Wednesday, April 29, 2020

श्री रामचरित मानस जी (दोहावली)

(श्री रामचरित मानस जी)

 

v  जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥                                          

अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नजर आती है|

 

v  भक्ति तात अनुपम सुखमूला| मिलइ जो संत होंई अनुकूला ||

श्री राम जी लक्ष्मण को कहते हैं कि संसार में भगवान की कृपा के बिना संत शरण नहीं मिलती और संतो की शरण के बिना इंसान को वो सुख नहीं मिलता जिसके लिए वह निरंतर प्रयास करता है|

 

v सिया राममय सब जग जानी। करउं प्रणाम जोरि युग पानी।।

जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं, उन सब से भरे हुए इस सारे संसार को श्री सियाराम के समान जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

 

v  अस अभिमान जाई जनि भोरे| मैं सेवक रघुपति पति मोरे ||

अर्थ:- ‘सेवक की चाह यह है कि ऐसा अभिमान तो भूलकर भी मेरे मन से न जाए कि मैं अपने इष्टदेव का सेवक हूँ और वे मेरे स्वामी है|’

 

v  भक्ति हीन गुण सब सुख ऐसे| लवन  बिना बहु बिंजन जैसे||

यदि किसी व्यक्ति में अनेकों गुण हो लेकिन भक्ति का गुण ना हो तो सत्पुरुषों की दृष्टि में कौड़ी के बराबर भी नहीं है| यदि केवल भक्ति का गुण हो तो वह अनेको गुणों से बढ़कर है| जिस प्रकार नमक के बिना सभी व्यंजन फीके लगते हैं अथवा चाँद के बिना सितारों जड़ित आकाश भी शोभायमान नहीं होता, इसी प्रकार भक्ति के बिना अनेकों गुण किसी के काम के नहीं, क्योंकि भक्ति ही मानुष जीवन का सुंदर श्रृंगार है|

 

vरहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की ॥

अर्थात् प्रभु के चित्त में अपने भक्तों की हुई भूलचूक याद नहीं रहती पर भक्तों के भक्तिमय हृदय की सॊ सॊ बार याद करते है ।

 

v  सोई सेवक प्रियतम मम सोई| मम अनुशासन मानै जोई ||

श्री राम जी वचन करते हैं वही मेरा सेवक है और वही मुझे प्यारा है जो मेरी आज्ञा मानता है|

 

v पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा॥

हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा॥

भावार्थ:-बालि ने बार-बार भगवान्‌ की ओर देखकर चित्त को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। वह श्री रामजी की ओर देखकर बोला

 

v धर्म हेतु अवतरेहु गोसाईं। मारेहु मोहि ब्याध की नाईं॥

   मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कवन नाथ मोहि मारा॥

भावार्थ:-हे गोसाईं। आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया है और मुझे व्याध की तरह (छिपकर) मारा? मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा? हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा?

 

v अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी॥

   इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई॥

भावार्थ:-(श्री रामजी ने कहा-) हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहिन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता॥

 

vजन्म-जन्म मुनि जतन कराही| अंत राम कहि आवत नाही ||

जब बाली का अंत समय आया तो उसने श्री चरणों में प्रार्थना की ‘हे प्रभु, लोग बड़ी-बड़ी साधना करते है कि अंत समय में हमारा ध्यान आपके पावन श्री चरणों में हो| आज मैं यह अवसर प्राप्त कर रहा हूँ| अगर अपने प्राणों को बचा लेता हूँ तो पता नहीं फिर यह अवसर मिले न मिले|

 

v सिर भर जाउँ अस मोरा| सब ते सेवक धरमु कठोरा ||

श्री राम जी बनवास पर जा रहे थे तो भरत जी उनके पीछे-2 पैदल दौड़ते जा रहे थे तब सैनिकों ने उन्हें रथ पैर बैठने के लिए कहा तो भरत जी कहते है मेरा ये फर्ज है कि जिस मार्ग से प्रभु श्री राम जी नंगे पाँव गए हैं, जहाँ मेरे स्वामी के चरण लगे हैं वहाँ मेरा सिर लगना चाहिए| सेवक धर्म बड़ा ही कठिन है| हम अपने आपको सेवक कहते हैं| लेकिन सेवक बनना बड़ा ही कठिन है|

 

v देखि भरत गति सुनि मृदु बाणी | सब सेवकजन गारहिं गलानी||

भारत जी की प्रेमपूर्वक वाणी सुनकर सब सेवक अपनी त्रूटियों के कारण लज्जित हो गए और भारत जी के प्रेम की सराहना करने लगे|

 

v  सुलभ सुखद मारग यह भाई| भगति मोरी पुरान श्रुति गाई ||

 “हे भाई! यह मेरी भक्ति का मार्ग सुलभ एवं सुखदायक है, पुराणों औए वेदों ने इसका गायन किया है|”

 

v  गुरु और शिष्य वचन कर नाता| सो सेवक जिस वचन पछाता ||

गुरु का वचन मानना ही भक्ति मार्ग की प्रथम सीढ़ी है| वाही भक्ति के दुर्लभ फल की प्राप्ति करता है जिसने सद्गुरु की आज्ञा को सत्य-2 कर मानना सिख लिया है|

 

v  गुरु बिन भव निधि तरह न कोई | जौं बिरंचि संकर सम होई ||      

गुरु के बिना संसार सागर से कोई पार नही हो सकता, चाहे कोई ब्रह्मा या शंकर के सामान ही क्यों न बन जाए| भाव यह है की संसार में आकर जीव को आंतरिक शान्ति और शास्वत सुख की प्राप्ति बिना गुरु के नही हो सकती| अनेक योगी, ऋषि मुनि और तपस्वी इस चिरंतन सुख की खोज कर चुके, परन्तु वह दिव्य आनंद गुरु के बिना उन्हें कहीं भी प्राप्त नही हुआ |

 

v  जासु कृपा छूटे मद मोहा ताकहु उमा कि सपनेहु कोहा।।

शिवजी कहते हैं, हे पार्वती! जिनकी कृपा मात्र से ही संसार के मद, मान, मोह, छूट जाते है| उसमे सपने के अन्दर भी क्रोध उत्पन्न नहीं हो सकता| यह केवल भय दिखाया है ताकि दास सावधान रहे| क्योंकि भय के बिना भक्ति नहीं हो सकती| भय तथा क्रोध के अन्तर्गत भी दास पर उनका प्यार भरा होता है|

 

v जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥
तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेउँ॥

जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाज में मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही -

 

v उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भगति जगत सब सपना ।।

शिव भगवान माता पार्वती जी से कहते हैं हे उमा ! मैं अपना स्वयं का अनुभव कहता हूँ कि यह सारा संसार स्वप्न के समान है । हरि - भजन ही एक मात्र सत्य है ।

 

v  कोमल चित अति दीन दयाला| कारण बिनु रघुनाथ कृपाला ||

अर्थात भगवन का चित्त इतना कोमल है की वे बिना करण के भी देना चाहते है|

 

v सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

भावार्थ-जैसे ही जीव मेरे सम्मुख होता है,वैसे ही उसके करोडो जन्मो के पापो का नाश हो जाता है।

 

v संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इन्दु तमारी।।

अर्थः-""सन्तों का अभ्युदय अर्थात् उनका संसार में शुभागमन सदैव ही सुखकर होता है जैसे चन्द्रमा एवं सूर्य का उदय सम्पूर्ण विश्व के लिये सुखदायक है।'' ऐसे दैवीगुण सम्पन्न मनुष्य उत्तम श्रेणी के मनुष्य हैं। दूसरे प्रकार के मनुष्य वे हैं जो स्वलाभ एवं स्वहित के साथ साथ परहित एवं परलाभ का भी ध्यान रखते हैं। वे मध्यम श्रेणी के मनुष्य हैं। तीसरे वे हैं जो स्वलाभ अथवा स्वहित को ही दृष्टिगत रखते हैं। स्वलाभ अथवा स्वहित के लिये वे दूसरों को हानि पहुँचाने में भी कोई दोष नहीं समझते। ये आसुरीगुण सम्पन्न मनुष्य निम्नश्रेणी के मनुष्य हैं। चौथे वे हैं जो केवल अन्यान्य प्राणियों की हानि की ही सोचते रहते हैं। अन्यों को हानि पहुँचाने के लिये वे अपनी हानि तक करने को तत्पर हो जाते हैं। श्री रामचरितमानस में ऐसे मनुष्यों के लिये वर्णन है।

 

v सेवक सेव्य भाव बिनु,भव न तरिय उरगारि.
भजिय राम पद पंकज,अस सिद्धांत विचारि।।

जब तक श्री राम मेरे स्वामी हैं और मै उनका सेवक हूँ ऐसा भाव प्रकट नही हो जाता तब तक भाव सागर पार नही जा सकते यह सिद्धांत विचारक़र भगवान श्री राम के चरण कमल का आश्रय लेना चाहिए ।।

 

v बिन छल विश्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।

इन लक्षणों से युक्त पुरुष राम भगवान में ऐसे एकाकार हो जाता है जैसे दूध में पानी। यदि उस दूध में कपट रुपी खटाई डाली जाये तो दूध और पानी अलग-अलग हो जाता है।

 

v अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँति।
सब तजि भजनु करौं दिन राती॥

हे प्रभो अब तो इस प्रकार कृपा कीजिए कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ।

 

v उमा दारु जोषित की नाई| सबहि नचावत रामु गौसाई||

शिवजी कहते है –हे पार्वती! कठपुतली की तरह भगवान सबको नचाते है|

v श्रुति  पुरान  सब  ग्रंथ  कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ।।

सारांश तो एक ही है कि राम की शरण में आ जाओ। उनकी भक्ति और मालिक के नाम को दिल में बसाने से इन्सान सदा सुखी हो जाता हैफिर उसको ज़रा भी दुःख नहीं होता।

 

v बड़े   भाग   पाइब  सतसंगा। बिनही  प्रयास  होहिं  भवभंगा ।।

जब इन्सान के भाग्य उदित होते हैं तब उसे सत्पुरुषों की संगति मिलती है। तब इन्सान की सम्पूर्ण चिन्तायेंदुःखदर्द व क्लेश दूर हो जाते हैं।

 

v बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल

जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए और बालू (को पेरने) से भले ही तेल निकल आवे, परंतु श्री हरि के भजन बिना संसार रूपी समुद्र से नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धांत अटल है॥

 

v सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।

अर्थः-""जो मछलियां अथाह जल में हैं वे सुखी हैं जैसे श्री हरि की शरण में चले जाने पर एक भी बाधा नहीं रहती।'' जो मछलियां समुद्र की गहराई में रहती हैं वे सुखी रहती हैं, परन्तु जो अपने को प्रकट करके समुद्र की सतह पर तैरती हैं, वे ही मछुये के जाल में फंसती हैं। इसी प्रकार जो जीव अपने भरोसे पर, अपनी बल-बुद्धि पर इतराते हैं, वे ही काल-माया के जाल में फंसते हैं। किन्तु जो मालिक की चरण-शरण में चले जाते हैं, उन्हें काल-माया का भय नहीं रहता और इनसे निर्भय होकर सुखमय और शान्तिमय जीवन व्यतीत करते हैं। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जो इस प्रकार का जीवन व्यतीत कर रहें हैं।

 

v  जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना| जहाँ कुमति तहँ विपति निधाना||

आप सब जानते ही है कि लंका के राजा रावण का क्या हाल हुआ| वह इतना पण्डित विद्वान था, परन्तु वहाँ कुमति ने डेरे दाल लिए तो सोने की लंका जलकर राख हो गई| कुमति से ह्रदय में अशांति, चिंता, कलपना पैदा हो जाती है; और सुमति से सुख, शांति और आनन्द की प्राप्ति होती है|

 

vसुन सुरेश रघुनाथ सुभाऊ, निज अपराध रिसाहि न काऊ।।

 जो अपराध भगत कर करई, राम रोष पावक सो जरई ||

ब्रहस्पति ही फरमाते है कि ‘हे इंद्र, भगवान का स्वभाव सुनो| वह अपने अपमान से किसी पर कोप नहीं करते अर्थात उनका अपना कोई अपमान कर देता है तो वह परवाह नहीं करते| परन्तु जो उनके भक्त का अपमान करता है वह भगवान के क्रोध की अग्नि में जरुर जलता है| भक्तों और संतो के अपराधी को ईश्वरीय नियम के अधीन अवश्य ही दंड भुगतना पड़ता है, उससे उसे कोई नहीं बचा सकता| हे इंद्र! भरत के समान भगवान का प्यारा कौन है| संसार तो भगवान का नाम जपता है और स्वयं भगवान उनका (भरत जी का) नाम जपते हैं| हे अमरपति(देवराज इंद्र) भगवान के भक्त का अकाज मन में न लाइए अर्थात भक्त के अकाज की मन में चितवन भी न कीजिए, नहीं तो इस लोक में अपयश और परलोक में दुखी होंगे और दिन- प्रतिदिन शोक संताप बढ़ते जायेंगे|

 

v सुन सुरेश उपदेश हमारा, रामहि सेवक परम प्यारा ||

मानत सुख सेवक सेवकाई, सेवक वैर, वैर अधिकाई ||

ब्रहस्पति ही फरमाते है कि ‘हे इंद्र, हमारा उपदेश सुनो|  भगवान को अपना सेवक बहुत ही प्यारा है| उनके सेवक की जो सेवा करता है, उसे सुख मिलता है और जो उनके भक्त के साथ वैर रखते है उन्हें दुःख भोगना पड़ता है|’ ब्रहस्पति जी की सुंदर बाते सुन कर इंद्र को ज्ञान हुआ और मन की ग्लानि मिट गई| तब सुरराज इंद्र भी प्रसन्नता से फूल बरसाकर भरत जी के स्वभाव की बड़ाई करने लगे|

 

v भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी, बिनु सत्संग न पावहि प्रानी ॥
पुण्यपुंज बिनु मिलहिं न संता, सत्संगति संसृति कर अंता ॥

अर्थात् भक्ति स्वतन्त्र है ऒर सब सुखों की खान है, परंतु सत्संग ( संतो के संग) के बिना प्राणी इसे पा नहीं सकते ऒर पुण्यपुंज के बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति ( जन्म मरण के चक्र) का अंत करती है ।

 

v ज्ञान अगम प्रत्यूह अनेका, साधन कठिन न मन कहुं टेका ॥
करत कष्ट बहु पावहि कोउ, भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोउ ॥

यानि ज्ञान अगम है ऒर उसकी प्राप्ति मे अनेकों विघ्न है, पर साधन कठिन नहीं बल्कि मन की टेक कठिन है, ऒर बहुत कष्ट कर, जतन कर कोई उसे पा भी लेता है तो वह भी भक्ति रहित होने से मुझको प्रिय नहीं होता ।

 

v  बंदऊँ गुरु पद कंज, कृपा सिन्धु नररूप हरि |

   महामोह तम पुंज, जासु बचन रबि कर निकर ||

अर्थ----- श्री सद्गुरुदेव महाराज दया के सागर मनुष्य रूप में साक्षात् पारब्रह्म हैं | उनके श्री चरण –कमलो में मैं वन्दना करता हूँ | उनके श्री वचन सूर्य की किरणों के समूह हैं, जिनसे घना-घना मोह का अन्धकार नष्ट हो जाता है| अर्थात सद्गुरु के वचन तथा उपदेश जीव के सारे जीवन को बदल देते हैं|

 

v राम भगति मनि उर बस जाकें, दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें॥

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं, जे मनि लागि सुजतन कराहीं॥

श्री रामभक्ति रूपी मणि जिसके हृदय में बसती है, उसे स्वप्न में भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्ति रूपी मणि के लिए भली-भाँति यत्न करते हैं॥

 

v राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार |

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ||

अर्थ : तुलसीदासजी कहते हैं कि हे मनुष्य ,यदि तुम भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो तो मुखरूपी द्वार की जीभरुपी देहलीज़ पर राम-नामरूपी मणिदीप को रखो |

 

v आजु सफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू॥

सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू॥

जब भगवान श्री राम जी मुनि भरद्वाज जी की कुटीर में गए तब उन्होंने ये ऊपर लिखे ये वचन कहे- भावार्थ हे राम! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थ सेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा जप, योग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे सम्पूर्ण शुभ साधनों का समुदाय भी सफल हो गया॥

v बड़े भाग मानुष तन पावा | सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा ||
साधन् धाम मोक्ष कर द्वारा | पाई न जेहिं परलोक सँवारा ||

अर्थात मनुष्य कि शरीर बड़े हि भाग्य से प्राप्त होती क्योंकि मानव शरीर पाना देवताओं के लिए भी दुर्लभ होता है अर्थात मानव शरीर के लिए देवता गण भी तरसते रहते हैं - लालायित रहते हैं | ऐसा इसलिए कि मानव शरीर एक ऐसा शरीर है जो जीव को मोक्ष के दरवाजे तक पहुँचाने के लिए समस्त मोक्ष साधनों का धाम या घर है | इस मानव शरीर को पाकर भी जो मनुष्य अपना परलोक सँवार नहीं लेता यानी अपने जीव का उद्धार तथा मुक्ति-अमरता न पा लेता वही वहाँ परलोक में और यहाँ लोक में अपार दु:ख कष्ट पाता है |

 

v सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दु:ख पावहिं सब लोगा॥

जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥

 

v गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥1

जो भगवान् का भक्त है उसके लिए विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है|

 

v जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥3

हनुमान्‌जी ने एक ही क्षण में सारा नगर जला डाला। एक विभीषण का घर नहीं जलाया|

 

v मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥

काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥

सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥

 

v  एक बार वसिष्ठ मुनि आये, जहाँ राम सुखधाम सुहाये|

  अति आदर रघुनायक कीन्हा, पड़ पखार चरणोंडाक लीन्हा||

भगवान् मर्यादा पुरुषोतम राम ने गुरु भक्ति को पूर्ण रूप से निभाया| एक दिन गुरुदेव वसिष्ठ मुनि जी वहां आ गये जहाँ भगवान् राम सुख आसीन थे| अपने सद्गुरु को आते देख कर प्रभु राम ने उनका हर प्रकार से आदर सम्मान किया और उनके चरना धोकर चरणामृत लिया और उन्हें सुंदर आसन पर बिठाया| इस प्रकार उन्होंने गुरु चरणों का पूजन किया|`

 

v मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपने शिक्षा गुरु विश्वामित्र के पास बहुत संयम, विनय और विवेक से रहते थे। गुरु की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सेवा के विषय में भक्त कवि तुलसीदास ने लिखा है-

मुनिवर सयन कीन्हीं तब जाई।

लागे चरन चापन दोऊ भाई॥

जिनके चरन सरोरुह लागी।

करत विविध जप जोग विरागी॥

बार बार मुनि आज्ञा दीन्हीं।

रघुवर जाय सयन तब कीन्हीं॥

गुरु ते पहले जगपति जागे राम सुजान।

 

v सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हर्ष विषादु न कछु उर आवा।

  गुरुहिं प्रनाम मन हि मन किन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लिन्हा॥

सीता-स्वयंवर में जब सब राजा धनुष उठाने का एक-एक करके प्रयत्न कर रहे थे तब श्रीराम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया।

 

v गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार जाय पद नावउ माथा॥

  सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भांति पूजि सनमाने॥

  गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले राम कमल कर जोरी॥

श्री सद्गुरुदेव के आदर और सत्कार में श्रीराम कितने विवेकी और सचेत थे, इसका उदाहरण जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वशिष्ठ जी महाराज महल में आते हैं तब देखने को मिलता है। सद्गुरु के आगमन का समाचार मिलते ही सीताजी सहित श्रीराम दरवाजे पर आकर सम्मान करते हैं-

 

vकर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करे सो तस फल चाखा।।

  सकल पदारथ यहि जग माहिं, कर्म हीन नर पावत नाहीं।।

गोस्वामी जी ने रामायण में अच्छी प्रकार यह समझाया है कि यहां सब कर्मों का विधान है। कर्म के अनुसार तुम्हें नाना सुख और नाना दुख भिन्न-भिन्न योनियों में भोगने पड़ रहे हैं। इस संसार में जितने भी पदार्थ है बिना कर्म के इन्सान उसे नहीं पा सकता| 

 

vतामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥
 अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥2

भावार्थ : मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन में श्री रामचंद्रजी के चरणकमलों में प्रेम ही है, परंतु हे हनुमान्‌! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्री रामजी की मुझ पर कृपा है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना संत नहीं मिलते

 

v  जासु नाम जपि सुनहु भवानी, भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥

   तासु दूत कि बंध तरु आवा, प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

जब हनुमान जी ने लंका के अन्दर अपने आप को ब्रह्मास्त्र में बंधवा लिया तब शिवजी भगवान जी माता पार्वती जी से कहते है जिस प्रभु का नाम जप कर ज्ञानी मनुष्य संसार बंधन को काट देते है उस प्रभु का सेवक भला कैसे किसी के बंधन में आ सकता है|

 

v हनुमान जी जब माता सीता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे, उसी समय समुद्र ने मैंनाक पर्वत से कहा कि ये श्री रघुनाथ जी के सेवक है, इन्हें थोड़ी देर अपने ऊपर विश्राम करने दो| जब मैंनाक पर्वत ने हनुमान जी से विश्राम करने के लिए प्रार्थना की, तब हनुमान जी ने उत्तर दिया-   

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ||

 हनुमान जी ने उसे हाथ से स्पर्श कर प्रणाम करते हुए कहा कि भगवान श्री  

 रामचन्द्र जी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? तात्पर्य यह है कि  

 सेवक के लिए सेवा पहले है, विश्राम बाद में|

 

v  बिना सत्संग विवेक न होई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ||

   सतसंगत मुद मंगल मूला, सोई फल सिधि सब साधन फूला||

बिना सत्संग किये ज्ञान नहीं होता और वह सत्संग भगवान की कृपा के बिना प्राप्त नहीं होता| सत्संगति जो आनंद और मंगल की मूल है, वाही सब साधन, दान, यज्ञ, तप आदि फलों का सिद्ध फल है|

 

v सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
अग्यासम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।2

भावार्थ:-वह रुचि है- कपट, स्वार्थ और (अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष रूप) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञा पालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञा रूप प्रसाद सेवक को मिल जाए॥

 

v  श्री गुरु पदनख मणिगन ज्योति, सिमरत दिव्य दृष्टि हिय होती ||

   दलन मोह तम सो सुप्रकासु, बड़े भाग्य उर आवहिं जासु ||

गुरु के चरण कमलों के नाखुनों की जो ज्योति है वह मणियों के समूह के समान प्रकाशमान है, जिस ज्योति के स्मरण करते ही ह्रदय में दिव्य दृष्टी हो जाती है अर्थात गुप्त वस्तुओं के जानने का ज्ञान हो जाता है| फिर वह ज्योती कैसे है? जिसका प्रकाश मोह रूपी अन्धकार को दूर करता है| वह ज्योति जिसके ह्रदय में आवे उसके बड़े भाग्य है अर्थात जिसके अति उत्तम भाग्य होते हैं और जिस पर धुर की दया होती है उसके ह्रदय में वह दिव्य दृष्टी होती है | 

 

v  जे न मित्र –दुःख होहिं दुखारी, तिनहीं विलोकत पातक भारी ||

   निज दुःख गिरि सम रज करि जाना, मित्र के दुःख रज मेरु समाना ||

भगवान सुग्रीव से कहते हैं जो अपने मित्र को दुखी देखकर दुखी नही होते उनके देखने से पाप लगता है अपना दुःख पहाड़ के समान भी हो तो उसे रज अर्थात ख़ाक के समान जाने| जो मित्र का दुःख ख़ाक के समान न हो तो उसे पहाड़ के समान जाने और उसके निवारण का यत्न करे |

 

v  राम भगति एहि तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु वेद भजन नहिं वरना।।

अर्थः-चूंकि मुझे इसी शरीर से मेरे ह्मदय में मालिक की भक्ति उत्पन्न हुई, इसी से हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है। मेरा मरण अपनी इच्छा पर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता, क्योंकि वेदों ने वर्णन किया है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता।

 

v आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन॥

काकभुशुंडि कहते हैं - हे पक्षीराज गरुड़! यद्यपि मैं सब प्रकार से हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यंत धन्य हूँ, जो राम ने मुझे अपना 'निज जन' जानकर संत-समागम दिया 

 

v  साधु चरित सुभ चरित कपासू| निरस बिसद गुनमय फल जासू ||

   जो सहि दुख परछिद्र दुरावा| बंदनीय जेहिं जग जस पावा ||

संतो के चरित्र कपास के समान कल्याणकारी है| ये चरित्र देखने में तो हैं र सरहित, परन्तु उनका फल बड़ा गुणयुक्त है| कपास गर्मी, शीत, वर्षा सहनकर उत्पन होती है| केवल दूसरों के भले की खातिर| वह कपड़ा बनकर दूसरो को ढकती है| अर्थात् आप दुःख सहनकर दूसरों को सुख पहुँचाती है | इसी प्रकार सन्त महापुरुष भी संसार में पहले कठिन साधना करके फिर संसार में अनेक कष्ट सहन करके जीवों के अवगुणों को न देखते हुए उनका सुधार करते है इसी से वे वन्दना के योग्य हैं |

 

v  उमा संत की यही बड़ाई, मंद करत पे करहिं भलाई|

निज गुण श्रवण सुनत सकुचाएं, पर गुण सुनत अति हर्षाएं||

(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! संत की यही बड़ाई (महिमा) है कि वे बुराई करने पर भी (बुराई करने वाले की) भलाई ही करते हैं| अपने गुणों को सुन कर वे सकुचाने लगते है और दूसरों के गुण को सुन कर बहुत हर्षाते है|

 

v  धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना | ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना |

   जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई | सो मम भगति सुखदाई ||

वास्तविक धर्म वही है, जिस धर्म से वैराग्य उत्पन हो| जिन धर्म कर्मों के करने पर अहंता उत्पन हो, उसे धर्म नही कहा जा सकता | वैराग्य से योग तथा योग से ज्ञान की प्राप्ति होती है| यही वेदों तथा ग्रंथो ने भी बतलाया है कि मोक्ष को देने वाला है, परन्तु ज्ञान का मार्ग सरल नहीं| इसमें सरल साधन है भक्ति, जिससे मालिक शीघ्र प्रसन्न होते है| श्री रामचन्द्र जी स्वयं निजमुख से फरमाते है कि मुझे भक्ति प्रिय है और वही भक्तों को सुख देने वाली है|

 

v  जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं| जद्यपि ताहि कामना नाहीं |

   तिमी सुख संपति बिनहिं बोलाएँ | धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ ||

अर्थ – जिस प्रकार सागर को कोई इच्छा न होते हुए भी सब नदियाँ स्वयं ही उस और आकर्षित होती है, इसी प्रकार संसार की सब सुख सम्पत्ति, ऐश्वर्य –भोग के सामान प्रभु भक्त के पीछे स्वयं ही भागते फिरते है| यद्यपि वह कभी उनकी इच्छा नहीं करता| जब दिल में इष्टदेव का निवास हो जाएगा तो फिर सामानों की इच्छा नहीं रहती, बल्कि वे तो चरणों में आने को उत्सुक रहते है|

 

vसो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥127

हे उमा! सुनो वह कुल धन्य है, संसार भर के लिए पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्री रघुवीर परायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हों॥

 

vतात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग !

   तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग !!

हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सभी सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर (दुसरे पलड़े पर रखे हुए ) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते ,जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है !

 

v सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥
अग्यासम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।2

भावार्थ:-वह रुचि है- कपट, स्वार्थ और (अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष रूप) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञा पालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञा रूप प्रसाद सेवक को मिल जाए॥2

 

v  गिरजा संत समागम हरि कथा, सम लाभ ना कछु आन|

  बिन हरि कृपा ना होवही, गावत वेद पुराण||

भगवान शंकर जी माता पारवती को उपदेश करते है कि हे गिरजा इस संसार में संत समागम और हरि कृपा के सामान दूसरी लाभ की वास्तु कोई नहीं है और यह संत समागम मिलता भी तभी है हरि की कृपा होती यही वेदों पुराणों ने भी गाया है|

 

vसुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा| भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी | जिमि बालक राखइ महतारी ||

हे मुनि| सुनो मैं तुम्हे हर्ष के साथ कहता हूँ जो समस्त आशा भरोसा छोड़ कर केवल मुझको ही भजते है मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की रक्षा करती है|

 

v जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥

जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं।

 

v काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि॥83 ख॥

भावार्थ:-हे काकभुशुण्डि! तू मुझे अत्यंत प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा संपूर्ण सुखों की खान मोक्ष,

v ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना॥
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं॥

भावार्थ:-ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत्‌ में मुनियों के लिए भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें संदेह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले॥1

 

v सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेउँ॥
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही॥2

भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेम में भर गया। तब मन में अनुमान करने लगा कि प्रभु ने सब सुखों के देने की बात कही, यह तो सत्य है, पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही॥2

 

v भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे॥
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा॥

भावार्थ:-भक्ति से रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फीके) हैं जैसे नमक के बिना बहुत प्रकार के भोजन के पदार्थ। भजन से रहित सुख किस काम के? हे पक्षीराज! ऐसा विचार कर मैं बोला-॥3

 

v जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू॥
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी॥

भावार्थ:-हे प्रभो! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझ पर कृपा और स्नेह करते हैं, तो हे स्वामी! मैं अपना मनभाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदय के भीतर की जानने वाले हैं॥

 

v अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव॥

भावार्थ:-आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्ति को श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोजते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है|

 

v भगत कल्पतरू प्रनत हित कृपा सिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥

भावार्थ:-हे भक्तों के (मन इच्छित फल देने वाले) कल्पवृक्ष! हे शरणागत के हितकारी! हे कृपासागर! हे सुखधान श्री रामजी! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिए|

 

v संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।।

काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।

अर्थः-सन्तों और असन्तों की करनी ऐसी है जैसे चन्दन और कुल्हाड़ी का आचरण होता है। हे भाई, सुनो! कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है, परन्तु चन्दन अपने स्वभाव वश अपना गुण देकर उसे सुगन्ध से सुवासित कर देता है। अभिप्राय यह कि सन्त भी बुराई के बदले सदा भलाई ही करते हैं।

 

v निर्गुन रुप  सुलभ अति सगुन जान  नहिं कोइ।

   सुगम अगम नाना चरित, सुनिमुनि मन भ्रम होइ।।

अर्थः-निर्गुण रुप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परन्तु (गुणातीत दिव्य) सगुणरुप को कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम तथा अगम चरित्रों को सुन कर ऋषियों-मुनियों का मन भी भ्रमित हो जाता है। चेतनरुप की भक्ति को इसलिये कठिन कहा गया है कि वे आम मनुष्यों की भाँति लोगों के मध्य रहते और खाते-पीते हैं, बीमार भी होते हैं और कभी-कभी दुःखी भी दिखलाई देते हैं। उनकी कुल चेष्टा और कार्यवाही आम मनुष्यों की सी होती है। उनको अवसर देखकर कठोर बात भी कहनी पड़ती है। यह सब देखकर उनके कुछ सेवक उनसे रुष्ट भी हो जाते हैं और उनकी प्रत्येक बात को सहन करना असम्भव हो जाता है, इसलिये उन पर निश्चय होना कठिन है।

 

vमुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू ॥

   राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा| सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ||

   बिधि निषेधमय कलिमल हरनी| करम कथा रबिनंदनि बरनी||

अर्थ – संतो की संगति आनंददायिनी होती है, जो संसार में चलता फिरता प्रयाग राज है| जैसे प्रयाग राज में गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों नदियों का मिलाप होता है, इसी प्रकार संतों के सत्संग रूपी प्रयागराज में भी गंगा, यमुना और सरस्वती तीनों नदियों का संगम होता है| संतो के सत्संग में जो प्रेम भक्ति का अंग होता है, वह गंगा की धारा है| ब्रह्मज्ञान सरस्वती तथा कर्मकाण्ड अर्थात अमुक कर्म करने योग्य है अथवा त्यागने योग्य है ऐसा वर्णन यमुना नदी की धारा है|

 

v अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥

   नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥

ऐसे विकार रहित प्रभु के हृदय में रहते भी जगत के सब जीव दीन और दुःखी हैं। नाम का निरूपण करके (नाम के यथार्थ स्वरूप, महिमा, रहस्य और प्रभाव को जानकर) नाम का जतन करने से (श्रद्धापूर्वक नाम जपरूपी साधन करने से) वही ब्रह्म ऐसे प्रकट हो जाता है जैसे रत्न के जानने से उसका मूल्य।

 

v  जब-2 होई धर्म कै हानी, बाढहिं असुर अधम अभिमानी ||

   करहिं     अनीति जाइ नहिं बरनी, सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी ||

   तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ||

अर्थात- ‘जब धर्म की ग्लानि होती है, दुष्ट, नीच और अभिमानी व्यक्ति बढ़ते हैं और वे ऐसा अन्याय करते हैं कि जिसका वर्णन नही हो सकता तथा ब्राह्मण, गौ, देवता और प्रथ्वी कष्ट पाते हैं, ऐसे समय दया के भंडार प्रभु भांति-2 के दिव्य शरीर धारण करके सज्जन व्यक्तियों की पीड़ा हरते हैं|

 

v  तुम से अधिक गुरुहि  जिय जानि| सकल भाव सेवहिं सनमानी ||

   काम क्रोध मद मान न मोहा| लोभ न क्षोभ न राग न द्रोहा ||

   जिन के कपट न दम्भ न माया| तिनके हृदय बसहु रघुराया ||

भगवान श्री राम वाल्मीकि ऋषि के आश्रम में पहुँच कर अपने रहने के लिए स्थान पूछते हैं तब वाल्मीकि जी कहते हैं कि जो प्राणी अपने दिल में तुम से भी अधिक गुरु को समझता है और सब प्रकार से उनकी सेवा और सम्मान करता है तथा जिनके हृदय में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और राग-द्रोह आदि के शूल नहीं है तथा जिनका मन कपट, छल और पाखंड से साफ़ है, हे रघुनाथ जी, उनके हृदय रूपी मंदिर में निवास करो, आपके रहने के लिए वही शोभनीय स्थान है|

 

v  तजऊं न नारद कर उपदेसू | आपु कहहिं सत बार महेसू ||

   नारद बचन न मैं परिहरऊँ | बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ ||

   गुरु के वचन प्रतीति न जेही | सपनेऊँ सुगम न सुख सीधि तेहि ||

अर्थ -----जब सातों ऋषियों ने पार्वती जी को तप का त्याग करने के लिए कहा तो पार्वती जी ने उतर दिया ---मैं नारद जी ( गुरु जी ) के उपदेश को न त्यागूँगी, चाहे मुझे शिव जी स्वयं सौ बार भी क्यों न कहे| मैं नारद जी अर्थात् गुरुदेव देव के वचनों का उल्लंघन नही करुँगी | चाहे अब मेरा घर बसे अथवा उजड़े, इससे नही डरती; क्योंकि जिसे गुरु के वचनों पर विश्वास नही उसे स्वप्न में भी सुख और सिद्धि प्राप्त नही होती |

 

v  ईस्वर अंस जीव अबिनासी | चेतन अमल सहज सुखरासी ||

   सो मायाबस भयउ गोसाई | बँध्यो कीर मरकट की नाई ||

   जड़ चेतननहि ग्रन्थि परि गई | जदपि मृषा छूटत कठिनई ||

यह जीव अविनाशी ईश्वर का ही अंश है जो चेतन, पापरहित तथा स्वाभाविक ही सुख का निदान है, फिर भी माया के वश होकर जीव ऐसा बंध गया है जैसे तोता और बन्दर स्वयं बंध जाते है | (बन्दर तंग मुंह वाले बर्तन में हाथ डालकर मुट्ठी बंध करने पर फिर नहीं खोलता, इसलिए फंस जाता है और तोता नलकी में फंसता है) जैसे बन्दर और तोता चैतन्य रूप होकर भी जड़ वस्तु में फँस जाते है वैसे ही जीव माया में फँसकर छूट नही सकता| जड़ (माया) और चेतन (जीव) में गाँठ पड़ गई, यद्यपि जीव में माया की गाँठ मिथ्या हैं, परन्तु इसका छुटना कठिन है | इसलिए उस ईश्वर की चेतना सत्ता में मिलकर जीव जब तक आनन्दमय न बन जायेगा तब तक विश्राम प्राप्त नही कर सकता, आवागमन के चक्र से नहीं छुट सकता |

 

v जननी जनक बन्धु सुत दारा | तनु धनु भवन सहृद परिवारा ||

        सब कै ममता ताग बटोरी | मम पद मनहि बाँध बरि डोरि ||

        समदरसी इच्छा कछु नाहीं | हर्ष शोक भय नहिं नम माहीं ||

        अस सज्जन मम उर बस कैसे | लोभी ह्रदय बसंइ धन जैसे ||

अर्थ :- ‘माता-पिता, भाई-बन्धु, स्त्री-पुरुष, अपना शरीर, धन-दौलत, मकान और परिवार के प्यारे जन तथा मित्र आदि जिनमे इस जीव ने अपनी-अपनी सुरती को तकसीम कर रखा है, उन सबकी झूठी ममता के बारीक धागों को जगह-जगह से समेट कर उनका एक मजबूत रस्सा बनाकर मेरे चरणों के साथ मन ही मन बांध    देवे| जो इस तरह से मेरे चरणों से प्रीती रखे और फिर सब से समदर्शी होकर रहे| मेरी प्रीति के अतिरिक्त मन में कोई ख्वाइश न हो| ख़ुशी, गम और क्रोध की हालतों को अपने मन में न आने देवे| ऐसा सज्जन पुरुष मेरे ह्रदय में इस प्रकार बसता है जिस तरह कि लोभी आदमी के दिल में धन का ख्याल बसता है-ऐसा भगवान श्री रामचन्द्र जी अपने मुख से वचन फरमाते हैं|

 

v  तन संतन का धनु संतन का| मन संतन का किआ ||

   संत प्रसादि हरि नामु धिआइया| सरब कुसल तब थीआ ||

   संतन बिनु अवरु न दाता बीआ ||

   जो जो सरणि परै साधु की| सो पारगरामी किआ ||

भक्ति का कैसा सुगम और सरल मार्ग है कि मेरा-मेरा त्याग कर तेरा-2 को धारण कर लो, फिर काम बना बनाया है| मगर हम है जो है यह सुन कर ही घबराते हैं कि कोई सब कुछ हम से छीन ना ले| यह भ्रम हमको सताता है, जो भक्ति मार्ग में चलते हुए हमारे सामने दीवार बन कर खड़ा हो जाता है लेकिन हमें  याद रखना चाहिए कि सब कुछ तो एक दिन हम से काल छीन लेता है, श्री रघुनाथ जी के वचन श्रवण करके सब ने कृपानिधान श्री राम जी के चरणों में नतमस्तक किया|

 

v राम कृपा नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा।।
सद्गुरु वैद वचन बिस्वासा। संजम यह न विषै कै आसा।।
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान सरधा मति पूरी।।
एहि विधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहित जतन कोटि नहिं जाहीं।।

अर्थः-ये सभी रोग प्रभु-कृपा से विनष्ट हो सकते हैं। हाँ, हरि कृपा से यदि ऐसा सुन्दर संयोग बन जावे तो, ईश-कृपा की प्राप्ति के लिये पहले श्री सद्गुरुदेव को अपना समर्थ वैद्य बनावे। उनके श्री वचनों पर अचल विश्वास रखे। पथ्य-सेवन यह है कि विषय-वासनाओं से दूर रहे। प्रभु-भक्ति ही वह संजीवनी वटी है, जिसके प्रयोग से सभी व्याधियों का विनाश हो सकता है। औषधि लेते हुये अटूट श्रद्धा को अऩुपान समझे। श्रद्धासहित भक्ति अति आवश्यक है। इस साधन के बिना और कोई मार्ग नहीं है इन मानसिक क्लेशों से मुक्त होने का।

 

v काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता।।
योग-वियोग भोग भल मन्दा। हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा।।
जन्म मरण यहाँ लगि जग जालू। सम्पत्ति विपति कर्म अरु कालू।।
धरणि धाम धन पुर परिवारु। स्वर्ग नरक जहाँ लग व्यवहारु।।
देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं। माया कृत परमार्थ नाहीं।।

अर्थः-लक्ष्मण जी मीठी,कोमल,ज्ञान वैराग्य तथा भक्ति से भरपूर वाणी से बोले-ऐ निषादराज! संसार में न कोई किसी को सुख पहुँचा सकता है, न दुःख। हे भाई! सुख दुःख जीव को अपने कर्मों के अनुसार मिलते हैं। योग अर्थात् मिलाप वियोग अर्थात् बिछोड़ा। भले तथा बुरे कर्मों का भोगना, मित्र-शत्रु तथा मध्यम अर्थात् निष्पक्ष आदि सब भ्रम का जाल है। इसके अतिरिक्त जन्म-मरण, जहां तक इस संसार का पसारा है-सम्पत्ति-विपत्ति-कर्म और काल-पृथ्वी घर-नगर-कुटम्ब,स्वर्ग व नरक एवं जो कुछ भी संसार में देखने सुनने और विचारने में आता है, यह सब माया का पसारा है। इसमें परमार्थ नाम मात्र भी नहीं है।

सपने होय भिखारि नृप, रंक नाकपति होय।

जागे लाभ न हानि कछु, तिमि प्रपंच जग जोय।।

जैसे सपने में राजा भिखारी होवे और कंगाल इन्द्र हो जावे परन्तु जागने पर लाभ या हानि कुछ नहीं-वैसे ही जगत् का प्रपंच स्वप्न के समान मिथ्या है। जागने पर पता लगता है कि न कोई लाभ हुआ है और न कोई हानि हुई है। यह तो सब माया का खेल था, यथार्थ कुछ भी नहीं था।

 

v  गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि

   जिन्ह हरी कथा सुनी नहीं काना| श्रवण रध्र अहिभवन समाना||

   नयनन्हि संत दरस नहीं देखा| लोचन मोरपंख कर लेखा||

   ते सर कटु तुम्बरी सम तूला| जे ने नमत हरी गुरु पद मूला||

   जिन हरी भक्ति हृदय नहीं आनी| जीवत शव समान तेहि प्राणी||

   जो नहीं करही राम गुण गाना| जिह सो दादुर जिह समाना||

   कुलिस कठोर निठुर सोई छाती| जो ना सुनत हरि चरित न जो हर्षाती ||

अर्थ- “शिव जी पार्वती जी के प्रति कथन करते हैं कि जिन्होंने अपने कानों से भगवान की कथा नहीं सुनी, उनके कानों के छिद्र साँप के बिल के समान है| जिन्होंने अपने नेत्रों से संतों, महापुरुषों के दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोर के पंखों पर दिखने वाली नकली आँखों के सामान है| वे सिर कड़वी तुम्बी के समान है, जो भगवान अथवा गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते| जिन्होंने भगवान की भक्ति को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीवित रहते हुए भी मुर्दे के समान है| जो जीभ भगवान का गुण गान नहीं करती, वह मेंढ़क की जीभ के समान है| वह ह्रदय वज्र के समान कठोर और निष्ठुर है, जो भगवान के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता|

 

v  कहु रघुपति सुन भामिनी भाता| मानहु एक भक्ति का नाता||

   जाती पाती कुल धर्म बड़ाई| धन बल परिजन गुण चतुराई||

   भक्ति हीन नर सोई कैसा| बिन जल बारिद देखी जैसा||

भगवान ने शबरी को संबोधित करते हुए कहा – हे भामिनी, मेरी बात सुन| मैं तो केवल एक भक्ति का ही नाता मानता हूँ| जाति – पाति, कुल, धर्म, बड़ाई, बल, धन, कुटुम्ब, गुण और चतुराई- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मानुष ऐसा लगता है जैसे जलहीन बादल शोभाहीन लगता है|

 

v  एक पिता के विपुल कुमार| होहिं पृथक गुन सील अचारा ||

   कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता| कोउ धनवन्त सूर कोउ दाता ||

   कोउ सर्वग्य धर्मरत कोई| सब पर पितही प्रीति सम होई ||

   कोउ पितु भगत वचन मन कर्मा| सपनेहूँ जान न दूसर धर्मा ||

   सो सुत प्रिय प्राण समाना| यद्मपि सो सब भांति अयाना ||

अर्थ:- भगवान श्री रामचन्द्र जी महाराज काकभुशुंडि जी के प्रति फरमाते हैं कि एक पिता के बहुत से पुत्र पृथक-2 गुण, स्वभाव और आचरण वाले होते हैं| कोई पंडित होता है, कोई तपस्वी कोई ज्ञानी, कोई शूरवीर, कोई सर्वज्ञ और कोई धर्म परायण होता है| पिता का प्रेम इन सब पर समान होता है, परन्तु इनमे से यदि कोई मन, वचन और कर्म से पिता की आज्ञा के पालन के अतिरिक्त दूसरा धर्म नही जानता अर्थात सब प्रकार से पिता का आज्ञापालक होता है, वह चाहे अनजान ही क्यों न हो, तो भी वह पिता के प्राणों के समान प्रिय होता है अर्थात पिता की उस पर विशेष कृपा होती है| ठीक इसी प्रकार गुरुदेव को भी यद्मपि सभी सेवक प्यारे होते हैं और वे सभी सेवकों का समानरूप से हित एवं कल्याण  चाहते हैं| परन्तु जो सेवक मन, वचन और कर्म से गुरु आज्ञा का पालन करने में प्रियपात्र होता है, और उनकी पूर्ण प्रसन्नता का अधिकारी होता है|

 

v  राम भगति चिंतामनि सुंदर| बसई गरुड़ जाके उर अंतर ||

   परम प्रकास रूप दिन राती| नही कछु चहिअ दिआ धृत बाती ||

   मोह दरिद्र निकट नहीं आवा| लोभ वात नहिं ताहि बुझावा ||

   प्रबल अविधा तम मिटि जाई| हारहिं सकल सलभ समुदाई ||

   खल कामादि निकट नहिं जाहिं| बसई भगति जाके उरमाही ||

प्रभु की भक्ति सुंदर चिंतामणि के समान है| चिंतामणि इतनी अधिक मूल्यवान है कि जिसके मूल्य का अनुमान ही नही लगाया जा सकता| बहुमूल्य होने के अतिरिक्त चिंतामणि में यह गुण है कि वह अपनी दिव्य किरणों द्वारा अन्धकार का नाश करती है| एक अन्य गुण उसमे यह है कि जिसके पास यह मणि रहे, उसका प्रत्येक मनोरथ पूर्ण होगा| अब प्रभु-भक्ति की महिमा करते हुए काकभुशुंडि जी कहते हैं कि हे गरुड जी! जिसके ह्रदय में भक्ति रुपी चिंतामणि बस जाए, उसके ह्रदय में निरंतर अलौकिक प्रकाश व्याप्त रहता है तथा यह ऐसा प्रकाश है जिसे किसी दीपक, धृत तथा बत्ती की अपेक्षा नही| भक्तिरूपी चिंतामणि पास रहने से मोहरूपी दरिद्रता निकट नही फटक सकती तथा इसकी ज्योति को लोभ रुपी वायु बुझा नही सकती| काम-क्रोध, दुष्ट विकार भक्ति की ज्योति में पतंगो के समान जलकर भष्म हो जाती है| इसके अतिरिक्त संसारिक कामनाये जो अति क्रूर है, वे भी उस मनुष्य के निकट नही आती, जिसके ह्रदय में भक्तिरूपी चिंतामणि बस जाती है| भक्ति को ह्रदय में बसाए बिना मोह-अज्ञान के विनाश क्योंकर होगा? मनुष्य जो दिन-रात मोह की चाह करता रहता है यही मोह अज्ञान का अँधेरा है और मुक्ति के प्रकाश के बिना कदापि नही मिट सकता| संसारी मनुष्य और गुरुमुख में यही तो अंतर है कि संसारी मनुष्य माया को चाहता है, जबकि गुरुमुख भक्ति को|

 

vज्ञान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होई नहिं बारा।।
 अस बिचारि हरि भगति सयाने। मुक्ति निरादर भक्ति लुभाने।।
 भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अविद्या नासा।।
 उमा जोग जप दान तप, नाना व्रत मख नेम।
 राम कृपा नहिं करहिं तस, जस निस्केवल प्रेम।।
 पन्नगारी सुनु प्रेम सम, भजन न दूसर आन।।
 यह बिचारि मुनि पुनि पुनि, करत राम गुन गान।।

अर्थः-""काकभुशुण्डी जी पक्षिराज गरुड़ को उपदेश करते हैं कि ज्ञान मार्ग तलवार की धार पर चलने जैसा है, जिससे गिरते देर नहीं लगती। यही सोच विचारकर जो सयाने भक्तजन हैं, वे मुक्ति का भी निरादर करके भक्ति की अभिलाषा करते हैं। क्योंकि प्रेमाभक्ति के द्वारा बिना किसी विशेष यत्न और परिश्रम के उस अज्ञान का नाश हो जाता है, जो जीवात्मा को संसार के बन्धन में जकड़ने का मूल कारण है।'' ""भगवान शिव पार्वती के प्रति कहते हैं, हे उमा! योग,जप, दान, तपस्या और भाँति भाँति के व्रत यज्ञ नियम आदि मिलकर भी साधक को प्रभु कृपा का वैसा अधिकारी नहीं बना सकते, जैसा कि अनन्य प्रेम बना सकता है। पुनः काकभुशुण्डी जी कहते हैं, हे गरुड़ जी! प्रेमाभक्ति जैसा अन्य भजन नहीं है। ऐसा विचारकर मुनिजन पुनः पुनः प्रभु के नाम के गीत गाते हैं।''

 

v जिमि  थल  बिनु जल रहि नसकाई। कोटि  भांति  कोउ  करै  उपाई ।।

तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ।।

जैसे ज़मीन के बिना पानी नहीं रह सकताचाहे कोई करोड़ों प्रकार के यत्न कर ले। ऐ गरुड़ जी! इसीप्रकार मोक्ष का सुख मालिक की भक्ति के बिना नहीं मिल सकता। अर्थात् जहां पर भक्ति होगीवहीं पर सच्चा सुख होगाअन्यत्र नहीं। इसीलिए भक्तिवान ही चतुर सयाने होते हैं। गुरुमुख ही सोच सकते हैं कि भक्ति करने और न करने में कितना लाभ व कितनी हानि है। गुरुमुखों को साधन प्राप्य हैंजो कि अत्यन्त सरल हैं। इनका भलीभांति परिपालन करके लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं। तथा भगवान से एकाकार होकर जीवन को सार्थक कर सकते हैं।

 

vअब सुनु परम विमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।.
 निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।।
 मम माया संभव संसारा। जीव चराचर विविध प्रकारा।।
 सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सबते अधिक मनुज मोहि भाए।।
 तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।।
 तिन्ह महँ प्रिय विरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहुँ ते अति प्रिय बिग्यानी।।
 तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
 पुनि पुनि सत्य कहुँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
 भगतिहीन विरञ्चि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।
 भगतिवन्त अति नीचउ प्राणी। मोहि प्रानप्रिय अस मम बानी।।

अर्थः-श्री भगवान राम चन्द्र जी महाराज अपने प्रिय भक्त काकभुशुण्डि जी को उपदेश कर रहे हैं कि हे काक! अब मेरी पवित्र वाणी को सुन; जो सत्य है, तथा जिसकी बड़ाई वेद शास्त्रों में भी गायी गई है। मैं तुझे अपना निजी सिद्धान्त अर्थात् रहस्य की बात सुनाता हूँ। इसे सुनकर मन में धारण कर ले तथा सबका मोह त्यागकर मेरे भजन में मन लगा। वह रहस्य यह कि सम्पूर्ण सृष्टि मेरी माया के द्वारा उत्पन्न हूई है। सृष्टि में जितने भी चर अथवा अचर जीव हैं, वे सब मेरे ही उपजाए हुए हैं तथा सभी मुझे समान रुप से प्रिय हैं। इन सब जीव प्राणियों में मुझे मनुष्य सर्वाधिक प्रिय है, क्योंकि यह मेरा ही प्रतिरुप है। साधारण मनुष्यों में मुझे ब्रााहृण तथा ब्रााहृणों में वेदपाठी मुझे अधिक प्रिय हैं। उनसे भी अधिक प्रिय वे हैं, जो धर्म कर्म की मर्यादा में चलने वाले हैं। पुनः उनसे भी अधिक प्रिय वे हैं, जो वैराग्यवान हैं। उनसे भी ज्ञानी अधिक प्रिय हैं तथा ज्ञानियों से कहीं बढ़कर मुझे विज्ञानी प्रिय हैं। विज्ञानियों से भी बढ़कर मुझे अपने दास और सेवक प्रिय हैं, जिन्हें एकमात्र मेरा ही आधार है तथा किसी अन्य की आशा जिनके चित में नहीं है। मैं यह तथ्य तुझसे बार बार कहता हूँ कि अपने सेवक के समान मुझे अन्य कोई भी प्रिय नहीं है। यदि साक्षात् ब्राहृा भी मेरे सम्मुख आ जावे और जब मैं उसमें भी भक्ति का अभाव पाऊँगा, तो वह मेरे लिये एक साधारण जीव होगा-इसके विपरीत यदि कोई नीचवंश में उत्पन्न जीव भक्तिभाव में रँगा है, तो वह मुझे प्राणों के समान प्रिय है-यह मेरा अचल सत्य वचन है।

 

v  भगवान श्री राम जी शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश करते हुए बताते है

नवधा भक्ति कहउँ तोहि पाही| सावधान सुनु धरु मन माहि||

 

v प्रथम भगति संतन्ह कर संगा|

भगवान फरमाते हैं कि प्रथम भक्ति- ‘सन्तो का संग’ अर्थात पहली भक्ति है- संतो-सत्पुरुषों का संग अर्थात सत्संग| भगवान ने सत्संग को पहली भक्ति क्यों बतलाया? इसलिए कि सत्संग में ही मनुष्य को विवेक की प्राप्ति होती है|

 

v दुसरि रति मम कथा प्रसंगा

‘कथा प्रसंगा’ का अर्थ यहाँ भगवान की कथाओं का श्रवण करना तो है ही, भगवानचर्चा| भगवान की लीला कथाओं का वर्णन सुनकर प्रेम- विभोर हो जाना, शरीर में रोमाँच हो जाना तथा नेत्रों से प्रेम आँसू प्रवाहित होने लगना- यह भक्ति का लक्षण है| ‘ हृदय माहि प्रेम जो, नैनो झलके आये’

कुलिस कठोर निठुर सोई छाति| सुनि हरी चरित न जो हर्षाति||

अर्थ- “वह हृदय वज्र के समान कठोर एवं निष्ठुर है, जो भगवान के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता|

 

v गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान|

अर्थात तीसरी भक्ति है- अभिमान रहित होकर गुरुदेव के चरण – कमलों की सेवा करना| गुरु दरबार में तो अनेकों ही सेवक रहते है और सभी सेवा करते है, परन्तु सेवा वास्तव में वही है, जो अभिमान से रहित होकर की जाये| हनुमान जी श्री राम जी के प्यारे सेवक थे क्योंकि उनमे लेशमात्र भी अभिमान नहीं था|

 

v चौथि भगति मम गुन गन| करइ कपट तजि गान||

अर्थात चौथी भक्ति है- कपट का त्याग कर भगवान के गुणों का गान करना| भगवान फरमाते हैं कि गुण- स्तुति गायन करते समय मन में तनिक भी छल, कपट, दिखावा व आडम्बर न हो| भगवान को छल कपट तथा आडम्बर आदि तनिक भी पसंद नहीं है| भगवान के वचन है कि

निर्मल मन जन सो मोहि पावा| मोहि कपट छल छिद्र न भावा||

 

v मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा| पंचम भजन सो वेद प्रकासा||

अर्थात हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर सतगुरु से प्राप्त नाम मन्त्र का जाप करना- यह पांचवी भक्ति है जो वेदों में प्रसिद्ध है| मन्त्र का जाप करते समय हृदय में पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास होना चाहिए| बिना विश्वास के की गई भक्ति कभी फलीभूत नहीं होती और न ही इष्टदेव की कृपा प्राप्त होती है| इसलिए हृदय में श्रद्धा एवं विश्वास रखकर नित्यप्रति नियमपूर्वक भजन करना चाहिए|

 

v छठ दम सील बिरति बहु करमा| निरत निरंतर सज्जन धरमा||

अर्थात छठी भक्ति है- इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहु कार्यों से वैराग तथा सदैव संत-सत्पुरुषों के निधारित किये हुए श्रम (आचरण) में लगे रहना|

1. पहली बात- इन्द्रियों को विषय विकारों में जाने से रोकना है जब तक इन्द्रियाँ विषयों की ओर भागती रहेगी मनुष्य भजन भक्ति नहीं कर सकता|

2. दूसरी बात  जो व्यक्ति शील अर्थात अच्छा स्वभाव व चरित्र वाला है वही भजन भक्ति कर सकता है| दुश्चरित्र व्यक्ति तो सदा बुरे आचरण में निवृत रहता है| पांडव शीलवान थे, तभी भगवान के प्यारे थे| कौरवों में शील का अभाव था|

3. तीसरी बात जो भगवान ने कही है वह है बहु कार्यों से वैराग्य| जिस मनुष्य का मन संसार के अनेकों कार्यो में फँसा रहता है, उसका मन संसार में ही लगा रहता है| ऐसा व्यक्ति भक्ति भजन क्या करेगा?

4. चौथी बात जो भगवान ने छठी भक्ति के अंतर्गत कही है वह है- सदा संत सत्पुरुषों द्वारा बताये गए धर्म के मार्ग पर चलना|

 

v सातवँ सम मोहि मय जग देखा| मोतें संत अधिक करि लेखा||

अर्थात सारे संसार में प्रभु को देखना और सत्पुरुषों को भगवान से अधिक मानना | ऐसा भगवान ने इसलिए कहा क्योंकि संत शरण व् उनके माध्यम से ही जीव को  भगवान की प्राप्ति होती है|

 

v आठवँ जथा लाभ संतोषा| सपनेहुँ नहीं देखइ परदोषा||

जो कुछ मिल जाये उसी में संतोष करना और स्वपन में भी पराये दोषों को न देखना, यह आठवी भक्ति है|

 

v नवम सरल सब सन छलहीना| मम भरोस हियँ हरष न दीना||

सबके साथ सरल स्वभाव से और कपट रहित होकर व्यवहार करना, हृदय में भगवान पर भरोसा रखना और हर्ष तथा विषाद से न्यारा रहना नवी भक्ति है|

जो इस नवधा भक्ति को हृदय में अपना लेता है वह अपने ईष्ट देव की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त कर अपना लोक- परलोक सवाँर लेता है और अपना जन्म सफल कर लेता है |

 

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