दीपक में तेल कितना है यह
तो मनुष्य देख सकता है और दीपक में तेल भी डाल सकता है ताकि दीपक और अधिक समय तक
जलता रहे, परन्तु जीवन के स्वास कितने बाकी है, न ही मनुष्य यह जान सकता है और न
ही स्वास बढ़ा सकता है|
v भक्ति दो तरह की होती है -अह्म भक्ति और दूसरी
शरणागत
भक्ति| अह्म भक्ति जिसमे कर्तापन होता है जिसमे
इंसान ये सोचता है कि जो भी करने वाला हूँ मैं ही करने वाला हूँ| दूसरी है शरणागत
जिसमे इंसान यही सोचता है कि मैंने कुछ नही किया सब भगवान की कृपा है|
v संसार में हम लोगों से प्रीत रखते हैं किसी के साथ
100 बार
अच्छा करो एक बार बुरा हो गया हो या कहीं कोई गलती
हो गई हो तो वह व्यक्ति हमसे बोलना बंद कर देगा मुँह फेर लेगा| ऐसे करेगा कि जैसे
हम उसे जानते ही न हो| लेकिन भगवान की प्रीत देखो 100 बार बुरा करके एक बार अच्छा
करो तो भगवान अपने चरणों से लगा लेता है कितना फर्क है भगवान की प्रीति और संसार
की प्रीती में |
v जैसे डाली से पककर फल टूट जाता है वह दुबारा नहीं
जुड़ सकता| वैसे ही एक बार मानुष जन्म हाथ से निकल गया तो फिर जरुरी नहीं की दुबारा
मिल जाए | इसलिए इसी समय को उपयुक्त समझ कर गुरुमुख ने अपना काम बनना है|
v यदि कोई लाखों करोडों रुपये खर्च करके भी एक स्वांस
खरीदना चाहे तो यह असम्भव है| इसका अर्थ है की मनुष्य का हर एक स्वास अनमोल है तो
दिन रान के चौबीस घण्टो में जो चौबीस हजार स्वास निरंतर खर्च हो रहे है, उनका
कितना मूल्य हुआ? ऐसी अमूल्य पूंजी को भगवान के भजन सुमिरन की अनमोल कमाई में न
लगाकर उसे खाने पीने और विषय भोगों में ही व्यय कर देना तो अपनी इस अनमोल पूंजी को
व्यर्थ नष्ट करना है|
v इंसान खुद विचार करे कि जो लोग हमारे परिवार के है,
जिनसे हमारा कुछ समय का साथ है, उनके साथ हम कितना अधिक वक़्त गुजारते हैं और जिनके
साथ हमारा लोक और परलोक का नाता है उसके साथ हम कितना वक़्त गुजारते हैं तब हमे
अपनी गलती का एहसास होगा|
v दिल में कभी भी न कटुता भरो| कभी किसी को भी कष्ट न
पहुँचाओ| महान आत्माओं ने कितने कष्ट सहन किये है| उनकी कितनी निंदा की गई| परन्तु
नम्रता से सहन कर पर भी प्रबल शक्ति के साथ भक्ति मार्ग पर अग्रसर होते रहे|
विनम्रता, दया, क्षमा आदि गुण रुपी शस्त्रों से सुसज्जित होकर अपनी भक्ति को
सुरक्षित करो|
v पिछले दोषों की ओर ध्यान देने की अपेक्षा जो हमारे
आगे हैं, उसका लाभ उठाना चाहिए| परमात्मा का द्वार सदैव खुला है| वह प्रेम और कृपा
की मूर्ति है| बुरे कर्म फिर कभी न करते हुए सच्चा प्रायश्चित ही वास्तव में क्षमा
की प्रार्थना है|
v कहते
है कि नाम का अर्थ है ना मै|
v अच्छे व्यक्ति के साथ अच्छाई कोई भी कर सकता है|
लेकिन बुराई के बदले अच्छाई करना बहुत बड़ा कार्य है|
v याद रखो कि केवल परमात्मा ही तुम्हारे जीवन का
लक्ष्य है| वही कार्य करो जो तुम्हें परमात्मा की ओर अग्रसर हो| तुम्हें प्रभु
चिन्तन व सेवा में विलम्ब नही करना चाहिए|
v हम जब जन्म लेते हैं, तब इस संसार में कोई पदार्थ
साथ नही लाते और जब हम जाते हैं, तब भी कुछ साथ नही लेकर जाते| लेकिन जब हम पैदा
होते हैं, तब हम अपने साथ पिछले संस्कार लाते हैं| और जब हम जाते हैं, तब भी
संस्कार लेकर जाते हैं| भविष्य में अच्छे संस्कार जमा करने का साधन है –ईश्वर के
सच्चे नाम का धन कमाना| यही धन परलोक में साथ जाता है| अतः इसी में ही चित लगाओ|
v दूसरों की निंदा और दोष वास्तव में अपनी निंदा और
दोष है| इसलिए मनुष्य को दूसरे की निंदा या अपमान नही करना चाहिए|
v ईश्वर की कृपा सच्चे इंसान पर उतरती है| इसलिए
निर्मल और निश्छल बनो, बाकी सब स्वतः ही ठीक हो जायेगा|
v यदि तुमने दूसरों की सहायता करके अच्छा कार्य किया
है तो तुम उसका अभिमान मत करो और न ही उसके बदले में कुछ पाने की आशा रखो|
v सतगुरु वर्तमान, भूत और भविष्य के ज्ञाता है|
तुम्हरे लिए क्या अच्छा है, वे जानते हैं| इसलिए उनके वचनों का अटल विश्वास और
पूर्ण श्राद्धा के साथ अनुसरण करो| एक शिष्य के लिए सतगुरु की आज्ञा पालन करने से
बढ़कर और कुछ भी नही है| सतगुरु की सेवा ही सबसे बड़ी उपासना है|
v यदि कोई रोगी वैद्म के पास उपचार के लिए जाए,
परन्तु वैद्म के आदेशानुसार न तो औषधि का सेवन करे और न ही परहेज करे और फिर वैद्म
को दोष दे की उसके पास जाने से और उसका उपचार करने से मुझे कोई लाभ नहीं हुआ तो यह
उसकी नादानी ही कही जाएगी | ठीक इसी प्रकार मानसिक रोगों के उपचार के लिए यदि कोई
मनुष्य सतगुरु रूपी वैद्म के पास जाये, परन्तु निर्देशानुसार न तो नामरूपी औषधि का
सेवन करे और न ही सेवा, सत्संग, ध्यान तथा श्री आरती पूजा आदि का अध्यात्मिक आहार
ले, अपितु विषय भोग रूपी कुपथ्य का सेवन
करे और फिर सतगुरु को दोष दे की उनकी शरण में जाने पर भी मुझे मानसिक रोगों से
छुटकारा नहीं मिला तो ऐसे मनुष्य को नादान ही कहा जाएगा|
v सत्पुरुष फरमाते हैं कि ऐ जीव| जैसे वर्षा की एक-एक बूँद एकत्र होने से तालाब भर जाता है| यदि उस
तालाब का निकास कहीं धरती के भीतर अथवा बाहर निकल रहा हो, तो
वह तालाब कभी नहीं भर पायेगा अथवा एक घड़े के पेंदे में सुराख़ करके ऊपर से पानी
भरना चाहो, तो वह कभी नहीं भर पायेगा| ऐसे
ही भक्ति के गुणों को, साधन-नियमों को
अपनाकर यदि विकारों (छिद्रों) को बनाये
रखा, तो भक्ति की सम्पदा को एकत्र नहीं कर पाओगे||
v जिस प्रकार पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाता और नदी
अपना पानी स्वयं नहीं पीती, वरन् परोपकार के लिए वृक्षों के फल एवं नदी का पानी
होता है ठीक इसी प्रकार ही संत महापुरुष परोपकार के लिए मानुष शरीर धारण कर धरा पर
अवतरित होते हैं|
v जैसे जल से मछली की, मणि से सर्प की, चात्रिक की
स्वाति बूंद से, कमल की सूर्य से, चकोर की चन्द्रमा से प्रीति है; सेवक को भी इसी
प्रकार से सतगुरु के चरणों में प्रेम की तार जोड़नी चाहिए| सेवक और कुछ न देखे
अर्थात न वाद – विवाद, तर्क –वितर्क में पड़े और न ही माये के लुभावने प्रपंचो में
पड़कर जीवन की बाजी को हारे| सब ओर से अपनी सुरति को हटा कर मालिक के चरणों से
जोड़े, तो सतगुरु उसके अंग संग रहकर परलोक में भी रक्षक बनते है|
v जैसे किसी मंजिल तक पहुँचने के लिए एक साधन है पैदल
चलना और दूसरा साधन है वाहन| हम दोनों साधन से पहुँच जायेंगे पैदल ज्यादा देर
लगेगी ठीक इसी तरह जप, तप, साधन, व्रत, नियम आदि सब मंजिल तक तो पहुँचाते हैं
लेकिन ये सब मंजिल तक पहुँचने में अधिक समय लगाते हैं सतगुरु के शब्द से मंजिल तक
जल्दी ही पहुँचा जा सकता है| वास्तव सतगुरु की प्राप्ति के बाद व्यक्ति अपनी मंजिल
तक पहुचँता है|
v जिस तरह सूर्य दिन में प्रकाश करता है, चन्द्रमा
रात में प्रकाशित होता है और दीपक घर में उजाला करता है तथा घर के अन्धकार का नाश
करता है, परन्तु गुरुदेव तो शिष्य के ह्रदय में रात –दिन सदैव ही प्रकाश फैलाते
रहते हैं| वे शिष्य के सम्पूर्ण अज्ञान अन्धकार का विनाश कर देते हैं|
v याद रखो की मनुष्य को पिता से धन की प्राप्ति हो
जाने पर यदि वह उस पूंजी को व्यापार में लगाकर लाभ कमाने की अपेक्षा विषय – विलास
और खाने –पीने आदि में व्यय करता है, तो धीरे -2 वह पूंजी समाप्त हो जाएगी और वह
कंगाल हो जाएगा| उस समय वह लाख रोये और पछताये, तब क्या होता है? इसी प्रकार
परमपिता परमात्मा ने मनुष्य को स्वासों की अनमोल पूंजी दी है| जो इस पूंजी को नाम,
सुमिरन, सत्संग, सेवा आदि के व्यापार में लगाकर इससे सच्चा लाभ नहीं उठाता अपितु
इसे सांसारिक कार्य व्यवहार और शरीर – इन्द्रियों की तृष्टि में ही व्यय कर देता
है, वह भी इस अनमोल पूंजी को गवाकर अंत में बहुत पछताता है परन्तु समय निकल जाने
से पछताने से क्या बनता है|
v जिस प्रकार वृक्ष अपने फल को स्वयं नहीं खाता, नदी
अपने लिए पानी को संचित नहीं करती अपितु वृक्षों तथा नदियों से अन्य प्राणियों को
लाभ पहुँचता है, इसी प्रकार संत महापुरुषों का अवतरण भी परोपकार के लिए होता है|
v संसार में आमतौर पर देखा जाता है की यदि कोई सेठ साहूकार
किसी कारिंदे को कुछ रकम देकर कोई सौदा करने के लिए भेजता है तो जब वह कारिन्दा
सौदा खरीद कर वापिस आता है तो सेठ इस बात की जाँच पड़ताल करता है की सौदा कैसा है?
यदि वह लाभप्रद सौदा करके आता है तो सेठ प्रसन्न होता है और यदि वह घाटे वाला सौदा
करता है तो फिर सेठ उस पर नाराज तो होता ही है, सजा के रूप में उसे नौकरी से निकाल
सकता है | ठीक इसी प्रकार वह परमात्मा रूपी साहूकार भी, जिसने हमे स्वासों की
पूंजी देकर लाभदायक सौदा करने के लिए इस संसार में भेजा है, हमारे सौदे को अच्छी
तरह परखता है की हमने कैसा सौदा किया है| इसलिए हमें चाहिए की हमेशा लाभ वाला सौदा
करें जिससे की परमेश्वर हमारे सौदे को देख कर प्रसन्न हो|
v कहते हैं एक तेली एक बार कही आतिथ्य में गया| जब
भोजन परोसा गया और सबने खाना आरम्भ किया तो तेली को उस भोजन में अनोखा ही आनंद
आया| पूछने पर उसे विदित हुआ कि सब व्यंजन देसी घी से तैयार किये गए है| तेली ने
तो अब तक सदा तेल से बना हुआ भोजन ही खाया था, देसी घी का तो उसने कभी स्वाद ही
नहीं चखा था| उस दिन दावत में देसी घी से बने व्यंजनों में उसे जो स्वाद आया, उसे
चख कर वह बड़ा चकित हुआ और मन ही मन कहने लगा यदि मुझे पहले पता होता कि घी से बने
पदार्थ इतने स्वादिष्ट होते हैं तो मैं
तेल से बने पदार्थो के निकट ही ना जाता| इसी प्रकार प्रभु प्रेम के आलौकिक रस का
जिसने पान कर लिया| उसे फिर शरीर इन्द्रियों के अथवा माया के निकृष्ट रस कदाप नहीं
सुहाते|
v जिसप्रकार एक घड़ी का अलार्म सोये हुए इन्सान को जगा देता है, इसी तरह महापुरुषों के वचन अज्ञान की नींद
में सोये हुए जीवों को जागृति प्रदान करते हैं। वह अज्ञानता क्या है? कि इन्सान मिथ्या संसार और संसार के मिथ्या पदार्थों को सत् समझ बैठा है।
जो चीज़ सच्ची है उसका उसे पता ही नहीं बल्कि सच को झूठ मान बैठा है। यही भारी
अज्ञानता है। इसी अज्ञानता को दूर करने के लिए महापुरुष जीवों को उपदेश करते हैं।
v कहते हैं कि सेवक वो है जो सतगुरु से जोड़े ना की
अपने आप से जोड़े|
v सुनने में आता है कि, जिस व्यक्ति को प्यास लगती है
वह अपनी प्यास बुझाने के खुद पानी के पास जाता है लेकिन इस रूहानी पंथ के मालिक
श्री हजूर श्री गुरु महाराज जी अपने प्रेमियों की प्यास बुझाने के लिए खुद जाते
हैं|
v किसी का जन्मदिन आता है लोग कहते हैं इंसान बड़ा हो
रहा है सही मायनों में वह बड़ा नहीं हो रहा होता बल्कि उसकी उम्र घट रही होती है
जितने समय उसने जीना है रोज एक दिन उसकी आयु में से घटता जाता है|
v कहते हैं अगर 1000, या 100 के नोट के आगे से अंक
(1) हटा दिया जाये तो शून्य की कोई कीमत नहीं है ठीक इसी प्रकार इंसान भी जो काम
करता है, वो भी शून्य के सामान है लेकिन अगर इंसान सांसारिक कामों के साथ -2 भगवान को भी याद करता है तो उनके आगे
अंक लग जाता है | और उन कामों की भी कीमत लग जाती हैा
v कहते हैं भला का उल्टा होता है लाभ| अगर कोई
व्यक्ति किसी का भला करता है तो उसे लाभ automatically मिल जाता है|
v श्री राम चरित मानस में भगवान श्री राम जी ने अपने
मुख से शबरी के प्रति नवधा भक्ति का वर्णन करते हुए सातँवी प्रकार की भक्ति में
फरमाते हैं की “सातँव सम मोहि मय जग देखा” अर्थात भक्ति का सातवाँ सोपान यही है की
मनुष्य जगत के समस्त जीवों में मेरा ही रूप देखे और समझे की सबमे मेरी ही ज्योति
जगमगा रही है |
v कहते हैं कि यह मन बंदर की भांति वृक्षों पर एक डाल
से दूसरी डाल पर कूदता रहता है| बंदर चंचल कहा गया है| वह एक स्थान पर टिक कर नहीं
बैठ सकता | इसी प्रकार मनुष्य का मन सत्संग में बैठे होने पर भी हर समय कभी घर
में, कभी व्यापार में और कभी देश देशांतर में अपने संबंधियों के मोह में घूमता है
इसे सत्संग वचनों द्वारा बार -2 मोड़कर वापस लाया जाता है परन्तु मन के चंचल होने
के कारण पुन: मोड़कर मायावी पदार्थो के मोह में अटक जाता है|
v कहते हैं कि जैसे वृक्ष का आधार उसकी जड़ से होता है
ठीक उसी प्रकार भक्ति का आधार विश्वास है|
v कहते हैं कि जिस प्रकार बंजारे आठ मॉस तक देश विदेश
में व्यापार करके धन कमाते हैं और फिर वर्ष ऋतु में बैठकर आराम करते हैं उसी
प्रकार मनुष्य जन्म भक्ति की कमाई करने का अवसर है अन्य सभी योनियाँ केवल भोक्ता
है और पूर्व कर्मों में किये हुए कर्मों का फल भोगती है| इसलिए इस जन्म को पाकर
तनिक सा भी आलस नहीं करना चाहिए| यदि बंजारे आठ महीने आलस में नष्ट कर दे और
परिश्रम करके कमाई न करे, तो फिर वर्षा ऋतु में उन्हें दुःख, कष्ट तथा परेशानी
भोगनी पड़ेगी| तो फिर यदि जीव मनुष्य जन्म में भक्ति की कमाई नहीं करेगा, तो फिर उसे
भी परलोक में दुःख कष्ट और परेशानी भोगनी पड़ेगी|
v दिल से अपने पापो का प्रायश्चित करो| यदि तुमने
अपने बुरे कर्मों के प्रति अरुचि की भावना उत्पन्न नही की है तो इसका अर्थ है कि
तुम्हारा पश्चात्ताप पूर्ण नही है| पश्चात्ताप करो परन्तु निराश मत होवो| तुम
कितने भी अधर्मी पापी क्यों न हो, यदि तुम ह्रदय से पश्चात्ताप करते हो तो प्रभु
की कृपा के सम्मुख तुम्हारे कोई पाप नही ठहर सकते|
v पहाड़ी के ऊपर चढ़ते समय किसी व्यक्ति की फिसलकर
गिरने से हड्डी टूट गई| वह गिर तो एक क्षण में गया, लेकिन उसे ठीक होने में कई
वर्षो लग गए| भक्ति मार्ग की चढ़ाई तो इन चट्टानों से भी ऊँची और खतरनाक है
लेशमात्र का भी दुष्कार्य मनुष्य को निम्न स्तर पर ला सकता है| जहाँ से फिर उस उस
बिंदु तक पहुचँना अत्यधिक कठिन है| इसलिए मनुष्य को सदैव सतर्क रहना चाहिए|
v जहर की गोली अगर देखने में सुंदर हो, बाहर से मीठी
हो तो उसका असर विषमय न होगा? निश्चय ही इसका परिणाम घातक होगा| ठीक उसी तह
संसारिक इच्छाओं में सुख तो बसता है जो नाशवान होता है| लेकिन उसका परिणाम कटू एवं
दुखप्रद होता है| साधारण मनुष्य इसी सुख को सच्चा मानते हैं| उसमे आसक्त होकर
कष्टों को परिणाम में पाते हैं|
v अगर तेरा मुर्शिद दिन को रात कहे तो तेरा यह धर्म
है कि तू कहे हजूर मुझे चाँद और सितारे भी नजर आते हैं| यहाँ पर बुद्धि से काम नही
लेना, बुद्धि जो है वो हमारा काम खराब करती है | बुद्धि को आप अपने व्यवहार में,
कारोबार में प्रयोग लाये लेकिन यहाँ भक्त की बात है, गुरु सेवा की बात है, यहाँ
बुद्धि को एक ओर रख दे|
स्वामी रामतीर्थ ने भी कहा है-
अक्ल वक्ल नही चाहिए ,
हमको पागलपन दरकार |
और आगे उन्होंने कहा-
मैं मरीजे अक्ल था, मस्ती ने अच्छा कर दिया |
यह मार्ग अक्ल का नहीं पागल और दीवानों का मार्ग है
|
v पाप से घृणा करो पापी से नही |
v कहते हैं कि जो भगवान विष्णु जी की पूजा करता है तो
भगवान विष्णु उससे खुश होकर आशीर्वाद देते हैं, कहते हैं जो ब्रह्मा जी की पूजा
करता है तो ब्रह्मा जी उस भक्त से खुश होकर उसे आशीर्वाद देते हैं, जो भोलेनाथ की
पूजा करता है भोलेनाथ जी उसे आशीर्वाद देते हैं पर जो सतगुरु की पूजा करता है तो
उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य सभी देवी देवता खुश होकर उसे आशीर्वाद देते
हैं|
v कहते हैं कि संसार में जितने भी पशु-पक्षी है ये
अपने पेट को भरने के लिए जो भी प्रयत्न करते हैं और भोजन को प्राप्त करके भोजन
ग्रहण करते हैं वे जब पेट भरके खा लेते हैं तो उनको कल की चिंता नही होती क्योंकि
वो कल के लिए सोच भी नही सकते| लेकिन मनुष्य तो ऐसा नही उसकी बुद्धि तो दूर तक जा
सकती है| यह अपने शरीर के साथ-2 परलोक की भी सोच सकता है| लेकिन अगर वो भी दूसरे
जीवों की भांति पेट भरना ही सीखा है तो मनुष्य और पशु में क्या अंतर हुआ |
v किसी जिज्ञासु ने एक बार संतो से पूछा –भगवान!
पापों का इलाज क्या है? उत्तर में संतो ने कहा-अपने किये हुए पाप-कर्मों पर रोना
और आगे के लिए उनसे परहेज करना| उस पछतावे में रोते हुए जो अपनी आँखों से आँसू गिरते
हैं, उनसे सब पाप धुल जाते हैं यही पापो का सही इलाज है |
v जब तक तुम्हारे मन में संसार की प्रीति विद्ममान है
| तब तक प्रभु तुम्हारे से बहुत दूर है| संसार की प्रीति से चित्त हटा दो, प्रभु
स्वयं तुम्हरे चित्त में आ विराजेंगे
v कुदरत की रचना में सब चीजें पाई जाती है और हर एक
चीज की अपनी तासीर है, अपना -2 गुण है| इंसान की तासीर है इसको विवेक, बुद्धि और
ज्ञान ताकि वह हर चीज को सोच समझ कर इस्तेमाल करे| पानी की तासीर है ठंडक और आग की
तासीर गर्म है, तपश है और यह तासीर जिस चीज की जैसी है हर जगह वैसी ही मिलेगी| इसी
तरह भक्ति की तासीर जो है वह ठण्डक, शांति और सुख देने वाली है और माया की तासीर
गर्म, दुख और अशांति पैदा करने वाली है, भक्ति की तासीर का ज्ञान इंसान को सत्संग
में जाकर होता है तब पता चलता है कि यह भक्ति शांति देने वाली है और लोक परलोक में
सुख देने वाली है|
v जिस प्रकार गुरु द्रौणाचार्य के पास पांडव तथा कौरव
शिक्षा प्राप्त करने ले किये जाते थे, परन्तु निपुण अर्जुन ने गुरु की प्रत्येक
मौज व आज्ञा में अपने सुख आराम को न्यौछावर कर दिया तो गुरु जी से उसने
धनुर्विद्या प्राप्त कर ली जिसकी तुलना में अन्य कोई न था| गुरु जी तो समदृष्टि
भाव से सिखाते थे परन्तु जिसने जिस विद्या में अधिक रूचि राखी उसी विद्या में
दक्षता प्राप्त कर ली|
v वर्षा ऋतु वर्णन में भगवान् श्री रामचंद्र जी
महाराज लक्ष्मण जी के प्रति कथन करते हैं कि वर्षा ऋतु में धरती पर अनेकों प्रकार
के जो जीव – कीट, पतंग आदि उत्पन्न हो जाते हैं, शरद ऋतु आने पर वे सब वैसे ही
नष्ट हो जाते हैं जैसे सतगुरु के मिल जाने पर सारे भ्रम –संशय नष्ट हो जाते हैं|
v भगवन भजन के लिए ये बाते आवश्य है
कम बोलना, कम खाना, कम सोना, सत्संग करना, एकांत
में रहना, श्रद्धा एव निष्ठां पूर्वक स्मरण करना |
v आत्मसमर्पण केवल यही नहीं कि शारीरक रूप से
सतगुरुदेव के समर्पित होना, अपितु इसका अर्थ यह है की अपनी मनमति का त्याग करके
पूर्ण रूप से गुरुमति को धारण करने का व्रत लेना है|
v कहते हैं कोई वस्तु इंसान को एक साल बाद मिले तो
उसकी कदर बढ़ जाती है| और कोई वस्तु सालों के बाद मिले तो कदर और बढ़ जाती है| ठीक
इसी प्रकार यह मानुष का चोला भी इंसान को कई सालों बाद नहीं अपितु कई युगों के बाद
मिलता है| इसकी कदर करनी चाहिए|
v वैराग्य दो प्रकार के होते हैं –एक तीव्र वैराग्य,
जो जन्म-जन्मान्तरों के पुण्य-कर्मों से मिलता है| दूसरा –कारण वैराग्य, यह किसी
विशेष कारण या संसार की ओर से भरी ठोकर खाकर उत्पन्न होता है| वैराग्य तीव्र हो या
कारण, दोनों अभ्यास में वृति लगाने के सहायक है |
v गुरुवाणी के 1430 पृष्ठ है सम्पूर्ण गुरुवाणी में
केवल चार विषय चलते है- पहला संत महिमा, दूसरा नाम महिमा, तीसरा गुरु महिमा और
चौथा जगत मिथ्या| ये चार विषय है जिनके विस्तार पर सम्पूर्ण गुरुवाणी का पवित्र
ग्रन्थ रचा गया है|
v महर्षि अरविंदु कहा करते थे कि ‘जैसे समुन्द्र के
धरातल में कई सौ फुट गहरा उतरकर सीपियों और घोंघो में से मोतियों की खोज की जाती है|
और जैसे कई-2 फुट गहरी खानों की खोज कर, कोयले की चट्टानों को चीर कर हीरे की खोज
की जाती है, उसी प्रकार गुरु जिज्ञासुओं की सोई हुई दिव्य शक्ति को झंझोड़ कर जगाता
है| आग के शोले, प्रचंड दीपक की लौ जैसे हर एक को प्रकाशित कर देती है, इसी प्रकार
गुरु बुझे हुए आत्म दीपक को जला देता है| जिस प्रकार आतिशबाजी के पटाखे तनिक सी आग
देखकर मचल-2 कर जलते हैं| और अपनी रगों से दिलों को मोहित करते हैं, इसी प्रकार
गुरु शब्द के सम्पर्क से, गुरु दृष्टी से हमारी दिव्य शक्ति जगा कर हमें कुछ का
कुछ बना देती है|
v हजरत ईशा मसीह को जोन दी बैपटिस्ट ने कहा था –“यह
ठीक है कि मैंने तुम्हें शिष्य बनाया है, किन्तु सत्य तो यह है कि मुझे तुम्हारा
शिष्य बनना चाहिए थे |”
v कबीर जी भी ऐसे ही शिष्य थे कि स्वामी रामानन्द जी
को भी यह कहना पड़ा था कि ‘कबीर न मिलते तो मेरा जीवन किस काम का था|’
v स्वामी रामानुज जी भी ऐसे ही शिष्य थे| गुरु का
आदेश था कि गुरुमन्त्र को गुप्त रखो| रामानुज गुरुमंत्र को प्रकट कर सबको उपदेश
देने लगे| गुरु स्थान पर खलबली मच गयी| अपराधी रामानुज को पकड कर गुरु जी के सामने
उपस्थित किया गया| गुरुदेव ने कहा –‘यह जानते हुए कि गुरुमंत्र को प्रकट करने का
दंड नरक है, तुमने यह अपराध क्यों किया?’ रामानुज जी बोले-‘मुझे भले ही नरक में
जाना पड़े, परन्तु सबको स्वर्ग मिल जायेगा|’ गुरुदेव से रहा न गया, जन कल्याण को
प्रभु सेवा समझने वाले रामानुज को गले लगा लिया|
v स्वामी राम कृष्ण परमहंस जी के वचन है कि जब इंसान
दुनिया का धन प्राप्त कर लेता है तो उसमे अहंकार आ जाता है और वह स्वार्थी बन जाता
है वह यही सोचता है कि जिस तरीके से मैंने धन कमाया इसके बारे में मैं किसी को ना
बताऊँ| लेकिन जब इंसान को अन्तर का खजाना प्राप्त हो जाता है वह परमार्थी बन जाता
है वह सोचता है कि जो मैं सच्चा सुख मैंने पाया है वो सारी दुनिया प्राप्त करे|
v कृष्ण प्रेम की मतवाली राधा से एक बार किसी सखी ने
जब प्रेम के विषय में पूछा तो राधा ने उत्तर दिया-‘हे सखी| प्रेम के विषय में मैं तुम्हें
क्या बताउं? क्योंकि जो कुछ भी मैं इस विषय में जानती या अनुभव करती हूँ, उसे
प्रकट करने योग्य मेरे पास शब्द नही है| मैं तो बस इतना कह सकती हूँ कि यदि तू
प्रेम के विषय में जानना चाहती है तो फिर प्रभु चरणों में प्रेम करके देख|’
तात्पर्य यह है कि सच्चे प्रेम का वर्णन करना प्रेमी के लिए कठिन ही नही, असम्भव है|
और जो प्रेम का वर्णन करता है, जो प्रेम की डींगे मारता है, समझ लो वह प्रेम के
विषय में अभी अनजान है| वह अभी प्रेम समुन्द्र में गहरा नही उतरा, किनारे पर
डुबकियाँ मारकर कह रहा है कि मैंने प्रेम की थाह पा ली है| भला प्रेम की थाह किसी
ने पायी है? प्रेम का वास्तविक स्वरुप किसी ने जाना है? और जिसने प्रेम समुन्द्र
में गहरी डुबकी लगाई है, वह तो अपनी सुध-बुध खो बैठता है|
डूबे सो बोलै नही, बोलै सो अनजान |
गहरो प्रेम समुन्द्र कोउ, डूबे चतुर सुजान ||
v कहते है कि दो चीजों का एक साथ होना बहुत भाग्यशाली
मन गया है एक समय और दूसरा समझ| कहते है आम संसार में इंसान के पास जब समय होता है
तो समझ नहीं होती और जब समझ होती है तो समय नहीं होता| लेकिन गुरु मुख जन भाग्य
शाली है जिनको महापुरुषों की कृपा से समझ भी होती है और समय भी होता है|
v कहते है संसार में दो चीजे कभी झूठ नहीं बोलती एक
तो आईना और दूसरा महापुरुषों के वचन| जिस तरह आईने में अगर शक्ल देखि जाये तो वैसा
ही इंसान नजर आएगा जैसा उसका रूप है ऐसा नहीं की कोई गुर है तो काला नजर आएगा ठीक
इसी तरह महापुरुषों के वचन भी आत्मिक दर्पण की तरह होते है जो जीव को आत्मा की
पहचान करवाते है|
v मनुष्य के जीवन का अनुमान दिन, मास, वर्ष पर
नहीं, अपितु स्वांसो की संख्या पर निर्भर करता है| स्वस्थ होने की स्थिति में 21600 स्वांस प्रतिदिन के
निर्धारित है उनकी न्यूनता अथवा अधिकता से जीवन काल में न्यूनता अधिकता हो सकती है|
अतएव जिन कार्यों में स्वांस अधिक चले उनसे परहेज करना चाहिये|
स्वांसों की चाल (गति) इस
प्रकार है- बैठत बारह, चालत अठारह,
सोवत पच्चीस| अतएव समाधि लगाने से जिसमे
स्वांस पूर्णत: एक जाता है अथवा बहुत कम गति से चलता है|
जीवन बहुत बढ़ सकता है| यदि सुरत-शब्द योग का अभ्यास किया जाए तो आयु बढ़ने के साथ-साथ
एक विशेष लाभ यह भी है कि आत्मिक सुख और शान्ति भी प्राप्त होती है| किन्तु सुरत-शब्द-योग का
अभ्यास पूर्ण सतगुरु से विधिपूर्वक सीख कर ही करना चाहिये|
v सन्त मत का अभिप्राय है सन्तों की
मति अर्थात् मत पर चलना। सन्त
मत में सबसे मुख्य तीन बातें
हैंः- 1.सद्गुरु, 2.सत्संग,3.सत्यनाम।
सन्त मत में इन तीनों से ही सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है। जब तक इन तीनों से सम्पर्क
नहीं किया जाता तब तक वास्तविक उद्देश्य अर्थात् आत्म-कल्याण नहीं हो सकता।
v जैसे सोने को कभी जंग नही लगता और न ही लोहे पर
लकड़ी के कीड़ो का कुछ असर होता है| ऐसे ही सतगुरु का सेवक भी कभी नरको में नही जाता
है| जैसे अदालत के कानून द्वारा किसी को फाँसी की सजा हो गई है तो उस कानून को कोई
नही तोड़ सकता| यहाँ तक की जिस न्यायधीश ने यह निश्चय ने यह निर्णय दिया हो वह भी
उसे नही बचा सकता| यदि वह अपराधी राजा से दया की भीख माँगे तो वह राजा उसकी सजा को
रोक सकता है| इसी प्रकार सतगुरु भी अपने शिष्य की रक्षा संकट में करते हैं|
v यक्ष ने युधिष्ठिर से वनपर्व के समय कुछ प्रश्न
किये जिनमे से एक प्रश्न यह भी है कि ‘दिशा क्या है?’ उत्तर में युधिष्ठिर ने
कहा-‘’सत्पुरुष दिशा है, क्योंकि वो हम जीवों को उचित दिशा दिखाते हैं|’
एक अन्य प्रश्न है-‘मार्ग क्या है?’ इसका उत्तर
युधिष्ठिर ने इन शब्दों में दिया –‘येन गतः स पन्था’ अर्थात जिस मार्ग में संत
महापुरुष जाते हैं वही मार्ग है|
v किसी सेठ ने अपने नौकर को किसी कार्ये
हेतु विदेश भेजा | वह वहाँ जाकर ऐशो आराम में फँस गया | जिस उद्देश्य
से गया था वह तो भूल ही गया | जब लौटा तो नौकरी भी गवाँई और लज्जित भी हुआ | हमें भी प्रभु ने ये तन विशेषत: भजन भक्ति के लिए दिया है इसी पर्याप्त कारण
के लिए संसार में भेजा है यदि हम भी सांसारिक विषय भोगों में फँसकर अपना धेर्य भुला देंगे तो मालिक की कृपा से वंचित
हो जाएँगे और उनके सामने लज्जित होना पड़ेगा
v जो
आसमान में चाँद होता है वो तो घटता बढ़ता रहता है लेकिन जो
सच्चा
चंद्रमा (सतगुरु) के रूप में है वो नित्त बढ़ता रहता है बढ़ता रहता है|
v एक व्यक्ति ने हिमालय की चोटी पर रह कर काफी समय तप
किया जब वह वहाँ से वापिस आता है तो रास्ते में एक सन्त जी उन्हें मिलते हैं तो वह
उन सन्त जी को कहता है कि मैं काफी समय हिमालय की चोटी पर रहा| वहाँ भक्ति की मेरे अन्दर लोभ, मोह, काम, क्रोध, अहंकार बिलकुल भी नहीं है| तो सन्त जी ने कहा कि तुम
ऐसी जगह रहे जहाँ कोई रहता नहीं था| संसार में रहो तब इन से
बच के दिखाओ| तब वह संसार में कुछ दिन रहा तो किसी की बात
अच्छी ना लगे| केवल अपनी ही बात को आगे करे| इर्ष्या, लोभ, आने लगा तो
कहने का मतलब है कि इंसान का माया का त्याग तो तब माना जाएगा जब वह माया में रहकर
माया का त्याग करेगा||
v एक बार एक महात्मा जी नगर में पुहंचे वहाँ उन्होंने
देखा की हर कोई इतना व्यस्त है सभी जल्दी में है किसी के पास फुर्सत
ही नहीहै तो उन्होंने
किसी व्यक्ति से रोक
के पूछा की यहाँ सभी
इतने व्यस्त क्यों है किसी के पास रुकने तक का समय नही है हमने कई बार रोकने की कोशिश की | तो उस व्यक्ति ने कहा की ये सब अपने अपने काम
पर जा रहे है
तो महात्मा जी ने कहा ये अपने काम है इनमे से कोई भी अपना काम
नही है , अगर हम उनकी बातो पर विचार करे तो जिन संसार के कामो
में इंसान हर समय व्यस्त रहता है क्या संसार के काम धंधे अपने है और क्या ये आत्मा के किसी काम आते
है और परलोक में सहायता करते हैं
v कहते हैं कि एक बार एक मदारी ने बन्दर को पकड़ने की
तरकीब निकाली उसने सड़क के बीच में एक मटका रखा जिसके अन्दर कुछ चने डाल दिए| जब बन्दर ने मटके में चने देखे तो
उसने अपना हाथ मटके में डाला| जब वह चने उठाकर मुटठी बंद
करके हाथ बाहर निकलने लगा तो मटका टाईट था| मटके का मुँह
टाईट होने के कारण बन्दर मुटठी समेत हाथ बहार निकाल नहीं पाया| तो बन्दर ने सोचा कि मेरा हाथ मटके में फँस गया|
मटके ने मेरे हाथ को फँसा दिया जबकि उसे ये नहीं पता की उसने खुद ही अपना हाथ
मुटठी बन्द करके फँसा रखा है| ऐसी ही संसार की हालत है लोग
कहते हैं कि संसार की मोह माया ने हमें फंसा रखा है| लेकिन
ये नहीं पता की खुद ही संसार में अपने आप को फंसा रखा है|
v एक कन्या को विवाह नामक शब्द का कुछ भी ज्ञान नहीं
था जब वह पति के घर जाने के लिए डोली में बैठी तो उसने अपनी परिचारिका को बुलाया
और कहा, "तुमने मुझे यह कभी नहीं सिखाया कि मुझे पति के घर में क्या-क्या करना है? परिचारिका ने उत्तर दिया,
"बच्ची| चिंता की कोई बात नहीं है
तुम्हें केवल अपने माता-पिता के घर की ओर पीठ करनी है,
बाकि तुम्हें स्वयंमेव पता चल जाएगा कि तुम्हें क्या करना है|"
यही वास्तव में एक साधक के लिए आवश्यक है| उसी
कन्या के सामान साधक को भी केवल सांसारिक विषयों से मुख मोड़ना है और मालिक की तरफ
रूख करना है बाकि सतगुरु स्वयमेव बता देंगे| जीवन के
वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने का यह सबसे आसान उपाय है|
v जिस भक्ति की सब शास्त्रों तथा ग्रंथो ने इतनी
महिमा गाई है तथा जिसे अति दुर्लभ कहा गया है, वह गुरु की ही भक्ति है और गुरु
चरणों में ही पाई जाती है| इस भक्ति के अक्षरार्थ संतों ने यो बताए हैं| भक्ति
शब्द तीन अक्षर –भ+क+ति | ‘भ’ से भवसागर तराने वाली, ‘क’ से कल्याणकारी तथा ‘ति’
से तिमिर अज्ञान का नाश करके ज्ञान का प्रकाश करने वाली| ऐसी जो उत्तम भक्ति है वह
उसको प्राप्त होती है जिसकी सच्ची हार्दिक लगन तथा अनन्य प्रीति गुरुदेव के चरणों
में होती है अर्थात जब गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी की प्रीती –प्रतीति चित्त में
नही होती तब वह अनन्य प्रीती कहलाती है|
v महानता कभी ना गिरने में नहीं है, बल्कि हर बार
गिरकर उठ जाने में है|
v क्रोध को पाले रखना, गर्म कोयले को
किसी और पर फेंकने की नीयत से पकड़े रहने के सामान है; इसमें
आप स्वंय ही जलते हैं| ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियाँ पहले से
हमारी हैं| वो हमीं हैं जो अपनी आँखों पर हाँथ रख लेते हैं
और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है|
v कभी किसी को देखा है ये बोलते हुए
कि ओए कुत्ते, कुत्ते वाला काम कर या ओए गधे, गधे वाले काम कर लेकिन इंसान को ही
हमेशा बोला जाता है कि ओए इंसान, इंसान वाला काम कर| ओये बन्दे बन्दे वाला काम कर|
v कहते हैं जब कभी इंसान को बाहर
विदेश में जाना है तो वहां के लिए वहां की currency का इंतजाम करता है| इसी तरह
परलोक में भी जब आत्मा जाती है तो मालिक के नाम और अच्छे कर्मो की currency की
जरुरत होती है|
v जिस समय मन साफ़ है उस समय ही समझो
भगवान् का दर्शन हो सकता है|
v
भगवान ने मनुष्य को अपने ही समान बनाया, पर दुर्भाग्य
से इन्सान ने भगवान को अपने जैसा बना
डाला |
v हमेशा याद रखो कि आपकी खुद की
अनुमति के बिना कोई भी आपको ठेस नहीं पहुँचा सकता।
v वह जो अपने प्रियजनों से अत्यधिक
जुड़ा हुआ है, उसे चिंता और भय का सामना करना पड़ता है, क्योंकि
सभी दुखों कि जड़ लगाव है| इसलिए खुश रहने कि लिए लगाव छोड़ दीजिये
v जो लोंग मन को नियंत्रित नहीं
करते, उनके लिए
मन शत्रु के समान कार्य
करता है|
v क्षमा से क्रोध को जीतो, भलाई से बुराई को
जीतो, दरिद्रता को दान से
जीतो और सत्य से असत्यवादी को
जीतो |
v
आपके पास जो कुछ भी है उसे बढ़ाचढ़ा
कर मत बताइये और ना ही दुसरे से इर्ष्या कीजिये, जो दूसरो से इर्ष्या करता है उसे
मन की शन्ति नहीं मिलती|
v
एक दिन बिमारी ने कहा दौलत से:
“तुम कितनी खुशनसीब हो, हर कोई तुम्हें
पाने कि कोशिश करता है, और मैं कितनी बदनसीब हूँ कि हर शक्श मुझ से दूर भागता है”|
दौलत बोली: “खुशनसीब तो तुम हो, जिसे पा कर लोग अपने खुदा को यद् करते है, और
बदनसीब मैं हूँ, जिसे पा कर लोग अपने खुदा को ही भूल जाते है|
v एक जलते हुए दीपक (मोमबत्ती) से
हजारों दीपक रौशन किए जा सकते है, फिर भी उस दीपक की रौशनी कम नहीं होती| उसी तरह खुशियाँ बाँटने से बढ़ती है, कम नहीं होती|
v क्रोधित रहना, जलते हुए कोयले
को किसी दूसरे व्यक्ति पर फेंकने की इच्छा से पकड़े रहने के समान है| यह सबसे पहले आप को ही जलाता है|
v
जिस तरह से तूफ़ान एक मजबूत पत्थर को हिला नहीं पाता, उसी तरह से महान
व्यक्ति, तारीफ़ या आलोचना से प्रभावित नहीं होते|
v
जिस व्यक्ति का मन शांत होता है| जो व्यक्ति बोलते
और अपना काम करते समय शांत रहता है| वह वही व्यक्ति होता है
जिसने सच को हासिल कर लिया है और जो दुःख-तकलीफों से मुक्त हो चुका है|
v शांतिप्रिय लोग आनंद से जीवन जीते
हैं और उन पर हार या जीत का कोई प्रभाव नहीं पड़ता|
v हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह
एक शब्द है जो शांति लाये|
v हम जो सोचते हैं, वो बन जाते हैं|
v अकसर हम भगवान जी की आरती में सुनते है ओम जजी
अग्दिश हर भक्त जनों के संकट श्रण में दूर करे और अंतिम लाइनों में सुनते है कि
विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा| इव आत्मा की यह
माँग थी भगवान से कि उसे संतों को सेवा मिले बड़े ही पुन्य कर्मों से जीव को यह
अवसर प्रदान हुआ तब वह जाकर सतगुरु की शरण में आया उसे संतों का संग मिला|
v जामवंत ने हनुमान जी को उनकी दिव्य शक्ति, ताकत
कौशल की याद दिलाई थी| इसी तरह संत महापुरुष, सतगुरु सोई हुई आत्मा को जगाते है|
अरे इंसान! सर्वश्रेष्ठ राजा के पुत्र राजकुमार की तरह रहो और राजकुमार बन के रहो|
अपनी दिव्यता को पहचानो| तुम उस सर्वशक्तिमान परम पिता की सन्तान हो|
v विभीषण लंका में रहता था, किन्तु उसका रुख श्री राम
जी की तरफ था| रावण के निकट रहकर भी उसका रुख रावण की तरफ नही था| फिर परिणाम क्या
निकला? यही कि वह श्री राम से जाकर मिला| इसी प्रकार गुरुमुख भी जहाँ और जिस
अवस्था में रहे उसका रुख अपने इष्टदेव की तरफ रहे| उन्ही का ध्यान और उन्ही की
आज्ञा में रहे| कभी माया का उस पर अधिकार न हो सकता, न कभी मन दुखी हो सकता है|
v इंसान में 99 गुण हो 1 अवगुण हो तो लोग उनके 1
अवगुण की चर्चा ही
करते रहते है| इसके विपरीत किसी जीव में 99
अवगुण हो 1 गुण हो तो भी महापुरुष उसके अवगुणों को भूल कर उसके गुण पर ध्यान देते
है|
v महात्मा बुद्ध ने कहा था ----बोधिसत्व ( आत्म
विज्ञान और प्रभु स्मरण ) का दीप जलाकर आगे बडो, संसार में किसी स्थान पर आपको भय न
होगा अर्थात आत्मिक ज्ञान ही यथार्थ ज्योति है | समयनुसार
संत महापुरुष इसी आत्मिक –ज्योति को ही जगत में प्रकाशित
करते आयें हैं |
v कहते है अगर इंसान को बहुत जोर से प्यास लगी हुई है
तो वो एक घूंट भी पानी पी ले तब भी उसको तृप्ति हो जायेगी| लेकिन वो पानी ना पिए
और हजारों ही पानी से भरी बाल्टियाँ अपने ऊपर डाल ले तो उसकी प्यास नहीं बुझ सकती|
ऐसा ही संसार का हाल है प्यास तो अन्तेर आत्मा में लगी है लेकिन वो बाहरी प्यास
बुझाने में लगा हुआ है|
v जिस प्रकार किसी नदी के ऊपर पुल बना दिया जाए तो
इंसान सहज से ही उस नदी को पार कर लेता है ठीक इसी प्रकार महापुरुषों ने जो भक्ति
साधन बनाए ऊँ पर चलकर इन्सान सहज में ही भाव से पार हो जाता है|
v कहते है जब भगवान श्री कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली
पर उठा लिया तो जिन लोगो को भय था श्री कृष्ण जी पर पूर्ण विशवास नहीं थे उन लोगो
ने अपनी लाठियाँ पर्वत के नीचे लगा ली
ताकि पर्वत गिरे ना| ये उनकी अज्ञानता थी
कि उन्हें कृष्ण जी पर पूर्ण विशवास नहीं था ऐसे ही जिनको सतगुरु पर पूर्ण विशवास
नहीं होता वहीँ लोग चिंता करते है|
v इंसान जब एअरपोर्ट पर किसी अपने बन्दे को रिसीव
करने जाता है तो जब वह एअरपोर्ट पर कई लोगो को देखता है तो उसे ख़ुशी नहीं होती
लेकिन जैसे ही उसकी नजर अपने बन्दे पर पड़ती है उसी समय उसका मन ख़ुशी से खिल उठता
है इसी प्रकार जब जन्मो –जन्मों से बिछड़ी आत्मा अपने सतगुरु से मिलती है तो वो भी
ख़ुशी में झूम उठती है|
v काले कपड़े यदि स्याही की बोतल भी उड़ेल दी जाए तो उस
कपड़े के रंग –रूप
में कुछ अंतर मालुम नही होता| स्याही तो बिलकुल नजर नही आती,
परन्तु जब कपड़ा धुलेगा उस समय स्याही निकलेगी| परन्तु सफेद कपड़े पर यदि जरा – सी स्याही लगा दी जाए
तो उसका धब्बा दूर से दिखाई देगा| इसी प्रकार इन्सान जन्म
-जन्मान्तरो से माया के पंजो में आया हुआ है कि काले कपड़े कि न्याई से पता नही
चलता कि मुझ पर माया के कितने आवरण चढ़े हुए है| जब मनुष्य
सन्त महापुरुषो की संगति प्राप्त करता है तो माया के झीने आवरण दूर होते हैं|
मायावी जीव को इसका कुछ भी ज्ञान नही| इसकी
अपेक्षा गुरुमुखजन सफेद वस्त्र के सामान हैं| जब भी माया
तनिक- सा उन पर अपना प्रभाव डालती है तो सफेद वस्त्र पर धब्बे की न्याईं दूर से
दिखाई देती है| अंत: गुरुमुख सद्गुरू का आश्रय लेकर उसे दूर
करने में समर्थ हो जाते हैं|
v यह सामान्य अनुभव की बात है कि जब बड़ा भाई अपने
छोटे भाई के साथ छुपना और ढूँढना खेलता है तो बड़ा भाई जानबूझकर ऐसा मौका देता है
कि वह उसे ढूँढ ले मान लो वह निश्चय कर ले कि मैं ऐसी जगह छिप जाऊं कि छोटा भाई
मुझे ना ढूँढ पाये तो यह उसके लिए कौन सी बड़ी बात है पर फिर भी वह अपने भाई की
ख़ुशी के लिए ऐसी जगह छिपता है जहाँ उसका भाई उसे आसानी से ढूँढ ले| जब छोटा भाई बड़े भाई को ढूँढ लेता
है तो वह बहुत खुश होता है और बड़ा भाई इसका श्रेय उसी को ही देता है यदि वह जनता
है कि वह स्वयं को प्रकट ना करता तो उसका भाई न ढूंढ पाता| ठीक
इसी प्रकार शरीर रूप में मालिक सतगुरु अपने प्रति श्रद्धा-प्रेम
का श्रेय हमको ही दे देते हैं| उनके कार्यों में बड़ा भेद भरा
होता है और उनकी लीला को जाना नहीं जा सकता कि वह अधिकारी आत्माओं को किस प्रकार
चुन लेते हैं| श्री परमहंस दयाल जी एक बार घूमते-घूमते अपने तदनुरूप शिष्य श्री स्वामी स्वरुप आनन्द जी को अपना रूप
दर्शाने के लिए टेरी पधारे थे परन्तु वास्तव में यह श्री सतगुरुदेव जी की मौज थी
कि वे टेरी जाकर अपने उत्तराधिकारी को ढूँढना चाहते थे| इसी
प्रकार ही सभी महापुरुष इस गूढ रहस्य को प्रदर्शित करते आये हैं||
v सुरति की अन्तमुखी यात्रा के लिए आवश्यक है कि नीचे
के नौ द्वारो को बंद किया जाये और दसवां द्वार, जो दोनों भोहों के मध्य और थोडा
पीछे की ओर स्थित है, उसे खोला जाये| उस
द्वार से अध्यात्मिक राज्य में जाकर सुरति सुख और आनन्द में रमण करती है| दसवे द्वार को इस भौतिक आँखों से नहीं देखा जा सकता| इस द्वार से अन्दर जाने के लिए अपने गुरु द्वारा बताये गये तरीके से
नियमित रूप से निरंतर प्रयास करना चाहिए| जब इस द्वार से
सुरति भीतर जाती है तो वहाँ उस सतगुरु के प्रकाश पुंज स्वरुप के दर्शन होते हैं,
जो उर्ध्वमुर्ख यात्रा में उसकी सहायता करने के लिए प्रतीक्षा कर
रहे होते हैं| बाईबल में लिखा है - "दरवाजा खटखटाओ और वह खुलेगा"| इसका तात्पर्य इस
"दसवे द्वार" अथवा "तीसरी आँख" या "शिव
नेत्र" से है|
v "जाप का तरीका" ऐ साधक| युग बीत गए तुम्हें लकड़ी की माला फेरते हुए|
किन्तु तुम्हारे मन में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया| वह तो पहले की भांति ही पारे के समान चंचल है इसलिए इस बनावटी माला को
छोड़कर अपनी ही भलाई के लिए मन के मनकों की माला फेरो, जो
तुम्हारे घट में स्वभाविक ही चल रही है|
जिस माला को तुम फेरते हो, वह तो लकड़ी के मनको की बनी हुई है
और इसे फेरने में तुम्हें प्रत्यन्न भी करना पड़ता है परन्तु स्वाभाविक और ईश्वर-निर्मित स्वांसों की माला अपने आप ही चल रही है तथा उसमे न तो कोई गाँठ ही
है और न अन्त में उसे बंद करने के लिए कोई बड़ा मनका ही है| (जैसे
मनुष्य द्वारा निर्मित झूठी माला में होता है)
ü माला फेरते समय तुम्हारा ध्यान तो माला की गिनती की
ओर होता है और मन इन्द्रिय सुखों की तलाश में बाहर भाग गया होता है| इस तरह की पूजा तुम्हारे किसी काम
नहीं आयेगी| मन जिसे मालिक से मिलने के लिए भीतर जाने का
अभ्यास होना चाहिए था वह तो हिला ही नहीं है अर्थात उसके स्वभाव में पहले से कुछ
भी परिवर्तन नहीं हुआ|
ü बाहरी दिखावे की इस पूजा और प्रार्थना का क्या लाभ? उस मालिक का नाम अपने भीतर में जपो|
मालिक से मिलना कोई खेल नहीं है वह दिखावटी पूजा से प्रसन्न नहीं
होता| उसे मिलने के लिए श्रद्धा और सच्ची भक्ति की आवश्यकता
है|
ü तुम्हारे घट में मालिक के नाम की धुन सहज रूप से
निरंतर चल रही है परन्तु उसे सुनने के लिए तुम्हें अपनी "सुरत" को शब्द के साथ मिलाना है अथवा दूसरे शब्दों में "सुरत-शब्द-योग" का आभास करना है| जिसमे होठं हिलाने की कोई आवश्यकता
नहीं|
ü अजपा जाप तो हमारे घट में निरंतर चल रहा है उसे
मालिक ने अति कृपा करके हमें बता दिया है| सन्त श्री कबीर साहिब जी कहते थे कि अब मेरा मन अजपा जाप
में पूरी तरह लवलीन हो गया है||
v सम्पति दो तरह की मानी गयी है- एक 'चल
सम्पति' जैसे- नकद रुपया तथा आभूषण आदि
और दूसरी 'अचल सम्पति' जैसे जमीन तथा
मकान आदि| यदि कभी एक शहर से दूसरे शहर जाना हो, तब रुपया तथा आभूषण एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से ले जाये जा सकते
है, इसे चल सम्पति
कहते हैं| मगर जमीन तथा मकान जोकि अचल सम्पति है, साथ नहीं ले जाये जा सकते| इसी तरह इस मनुष्य का
शरीर भी जमीन या मकान की तरह आध्यात्मिक दृष्टि से अचल सम्पति है इस लोक में इस
मनुष्य शरीर से जितना काम ले लिया जाये, मगर अन्त को इसने
साथ नहीं जाना| यह यहाँ रह जाने वाली चीज़ है| इसके विपरीत नाम की कमाई चल संपत्ति है, जो परलोक
में भी साथ देती है इसलिए सन्त महापुरुष फरमाते हैं कि बुद्धिमान वह है जिसने इस
शरीर के साथ ले जाने वाली नाम की अधिक से अधिक सम्पति संचित कर ली है| जिसने इस शरीर द्वारा रूहानी धन को प्राप्त कर लिया, वह लाभ में रहा, क्योंकि मनुष्य-शरीर तो इस जीव के साथ कुछ समय तक ही है| अन्त में
इसने अलग हो जाना है फिर क्यों न इससे वह धन कमाया जाये, जो
मरने के बाद भी काम आवे? इसलिए अपने मन और शरीर को सदगुरु के
चरणों में सौंपकर नाम और भक्ति का धन प्राप्त करना ही बुद्धिमानी है|
कबीर सो धन संचिये, जो आगे को होय|
सीस चढ़ाये गाठरी, जात न देखे कोय||
v जिस प्रकार नेत्रों से अपना मुख किसी को नहीं दिखाई
दे सकता यदि अपना मुख देखना है तो दर्पण की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अपनी
आत्मा को निज स्वरुप देखने के लिए भी आत्मिक दर्पण की आवश्यकता है|
अब यदि तुमसे कोई कहे कि तुम्हारे मुख पर दाग और
धब्बे हैं| तब तुम तत्काल दर्पण की खोज करोगे, यह निश्चय करने के लिए कि क्या
वास्तव में मेरे मुख पर दाग और धब्बे हैं या नही? यदि हैं तो जब तक तुम उन्हें दूर
न कर लोगे, तुम्हें चैन आराम नहीं आवेगा| क्योंकि तुम्हें सदैव यह ध्यान बना रहेगा
कि यदि मेरे चेहरे से दाग और धब्बे दूर न हुए तो प्रतिष्ठित पुरुषों की सभा में बैठने
योग्य नही रहूँगा| तब तुम कितनी चिंता में पड़ जाते हो और कितना शीघ्र उनके दूर
करने के उपाय में लग जाते हो| परन्तु कब, जबकि पहले दर्पण में अपना मुख देख लेने
से दाग और धब्बे होने का निश्चय हो जाता है| इसी प्रकार ही तुम जोकि वास्तव में
आत्मा या रूह हो और तुम्हारी रूह पर माया की मलिनता के अनेकों दाग और धब्बे पड़
चुके है, जोकि तुम्हें स्वयं दिखाई नही दे सकते| इसके लिए आत्मिक दर्पण में ही
अपने स्वरुप को देखो| आत्मिक दर्पण क्या है?संत सतगुरु का सत्संग, उनका वचन और
उनका ध्यान| उनके सत्संग और उनके ध्यान में ही तुमको रूह की मलिनता का ज्ञान होगा
और यही से ही उसके दूर करने का उपाय भी हाथ आएगा|
साध संग में चांदना, सकल अँधेरा और|
सहजो दुर्लभ पाइये, सत्संग में ठौर ||
संत सतगुरु के सत्संग में आकर तुम प्रकाश में आ
जाते हो, तुम्हें अपनी आत्मा का निज स्वरुप स्पष्ट देखने को मिलता है और तभी तुम
अपने आप को जान सकते हो|
v हमारे धार्मिक ग्रंथो में मनुष्य की अवस्थायों को
चार भागों में विभक्त किया गया है – ब्रह्मचर्य, ग्रहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास |
ब्रह्मचर्य – प्रथम पच्चीस वर्ष तक विध्याध्ययन, दूसरे भाग में अर्थात ग्रहस्थ में
पत्नी और अपनी संतान का पालन पोषण करना तीसरी अवस्था में इन सबसे उदासीन होकर
एकांत में अपने मन को साधना तथा चौथी अवस्था में संन्यास धारण कर लेना|
·
ब्रह्मचर्य
अवस्था में जीव को आत्मिक
ज्ञान प्राप्त करना चाहिए| क्योंकि बचपन में जो संस्कार जीव के मन में पड़ जाए, वही
बाद बड़े होकर फुलते – फलते हैं|
·
गृहस्थ
अवस्था में अपने परिवार का
पालन –पोषण करते हुए संत महात्माओं की सेवा करना, अतिथि सत्कार तथा दीन –दुखियों
की सहायता करना परम कर्तव्य है| गृहस्थाश्रम में जीव को अनासक्त भाव से जीवन
व्यतीत करना चाहिए|
·
वानप्रस्थ
का अर्थ है मन के
ख्यालों पर प्रतिबन्ध लगाना, चित्वृतियों को विषय विकारों से उपराम करना| मन को
मायावी पदार्थों से मोड़कर आत्म ज्ञान की ओर लगाना ही वानप्रस्थ है|
·
संन्यास
का अर्थ है –शुद्ध
पवित्र भाव से आत्म भाव में स्थित होना| जब जीव मन पर विजय प्राप्त कर सब इच्छाओं
तथा वासनाओं से मन को मुक्त कर दे तो वही संन्यास है|
v बल कई प्रकार का कहा जाता है
जैसे-
1) शरीरिक बल, 2) मानसिक बल, 3) बौद्धिक बल, 4) धन का बल, 5)
पद एवं अधिकार का बल
·
शरीरिक
बल - कई व्यक्तियों का शरीर कुदरती तौर
पर दूसरों की तुलना में लम्बा-चौड़ा और तगड़ा होता है ऐसे
व्यक्तियों में प्राय: दूसरों की तुलना में अभिमान आ जाता है
और यही अभिमान उन्हें भगवान से दूर ले जाता है| इसलिए इंसान
को अपने शारीरिक बल का अभिमान नहीं करना चाहिए|
·
मानसिक
बल - यह बल मानसिक जाप और मन की एकाग्रता
से प्राप्त होता है और इससे मनुष्य को अनेक प्रकार की सिद्ध शक्तियाँ प्राप्त हो
जाती हैं| यह बल भी मनुष्य के अन्दर अहंकार भर देता है
महर्षि विश्वामित्र तथा महर्षि दुर्वासा का नाम तो इस विषय में विशेष उल्लेखनीय है,
क्योंकि वे तनिक सी बात पर रुष्ट हो जाते थे और क्रोध में आकर इन
शक्तियों का प्रयोग करने लगते थे|
·
बौद्धिक
बल - बुद्धि तो भगवान ने प्रत्येक मनुष्य
को दी है, परन्तु जब मनुष्य खूब विद्या ग्रहण कर लेता है और
विद्वान बन जाता है, तो फिर उसकी बुद्धि दूसरों की तुलना में
अधिक विकसित एवं कुशाग्र हो जाती है इसी को बौद्धिक बल कहते हैं| ऐसा मनुष्य अपने तर्क- वितर्क के बल पर दूसरों से
अपनी बात मनवा लेने में सक्षम हो जाता है और जब वह ऐसा करने में सक्षम हो जाता है
तो फिर उसमे अहंकार आ जाना स्वाभाविक है
·
धन
का बल - धन भी संसार में एक प्रकार की शक्ति
है इसलिए धन पाकर भी मनुष्य अहंकार में चूर हो जाता है| ऐसा
मनुष्य यही समझता है कि उसके समान संसार में दूसरा कोई नहीं है वह समझता है कि धन
के बल पर जो चाहूँ कर सकता हूँ और जो कुछ चाहूँ प्राप्त कर सकता हूँ|
·
पद
एवं अधिकार का बल - पद एवं अधिकार पाकर भी मनुष्य के
अन्दर अहंकार खूब बढ़ जाता है और इस अहंकार के नशे में वह किसी को कुछ नहीं समझता|
वह इस बात को पूरी तरह से भूल जाता है कि सब कुछ देने वाला तो
परमात्मा है| वह चाहे तो एक पल में ही सब कुछ ले भी सकता है|
v शरीर के नव द्वारो (दो आँखे, दो कान, दो नासाग्र,
मुँह, मलद्वार और लिगेन्द्रिय) से इन्द्रिया जनित श्रणिक सुख का उपभोग किया जाता
है| इन द्वारों से ऊपर उठकर सुरति की ओर जाती है तो वह परम सुख और आनंद का
रसास्वादन करती है| ज्यो -2 सुरति ऊपर की ओर जाती है| आनंद बढ़ता जाता है| नित्य
सुख, मानसिक शांति अथवा शाश्वत आनंद तभी प्राप्त होता है जब सुरति ह्रदय में
प्रकाशपुंज सतगुरु के दर्शन करती है| जब मनुष्य इस अवस्था में पहुँचता है तो यह एक
बहुत बड़ी उपलब्धि है | परन्तु यह अवस्था एकाग्रचित होकर निरंतर अभ्यास करने से
काफी समय बाद प्राप्त होती है और तब भी गुरु की कृपा के बिना नहीं| सतगुरु ईश्वर
के ही रूप है| वे ईश्वर का सन्देश लेकर किसी विशेष उद्देश्य से इस भू लोक पर
अवतरित होते हैं| सतगुरु के प्रति प्रेम का अर्थ है| ईश्वर के प्रति प्रेम| इसलिए
इस प्रश्न पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि सतगुरु से प्रेम कैसे किया
जाए? अत: पूर्ण श्रद्धा से सतगुरु के वचनों का पालन करना चाहिए| उनसे दिलो जान से
प्रेम करना चाहिए| भक्ति भावना से उनकी सेवा करनी चाहिए और आत्मिक उन्नति के लिए
उनके चरणों में आत्म समर्पण कर देना चाहिए| यदि साधक बस इतना ही कर ले तो शेष सब
कुछ सतगुरु स्वय कर लेंगे| तब साधक अपने अंदर एक विलक्षण प्रकार की जाग्रति का
अनुभव करने लगेगा| भक्ति पाठ पैर दृढ़ता पूर्वक चलने से सतगुरु की कृपा और दया बड़ी
सुगमता से प्राप्त की जा सकती है क्योंकि वे बड़े दयावान और कृपालु है| पूर्ण
सतगुरु के बताये मार्ग पैर चलकर कुछ समय में साधक को प्रकाश पुंज रूप में दर्शन
होने लगेंगे जो शरीर रूप में साक्षात् ईश्वर है, पूजनीय एवं वन्दनीय है| जब हमने
अपना सर्वस्व ही सतगुरु को सौंप दिया तो फिर उसके अतिरिक्त और रह ही क्या गया, फिर
हमे उनकी मौज से जो कुछ मिलता है वह हमारे लिए ‘प्रसाद’ है चाहे वह आशीर्वाद और या
नाराजगी हो| सब कुछ हमे मधुर लगना चाहिए क्योंकि वह हमारी भलाई के लिए होगा|
v कर्म तीन प्रकार के है
·
संचित
कर्म
·
प्रारब्ध
कर्म
·
क्रियमाण
कर्म
'संचित कर्म' हमारे पिछले जन्मों का परिणाम है जो अभी
तक चुकाये नहीं गए है| प्रारब्ध कर्म पिछले जन्मों के उन
कर्मो का फल है, जिस पर हमारा वर्तमान जीवन आश्रित है और
जिसके कारण हमें वर्तमान जन्म मिला है अर्थात अपने प्रारब्ध के अनुसार अच्छे और
बुरे कर्मो का भोग भोगने के लिए यह जन्म मिला है| प्रारब्ध
कर्म संचित कर्मो का उपविभाग है जो कर्मो का कुलयोग है| 'प्रारब्ध'
'संचित' का पूर्ण भाग नहीं है बल्कि संचित का
एक भाग है जिसके परिणाम हमें वर्तमान जन्म में भुगतने पड़ते है 'संचित कर्म' एक किसान के कार्य का प्रमाण लेकर भी
समझ सकते हैं| वह अपनी एकत्र की हुई (संचित) फसल पर निर्वाह
करता है| यदि कुछ अधिक फसल होती तो उसे वह भविष्य के लिए
अर्थात विपत्ति काल के अलग रख देता है| इसी प्रकार कुछ नए
कर्म जो प्रत्येक जीवन के अन्त में इकट्ठे होते हैं, वे अलग
सुरक्षित रख दिए जाते हैं| जब प्रारब्ध कर्म ख़त्म हो जाते
हैं तो उन्हें प्रयोग में लाया जाता है| यह एक दम असंभव है
कि इस जीवन में नए कर्म बिल्कुल न किये हो|
'क्रियमाण' कर्म वे कर्म है जो अब हो रहे है या
जिन्हें हम अब कर रहे हैं, दूसरे शब्दों में भाग्य से गुजरते
हुए हम प्रतिदिन नये कर्म करते ही जा रहे हैं| जिनके परिणाम
हम भविष्य के जीवन में भाग्य अथवा भाग्य के अंश के रूप में या फिर संचित कर्मो के
रूप में भोगेंगे| हम निरन्तर क्रियमाण कर्म कर रहे हैं| यही क्रियमाण कर्म ही सुख, दुःख एवं हमारे विविध
जन्मों का कारण बनते है|
v संसार में महापुरुषों का अवतार दो प्रकार का होता
है-
1) निमित्त अवतार 2) नित्य अवतार |
निमित्त अवतार किसी विशेष कारण अथवा घटना को लेकर
होता है| जैसे सत्तयुग में हिरनकश्यप के पापों का अंत करने के लिए प्रभु ने
नृसिंहरूप अवतार लिया था| त्रेता युग में राम जी ने रावण का वध किया, द्वापर में
भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया |
नित्य अवतार संत, महापुरुषों के रूप में होता है|
उनका जन्म ही संसार में लोगों को नाम, उपदेश देकर सच्चा आत्मिक ज्ञान प्रदान करना
होता है| संसार में रहकर अपने उचित कर्मों से विमुख हुए जीवों को वे अपने
अध्यात्मिक अमृत से शिक्षा देकर उन्हें भक्ति पथ पर चलने तथा आत्म उन्नति के लिए
अग्रसर होने में सहायक बनते हैं|
v वैराग्य चार प्रकार का है -
v शमशान वैराग्य- जो किसी व्यक्ति के शव को दफ़न करने अथवा जलाने के समय साथ जाने वाले लोगों
के दिलो में पैदा होता है उस समय सारा संसार तुच्छ लगता है पर जब शव को दबाकर अथवा
जलाकर वापिस आए और अपने कार्य में व्यस्त होए तो इंसान सब कुछ भूल जाता है|
न फूल इस ऐशे दुनिया पर, कि ये सब चन्द रोजा है |
तुझे जाना वहाँ पर है, जहाँ सब का ठिकाना है ||
·
लखोटा
वैराग्य- जो
किसी कष्ट के आने पर उत्पन्न होता है| जब तक कष्ट का सामना
होता है वैराग्य रहता है और जब कष्ट दूर हो जाता है तो यह वैराग्य भी खत्म हो जाता
है|
·
मन्द
वैराग्य- जिसमे संसार के साथ राग और वैराग्य
दोनों पाये जाते हैं कभी तो यह विश्वास हो जाता है कि संसार तुच्छ, अस्थायी एवं नाशवान है इसमें चित्त फँसाना व्यर्थ है लेकिन फिर किसी समय
कामनाओं का ऐसा प्रबल रेला आता है| कि उसके जोर में वह
वैराग्य बहा चला जाता है|
·
दृढ़
वैराग्य- जिसमे दैवी शक्ति की जय पूरी तरह से
होती है और संसार का त्याग पूर्णरूप से हो जाता है यह वास्तविक वैराग्य है जिसके
उत्पन्न हो जाने पर मन से मान, बड़ाई, इर्ष्या
आदि सभी आसुरी गुण दूर हो जाते हैं||
v संतो ने तीर्थ तीन प्रकार के कहे है| स्थानीय तीर्थ, जंगम तीर्थ, घट का तीर्थ|
·
स्थानीय
तीर्थ वह है जहाँ पर सन्त
महापुरुष प्रकट होकर किसी आश्रम या सरोवर की स्थापना करते हैं| वहाँ पहुँचने पर मनुष्य के विचारो
में स्वयं पवित्रता आनी शुरू हो जाती है महापुरुषों के श्री चरण कमलो की रज के जो
कण उड़ते है वे वायुमंडल को पवित्र बना देते हैं जैसे अग्नि के समीप गर्मी तथा जल
के समीप शीलता अनुभव होती है, उसी प्रकार सन्त महापुरुषों की
समीपता में शान्ति, आनन्द तथा प्रसन्नता का मिलना स्वभाविक
है||
·
दूसरा
है जंगम तीर्थ- जब सन्त महापुरुष एक स्थान से दूसरे
स्थान पर जीव कल्याण हेतु पधारते हैं तो वह जंगम तीर्थ कहलाता है| दूर व समीप से भाग्यशाली जीव आकर दर्शन करते हैं तथा सत्संग लाभ प्राप्त
करते हैं यह जंगम अथार्त चलता फिरता तीर्थ दूर-दूर देशो में
जाकर तथा स्थानों पर पहुँचकर जन-जन को स्नान करता हुआ पापों
को हरता है||
·
तीसरा
है घट का तीर्थ- जब सन्त महापुरुष अपनी शरण में आये
हुए जीवों को रूहानी उपदेश की दात बक्शते हैं और जीव की बाह्य पदार्थों से सुरति
हटाकर ब्रह्माण्ड देश में ठहराने का उपाय बताते हैं और साधक लक्ष्य पर सुरति
ठहराना सीख जाता है तो वह घट तीर्थ का दर्शन कहलाता है जैसे प्रयागराज में तीन
नदियों का संगम होता है वैसे ही घट में इडा, पिगाला, सुषुम्णा तीनों नाड़ियों का मिलाप होता है, जिसका
पूर्ण रहस्य सन्त सदगुरु ही बता सकते हैं| जिसने इस तीर्थ
में स्नान कर लिया, वह मालिक का प्यारा बन गया||
v कहते हैं कि हित दो प्रकार के होते हैं –एक
शारीरिक| दूसरा –आत्मिक या रूहानी| हमारे शरीर का हित चाहने वाले और प्यार करने
वाले तो संसारिक सम्बन्धी है| शारीरिक हित की समझ रखने वाले अथवा उसकी मदद करने
वाले तो आम लोग भी होते हैं| दुनिया में अक्सर इसी को पराया हित समझा जाता है|
परन्तु रूहानी हित करने वाले संसार में केवल संत अवतार ही हुआ करते हैं अथवा हमारी
रूह के साथ हित और प्यार रखने वाले संत सतगुरु ही हैं| अतः शारीरिक सहायता संसारी
सम्बन्धों से मिलती है| अतः रूह की सहायता संत सतगुरु करते हैं लेकिन असल सहायता रूह की ही समझनी
चाहिए, क्योंकि शरीर की सहायता कोई कितनी करेगा और कब तक करेगा| कारण यह कि पहले
तो शरीर के होते हुए ही सम्बन्धी साथ छोड़ जाते हैं| शरीर तक निभाएं भी सही तो शरीर
के समाप्त होने पर उनका हित प्यार भी समाप्त हो जाता है| लेकिन रूह के हितैषी तो
ऐसा नही करते, वे तो शरीर छूटने के पश्चात् भी रूह के साथ रहते हैं| इसलिए शरीर के
साथी कच्चे और रूह के साथी पक्की मित्र है|
vनित्य प्रति श्री आरती पूजा में
स्त्रोत में पढ़ते हैं।
शुक सनकादिक,ध्रुव नारदादिक गुरु उपदेश ते अमरणम।
ऋषि मुनि जन
प्रकृत जग में लै दीक्षा प्रभु सुमिरणम।
शुकदेव जी को गर्भयोगीश्वर कहा
जाता है। जब वह माता के गर्भ में ही थे तो उन्हें ज्ञान प्राप्त था परन्तु बिना
गुरु के वे भी मोक्ष के अधिकारी नहीं हुये। जब उन्होने महाराज जनक जी को गुरु धारण
किया तो वह मोक्ष के अधिकारी हुये।
गर्भ योगीश्वर गुरु बिना लागा हरि की सेव।
कहें कबीर वैकुण्ठ से फेर दिया शुकदेव।।
जनक विदेही गुरु किया लागा हरि की सेव।
कहें कबीर वैकुण्ठ में फेर मिला शुकदेव।।
सनक,सनन्दन,सनत कुमार,सनातन और देवर्षि नारद जी ब्राहृा जी के
मानस पुत्र कहलाते हैं। गुरुदेव की कृपा से उनसे नाम दीक्षा लेकर सुमिरण किया
तभी वे अमरपद को प्राप्त हुये। धनी धर्म दास जी परम
सन्त श्री कबीर
साहिब जी के शिष्य हुये हैं,वे गुरु महिमा में वर्णन करते हैं।
अखिल विवुध जग में अधिकारी। व्यास वशिष्ठ महान
आचारी।
गौतम कपिल कणाद पातञ्जलि।जौमिनी बाल्मीकि चरणन बलि।
ये सब गुरु की शरणहिं आये। तासे जग में श्रेष्ठ
कहाये।।
विश्व में जितने भी ऋषि मुनि,राजर्षि,महर्षि,ब्राहृर्षि,देवर्षि हुयें हैं उदाहरण देते हैं गौतम,कपिल,कणाद,पातञ्जलि,वेदव्यास,वसिष्ठ,बाल्मीकि आदि
ये सब शास्त्रों के रचियता, ब्राहृनिष्ठ उच्चकोटि के
महापुरुष हुये हैं सभी गुरु की शरण में आये उनकी सेवा करके उनकी प्रसन्नता व कृपा
के पात्र बने तब ही जग में श्रेष्ठ और पुज्यनीय हुये।
v नौ लख जल के जीव बताए|
बहुत
जन्म इनमे भुगताये ||
पंछी
जाति कही दस लाखा|
आगू सूँ चली आई साथा ||
ग्यारह
लाख कृमकीट लगाऊँ |
जिमीं
माहिं जो चलत दिखाऊँ ||
बीस लाख
थावर बिसतारा |
भरमत भरमत ही पचि हारा ||
तीस लाख पसु जोनि सुनाया |
धनी बार सो पहिरी काया ||
चारहु लाख मनुक्खा देही |
लख चौरासी यह सुनि लेही ||
जल के जीव -9,00,000
हवा में
उड़ने वाले पक्षी -10,00,000
कीड़े
मकोड़े, रेंगने वाले – 11,00,000
पत्थर
,पहाड़ आदि – 20,00,000
पशु - 30,00,000
मनुष्य
जाति - 4,00,000
कुल
= ---------------------------
84,00,000.
****
No comments:
Post a Comment