Thursday, April 30, 2020

श्री गुरु अर्जुन देव जी


जीवन परिचय श्री गुरु अर्जुन देव जी
जन्म      : अप्रैल 15, 1563 गोइंदवाल (जिला अमृतसर) पंजाब
पिता      : गुरु रामदास जी
मदर      : बीबी भानी जी
भाई       : प्रिथी चन्द जी, महादेव जी
पत्नी      : माता गंगा जी पुत्री (कृष्ण चन्द जी) मीओ गाँव (जिला
            जलंधर)
साहिबजादे  : हरगोबिन्द जी
जोती जोत  : मई 30, 1606

श्री गुरु अमरदास जी का वरदान
रामदासि गुरु जगत तारन कउ गुरु जोति सु अर्जुन माहि धरी||
आप अपने ननिहाल घर में ही पोषित और जवान हुए| इतिहास में लिखा है एक दिन आप अपने नाना श्री गुरु अमर दास जी के पास खेल रहे थे तो गुरु नाना जी के पलंघ को आप पकड़कर खड़े हो गए| बीबी भानी जी आपको ऐसा देखकर पीछे हटाने लगी| गुरु जी अपनी सुपुत्री से कहने लगे बीबी! यह अब ही गद्दी लेना चाहता है मगर गद्दी इसे समय आने पर अपने पिताजी से ही मिलेगी| इसके पश्चात गुरु अमर दास जी ने अर्जुन जी को पकड़कर प्यार किया और ऊपर उठाया| आप जी का भारी शरीर देखकर वचन किया जगत में यह भारी गुरु प्रकट होगा| बाणी का जहाज़ तैयार करेगा और जिस पर चढ़कर अनेक प्रेमियों का उद्धार होगा| इस प्रथाए आप जी का वरदान वचन प्रसिद्ध है-
"दोहिता बाणी का बोहिथा ||”
बीबी भानी जी ने जब पिता गुरु से यह बात सुनी तो बालक अर्जुन जी को उठाया और पिता के चरणों पर माथा टेक दिया| इस तरह अर्जुन देव जी ननिहाल घर में अपने मामों श्री मोहन जी और श्री मोहरी जी के घर में बच्चों के साथ खेलते और शिक्षा ग्रहण की| जब आप की उम्र 16 वर्ष की हो गई तो आपकी शादी श्री कृष्ण चंद जी की सुपुत्री गंगा जी तहसील फिल्लोर के मऊ नामक स्थान पर हुई| आप जी की शादी के स्थान पर एक सुन्दर गुरु द्वारा बना हुआ है| इस गाँव में पानी की कमी हो गई थी| आपने एक कुआं खुदवाया जो आज भी उपलब्ध है|
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गुरु गद्दी मिलना
चौथी पादशाही श्री गुरु रामदास जी के तीन साहिबजादे थे- बड़े पृथ्वीचन्द, दूसरे महादेव तथा तीसरे और सबसे छोटे श्री गुरु अर्जुन देव जी| पृथ्वीचन्द में भक्ति भाव का पूर्णतया अभाव था| उसके दिल में न तो सतगुरु के प्रति विश्वास और श्रद्धा थी और न ही भजन सिमरन में उसकी रूचि थी| छल, कपट, ईर्ष्या आदि अनेको अवगुण उनमे विधमान थे| दूसरे साहिबजादे महादेव बिलकुल ही साधू स्वाभाव के और मस्त मोला थे| न उन्हें खाने पीने की चिंता थी, न संसार की कोई चिंता| जब दिल आया तो खा लिया, नहीं तो भूखे प्यासे ही मगन रहते थे| बाद में विरक्त होकर घर बार त्यागकर चले गए| श्री गुरु रामदास जी के तीसरे साहिबजादे थे- श्री(गुरु) अर्जुन देव जी| बाल्यकाल से ही उनकी सेवा, सिमरन और भजन में विशेष रूचि थी सतगुरु देव जी जो भी आज्ञा बताते वे फिर उस कार्य को बड़े उत्साह के साथ पूरा करने में लग जाते| सतगुरु के ताया का लड़का सहारिमल जो लाहौर में रहता था| उसके लड़के के विवाह का समय निकट आ गया था तो उसने श्री चरणों में पहुँच कर विनय कि-आपके भतीजे अर्थात मेरे पुत्र का विवाह है आप लाहौर चलने और विवाह में सम्मिलित होने की कृपा करे| श्री गुरु महाराज जी ने फ़रमाया कि अगर हम वहां जाएँगे तो लड़की वालो को बड़ी परेशानी होगी क्योंकि वहां संगते भी आ जाएंगी हमारे दर्शनों के लिए| सहारिमल ने विनय की अच्छा ठीक है पृथ्वीचन्द को भेज दो| पृथ्वीचन्द और उसकी पत्नी करमकौर को जब यह पता चला कि सतगुरु जी और सहारिमल ने पृथ्वीचन्द को लाहौर भेजने का कार्यक्रम बनाया है तो पृथ्वीचन्द की पत्नी, जो उसकी तरह ही स्वार्थी थी, उसने पृथ्वीचन्द से कहा की आप लाहौर मत जाना मैंने सुना है कि आपके पिता अपना उतराधिकारी घोषित करने वाले है| आप कोई न कोई बहाना बना दो और मना कर देना जाने से| और अर्जुन देव को लाहौर भेज देना| पृथ्वीचन्द ने जाकर सतगुरु महाराज जी से विनय की महाराज मुझे बहुत सेवा करनी पड़ती है, सारी सेवा भेंटे मैं संभालता हूँ| आप अर्जुन देव को भेज दो| वैसे भी वो कोई काम-धाम तो करता नहीं सारा दिन खाली ही बैठा रहता है| तब यह सुनकर सतगुरु जी ने अर्जुनदेव को बुलाया और उसे कहा कि तुमने अपने भाई के विवाह में लाहौर जाना है परन्तु जब तक हम वापिस आने को न कहे वापिस मत आना| आज्ञा मानकर वह सहारिमल के साथ चले गए| सहारिमल के लड़के का विवाह हो गया| सब रिश्तेदार-सम्बन्धी अपने-2 घर वापिस चले गए, परन्तु अर्जुनदेव जी वापिस रामदासपुर न गए क्योंकि सतगुरु जी का वचन था कि जब तक हम वापिस न बुलाये तब तक वापिस मत आना| श्री अर्जुन देव जी लाहौर रहकर आज्ञा की प्रतीक्षा करते रहे, परन्तु कोई आज्ञा न आई| इसी तरह लगभग तीन महीने बीत गए| अब गुरु दर्शन के लिए उनका मन तड़पने लगा| परन्तु सतगुरु का वचन उन्हें रोके हुआ था| उनसे रहा न गया और उन्होंने सतगुरु के श्री चरणों में विनय पत्र लिखा जिस पर नम्बर एक(1) डाला| और उसमे ह्रदय की भावनाओ को इन शब्दों में प्रकट किया-
मेरा मन गुरु दर्शनों के लिए व्याकुल है| हे संत रूप प्रियतम जी! आपके दर्शन के बिना मन की प्यास बुझती नहीं और मन को शांति नहीं आती| हे संत प्यारे जी! मैं आपके दर्शन के लिए मन-वाणी-काया से बलिहार जाता हूँ|
यह विनती पत्र लिखकर आपने एक सिक्ख को देते हुए कहा कि तुम तुरंत रामदासपुर चले जाओ और यह विनती पत्र सतगुरु जी के चरणों में पहुंचा दो| विनती पत्र लेकर वह सिक्ख वहाँ से चल पड़ा| लाहौर से रामदासपुर की दुरी 56 किलोमीटर थी| जब वह सिक्ख वहां पहुंचा, शाम हो चुकी थी| आगे पृथ्वीचन्द का राज था| उसने अनेक सेवको को अपने पक्ष में किया हुआ था| उसने अच्छी तरह समझा रखा था कि कोई सिक्ख यदि लाहौर से आये, कोई संदेश लाये तो उसे सीधे सतगुरु के पास मत ले जाना| जब वह वहां पहुंचा तो एक मसंद ने उससे पूछताछ की और वह विनती पत्र उससे लेकर कहा कि यह पत्र सतगुरु जी के पास पहुँच जाएगी, तुम किसी प्रकार की चिंता न करो| तुम थके हुए हो, नहा धोकर लंगर का प्रसाद ग्रहण करो और फिर आराम करो| सुबह सतगुरु जी के दर्शन कर वापिस चले जाना| उस भोले सिक्ख ने मसंद की बातो पर विश्वास कर लिया| उस मसंद ने वह पत्र पृथ्वीचन्द को दे दिया| पृथ्वीचन्द ने पत्र पड़कर चोले की जेब में रख लिया, और सतगुरु जी तक न पहुंचाई| वह सिक्ख दूसरे दिन सतगुरु जी के दर्शन करके चला और श्री अर्जुनदेव जी के चरणों में सब वृतांत प्रस्तुत किया| कुछ दिन तक तो वे इस बात की प्रतीक्षा करते रहे कि वहां से कोई उत्तर आएगा| परन्तु जब कोई उत्तर न आया तो उन्होंने दूसरी विनय पत्रिका लिखी जिस पर नम्बर दो डाला|
तेरा मुख सुन्दर एवम शोभनीय है और वाणी सहज ही अमृतमय और शान्तिरूप है| हे भगवन! आपके दर्शन किये चिरकाल हो गया है| हे मेरे सज्जन! वह देश धन्य है जहाँ आप निवास कर रहे हो| हे सज्जन गुरुदेव! मेरे प्यारे प्रभु जी! मैं तन, मन धन, वाणी से बलिहार जाता हूँ |
विनय पत्र लिखकर उन्होंने एक अन्य सिक्ख को दिया और उस पत्र को श्री चरणों तक पहुँचाने के लिय कहा| किन्तु वह पत्र भी पृथ्वीचन्द के हाथ लगा| वह पत्र भी सतगुरु जी तक नहीं पहुंचा| कुछ दिन प्रतीक्षा करने के उपरांत अर्जुन देव जी ने तीसरा विनय पत्र त्रितय लिखा-
एक घड़ी दर्शन न होने पर तो समय कलयुग बन जाता है अर्थात बिछोड़े की एक घड़ी कलयुग की तरह अर्थात दुखःद हो जाता है| हे प्यारे भगवन जी! अब मैं आपसे कब मिलूँगा? गुरु दरबार को देखे बिना मुझे नींद नहीं आती है और न मेरी रात चैन से बीतती है| मैं मन, तन और वाणी से गुरुदेव पर बलिहार जाता हूँ जिसका दरबार सच्चा है|
इस बार श्री अर्जुन देव जी ने सिक्ख के हाथ में विनय पत्र देते हुए कहा-हमारी बात ध्यानपूर्वक सुनो| इस पत्र को सिवाय सतगुरु जी के अलावा न तो किसी को दिखाना, न ही देना बल्कि इसके बारे में किसी से जिक्र मत करना यह पत्र केवल सतगुरु जी को ही देना| उस सिक्ख ने ऐसा ही किया जाकर वह पत्र सीधे ही श्री सतगुरु जी को दे दिया| सतगुरु जी ने पत्र पड़ा तो पत्र का नम्बर तीन था फिर बोले –अच्छा! दो पत्र पहले भी उन्होंने भेजे है, परन्तु हमे तो पहले उनका कोई पत्र नहीं मिला| यह कहकर अन्तर्यामी घट-घट की जानने वाले सतगुरु जी ने एक सेवक को फ़रमाया पृथ्वीचन्द को शीघ्र बुला लाओ| पहले दोनों पत्र उसी के पास होंगे| पृथ्वीचन्द जैसे ही वहां पहुंचे तो सतगुरु जी ने पूछा कि बेटा लाहौर से अर्जुन देव जी का कोई पत्र आया है लेकिन वह झूठ बोलने से बाज न आया| उसने उत्तर दिया- नहीं पिताजी! मुझे तो भाई का कोई पत्र नहीं मिला| तब सतगुरु जी ने फरमाया- अच्छा! तुम यही रहो हम भाई बल्लू को भेजकर तुम्हारा चोला मंगवाते है| यह कहकर भाई बल्लू पृथ्वीचन्द के घर से चोला उठा लाया, जिसकी तलाशी लेने पर जब जेब से दोनों पत्र निकल आये| अब पृथ्वीचन्द का सारा भेद खुल गया| श्री अर्जुनदेव जी को बड़े सम्मानपूर्वक लाहौर से बुलाया गया| अर्जुन देव जी आते ही श्री चरणों में गिर पड़े| पृथ्वीचन्द को भनक तो पड़ ही गई थी कि सतगुरु जी अर्जुनदेव जी को गुरु गद्दी का उत्तराधिकारी घोषित करने वाले है| अतः अगले दिन जब सतगुरु जी का दरबार लगा हुआ था तो पृथ्वीचन्द फिर वहां आ कर बोलने लगा| मैं आपका बड़ा पुत्र हूँ, इसलिए गद्दी का हक़ मेरा है| श्री गुरु रामदास जी शांतचित बैठे उसकी बातें सुनते रहे| जब वह बोल चूका तो सतगुरु जी ने फरमाया- अर्जुन देव ने अपने पत्रों में शब्द के तीन पद उच्चारे है, चौथा पद तुम रचकर शब्द को पूरा कर दो| गद्दी का वारिस तुम्हे घोषित कर देंगे| पृथ्वीचन्द कुछ देर तक तो सोचता रहा लेकिन जब कुछ समझ नहीं आया तो वहां से चला गया फिर सतगुरु जी ने अर्जुनदेव जी को चौथा पद उच्चारण करने के लिए कहा|
जब भाग्य उदय हुआ अर्थात पुण्यकर्म फल देने पर आये तब संतरूप गुरु का मिलाप हुआ| और घट में ही अविनाशी प्रभु को पा लिया| अब सदा आपकी सेवा करता रहू, पलभर भी आपसे न दूर रहू यह विनय है| मैं आपका दास हूँ| श्री गुरु अर्जुनदेव जी कथन करते है कि मैं मन, वाणी और काया से उन पर बलिहार जाता हूँ जो आपके दास है| यह पद सुनकर सतगुरु देव जी बड़े प्रसन्न हुए और उसी दिन शाम को गुरु गद्दी का उत्तराधिकारी श्री गुरु अर्जुन देव जी को घोषित कर दिया| इस प्रकार गुरु राम दास जी ने 1 सितम्बर 1581 को गोइंदवाल जाकर गुरु पद का तिलक दे दिया और आप भाद्रव सुदी तीज को पांच तत्व का शरीर त्यागकर अपने आत्मिक स्वरूप में विलीन हो गए| हरबंस भट्ट अपने सवैये में लिखते हैं-
हरिबंस जगति जसु संचर्यउ सु कवणु कहैं स्री गुरु मुयउ||||
देव पुरी महि गयउ आपि परमेसुर भायउ|| 
हरि सिंघासणु दीअउ सिरी गुरु तह बैठायउ|| 
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना 1409)
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दासों के दास
 श्री गुरु अर्जुनदेव जी को जब श्री गुरु रामदास जी ने लाहौर भेज दिया तो पृथी चन्द जो आपके ज्येष्ठ भ्राता थे और आपसे ईष्र्या करते थे को अवसर मिल गया। उसने यह प्रचार करना आरम्भ कर दिया कि मैं ही श्री सद्गुरुदेव जी का कृपा-पात्र हूँ। अर्जुनदेव जी तो उनके दिल से उतरे हुए हैं। ऐसा करके उसने कई लोगों को अपने पक्ष में कर लिया। कुछ लोगों ने जब श्री गुरु अर्जुनदेव जी से सब हाल जाकर बताया कि पृथीचन्द कहता है कि गुरु के दास तो हम हैं, तब आपने उत्तर दिया कि हम तो उसके दासों के भी दास बनकर भक्ति कर लेंगे और उसी में सच्चा सुख समझेंगे। आपने यह शब्द पढ़कर सुनायाः- 
जन की कीनी आपि सहाइ, सुखु पाइआ लगि दासह पाइ।
आपु गइआ ता आपहि भए, कृपा निधान की सरनी पए।।
अन्त में उन्हीं लोगों ने कहा कि वास्तव में जो नीचा होना जानता है अर्थात् जिसमें अहंकार का लेशमात्र नहीं होता, वही एक दिन ऊँचा बनता है। सच्चाई से गुरु-शरण लेने मे ही सच्चा लाभ है।
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गुरमुख और मनमुख

एक दिन कुला, भुला और भागीरथ तीनों ही मिलकर गुरु अर्जुन देव जी के पास आए| उन्होंने आकर प्रार्थना की कि हमें मौत से बहुत डर लगता है| आप हमें जन्म मरण के दुख से बचाए गुरु जी कहने लगे, आप गुरमुख बनकर मनमुखो वाले कर्म करने छोड़ दें| उन्होंने कहा महाराज! हमें यह समझाए कि गुरमुख और मनमुख में क्या अन्तर होता है| हमें इनके लक्षणों से अवगत कराए|
गुरमुख के लक्षण-
·                     गुरु के वचनों को याद रखना
·                     अपने ऊपर नेकी करने वालो की नेकी को याद रखना
·                     सबकी भलाई सोचना और चाहना
·                     किसी के काम में विघन नहीं डालना
·                     खोटे कर्मों का त्याग करना
·                     नेक कर्मों को ग्रहण करना
·                     गुरु के उपदेश को ग्रहण करके अपने आत्म स्वरुप को जानने वाला और
        अनेक में एक को देखने वाला गुरमुख होता है|

मनमुख के लक्षण-
·       सबसे ईर्ष्या करनी
·       किसी का भला होता देख दुखी होना
·       अपनी इच्छा से काम करने
·       कभी किसी का भला न सोचना
·       जो नेकी करे उसकी बुराई करनी
·       सबके बुरे में अपना भला समझना
·       कथा कीर्तन में ध्यान ना लगाना
·       गुरु उपदेश को ध्यान से न सुनना
·       पुण्य और स्नान से परहेज करना
·       उपजीविका के लिए झूठ बोलना|
गुरु जी के यह वचन सुनकर तीनों को संतुष्टि हुई| उन्होंने गुरमुखता के मार्ग पर प्रण कर लिया| फिर वह गुरु जी को माथा टेक कर अपने काम काज में लग गए|

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मन की शांति का साधन

एक दिन सुल्तानपुर के निवासी कालू, चाऊ, गोइंद, घीऊ, मूला, धारो, हेमा, छजू, निहाला, रामू, तुलसा, साईं, आकुल, दामोदर, भागमल, भाना, बुधू छीम्बा, बिखा और टोडा भाग मिलकर गुरु अर्जुन देव जी के पास आए| उन्होंने आकर प्रार्थना की कि महाराज! हम रोज सवेरे उठकर स्नान करके गुरबानी का पाठ करने के बाद ही अपना काम करते हैं व मन को संयम में रखते हैं| संयम में रखने के बाद भी मन में कलह ही रहती है| गुरु जी कृपा करके ऐसा उपदेश दो जिससे कलह समाप्त हो और मन को शांति मिले|गुरु जी ने उनकी बात सुनी और कहने लगे कि जब तक मन से रजो गुण और तमो गुण का त्याग ना किया जाए तब तक मन को शांति नहीं मिल सकती| इसलिए इनका त्याग जरूरी है| आगे से सिक्ख पूछने लगे महाराज! इस गुणों की परीक्षा किस प्रकार की जा सकती है| गुरु जी फरमाने लगे हिंसा (जीव हत्या) और क्रोध तमो गुण में आते हैं| लोभ और अभिमान यह रजो गुण में आते हैं| इसलिए इनका त्याग जरूरी है


तमो गुण के लक्षण- 
·   रात का बासी, खट्टा और चटपटा भोजन खाना
·   बहुत अधिक सोना
·   झूठ बोलना
·   गन्दा रहना
·   परायी निन्दा करनी
·   बुरी संगत करनी

रजो गुण के लक्षण-
·   भड़कीले वस्त्र पहनना
·   मांस का सेवन करना
·   अपना बडप्पन चाहाना

शांति गुण के लक्षण-
उज्जवल सफ़ेद वस्त्र पहनने
स्नान आदि में नियमित होना
चावल दाल आदि स्वच्छ भोजन करना
थोड़ा सोना व थोड़ा खाना
एक मन होकर कथा कीर्तन सुनना

राजसी गुण के लक्षण-
·   जिसका कभी मन टिके और कभी न टिके व राजसी गुण की निशानियाँ हैं|

तामसिक गुण के लक्षण-
·   जिसका मन कभी टिके ही न, शब्द वाणी की समझ भी कोई न आए उसे तामसिक गुण वाला समझे|
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अन्त में गुरु जी कहने लगे जब आप इन शांति वाले गुणों को अपनाओगे तो आपको शांति अपने आप ही प्राप्त हो जायेगी|
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सुख प्राप्ति का साधन

एक दिन श्री गुरु अर्जुन देव जी के पास दो सिक्ख हाजिर हुए| उन्होंने आकर गुरु जी से प्रार्थना की कि गुरु जी हम सदा दुखी रहते है हमे सुख किस प्रकार प्राप्त हो सकता है? हम अपने दुखों से निजात पाना चाहते हैं| इसलिए गुरु जी आप ही हमें दुखों से बाहर निकाल सकते हैं| हमे इसका कोई उपाय बताएँगुरु जी पहले उनकी बात ध्यान पूर्वक सुनते रहें| जब उन्होंने अपनी सारी बात गुरु जी के आगे रख दी तो गुरु जी ने कहना शुरू किया भाई अरोग शरीर, सुशील स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और धनधान्य के सुख पिछले जन्म में किये दान पुन्य से ही मिलते है| भाव मनुष्य को पिछले जन्म के अनुसार ही फल प्राप्त होता है| आगे गुरु जी कहने लगे की गृहस्थी का बड़ा धर्म दान-पुण्य करना और नेक कमाई ही है| इसलिए आप भी नेक कमाई, पुण्य दान और सत्संग किया करो| इससे आपके दुखों का नाश होगा| दुख आपको छू भी नहीं पाएंगे| आपको सुखो की प्राप्ति होगी|
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मूसन का कटा सिर जोड़ना

लाहौर शहर के शाहबाज़पुर गाँव में संमन (पिता) और मूसन (पुत्र) आजीविका के लिए मजदूरी करते थे| एक दिन संमन (पिता) और मूसन (पुत्र) ने संगत की देखा देखी गुरु जी को संगत समेत भोजन करने की प्रार्थना की| परन्तु जब उन्होंने देखा कि संगत को खिलाने के लिए उनके पास पूरे पैसे नहीं हैं और न ही प्रबंध हो सकता है| तो उन्होंने रात को साहूकार के कोठे की छत फाड़कर छेद कर लिया| इस छेद में से मूसन नीचे उतर गया और अपने जरूरत की चीजें घी, शक्कर और आटा आदि अपने पिता को पकड़ाता रहा| सब चीजें पकड़ाकर मूसन जैसे ही ऊपर आने लगा तो घर वालों की नींद खुल गई| उन्होंने मूसन की टाँगे पकड़ ली| मूसन ने अपने पिता से कहना शुरू किया कि पिता जी आप आप मेरा सिर काटकर ले जाए| अगर आप ऐसा नहीं करेगें तो लोग मुझे सिर से पहचान लेंगे और कहेंगे कि गुरु के सिक्ख चोर हैं| गुरु के नाम को धब्बा लगवाना ठीक नहीं है| पिता ने वैसे ही किया जैसे पुत्र ने कहा था| उधर जब साहूकार ने बिना सिर के मुर्दा देखा तो वह यह सोचकर कि कत्ल का इल्जाम मेरे सिर ना लग जाए भागा-2 संमन के पास गया| उसने जाकर कहा कि मैं तुम्हें बहुत पैसे दूँगा| इसके लिए तुम्हें मेरे घर से मुर्दा उठाना होगा| इसे ऐसी जगह फैंक आओ जहाँ इसे कोई न देख सके| संमन शीघ्रता से साहूकार के घर गया और अपने मृत बेटे को उठाकर के आया| उसने उसे अपने घर के पीछे वाले कमरे में सिर जोड़कर कपड़े से ढककर रख दिया| इसके पश्चात वह साहूकार के पास गया और अपनी जरूरत के अनुसार पैसे लेकर, गुरु जी व संगत के लिए खाना बनाने के लिए हलवाई को बुला लाया| सारा लंगर तैयार हो गया| गुरु जी भी संगत सहित आ गए| सबको खाना परोसा दिया गया| तब गुरु जी ने संमन से पूछा कि मूसन कहाँ है| वह संगत की सेवा में हाजिर क्यों नहीं हुआ? संमन चुपचाप खड़ा रहा|  उसकी चुप्पी को देखकर गुरु जी ने मूसन को आवाज़ लगाई कि आकर संगतो की सेवा करे| गुरु जी की आवाज़ सुनकर मूसन हाज़िर हो गया और श्री चरणों में माथा टेक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया| गुरु जी आप दोनो की गुरु घर के प्रति श्रद्धा देखकर संमन को सम्बोधित करके बोले-
चउबोले महला ५||
संमन जउ इस परेम की दमकिहु होती साट||
रावन हुते सु रंक नहि जिनि सिर दीने काट||||
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना 1363)
अर्थात-हे संमन सिक्ख! जो प्रेम तुमने दिखाया है अगर इसका बदला पैसों के साथ हो सकता होता, तो फिर लंका पति रावण कंगाल नहीं था जिसने अपने इष्ट शिव जी को अपना सिर ग्यारह बार काटकर प्रेम भेंट किया था| प्रेम तन और मन माँगता है धन नहीं| यह वचन करके गुरु जी ने दोनों बाप बेटों को शाबाशी दी|
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झूठ का त्याग व उपदेश

एक दिन भाई पुरीआ और चूहड़ पट्टी से गुरु जी के दर्शन करने आए| उन्होंने गुरु जी के आगे भेंट रखी व माथा टेका| उन्होंने गुरु जी से प्रार्थना की  कि महाराज हम आपके गावं के चौधरी है और हमे झूठ भी बोलना पड़ता है| हम इसका त्याग किस प्रकार करें उनकी यह बात गुरु जी ने सुनी और कहने लगे कि आप अपने नगर में एक धर्मशाला बनवाओ| उसमे दो समय सत्संग भी किया करो| आप रोजाना जो झूठ बोलते हे वह दीवान में संगत को सुनाया करो| गुरु जी की बात को वह ध्यानपूर्वक सुनते रहे| उन्होंने ऐसे ही किया जैसे गुरु जी ने उनको बोला था| धर्मशाला बनवाई गई| उसमे दो समय सत्संग भी रखा गया| उन्होंने अपना झूठ भी संगत के सामने रखना शरू कर दिया| जब कुछ दिन ऐसा ही होता रहा, वे लज्जा अनुभव करने लगे| उन्होंने झूठ बोलना कम  कर दिया| वे कम से कम झूठ बोलने का यत्न करते| ऐसा करते -2 उनकी झूठ बोलने की आदत ख़त्म हो गई| अब वे सच बोलने के आदि हो गए| उन्होंने गुरु जी का लाख -2 शुकराना किया|
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दयालु गुरु श्री अर्जन देव जी

श्री गुरु अर्जुन देव जी के दरबार में दो डूम संता और बलवंता कीर्तन करते थे| एक दिन डूमो ने गुरु जी से आर्थिक सहायता माँगी की उनकी बहन का विवाह है| गुरु जी कहने लगे सुबह कीर्तन की जो भेंट आएगी वह सारी रख लेना| अगले दिन कुदरती बहुत कम भेंट आई| जिसको लेने से डूमों ने इंकार कर दिया| वे गुस्से में भर गए व गुरु दरबार में कीर्तन करना ही छोड़ दिया| गुरु जी ने सिखों को उनके पास भेजा कि गुरु दरबार पर आकर फिर से कीर्तन करना शुरू करें|पर उन दोनों ने आने से इंकार कर दिया| गुरु जी कहने लगे कि लगता है कि उन्हें अहंकार हो गया है| अब हमारा कोई भी गुरु सिक्ख इनको मुहँ ना लगाये| जो इनकी सिफारिश करेगा उसका मुँह काला करके गधों पर बिठाकर पेश किया जायेगा| कुछ समय बाद जब वे भूख से दूखी हो गए| वे सिखों से कहने लगे कि हमें माफ कर दें| परन्तु किसी ने कोई बात ना मानी| वे तंग होकर लाहौर भाई लधा जी के पास आए| उन्होंने सारी बात लधा जी को बताई और विनय की कि आप ही हम पर दया करके गुरु जी से क्षमा दिला दें| उनकी बात सुनकर लधा जी को तरस आ गयाउन पर तरस खाकर व गुरु जी क आज्ञा का पालन करते हुए अपना मुँह काला कर लिया| गधे पर चढ़ कर उनके साथ गुरु जी के पास आए| गुरु जी के पास आकर उन्होंने प्रार्थना की कि महाराज इनको क्षमा कर दो|  ये बहुत दुखी है| आप से क्षमा मांगते है| उनकी बात सुनकर गुरु जी कहने लगे कि जिस मुख से इन्होंने गुरु घर की निन्दा की है, उसी मुख से गुरु घर की स्तुति करेंगे| तभी इन्हे क्षमा किया जाएगा| ऐसी बात सुनकर संता व बलवंड ने गुरु जी के सामने खड़े होकर राग रामकली में एक वार के द्वारा पाँचो गुरु साहिबान कि शलाघा गायी| यह सुनकर गुरु जी प्रसन्न हो गए|उन्हें कीर्तन करने कि भी आज्ञा गुरु जी द्वारा दे दी गई| श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पन्ना 866 पर यह "रामकली की वार राइ बलवंड तथा सत्ते डूमि आखी||" के नाम से दर्ज है|
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सनमुख व बेमुख की परिभाषा

एक दिन समुंदे ने गुरु अर्जुन देव जी से प्रार्थना की कि महाराज हमारे मन में एक शंका है, जिसका आप निवारण करें| उन्होंने कहा सनमुख कौन होता है और बेमुख कौन? गुरु जी पहले उसकी बात को सुनते रहे फिर उन्होंने वचन किया, भाई सनमुख वह होता है जो सदैव अपनी मालिक की आज्ञा में रहता है|जैसे परमात्मा ने मनुष्य को नाम जपने व स्नान करने के लिए संसार में भेजा है इस प्रकार जो मनुष्य इस आज्ञा का पालन करता है जिसमे शारीरिक शुद्धता के लिए स्नान करना व मन की शुद्धता के लिए नाम जपना और शारीरिक आरोग्यता के लिए भूखे नंगे को यथा शक्ति दान करता है वही सनमुख होता है| वही गुरु की आज्ञा में रहने वाला गुरु सिक्ख होता है| ऐसा मनुष्य सदैव सुखी रहता है तथा दुख उसके नजदीक नहीं आता| 
गुरु जी मनमुख भाव बेमुख की बात करने लगे कि वह पुरुष जो सदा माया  के व्यवहार में ही लगा रहता है| अपने मालिक प्रभु की ओर ध्यान नहीं देता और सारा समय मोह माया में व्यतीत कर देता है| ऐसा पुरुष सदैव दुखी रहता है| वह कभी भी सुख को प्राप्त नहीं कर पाता| इस प्रकार गुरू जी ने सनमुख व बेमुख की परिभाषा समुंदे को समझाई|
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बाला और कुष्णा पंडित लोगों को सुन्दर कथा करके खुश किया करते थे और सबके मन को शांति प्रदान करते थे| एक दिन वे गुरु अर्जुन देव जी के दरबार में उपस्थित हो गए और प्रार्थना करने लगे कि महाराज हमारे मन में शांति नहीं है| आप ही बताएँ हमें शांति किस प्रकार प्राप्त होगी हमें इसका कोई उपाय बताए? गुरु जी कहने लगे अगर आप मन की शांति चाहते हो तो जैसे आप लोगों को कहते हो उसी प्रकार आप भी उस कथनी पर अमल किया करो| परमात्मा को अंग संग जानकर उसे याद रखा करो| अगर आप धन इक्कठा करने की लालसा से कथा करोगे तो मन को शांति कदापि प्राप्त नहीं होगी| मन की लालसा बढ़ती जायेगी और आप दुखी होते रहेंगे| इस प्रकार आप निष्काम भाव से कथा किया करे जिससे आपके मन को शांति प्राप्त होगी|
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एक दिन सभी दुकानदार जो गुरु बाज़ार में रहते थे मिलकर गुरु अर्जुन देव जी के पास आए और प्रार्थना करने लगे महाराज जी आप ने हम पर बड़ी कृपा की है| हमें यहाँ बसाया है और काम काज बक्शा है| पर यहाँ न कोई ग्राहक आता है और न ही कोई व्यापार होता है| काम काज न होने के कारण गुजारा करने में बहुत दिक्कत आती है| अब आप ही बताएँ की क्या  किया जाए गुरु जी ने वचन किया रोजाना सुबह दरबार साहिब जाकर माथा टेककर आया करो| उसके पश्चात ही आप अपनी दूकाने खोल कर काम काज शुरू किया करो| आपको कभी कोई कमी नहीं आएगी व आपका काम बहुत चलेगा| ऐसा वरदान पाकर सभी दुकानदार खुश हो गए|
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योगी को परमपद की प्राप्ति

श्री गुरु  अर्जुन देव जी ने अपने गुरु पिता के वचन याद किए कि हमारी सेवा इन तीर्थों की सेवा है| इस प्रकार अमृत सरोवर के बाद संतोखसर तीर्थ की सेवा आरम्भ करने का विचार बनाया| इस सरोवर को श्री गुरु राम दास जी द्वारा आरम्भ कराया गया था| खोदे हुए गड्डे में वर्षा का पानी एकत्रित हो गया तथा चारों ओर बेरियों और वृक्षों के झुण्ड थे|सेवा का ऐसा विचार रखते हुए श्री गुरु अर्जुन देव जी कुछ सिखों को साथ लेकर एक टाहली के नीचे आ बैठे| बहुत से मजदूरों और कुछ सिक्ख सेवकों को सरोवर खोदने के लिए लगा दिया गया| सभी जोश व लगन के साथ सरोवर की खुदाई में लगे हुए थे| एक दिन मिट्टी के नीचे से एक गोलाकार मठ निकला जिसमे योगी समाधि लगाये बैठा था| गुरु जी ने उसको मखन, कस्तूरी व केसर की मालिश उसके सिर व पैरों पर कराकर समाधि खुलवाई| जब उस योगी ने बाबा बुड्डा जी व गुरु जी को सामने खड़ा पाया तो पूछने लगा कि यह कौन सा युग है और आप कौन हैं? बाबा जी ने बताया अब कलयुग है तथा जो उनके पास खड़े हैं वह श्री गुरु नानक देव जी की गद्दी पर विराजमान पाँचवे गुरु अर्जुन देव जी हैं| उस योगी ने जैसे ही बाबा जी की बात सुनी तो झट से कहा कि मेरा तप पूरण हो गया है| मेरे गुरु का वचन हुआ था कि जब कलियुग आएगा तो तुम गुरु अवतार के दर्शन करोगे और तभी तुम्हारा कल्याण होगा| आज वह समय आ गया है| मेरे मन को शांति मिली है| यह वचन करके योगी ने हाथ जोड़ दिए और गुरु जी को नमस्कार की| इसके पश्चात अपना शरीर त्यागकर परमपद को प्राप्त हो गया|
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संगत की सेवा
कहते है कि गुरु अर्जुन देव जी के समय की बात है एक बार लाहौर से कुछ संगत गुरु अर्जुन देव जी के दर्शन के लिए पहली बार आई, उन्होंने कभी पहले गुरु जी के दर्शन नहीं किये थे| रात का समय था गुरु अर्जुन देव जी खुद उन्हें लेने गेट पर पहुंचे| फिर उन्होंने संगत को लंगर करवाया उनके झूठे बर्तन उठाए| तब उन संगत ने विनय की हमे गुरु जी के दर्शन करने है तब आप जी ने फरमाया अब रात काफी हो गई| मैं आपको कमरा देता हूँ, वहां आप विश्राम करे कल सुबह सभा में श्री गुरु महाराज जी का दीवान लगेगा वही आकर दर्शन करना|
      ऐसा कहकर आप जी वहां से चले आये| अगले दिन वह संगत जब दर्शन करने पहुंची तब उन्होंने देखा की जिन्होंने रात को हमे लंगर करवाया, हमारे झूठे बर्तन उठाए वही श्री गुरु महाराज जी है तो उन्हें बड़ी ही शर्मिन्दगी महसूस हुई| उन्होंने विनय की महाराज हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई, आपने हमारी सेवा की, हमारे झूठे बर्तन तक उठाए| तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया– संगतो की सेवा बड़े ही भागो से मिलती है इसमें तो हमारी भी शान है| तो कहने का तात्पर्य यही है- कि गुरु दरबार की संगतों की सेवा के लिए तो देवी-देवता भी तरसते है|
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भाई मंझ
गुरु अर्जुन देव जी के समय की बात है भाई मंझ जी गुरु के बड़े प्रिय शिष्य थे| उन्होंने अपने गुरु से सच्ची प्रीत लगाईं थी| एक बार उनके घर में कोई गुरु का सन्देशा लेकर आया| यह देखकर वह बहुत खुश हुए कि गुरु के दरबार से कोई हमारे यहाँ पर आया है उन्होंने उस व्यक्ति को बिठाया व गुरु महाराज जी का हाल-चाल पूछा| उसके बाद उस व्यक्ति ने भाई मंझ जी के नाम जो संदेशा गुरु महाराज जी ने भिजवाया था वह सुनाया| उस सन्देश में लिखा था कि लंगर के लिए सेवा भिजवानी है| अब भाई मंझ जी एवं उनकी पत्नी सोच में पड़ गए कि गुरु दरबार में सेवा भिजवानी है लेकिन हमारे घर तो कुछ पैसे भी नहीं पड़े| भाई मंझ जी की पत्नी बड़ी भक्तिवान थी वह भी गुरु महाराज जी से बहुत प्रीत रखती थी| उसने मंझ जी से कहा कि हमारी एक लड़की है उसका विवाह किसी ऐसी जगह कर देते है जहाँ से हमे कुछ दौलत मिल जाए ताकि हम गुरु महाराज जी को सेवा भेज दे| उन्होंने ऐसा ही किया अपनी लड़की की शादी किसी ऐसे व्यक्ति से करवा दी, जिसके अंदर कुछ कमी थी और वहां से उन्हें कुछ राशि मिली जो उन्होंने श्री गुरु महाराज जी के पास लंगर की सेवा के लिए भेज दी| अब काफी समय बीता तो एक बार फिर एक व्यक्ति गुरु महाराज जी का सन्देशा लेकर आ गया| उसमे लिखा था कि लंगर के लिए सेवा चाहिए, जल्दी से जल्दी भिजवा दो| अब वे दोनों फिर सोच में पड़ गए की पहले तो बड़ी मुश्किल से सेवा भिजवाई थी अब कैसे भिजवाएंगे? तब मंझ जी की पत्नी ने कहा कि मैं किसी के यहाँ पर दासी बन जाती हूँ आप मुझे बेच दो, जो पैसे मिलेंगे आप लंगर की सेवा में भिजवा देना| मंझ जी के पास और कोई चारा भी नहीं था| वह अपनी पत्नी की बात मान गए जो धन राशि उन्हें मिली वह उन्होंने लंगर के लिए भिजवा दी| कुछ समय बाद फिर गुरु महाराज जी का सन्देशा आया उन्होंने भाई मंझ जी को तुरंत बुलाया है जैसे ही उन्होंने सन्देशा सुना कुछ भी सोच-विचार नहीं किया और गुरु महाराज जी के दर्शनों के लिया चले गए| जब वे गुरु दरबार में पहुंचे तो गुरु महाराज जी ने दूर से ही देखते ही अपना मुख मोड़ लिया| भाई मंझ जी फिर भी निराश नहीं हुए तब उन्होंने मन में सोचा कि शायद मेरी भक्ति में कोई कमी रह गई होगी जो गुरु महाराज जी ने मुख मोड़ लिया और मंझ जी वहीँ रहकर लंगर में दिन-रात सेवा करने लग गए और इतनी सेवा करते कि सभी देख कर हैरान हो जाते| एक दिन भाई मंझ जी वहां पर नहीं थे तो पीछे से गुरु महाराज जी वहां आ गए| उन्होंने भाई मंझ जी के बारे में पूछा तो भक्तो ने बताया कि वह तो दिन –रात सेवा में लगे रहते है तो श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि सेवा करते है तो कोई एहसान नहीं करते, खाते भी तो दरबार में है| यह कहकर गुरु महाराज जी चले गए| जब भाई मंझ जी आये तो भक्तो ने सारी बात बताई तब मंझ जी ने विचार किया कि वह दरबार में धन से भी सेवा करेंगे| अब वह जंगलो से लकड़ी लेकर आते कुछ तो लंगर में दे देते और कुछ बेचकर जो धन मिलता उसे दरबार में भेंट दे देते| एक दिन वह लंगर के किये लकड़ियाँ लेकर आ रहे थे कि रस्ते में आंधी चलने लगी, तूफान आने लगा और वे लकड़ियों सहित किसी गहरे गड्डे में जा गिरे| अब उधर श्री गुरु महाराज जी ने अपने भक्तो को फरमाया कि हमारे साथ चलो हमारा भक्त मुसीबत में है| वह भी वहीँ पहुँच गए जहाँ मंझ जी गिर गए थे| मंझ जी कोई है, कोई है की आवाज नीचे से लगा रहे थे| तभी श्री गुरु महाराज जी ने ऊपर से आवाज़ दी कौन है भाई? तब मंझ जी ने बताया कि मैं लकड़ियाँ लेकर आ रहा था आंधी आने के कारण गड्डे में गिर गया| आप मेरी चिंता न करे बस मेरा एक काम करे कि ये लकड़ियाँ मेरे गुरु महाराज जी के दरबार में पहुंचा दे क्योकि ये लकड़ियाँ लंगर के काम आनी है| तब श्री गुरु महाराज जी बड़े ही खुश हुए उन्होंने भाई मंझ जी को बाहर निकलवाया और उन्हें अपने गले से लगा लिया और फरमाया कि भाई मंझ जी आज आपने भक्ति की सारी परीक्षाओ को पार कर लिया है अपनी इस भक्ति के कारण आपका नाम युगो-युगो तक अमर रहेगा |
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गंधर्व का राग
श्री गुरु अर्जुन देव जी के समय की बात है उनके पास एक गंधर्व आया| उसने श्री चरणों में विनय की महाराज मैं आपको राग सुनाना चाहता हूँ| तब श्री गुरु महाराज जी ने कहा कि हम खाली राग नहीं सुनेंगे, राग के साथ आपको शब्द भी गाना पड़ेगा क्योंकि राग जो है वो सिंहासन है, सिंहासन की शोभा तभी है जब उस पर कोई विराजमान हो| शब्द जो है वो राग के सिंहासन पर विराजमान होगा तब हम तुम्हारा राग सुनेंगे| श्री गुरु महाराज जी ने उन्हें मना किया तो वह वहां से चला गया| उसके नेत्रों से आंसू भी आने लगे कि वो आया तो यही भाव बना कर आया था कि वह राग सुनाएगा| परन्तु वह राग नहीं सुना पाया| रास्ते में उसे गुरुदास जी (गुरु के भक्त) मिले| उन्होंने देखा कि गन्धर्व के नेत्रों से जल बह रहा है तो उन्होंने इसका कारण पूछा तब उसने बताया कि मुझे शब्द नहीं आता जिसके कारण वह श्री गुरु महाराज जी को राग भी नहीं सुना सका| तब गुरुदास जी ने कहा कि तू चिंता मत कर शब्द मैं तुझे सिखाता हूँ| उन्होंने शब्द का उच्चारण किया दंडोत वंदना अनेकवार सर्वकला समर्थ, डोलन ते राखो प्रभु नानक देकर हथ जब उस गन्धर्व ने इस शब्द को राग के साथ गाकर गुरु अर्जुन देव जी को सुनाया तो उनकी समाधि लग गई| वो ध्यान में चले गए| थोड़ी देर बाद जब उनकी आँखे खुली तो वे बहुत प्रसन्न हुए| सेवादार से 500 मुद्राएँ मंगवाई और उस गन्धर्व को दी| गन्धर्व भी बड़ा हैरान की आज से पहले मैंने बहुत से लोगो को राग सुनाया तो किसी ने मुझे एक मुद्रा भी नहीं दी लेकिन आज मैंने राग के साथ जब शब्द सुनाया तो मुझे 500 मुद्राएँ मिली| श्री गुरु महाराज जी ने 500 मुद्रा देते हुए फरमाया था कि यह शब्द सुनाने की भेंटा है| तब उस गन्धर्व ने कहा कि महाराज अगर प्रसन्न हुए हो तो मुझे भेंट न दो मुझे इस शब्द का असली मोल दे दो| श्री गुरु महाराज जी ने 500 मुद्रा और मंगवाई और उस गन्धर्व को दे दी| और फरमाया कि ये भी शब्द की भेंटा है| गन्धर्व ने फिर कहा कि महाराज मुझे भेंट नहीं चाहिए अगर देना चाहते हो तो मुझे उस शब्द का असली मोल दे दो| तब श्री गुरु महाराज जी समझ गए कि गन्धर्व जो है लालची है उन्होंने गन्धर्व को अपने पास बुलाया उसे अपने चरणों में बिठाया और उसके सिर पर हाथ रखा तो उसके अन्दर आवाज़ आई श्री वाहेगुरु! आँखों से आंसू बहने लगे| उसे सच्चे आन्नद का अनुभव हुआ तब उसने श्री चरणों में विनय की महाराज मुझे अब मोल मिल गया है| तब गुरु अर्जुन देव जी ने फरमाया कि ये भी मोल नहीं शब्द का ये भी भेंटा है| वचन फरमाए की गुरुनानक जी के शब्द का मोल सही मायनो में संसार के अन्दर कोई लगा नहीं सकता| भगवान की महिमा अगम अपार है उसका मोल लगाने के बारे में भी इंसान नहीं सोच सकता क्योंकि वह अनमोल है|
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बाबा बुड्डा जी से आशीर्वाद
श्री गुरु अर्जुन देव जी के घर में कोई संतान नहीं थी| उनकी पत्नी ने जब गुरु अर्जुन देव जी से विनय की इसका उपाय बताओ| तब गुरु अर्जुन देव जी ने फ़रमाया कि इसके लिए आप बाबा बुड्डा जी के पास जाओ| उनके आशीर्वाद से यह काम हो सकता है अब उनकी पत्नी अपने साथ थाल में धन-दौलत ले गयी और बड़े शान से उसके पास गई कि मैं तो गुरु अर्जुन देव जी की पत्नी हूँ मन में यही अहंकार चल रहा था लेकिन जब बाबा बुड्डा जी के पास पहूँची तो उन्होंने मुंह फेर लिया| जब वह वापिस गुरु अर्जुन देव जी के पास आई तो उनसे पूछा तब गुरु अर्जुन देव जी ने फ़रमाया कि अब तुम दुबारा जाओ लेकिन मन में श्रद्धा ले कर जाओ, शाही खज़ाना न ले जाओ| अब वह दुबारा बड़ी श्रद्धा के साथ बाबा बुड्डा जी के पास गई तो बाबा बुड्डा जी ने उसके भोजन जोकि मक्की की रोटी, सरसों का साग, लस्सी, प्याज़ ले गई उसे स्वीकार किया| उन्होंने प्याज़ को मुक्का मारा और फ़रमाया कि देख जिस तरह प्याज़ में से गुठली निकली है उसी तरह तेरे घर में संतान होगी जोकि दुश्मनों का नामो-निशान मिटा देगी| उन्ही के आशीर्वाद से गुरु अर्जुन देव जी के घर में संतान हुई श्री गुरु हरगोविंद सिंह जी|
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भाई गरीबू
श्री गुरु अर्जुन देव जी के समय की बात है अमृतसर में गुरु हरमंदिर साहिब जी के लिए सेवा चल रही थी| गुरु अर्जुन देव जी ने हर जगह घोषणा करवा दी कि जो भी कोई सेवा करना चाहता है वो तन, मन, धन से सेवा कर सकता है| हर जगह-२ गुरुद्वारों में ये घोषणा करवाई गई| ऐसे ही किसी जगह पर धर्मशाला में घोषणा करवाई जा रही थी कि जो भी अपनी सेवा गुरु घर में भेजना चाहता है वो भेज सकता है| वही गुरु महाराज जी को याद करने वाला उनका सेवक भाई गरीबू खड़ा था| जो कि बहुत गरीब था| उसने जब यह सुना तो उसके मन में भी सेवा का विचार आया| उसके मन में आया कि वह कुछ धन की सेवा करे| लेकिन जैसे ही उसने अपनी जेब में हाथ डाला तो उसकी जेब ही फटी हुई थी और जेब में एक कौड़ी तक नहीं मिली| तब गरीबू की आँखो से आँसू बहने लगे| तब गरीबू को पहली बार लगा कि मैं तो बहुत ही गरीब हूँ जो अपने गुरु के पास सेवा तक नहीं भेज सकता| तब वह अपने घर चला गया और घर पहुँच कर अपनी घरवाली को सारी बात बताई| तब घरवाली ने कहा कि आप परेशान न हो आप तो नाम जपने वाले हो भगवान की इसी में रजा होगी| तब गरीबू ने अपनी घरवाली से कहा कि तेरे पास कुछ धन है तो उसकी घरवाली ने कहा कि मेरे पास अगर होता तो मैं गुरु घर के लिए जरुर आपको दे देती| तब गरीबू ने उससे कहा कि घर में झाड़ू लगा कर देख क्या पता कोई पैसा दो पैसा मिल जाए| तब गरीबू की घरवाली ने झाड़ू लगाई तो उसे एक कौड़ी मिली| तब उसने वह कौड़ी गरीबू को दे दी| तो गरीबू और उसकी पत्नी वह कौड़ी लेकर धर्मशाला में गए लेकिन वहाँ संगत जा चुकी थी| तब गरीबू और उसकी पत्नी ने मन में विचार कि क्यों न अमृतसर चले गुरु जी के दर्शन भी हो जायेंगे उन्ही के चरणों में कौड़ी भेट करेंगे और उनसे यही अरदास करेंगे की महाराज हमारे पास तो बस यही है| गरीबू और उसकी घरवाली गुरु महाराज जी के चरणों में पहुँचे जब मत्था टेकने का नम्बर आया तो गरीबू ने देखा की श्री गुरु महाराज जी के आगे तो नोटों का ढेर लगा पड़ा है | तो गरीबू को शर्म आ गई कि सबने तो इतनी सेवा दी है और मैं खाली कौड़ी लेकर आया हूँ| मन में यही विचार कि सबके सामने अच्छा नहीं लगता| जब गुरु महाराज जी अकेले होंगे तब मत्था टेकूँगा| गरीबू और उसकी घरवाली दूर जाकर बैठ गए| जब सबकी सेवा आ गई तो किसी सिक्ख ने गुरु चरणों में विनय की महाराज अरदास की जाए तब गुरु अर्जुन देव जी ने कहा कि नहीं अभी किसी की सेवा आनी रहती है तो फिर सबसे विनय की गई कि जिसने भी सेवा देनी है दे दो| ऐसा कई बार हुआ| श्री गुरु अर्जुन देव जी चाहते थे कि गरीबू अपनी सेवा देने के लिए आगे आये| जब फिर सिक्ख ने विनय कि अरदास के लिए तब गुरु महाराज जी खुद खड़े हुए और चल कर गरीबू के पास गए और उसे अपने गले से लगा लिया| तब उससे कहा कि सेवा लाया है तो देता क्यों नहीं है| तब गरीबू ने कहा कि महाराज मेरे पास तो सिर्फ कौड़ी है जो धन दौलत आपके आगे मत्था टेका गया उसके सामने यह तो तुच्छ है| तब गुरु अर्जुन देव जी ने फरमाया जिस प्यार से और भाव से तू सेवा लाया है तो तेरी सेवा के आगे वह लाखो कि सेवा भी तुच्छ है| प्रेम से लाई तेरी सेवा हमे स्वीकार है श्री गुरु महाराज जी बहुत प्रसन्न हुए| तब गुरु महाराज जी ने अपनी दोनों मुट्ठी बंद कर कहा कि गरीबू एक मुट्ठी में लोक का सुख और दूसरी मुट्ठी में परलोक का बता क्या मांगता है? तब गरीबू ने कहा कि महाराज अगर प्रसन्न हुए हो तो लोक और परलोक दोनों का सुख मेरी झोली में डाल दो क्योंकि अगर इस लोक में दुःख मिले तो भी इंसान सहन नहीं कर सकता और परलोक में दुःख मिले तो भी सहन नहीं कर सकता| तब गुरु महाराज जी ने कृपा करके फरमाया कि जा दोनों लोक और परलोक के सुख तुझे बख्शे|
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शहीदी
जहाँगीर ने गुरु जी को सन्देश भेजा| बादशाह का सन्देश पढ़कर गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक समझकर अपने सपुत्र श्री हरिगोबिंद जी को गुरुत्व दे दिया| उन्होंने भाई बुड्डा जी, भाई गुरदास जी आदि बुद्धिमान सिखों को घर बाहर का काम सौंप दिया| इस प्रकार सारी संगत को धैर्य देकर गुरु जी अपने साथ पांच सिखों –

भाई जेठा जी, भाई पैड़ा जी, भाई बिधीआ जी, लंगाहा जी, पिराना जी को 

साथ लेकर लाहौर पहुँचे| दूसरे दिन जब आप अपने पांच सिखों सहित 

जहाँगीर के दरबार में गए| तो उसने कहा आपने मेरे बागी पुत्र को रसद 

और आशीर्वाद दिया है| आपको दो लाख रूपये जुरमाना देना पड़ेगा नहीं 

तो शाही दण्ड भुगतना पड़ेगा| गुरु जी को चुप देखकर चंदू ने कहा कि मैं 

इन्हें अपने घर ले जाकर समझाऊंगा कि यह जुरमाना दे दें और किसी 

चोर डकैत को अपने पास न रखें| चंदू उन्हें अपने साथ घर में ले गया

जिसमे पांच सिखों को ड्योढ़ि में और गुरु जी को ड्योढ़ि के अंदर कैद 

कर दिया| चंदू ने गुरु जी को अकेले बुलाकर यह कहा कि मैं आपका 

जुर्माना माफ करा दूँगा, कोई पूछताछ भी नहीं होगी| इसके बदले में 

आपको मेरी बेटी का रिश्ता अपने बेटे के साथ करना होगा और अपने 

ग्रंथ में मोहमद साहिब की स्तुति लिखनी होगी| 

गुरु जी ने कहा दीवान साहिब! रिश्ते की बात जो हमारे सिखों ने फैसला 

किया है, हम उस पर पाबंध हैं| हमारे सिखों को आपका रिश्ता स्वीकार 

नहीं है| दूसरी बात आपने मोहमद साहिब की स्तुति लिखने की बात की है 

यह भी हमारे वश की बात नहीं है| हम किसी की खुशी के लिए इसमें 

अलग कोई बात नहीं लिख सकते| प्राणी मात्र के उपदेश के लिए हमें 

करतार से जो प्रेरणा मिलती है इसमें हम वही लिख सकतें हैं| गुरु जी का 

यह उत्तर सुनते ही चंदू भड़क उठा| उसने अपने सिपाहियों को हुकम 

दिया 

कि इन्हें किसी आदमी से ना मिलने दिया जाए और ना ही कुछ खाने 

पीने को दिया जाए| 

गुरु जी को कष्ट देने:

१. पानी की उबलती हुई देग में बिठाना

दूसरे दिन जब गुरु जी ने चंदू की दोनों बाते मानने से इंकार कर दिया तो उसने पानी की एक देग गर्म करा कर गुरु जी को उसमें बिठा दिया| गुरु जी को पानी की उबलती हुई देग में बैठा देखकर सिखों में हाहाकार मच गई| वे जैसे ही गुरु जी को निकालने के लिए आगे हुए, सिपाहियों ने उनको खूब मारा| सिखों पर अत्याचार होते देख गुरु जी ने उनको कहा, परमेश्वर का हुकम मानकर शांत रहो| हमारे शरीर त्यागने का समय अब आ गया है|


२. गर्म रेत शरीर पर डालना
 जब गुरु जी चंदू की बात फिर भी ना माने, तो उसने गुरु जी के शरीर पर गर्म रेत डलवाई| परन्तु गुरु जी शांति के पुंज अडोल बने रहे "तेरा भाना मीठा लागे" हरि नाम पदार्थ नानक मांगै" पड़ते रहे| देखने और सुनने वाले त्राहि-त्राहि कर उठे| परन्तु कोई कुछ भी नहीं कर पाया| गुरु जी का शरीर छालों से फूलकर बहुत भयानक रूप धारण कर गया|   

३. गर्म लोह पर बिठाना
तीसरे दिन जब गुरु जी ने फिर चंदू की बात ना मानी, तो उसने लोह गर्म करवा कर गुरु जी को उस पर बिठा दिया| गुरु जी इतने पीड़ा ग्रस्त शरीर से गर्म लोह पर प्रभु में लिव जोड़कर अडोल बैठे रहे| लोग हाहाकार कर उठे|
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ज्योति ज्योत समाना
जब दिन निकला तो चंदू फिर अपनी बात मनाने के लिए गुरु जी के पास पहुँचा| परन्तु गुरु जी ने फिर बात ना मानी| उसने गुरु जी से कहा कि आज आपको मृत गाए के कच्चे चमड़े में सिलवा  दिया जाएगा| उसकी बात जैसे ही गुरु जी ने सुनी तो गुरु जी कहने लगे कि पहले हम रावी नदी में स्नान करना चाहते है, फिर जो आपकी इच्छा हो कर लेना| गुरु जी की जैसे ही यह बात चंदू ने सुनी तो खुश हो गया कि इन छालों से सड़े हुए शरीर को जब नदी का ठंडा पानी लगेगा तो यह और भी दुखी होंगे| अच्छा यही है कि इनको स्नान की आज्ञा दे दी जाए| चंदू ने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि जाओ इन्हे रावी में स्नान कर लाओ| तब गुरु जी अपने पांच सिखों सहित रावी पर आ गए| गुरु जी ने नदी के किनारे बैठकर चादर ओड़कर जपुजी साहिब का पाठ किया और कहा कि अब हमारी परलोक गमन की तैयारी है| आप जी ने फरमाया कि श्री हरिगोबिंद को धैर्य देना और कहना कि शोक नहीं करना, करतार का हुकम मानना| हमारे शरीर को जल प्रवाह ही करना, संस्कार नहीं करना| इसके पश्चात गुरु जी रावी में प्रवेश करके अपना शरीर त्याग कर सचखंड जी बिराजे| उस दिन मई 30, 1606 थी| गुरु जी का ज्योति ज्योत समाने का सारे शहर में बड़ा शोक बनाया गया| गुरु जी के शरीर त्यागने के स्थान पर गुरुद्वारा ढ़ेरा साहिब लाहौर शाही किले के पास विद्यमान है|सिखों ने गुरु साहिब की शहीदी की खबर माता जी और सिक्ख संगतो को बताई तो सबको बड़ा दुख हुआ| बाबा बुड्डा जी ने सबको धैर्य देते हुए कहा आप गुरु जी की वाणी का ध्यान करो| गुरु जी लोक भलाई व परोपकार के कार्य के लिए अपने बैकुंठ धाम को गए हैं| इसलिए उनके लिए शोक करना उचित नहीं है| शोक उनके लिए करना उचित होता है जो अपनी सारी उम्र जगत के भोग विलास में लगाकर सत्संग और नाम सुमिरन के बिना ही व्यतीत कर जाते हैं| इस तरह भाई बुड्डा जी ने सबको समझाकर धैर्य दिया और शांत करके बिठाया|
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