परमसंत कबीर साहिब जी
v कबीर खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर|
ना काहूँ से दोस्ती, ना काहूँ से बैर||
v सेवक सेवा में रहे, सेवक कहिये सोये|
कहत कबीर सेवा बिना, सेवक कैसे होये||
v कबीर सो धन संचिये, जो आगे को होय|
शीश चढ़ाये गाठरी, जात ना देखे कोय||
v कबीर सब जग निर्धना, धनवंता नहि कोय|
धनवंता सोइ जानिये, सत्तनाम धन जो
होय||
v कबीर सब जग दुःख भरा, सुखिया नहीं संसार|
सुखिया केवल भगत जन, जाके नाम अधार||
v कबीर गुरु की भक्ति करूँ, तजि विषय रस भौग|
बार -2 नहि पाइए, मानुष जन्म की मौज||
v वस्तु कही ढूंढें कही, किस विधि आवे हाथ|
कहत कबीर तब पाइए, जब भेदी लीजे साथ||
v भेदी लीना साथ कर, दीनी वस्तु दिखाये|
कोटि जन्म का पंथ था, पल में दिया मुकाये||
v कबीर तेरी झोपड़ी, गल कटियन के पास|
जो करेगा सो भरेगा, तू क्यों भयो उदास||
v सुख देवे दुःख को हरे, करे पाप का अंत|
कहत कबीर वे कब मिले, परम स्नेही संत||
v की त्रिसना है डाकिनी, की जीवन का काल|
और और निसिदित चहै,
जीवन करे बेहाल||
v राम बुलावा भेजिया, दिया कबीर रोय|
जो सुख साधू संग में, सो बैकुण्ठ ना होय||
v सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाय|
कह कबीर सुमिरन किये, साईं माहिं समाय||
v नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग|
और रसायन छाड़ि के, नाम रसायन लाग||
v “क्या काशी
क्या उसर मगहर राम हृदय बस मोरा|
जो तन काशी तजै कबीरा तो रामहि
काहे निहोरा||”
v कबीर संगत साध की, साहिब आवै याद|
लेखे में सोई घड़ी, बाकी दिन बरबाद||
v कबीर सोया क्या करे, जाग जाग अब जाग|
जा के संग से बिछुड़ा, वाही के संग लाग||
v कबीरा सोया करे, उठ के जपो मुरार|
इक दिन होयेगा सोवना , लम्बे पांव पसार||
v कबीर सोया क्या करै, उठि कर जन्म सुधार|
जिन -2 पन्थो चालना, सोई पंथ सवार||
vसंगत साध
की , जौं की भूसी
खाय।
खीर खाण्ड भोजन मिले, साकट संग न जाय।।
vकबीर साधु का संगति रहो,जौं की भूसी खाओ।
होनहार सो होइ है,
साकत संग न जाओ।।
v कबीर यह तन जात है, सकै तो ठौर लगाव|
कै सेवा करूँ साधु की, कै गुरु के गुण गाव||
v कबीरा मन तो एक है, चाहे जहाँ लगाये|
चाहे गुरु की भक्ति कर, चाहे विषय कमाये||
v सुख में सुमिरन ना किया, दुःख में किया याद|
कह कबीर ता दास की, कौन सुने
फरियाद||
v कबीर कसौटी गुरु की, खोटा टिकै ना कोय|
वारै तन मन प्राण जो, सो कोई बिरला होय||
v सेवक मुखी कहावई, सेवा में दृढ नाहिं|
कह कबीर सो सेवका, लाख चौरासी जाहिं||
v कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर|
पाछै लागा हरि फिरै, कहत कबीर कबीर||
v कबीर मन मैंला भया, जा में बहुत विकार|
ये मन कैसे
धोईये, साधो करो विचार||
v कबीर तासो प्रीत कर,जाको ठाकुर राम |
पंडित राजे भूपति, आवे कौनै काम ||
vकबीर मन तो एक है, भावै जहाँ लगाय|
भावे गुरु की भक्ति कर, भावै विषय कमाय||
v सतगुरु कहै जो सिष करै, बल बुधि आपा खोय|
कह कबीर गुरु कृपा से, सबा कारज
सिद्ध होय||
v गुरु आज्ञा मानै नाहीं, करता आना कानि|
कह कबीर सो सेवका, करै आपनी हानि||
v बहुत यत्न से धन कमाया, सिर पर बाँधी पोट|
कहे कबीर सत्तनाम बिन, सहेगा यम की चोट||
v सुसंगति से सुख ऊपजै, कुसंगति से दुःख जोय|
कहै कबीर तहँ जाइये, साधू संग जहँ होय||
v कबीर गुरु के रुठते, गुरु की शरणी जाय |
कहत कबीर गुरु रुठते, तो हरि नही होत सहाय ||
v कबीर तासो प्रीत कर, जाको ठाकुर राम |
पंडित राजे भूपति, आवे कौने काम ||
v आवत गाली एक है, पलटत होय अनेक |
कहे कबीर पल्टी नही, तो रही एक की एक ||
v भक्ति करे पाताल में, प्रगट होय आकाश |
कहे कबीर तिहुँ लोक में, छुपै न हरि का दास ||
v तन थिर मन थिर वचन थिर, सूरत निरत थिर होय |
कह कबीर इस पलक को, कल्प न पावै कोय ||
v कबीर आधी सखी यह, कोटि ग्रन्थ करि जान |
नाम
सत्त जग झूठ है, सूरत शब्द पहिचान ||
v तीरथ मिले तो एक फल, संत मिले फल चारि |
सतगुरु
मिलै अनेक फल, कहै कबीर विचारि ||
v सतगुरु जागत जगत में, सोवत सब संसार |
कह
कबीर सो भी जगा, गहे गुरु चरनार ||
v गुरु की सेवा चाकरी, करियें मन चित्त लाय |
कहै कबीर निज तरन को, नहीं और उपाय ||
v भक्ति प्रभाव मिटी सकल, धर्मदास की पीर|
कोटि जन्म के पुण्य से, सतगुरु मिले कबीर||
v ‘कबीर’ कूकर राम को मोतियों मेरा नाम |
गले प्रेम की जेवड़ी जित खींचो
तित जाऊं ||
v हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास.
सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास.
v उलटे
सुलटे वचन का सिक्ख न माने दुःख|
कहे ‘कबीर’
संसार में सो कहिये गुरु मुख||
v कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ|
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ||
v कबीर रैन गंवाई सोय करि, दिवस गंवाया रवाय|
हीरा
जन्म अमोल था, कौड़ी
बदले जाय||
v सेवक सेवा में रहै, अनत कहूँ नहिं जाय |
दुःख- सुख सिर ऊपर सहै, कह कबीर समुझाय ||
v सेवक फल
मांगे नहीं , सेव करै दिन रात।
कहैं कबीर ता दास
पर , काल करै नहीं घात।।
v फासन की विधि सभु कोउ जानै छूटन
की इकु कोई।।
कहि कबीर रामु रिदै
विचारै सूतकु तिनै न होई।।
v हम वासी वा देस के, जहँ जाति वरन कुल
नाहिं।
सबद मिलावा होत है ,
देह मिलावा नाहिं । |
v सबद बिना सुरत अंधरी, कहो कहाँ को जाय |
न
पावें सबद का, फिरि फिरि भटका खाय ||
v दुःख में सिमरण सब करे, सुख में करे ना कोय|
जो सुख में सिमरण करे, तो दुःख काहे को होय||
v निगुरा मुझे ना मिले, पापी मिले हजार |
एक निगुरे के शीश पर लाख पापी का भार ||
v प्रेम प्रेम सब कोइ कहै, प्रेम न चीन्है कोय |
आठ पहर
भीना रहै, प्रेम कहावै सोय ||
v प्रेम तो ऐसा कीजिये, जैसे चन्द चकोर |
घींच
टूटी भुइँ माँ गिरै, चितवै वाही ओर ||
vकूकर रहत सदा स्वामी के द्वारे जो देवे सो खावे|
हमरो मनवो इतनो लोभी द्वार
भटकावे ||
v निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय|
बिन पानी
बिन साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय||
v बुरा जो देखण मैं चला, बुरा न मिलया कोय|
जे मन खोजा आपना, तो मुझ से बुरा न कोय||
v काल करे सो आज कर, आज करे सो अब|
पल में परलय होगी, बहूरी करोगे कब||
v पोथी पड़ -2 जग भुआ, पंडित भयो न कोए|
ढाई आखर प्रेम के, पढ़े सो पंडित
होए||
v जब तू आया जगत में, लोग हँसे तू रोए|
ऐसी करनी न करी, पाछे हँसे सब कोए||
v एक वचन गुरु देव का ताका अंनत विचार|
पण्डित थाके मुनि जना, वेद ना पावे पार||
v मांगन मरण समान है, मत कोई मांगे भीख|
मांगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख||
v चिंता ऐसी डाकिनी, काट कलेजा खाय|
वैध बेचारा क्या करे, कहा तक दवा लगाये||
v ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय|
औरन को सीतल करे, आपँहु सीतल होय||
v सात समंदर की मसि करौ, लेखनि सब बनराइ|
धरती सब कागज़ करौ, हरि गुण लिखा न जाइ||
v यह तन विष के बेलरी, गुरु अमृत की खान |
सर दिजे सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान||
v सिख साखा बहुते किए, सतगुरु किया न मीत |
चाले थे
निजधाम को, बीच में अटका चीत ||
v धीरे -2 रे मना, धीरे सब कुछ होय|
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतू आये फल
होय||
v या दुनिया दुइ रोज की, मत कर या से हेत |
गुरु चरनन से लागिये, जो पूरन सुख देत |
vपाव पलक की सुधि नहीं, करै काल्ह का
साज।
काल अचानक मारसी, ज्यों तीतर को बाज़।।
vपाव पलक तो दूर है, मो मैं कह्रा न
जाय।
ना जानौं का होइगा, पल कै दसवैं भाय।।
v जा मरने से जग डरे , मेरे मन आनन्द |
कब मरिहै कब पाइहौं , पूरण
परमानन्द ||
v लूट सके तो लुट ले, राम नाम की लूट|
पीछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट||
v सत्त नाम कडुवा लगै, मीठा लागै दाम |
दुबिधा में दोऊ गए, माया मिली न राम||
v प्रेमी ढ़ूढ़त मैं फिरू, प्रेमी मिले ना कोय|
प्रेमी को प्रेमी मिले, सब विष अमृत होय||
v खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय |
कुटिल वचन साधू सहै, और से सहा
न जाय ||
v जो यह एक न जानिया, बहु जाने का होय|
एकै ते सब होत है, सब ते एक न होय||
v जो यह एकै जानिया, तौ जानो सब जान|
जो यह एक न जानिया, तौ सबही जान अजान||
v ज्ञान, ध्यान अरु योग जप, गुरु सेवा सम नाहिं|
भक्ति मुक्ति और परम पद, सब गुरु सेवा माहिं||
v माला तो कर में फिरे जीभ फिरे मुख माहिं|
मनुवा तो दह –दिशि फिरे यह तो सिमरन नाहिं||
v सब घट मेरा साइयाँ, सूनी सेज न कोय |
बलिहारी वा घट की, जा घट परघट होय ||
v सतगुरु मिला तो सब मिला, न तो मिला न कोय |
माता पिता सुत बान्धवा, यह तो घर परगट होय ||
v जल ज्यों प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम |
माता
प्यारा बालका, भक्त प्यारा राम ||
v माया छाया एक सी, विरला जाने कोय |
भक्तो के पीछे फिरे, सन्मुख आय सोय |
v प्रीती बहुत संसार में, नाना विधि की होय |
उत्तम
प्रीती सो जानिए, सतगुरु से जो होय |
v सिष साखा बहुते किये, सतगुरु किया न मीत ||
चाले थे
सतलोक को, बीचहि अटका चीत ||
v क्या मांगू कछु थिर न रहाई, नैनों देखत यह जग जाई|
इक लख
पूत सवा लख नाती, तहि रावण घर दिया न बाती||
v साधू भूखा भाव
का, धन का भूखा नाहिं|
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं||
v तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी
होय।|
v पत्ता
बोला वृक्ष से
, सुनो वृक्ष बनराय |
अब के बिछड़े न
मिले , दूर पड़ेंगे
जाय ||
v दुर्बल
को न सताइये, जाकी मोटी हाय |
मरी
खाल की सांस से, लोह भसम हो जाय ||
v पांच
पहर धंधा किया
, तीन पहर गया सोय |
एक पहर भी नाम
बिन , मुक्ति कैसे
होय ||
v नहाये
धोये क्या हुआ
, जो मन मेल न जाय
|
मीन सदा
जल में रही ,
धोये बॉस न
जाय ||
v अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,
अति
का भला न बरसना, अति की भली
न धूप।
v दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर
ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न
लागे डार।
v जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई.
जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई.
v जैसा भोजन
खाइये , तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय।
v कुटिल वचन
सबतें बुरा, जारि करै सब छार
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।
v जग
में बैरी कोई
नहीं , जो मन
शीतल होय |
यह आपा तो डाल दे ,
दया करे सब
कोए ||
v प्रेमभाव एक चाहिए , भेष अनेक बनाय
|
चाहे
घर में वास
कर , चाहे बन
को जाए ||
v ते
दिन गए अकार्थी
, सांगत भाई न संत |
प्रेम
बिना पशु जीवन
, भक्ति बिना भगवंत ||
v तू-तू करता तू भया, मुझमे रही न हूँ |
वारी तेरे नाम तो, जित देखा उत तू ||
v मन के मते न चालिये, मन पक्का यमदूत|
ले डूबे दरियाव में, जाय हाथ से छूट||
v साधू सोई जानिये, चलै साधु की चाल|
परमारथ राता रहै, बोलै बचन रसाल||
v बारी -2 आपने, चले प्यारे मीत|
तेरी बारी जीयरा, नियरे आवै नीत||
v ज्ञानी को ज्ञानी मिले, रस की लूटम लूट|
ज्ञानी को आनी मिले, हौवे माथा कूट||
v जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय|
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावे सोय||
v प्रेम भाव एक चाहिए, भेष अनेक बनाये|
चाहे घर में वास कर, चाहे बन को जाय||
v तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय|
सहजै सब विधि पाइये, जो मन जोगी होय||
v बानी से पहचानिये, साम चोर की घात|
अंदर की करनी से सब, निकले मुँह की बात||
v स्वांस –स्वांस में नाम जपो, वृथा स्वांस मत खोय|
न जानूँ की अंत का, यही स्वांस ही होय||
v संत होते परमारथी, शीतल जिनके अंग|
तपन बुझावै ओर की, देंदे अपना रंग||
v गोधन, गजधन, बाजधन, और रतन धन खान|
जो आवै संतोष धन, सब धन धूरि समान||
v जागो लोगो मत सोवो, ना करो नींद से प्यार|
जैसा सपना रात का, ऐसा यह संसार||
v माया तजी तो क्या भया, मान तजा नहिं
जाय।
मान
बड़े मुनिवर गले, मान सबन को खाय।।
v जग की भेड़ा चाल, चलते के पाछे चले
|
परमार्थ ना सम्भाल, देखों जग की मूरत ||
v रैन दिवस पौथी पड़े, सो नहीं पंडित होय
प्रभु
प्रेम हिये उपजी, पंडित कहाए सोये||
vकहैं कबीर हम धुर घर के भेदी, लाये
हुकुम हजूरी ।”
यानी कबीर साहब
जो धुर घर यानी
सबसे ऊची मंजिल के भेद से वाकिफ है
v ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराए |
नीचा होय
सो भरि पीवे, ऊचाँ प्यासा जाए ||
प्रक्रति के नियम के अनुसार पानी हमेशा नीचे की ओर
ही बहता है व नीचे स्थान पर ठहरता है| ऊँची जगह पर नही ठहरता| पानी पीने के लिए
मनुष्य को नीचे झुकना पड़ता है| इसी तरह हम किसी से कुछ ग्रहण करते हैं तो हमे
झुकना पड़ता है| जैसे शिष्य को गुरु से कुछ पाने के लिए उसके चरणों में विनम्र भाव
से झुकना पड़ता है| तभी हम किसी से कुछ ग्रहण करने के लायक बनते है|
v जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर |
एक पलक
बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर ||
यदि गुरु वाराणसी में निवास करे और शिष्य समुद्र के
निकट हो, परन्तु शिष्य के शरीर में गुरु का गुण होगा, जो गुरु को एक क्षण भी नहीं भूलेगा |
v इक बानो जो
दीनता, सन्तन किया विचार।
यही भेंट गुरुदेव की, सब कुछ गुरु दरबार।।
परम सन्त श्री कबीर जी कथन करते
हैं कि सच्चे परमार्थी का सबसे श्रेष्ठ भूषण क्या है "दीनता' जिसने अपने परम
इष्टदेव जी के चरण कमलों में रहकर दीन भाव का बाना ओढ़ लिया है उसने मानों अपना
सर्वस्व ही उन्हें अर्पित कर दिया। इसी का नाम है "नमन'- सदा ही अपने इष्टदेव जी के वचनों को शिरोधार्य करना, उनकी आज्ञा के अनुसार अपने जीवन को उसी ढंग से चलाना जिससे उनकी प्रसन्नता
प्राप्त हो सके।
vदेह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह |
बहुरि न देहही
पाइये, अब की देह सो देह ||
इसी जन्म में जो कुछ करना है कर ले| परोपकार कर
ताकि अपने ध्येय को पा सके| कोई तेरे साथ जैसा भी व्यवहार करे तू उसके साथ अच्छा
व्यवहार ही कर| नेकी कर दरिया में डाल | अपने दिल में किसी से बड़ा बनने की इच्छा न
रख|
v खुलि खेलो संसार में , बाँधि न सके कोय |
घाट जगाती क्या करै , सिर पर पोट न होय ||
अर्थ
– यदि तुम्हारा ख्याल, तुम्हारी सुरती और तुम्हारा ध्यान मायावी दुबिधा से फ़ारिग
है तो संसार में स्वतंत्र जीवन व्यतीत करो| अब तुम्हे किसी प्रकार का बंधन नही|
जिस व्यक्ति के सिर पर बोझ अथवा सामान की पोटली नहीं है तो चुँगी का कर लेने वाला
कर्मचारी उससे क्या मागेगा?
v रवि को तेज घटे नहीं, जो बादल घुमै घुमंड |
साध वचन
पलटे नहीं, पलट
जायें ब्रह्मंड ||
अर्थात जिस प्रकार सूरज का अपना तेज कभी घटता नहीं
चाहे बादल कितना भी घूम ले इधर से उधर इसी प्रकार संतों का वचन कभी पलट नहीं सकता
चाहे पूरा ब्रह्मण्ड पलट जाए|
v दोष पराया देख करि, चले हसतं हसतं|
अपनी याद न आवहीं, जाका आदि न अंत ||
प्रत्येक मनुष्य में कोई न कोई अवगुण अवश्य होता
है| अगर ऐसा नही होता तो वह इस दुनिया में कभी न आता क्योंकि जो सभी अवगुणों से
रहित हो जाता है, परमात्मा से नही मिल सकता| सभी जीव दूसरों में कोई न कोई दोष
ढूँढते रहते हैं| वे कभी खुद का आत्म निरक्षण नही करते कि उनमे कितने अवगुण भरे
है| यदि एक व्यक्ति किसी की बुराई करे, वह खुद अवगुणों से रहित कैसे हो सकता है?
अगर हम अच्छे हैं तो दुनिया अच्छी दिखाई देती है| उदाहरण के तौर पर हमारी आँख पर
जिस रंग का चश्मा होगा हमे दुनिया वैसे ही दिखाई देगी| यदि सभी केवल अपने-2
अवगुणों का सुधार करे तो सारी दुनिया अच्छी हो जाएगी|
v भक्ति बीज बिनसे नहीं, आय पड़े जो चोल|
कंचन जौं बिष्ठा पड़े, घटै न ताको मोल||
अर्थात
जिसके मन में एक बार भक्ति का बीज पड़ जाता है तो कभी उसका नाश नहीं होता| जैसे
सोने के ऊपर कीचड़ पड़ जाने से उसका मोल कम नहीं होता उसके ऊपर से कीचड़ साफ कर दी
जाए तो उसकी कीमत उतनी ही रहती है| ऐसे ही जिसके मन में नाम का बीज बौ दिया जाता
है तो फिर वो बीज कभी ख़त्म नहीं होता है|
v जिसका गृह तिस दिया ताला , कुंजी
गुरु सौम्पायी !
अनक उपाव किये नाही छूटे बिन सतगुरु शरनाई
यानी
उस परमेश्वर ने हमारा यह शरीर रूपी घर बनाकर इसमें ताला लगाकर चाबी
सतगुरु के हाथ में दे दी है और जब तक कोई जीव सतगुरु से अपनी यह कुंजी हासिल नहीं
करता , अपने अन्दर जाकर तलाश नहीं करता , तब
तक बह अपना मुक्ति का दरवाजा खोल नहीं सकता !
v
v निराकार की आरसी, साधों ही की देहि |
लखा जो चाहै अलख को, इनहीं में लखि लेहि ||
भावार्थ –अ लाख पुरुष – जो लाखा नहीं जाता अर्थात्
जिसको समझाने में बुद्धि का ज्ञान काम नहीं देता| अगम पुरुष जहाँ वाणी की गति नहीं
है अर्थात् जिह्वा उसके वर्णन करनें में असमर्थ है| “अकैह” पुरुष जो जिह्वा से कहा
नहीं जाता अर्थात् मन, बुद्धि , इन्द्रियों और वाणी से परे जो कुल मालिक का स्वरूप
है, यदि इसको देखने की इच्छा है तो उसको देखने का दर्पण सद्गुरु (संतन) की देह| इस
पवित्र के अंदर तू उस अलख पुरुष को ठीक प्रकार से देख सकेगा|
v सुमिरण की सुधि यों करै, ज्यों गागर
पनिहार।।
हालै डोलै
सुरति में, कहै
कबीर विचार।।
पनिहारिनें सिर पर घड़े उठाये
बातों का आनन्द लेती हुई घर की ओर बढ़ती चली जाती हैं परन्तु उनके अन्तर्मन में एक
यह भावना भी काम कर रही होती है कि हमारे सिर पर रखे हुए घड़ों का सन्तुलन कहीं
बिगड़ न जाये नहीं तो सारा हमारा जल ले आने का श्रम निष्फल हो जायेगा। इसी तरह सन्त
सद्गुरुदेव जी का अनन्य उपासक एक साधक उनकी आज्ञा के तार में बंधा हुआ व्यावहारिक
कार्य प्रसन्न चित्त होकर करता है किन्तु उसके ह्मदय की तलहटी में यह भी गूँज उठा
करती है कि मेरा यह कार्य भी परम इष्टदेव जी की प्रसन्नता के लिये ही है ।
v कागा का को धन हरै, कोयल का को देत |
मीठा
सब्द सुने के, जग अपनों करि लेत ||
अर्थात कोयल और कौआ रंग रूप में एक जैसे ही प्रतीत
होते हैं, मगर अपने गुण और दोष के कारण एक तो लोगों को प्रिय है मगर दुसरे से लोग
घृणा करतें है| कौआ तो निंदनीय शब्द (कायं -2) करने पैर धिक्कारा जाता है, कोई उसे
पास भी नहीं फटकने देता| इसके विपरीत कोयल की मीठी वाणी सबके मन को आकर्षित करती
है| इसी प्रकार मनुष्य भी रंग रूप से नहीं बल्कि गुण से पूजा जाता है| स्वभाव ही
जिव को पूजनीय बनाता है और स्वभाव ही घृणास्पद बनाता है| अत: मनुष्य को वाणी
(स्वभाव) पैर नियंत्रण रखना चाहिये|
v चलती चक्की देखकै, दिया कबीर रोये |
दुई पट भीतर आइ कै, साबत गया न कोय ||
चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा खिल्ल |
राखनहारा राखले, जाय किल्ली से मिल्ल ||
अर्थात जो दाना खूँटी के साथ मिल जाता है वह चलती
हुई चक्की के दोनों पाटो में रहकर भी नहीं बचा रहता है| संसार में काल और माया का
चक्कर चल रहा है| अज्ञानी जीव दानों की तरह इसमें पिसते जा रहे है| परन्तु जो लोग
सच्चे दिल से गुरु की शरण में आ जाते हैं, वे उन खूंटो के दानों की तरह बच निकलते
हैं| उनका जन्म सफल हो जाता है| वे हमेशा के लिए इस पापों के समुन्द्र से बचकर
किनारे लग जाते हैं|
v मोर तोर की जेवरी, बटि बाँधा संसार।
दास कबीरा क्यों बँधै, जाके नाम आधार।।
अर्थः-""श्री कबीर
साहिब उपदेश करते हैं कि स्वयं ही मेरे तेरे पने की एक सुदृढ़ रस्सी बट कर यह जगत
उसमें बँध रहा है। परन्तु मालिक के सच्चे दास इस बन्धन में कभी नहीं बँधते, क्योंकि उन्होंने
ममता अहंता को त्यागकर मालिक के नाम का आधार जो ले रखा है।''
vजो जल
बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम।
दोनों हाथ
उलीचिये, यही
सयाना काम।।
अर्थः-ऐ विचारशील मानव! यदि नौका के अन्दर आवश्यकता से अधिक जल भर जाये और
घर में बहुत अधिक संसार का ऐश्वर्य एकत्र हो जाय तो विचक्षण पुरुष को चाहिये कि दोनों
वस्तुओं अर्थात् जल और धन सम्पदा को नाव और घर में से शक्ति के अनुसार बाहर उछाल
दे। नहीं तो वह नैया और वह गृहस्थ जीवन विनाश के कारण बन जाएंगे।
v मैं मैं बुरी बलाय है, सको तो निकसो
भागि।
कहैं कबीर कब लगि रहै, रुई लपेटी आगि।।
"" मैं
मैं अर्थात् ममता बहुत बुरी बला है। जहाँ तक सम्भव हो, इसके
फन्दे से निकल भागने का यत्न करो। यदि अपनी सुरक्षा अभीष्ट है, तो इस ममता का परित्याग करना ही होगा। रुई में लिपटी आग भला कब तक रह
सकेगी? अन्ततः रुई को जला कर ही मानेगी। इसी प्रकार मैं-मेरी
के विचारों की अग्नि भी अन्त में मनुष्य की भक्ति प्रेम की भावनाओं को नष्ट भ्रष्ट
करके उसी लुटिया ही डुबो देगी।''
v कबीर गुरु की भक्ति का, मनमें बहुत
हुलास।
मन मनसा माँझै बिना, होन चहत है दास।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब जी का कथन
है कि मनमें गुरु-भक्ति प्राप्त करने की लालसा तो बहुत है; परन्तु यह मन है
कि सांसारिक इच्छाओं तथा मनमति को मलियामेट किये बिना ही गुरु के दास अथवा भक्त का
दर्ज़ा पा लेना चाहता है। जब ऐसी दशा है, तो सफलता कैसे
प्राप्त हो?
v बंधे को बंधा मिलै, छुटै कौन उपाय |
कर सेवा निरबंध की, पल में लेत
छुड़ाय ||
यह जीव तो माया मोह के बन्धनों में जकड़ा हुआ है
जिसे समय के सन्त महापुरुष जोकि स्वयं इन बन्धनों से मुक्त होते हैं, वही जीव को
आधि, व्याधि, उपाधि त्रय तापों से मुक्त करा सकते हैं, अन्यथा जीव इन विकारों से
निकलने के लिए स्वयं समर्थ नही है| सन्त-महापुरूष जिस भक्ति पथ को दर्शाते है वें भी
यही कहते हैं कि भक्ति स्वयं स्वतंत्र है| इस मार्ग पर चलने से ही जीव स्वतंत्र हो
सकता है क्योंकि जो स्वयं आजाद (बन्धनमुक्त) होगा वही बन्धन में पडे हुए को छुडवा
सकता है| जो स्वयं बन्धन में पड़ा हुआ हो वह दूसरों को कैसे छुडवायेगा| अंत: सन्त
सद्गुरू की शरण में आकर ही जीव बन्धन से मुक्त हो सकता है| इसलिए ऐ जिगासु! बन्धन
से मुक्त होने का साधन कर| सन्त महापुरूषों की संगति को शिघ्राति शीघ्र प्राप्त
कर, तभी तू माया के बन्धनों से आजाद हो सकेगा |
v आदि नाम पारस अहै, मन है मैंला लोह |
परसत ही कंचन भया, छुटा बन्धन
मोह ||
वास्तविक
पूँजी का नाम है| यह नाम पारसमणि है, मन लोहे के समान है | जैसे पारसमणि लोहे को
स्पर्श करते ही सोना बना देती है अर्थात् मोह के बन्धन टूट जाते हैं| मन स्वयं इस
शब्द में लगना आरम्भ हो जाता है जिससे जिन्दगी में एक अनूठे आनन्द का अनुभव होने
लगता है |
v बिन सतगुरु बाचै नही, फिरि बूड़ै भव माहिं |
भवसगर के त्रास में, सतगुरु
पकरैं बाहिं ||
संसार रुपी सागर की भँवर अथवा आवगमन का चक्र इतना
प्रबल है कि जीव इस भँवर से अपने बल से नहीं
बच सकता| माया
की वायु इस भँवर को और भी तेज़ कर देती है जिससे जीव बार -बार अन्यान्य योनियों का
शिकार
बनकर भवसागर में गोते खाता है, परन्तु सद्गुरू ही
ऐसे शक्तिशाली हैं जो इस संसार -सागर में गोते खाते हुए जीव की बांह पकड़ कर उसे
डूबने से बचा लेते हैं |
v कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोई
आप ठगायै सुख उपजय, और ठगाये दुख होई।
कबीर कहते हैं कि आप ठगे जाये तो कोई बात नहीं। आप
किसी को मत ठगे। आप ठगे जायेंगे तो सुख मिलेगा पर दूसरे को ठगने से आप को दुख
होगा।
v कबीर काहे को डरे, सिर पर सिरजनहार
हस्ती चढ़ी डरिये नहीं, कुकर भुसै हजार।
कबीर भला क्यों डरे जब उनके सिर पर सृजनहार प्रभु
की छत्र छाया है।
हाथी पर चढ़ कर भला हजारों कुत्तों के भोंकने से भी क्या डर। हाथी
ज्ञान वैराग्य का प्रतीक है।
v "शब्द बिना
साधू नहीं-द्रव्य बिना नहिं साह।''
धन सम्पत्ति के बिना कब कोई सेठ
कहलाया इसी तरह जिस साधु ने शब्द की कमाई नहीं की वह अभी साधना-पथ में है। परमपद
का इच्छुक सद्गुरुदेव जी की पावन शरण लेकर उनसे शब्द मन्त्र की दीक्षा ले ले। उसकी
प्रचण्ड साधना करे।
v जिन ढ़ूढ़ा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ
जो बउरा डूबन डरा, रहै किनारे बैठ।
जो गहरे पानी में डूब कर खोजेगा उसे ही मोती
मिलेगा। जो डूबने से डर जायेगा वह किनारे बैठा रह जायेगा। आत्म ज्ञान प्राप्ति के
लिये गहन साधना करनी पड़ती है।
v जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
""ऐ
मनुष्य! यदि तेरे लिये कोई काँटे बो देता है तो तू उसके लिये फूल बो दे। ये फूल
तेरे लिये तो फूल का काम देंगे ही और उसको ये कांटे के समान चुभने लगेंगे।''
v गुरु भक्ति अति कठिन है, ज्यों खाँडे की धार |
बिना साच
पहुँचे नहीं, महा कठिन ब्यौहार ||
अर्थात् गुरु भक्ति का मार्ग तलवार की धार के समान
तीक्ष् है| सच्चाई पैर चलने वाला ही मार्ग पर आ सकता है| यहाँ पैर कायरों का काम
नहीं है|
v अधिक सनेही माछरी, दूजा अल्प सनेह।
जब
ही जल से बिछुरै, तत छिन त्यागै देह।।
अर्थः-मछली का जल के प्रति प्रबल
प्रेम है। उसकी तुलना में प्रेम के अन्यान्य उदाहरण तुच्छ हैं। क्योंकि मछली तो
ज्योंही जल से बिछुड़ती है, उसी क्षण तड़पने लगती है और तड़पती हुई प्राणोत्सर्ग
कर देती है। जब पशु-पक्षियों और साधारण जीवों के चित्त में प्रेम की इतनी प्रबल
भावनाएँ विद्यमान हैं, तो फिर विचार करो कि गुरुमुखों का
मालिक के चरणों में कितना अधिक प्रेम होना चाहिये।
v बृच्छ कबहुँ नहिं फल भखै, नदी न अचवै नीर |
परमारथ के कारने, साधन धरा सरीर ||
जिस प्रकार वृक्ष अपने फल को स्वयं नहीं खाता, नदी
अपने लिए पानी को संचित नहीं करती, अपितु वृक्षों तथा नदियों से अन्य भुत
प्राणियों को ही अत्यंत लाभ पहुँचता है, इसी प्रकार संत महापुरुषों का अवतरण भी
परोपकार के लिए ही होता है|
v गुरु मिला तब जानियै, मिटै मोह सन्ताप।
हर्ष शोक दाझै नहीं, तब गुरु आपहिं आप।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब जी का कथन
है कि पूर्ण परमार्थी गुरु के मिलने का फल यही है कि सेवक अथवा शिष्य के चित से
माया मोह के समस्त विकल्प सर्वथा नष्ट हो जावें, जोकि
पाप-ताप-सन्ताप को उत्पन्न करने वाले हैं। मोहजनित विकल्प दूर हो गये, तो उनसे उत्पन्न होने वाले ताप सन्ताप और क्लेश भी स्वतः नष्ट हो गये। तब
ऐसे सेवक के चित को हर्ष-शोक, सुख-दुःखादि द्वन्द्व विचलित
नहीं कर सकते। तथा जब मन की पवित्रता और शुद्धि की ऐसी अवस्था को हस्तगत कर लिया
गया; तब उसके परिशुद्ध ह्मदय के स्वच्छ दर्पण में सच्चे गुरु
का ही प्रतिबिम्ब दिखायी देने लगता है। अर्थात् शिष्य सेवक का अहं-अभिमान विगलित
होकर वहाँ केवल गुरु ही गुरु शेष रह जाता है।
v सब कुछ गुरु के पास है, पाइये अपने भाग|
सेवक मन
सौंपे रहै, निसु दिन चरनन लाग ||
अर्थात् सद्गुरु के पास समस्त सम्पदाएँ हैं, परन्तु
जिव की जितनी कमाई होती है, वह उसी अनुसार ही उस धन को प्राप्त करता है| इसलिए
सेवक भाव से सद्गुरु के चरणों में प्रीटी का नाता जोड़कर उनके श्री चरणों में
अधिकाधिक अनुराग बढ़ाना चाहिये|
v ज्ञानी से कहिये कहा, कहत कबीर लजाय।
अन्धे आगे नाचते, कला अकारथ जाय।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब जी कथन
करते हैं कि हम इन ज्ञानियों से जो केवल वेदादि शास्त्रों के शब्दों और अर्थों को
ही भली भाँति जानते हैं-जिनका जीवन उन शास्त्रों के वचनों के अनुसार ढला नहीं
है-क्या कहें? उनसे हमारा अनुभव सिद्ध बातें करना ऐसे ही निर्रथक होगा
जैसे कोई नट बड़ी सुन्दरता से नाच करता हो परन्तु जिसकी प्रसन्नता के लिये वह जो
कुछ कर रहा है वह तो नेत्रहीन है। वह क्या जाने कि नृत्य-कला कैसी होती है?
v ‘गु अंधियारे जानिये ‘रु’ कहिये प्रकाश,
मेट अज्ञान ही ज्ञान से, गुरु
नाम है तास।
अर्थात्-
अंदर के अंधकार और अज्ञान को मिटाकर जो प्रकाश अर्थात् ज्ञान दे, वही गुरु है|
गुरु के चार लक्षण हैं-
(१) पूर्ण भक्ति से संपन्न हो।
(२) अपने धर्मग्रंथों, शास्त्रों, और वेदों के आशय को
समझने वाला हो।
(३) समद्ष्टा अर्थात् ईश्वर को सब में व्यापक एक समान
देखने वाला हो।
शिष्य
को ईश्वर से मिलाने, भक्ति में लगा देने और उसकी शंकाओं को दूर करने में समर्थ हो।
v कबिरा कलह अरु कल्पना , सतसंगति से जाय ।
दुःख बासे भागा फिरै , सुख में रहै समाय
।।
संतो के साथ रहने से मन के अन्दर बसी कल्पना और कलह रूपी
व्याधियाँ नष्ट हो जाती है । जो व्यक्ति संतो की सेवा करता है उसके निकट दुःख आने
का साहस नहीं करता अर्थात संत सेवक सदैव सुखी रहता है ।
vकबिरा संगत साधु की , ज्यों गन्धी की
बास ।
जो कुछ गन्धी दे नहीं , तो भी बास सुबास
।।
संत कबीर जी कहते है कि साधु की संगति सगुन्धित द्रव्य बेचने
वाले गन्धी के बास की तरह है । जबकि गन्धी प्रत्यक्ष में कुछ नहीं देता फिर भी
उसके सुगन्धित द्रव्यों के सुगन्ध से मन प्रसन्न हो जाता है । इसी तरह संतों से
चाहे प्रत्यक्ष लाभ कुछ न हो फिर भी मन एवम आत्मा को शान्ति मिलती है।
v जिवना
थोरा ही भला, जो सत सुमिरन होय।
लाख बरस का जीवना, लेखे धरै न कोय।।
जीवन तो वही उत्तम है जो
नाम-सुमिरण में व्यय हो, वह यदि थोड़ा भी है तो भी
उत्तम है। इसके विपरीत जो मनुष्य नाम-सुमिरण से वंचित है, वह यदि लाखों वर्षों तक भी जीवित रहे तो उसकी इस दीर्घायु का भी कोई लाभ
नहीं। इसीलिये सत्पुरुष फरमाते हैं कि नाम के बिना जीवन मृत्यु के समान, विद्या अविद्या के समान तथा संसार का सुख-दुःख के समान है।
v तीर तुपक से जो लडै, सो तो सुर न होय |
माया तजि भक्ति करै, सुर कहावे सोय ||
अर्थात तीर, तलवार और बन्दूक से लड़कें वाला भी बेशक
सुरमा है| मगर सच्चा सुरमा वही कहाँ जायेगा, जो माया की गुलामी से आजाद होकर भक्ति
की प्राप्ति के यत्न में लग जाता है|
v लागी जाहि के लगी, तन मन चित्त में लागि |
धुँआ न
बाहर प्रगटि है, अंतर लागी आगि ||
छाती धड़कै मन डरै, होंठ फरकते देखि |
आँखिन सूँ आँसू बहें, लगन का यही बिसेखि ||
अर्थ ---जिसके दिल में प्रेम की चिनगारी लग गई वह
तन मन, चित सबकी सुधि खो देता है| उसके तन मन में प्रेम की चिनगारी एसा प्रभाव
डालती है कि धुँआ बाहर तो दिखाई नही देता, परन्तु अन्दर ही अन्दर यह आग भड़क उठती
है पुन: फरमाते है कि प्रेमी की दशा फिर कैसी हो जाती है? उसके दिल की धड़कन तेज हो
जाती है, उसका मन प्रेम में कांपता है तथा ओंठ फड़कते है| जब व प्रेम विभोर हो जाता
है तो आँखों से आँसू बहते हैं|
v मन मुरीद संसार है, गुरु मुरीद कोई साध |
जो मानै गुरु बचन को, ताका मता
अगाध ||
सम्पूर्ण संसार मन के कहे अनुसार चल रहा रहा है|
परम सन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते है कि विरले संस्कारी जीव ही सद्गुरू की
आज्ञानुसार चलते है| गुरु के ज्ञान से सच्चा दरगाह में मुख उज्ज्वल होगा| यह मन
जीव को अशान्ति, दुःख, क्लेश, कलपना में हर समय कैद करने के प्रयत्न में रहता हैं
की कही जीव इसके पंजे से निकल न जाए| गुरु का ज्ञान ही इस मन की कैद से छुटकारा
दिला सकता है| जैसे मकड़ी अपने मुँह से तारें निकालकर जाल बुन लेती है, पुन: उसमें
फँसकर अशान्त और दुखी होती है, फिर उसका बाहर निकलने का रास्ता ही दिखाई नही देता,
इसी प्रकार जीव भी मन के कहने पर चलकर हर समय संकल्पों और विकल्पों, इच्छाओ –
वासनाओं का ताना बुनता है| जब इसके जाल में उलझ जाता है तो फिर कहता है कि में
बहुत दुखी हूँ| प्राय: सर्वसाधारण से यह कहते हुए सुना है कि आज मेरा मन बहुत
अशान्त हैं; मेरा मन बहुत दुखी है| तो इस दुःख का कारण कौन है? मन ही तो है| पहले
स्वयं काम क्रोध -लोभ-मोह-अहंकार के कहने पर चलकर फिर शिकायत करता है कि में दुखी
हूँ
v गुरुमुख गुरु चितवत रहे , जैसे
मनी भुवंग।
कह कबीर बिसरै नहीं,
यह गुरुमुख को अंग।।
गुरुमुख को अपने मालिक का ध्यान
इस तरह रहना चाहिये जैसे मणि वाले सर्प को अपनी मणि का रहता है-वह एक पल भी उस मणि
से पृथक् नहीं हो सकता। सत्पुरुषों के वचन तो ये थे कि ऐ जीव! तुझे संसार के
पदार्थों का सेवन करने का स्वतन्त्र अधिकार है किन्तु उन्हें पाकर उनमें आसक्त न
हो जाना। अपनी ममता उनमें न कर लेना-नहीं तो वे पदार्थ सदा ही तेरे मन को
अशान्त-दुःखी और चंचल बनाये रखेंगे। संसार के पदार्थों अथवा बन्धु बान्धवों से
ममता नहीं करनी-जगत् को समभाव से यथायोग्य बत्र्ताव करके जीवन बिताना है।
v मन
जानत सब बात, जानत ही औगुन करै।
काहे को कुसलात , हाथ दीप कूएँ परै।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब फरमाते
हैं कि मनुष्य का मन सभी बातों का जानकार है। वह भली प्रकार जानता है कि भलाई
किसमें है और बुराई किसमें? कौन सा काम करने से लाभ होगा
और किससे हानि होगी। किन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि सब कुछ जानता समझता हुआ भी
मानव मन बुराई औगुण स्वार्थ एवं विषय लोलुपता की ओर अधिक आकृष्ट रहता है। यह तो
वही बात हुई जैसे कोई हाथ में दीपक लेकर कुएँ में जा गिरे। जहाँ ऐसी अवस्था हो, वहाँ कुशलता की आशा रखना व्यर्थ है।
v पढ़ना गुनना चातुरी, यह तो बात सहल|
काम दहन
मन बसि करन, गगन
चढ़न मुसकल||
"शिक्षा प्राप्त कर लेना और शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों का विद्वान बन
जाना तो बहुत आसान काम है परन्तु काम-वासना को नष्ट करना,
मन को काबू करना और 'सुरत' को निजधाम में ले जाना बहुत कठिन है|"
सत्य ज्ञान की आवश्यकता पर बल देते हुए परम सन्त
श्री कबीर साहिब जी कहते हैं कि उच्च शिक्षा ग्रहण कर लेना और शैक्षणिक योग्यताएँ
प्राप्त कर लेना कोई मुश्किल नहीं है और न ही संसार में बौद्धिक उपलब्धियों के लिए
पदक प्राप्त कर लेना ही कठिन है परन्तु आत्म ज्ञान प्राप्त करना, काम, क्रोध,
लोभ, मोह और अहंकार आदि शत्रुओं से डट कर
मुकाबला करना और मन पर पूर्ण नियंत्रण का अभ्यास करना अत्यंत कठिन है||
vकह कबीर छूछा घट बोले। भरया होय सो कबहुं न डोले।।
छुद्र नदी
भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।
अर्थः-""फरमाते हैं कि सदैव रीता घड़ा ही
आवाज़ करता है, भरा
हुआ घड़ा आवाज़ नहीं करता।'' ""छोटे छोटे नदी-नाले
वर्षा के दिनों में किनारों को तोड़ते हुये उछल-उछल कर बहने लगते हैं जैसे अज्ञानी
और दुष्ट मनुष्य थोड़े से धन पर भी अहंकार करने लगता है। इसके विपरीत गम्भीर नदियां
बारह मास ही अत्यन्त शान्त गति से प्रवाहित होती रहती हैं जैसे कुलीन धनवान् लोग
करोड़पति होकर भी विनीत, सुशील एवं शान्तचित्त बने रहते हैं।
v तन थिर मन थिर वचन थिर, सूरत निरत थिर होय|
कह कबीर इस पलक को, कलाप न पावै कोय||
इंसान तन –मन व सुरती की धार को एकाग्र करके एक बार
मालिक की याद में लग जाए, लेशमात्र भी कोई ख्याल दिल में ना रहे तो एकाग्र सुरती
मालिक के ध्यान में लग जाती है| एक घड़ी में स्वास मात्र भी मालिक की याद में लग
जाए तो उसकी चारो युडो से बढकर कीमत है| एक पलक के ध्यान की तुलना में चारो युगों
की सम्पदा तुच्छ है जरा सोचो स्वांस की कितनी भारी कीमत है | परन्तु इस स्वांस की
कीमत वही जानता है जिसे विवेक दृष्टि मिल गई|
v सतगुरु वचन उलंधि करि, जो सेवक कहुँ जाय |
जहाँ जाय
तहँ काल है, कहे कबीर समझाय ||
सत्पुरुष समझाते हैं कि अगर महापुरुषों के वचन की
कदर नही की और उस पवित्र वचन से लापरवाही बरती तो फिर काल उसे अपने पंजे में दबोच
लेगा| यही सतगुरु का शब्द और उनका पवित्र वचन ही तो काल और माया के हमले से बचाने
वाला है| अगर उसी से लापरवाही है; तो फिर उसकी रक्षा कौन करेगा?
v जहाँ काम तहँ नाम नहिं, जहाँ नाम नही काम|
दोनों कबहूँ न मिलै, रवि रजनी इक ठाम ||
परमसंत श्री कबीर दास जी फरमाते हैं कि जहाँ मालिक
के नाम अर्थात सिमरण का प्रकाश है, वहाँ संसारिक कामना कैसे बस सकती है तथा जिस मन
में कामनाओं का निवास है, वहां नाम का उजाला नही होता| जिस प्रकार सूर्य और रात्रि
कभी एक साथ नही रह सकते| इसलिए हमेशा सतगुरु के शब्द को ह्रदय में बसाए रखो, जिससे
रूह शत्रुओं के वार से सुरक्षित रहे |
v गुरु सीढ़ी तें उतरै, सबद बिहूना होय |
ता को काल घसीटि है, राखि सकै
नहिं कोय ||
प्रत्येक गुरुमुख का यही कर्तव्य है कि गुरु –आज्ञा
को ह्रदय में धारण कर उस पर मननं करे| यही गुरुमुख का निजी कर्तव्य तथा वास्तविक
लक्ष्य है |”
v आये हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर |
एक सिंघासन चढ़ि चले, इक बाँधे
जात जंजीर ||
दुनिया नाशवान हैं| जो आया है उसने अवश्य ही एक दिन
मृत्यु के मुँह में जाना है| मगर जाने- जाने में अंतर है| जो गुरुमुख हैं,
जिन्होंने अपने जीवन को सद्गुरू की सेवा व भजनाभ्यास में लगा दिया हैं, वे उज्जवल
मुख होकर संसार से जाते हैं| सिंहासन पर चढ़कर अर्थात् सम्मान के साथ जाते हैं |
जिन्होंने नाम व शब्द की कमाई नही की, उन्हें चौरासी लाख योनियों की यन्त्रंणाए
सहन करनी पड़ती है| इसलिए संसार में आकर गुरुमुखों वाला जीवन व्यतीत करो| संसार से
उज्जवलमुख होकर जाओ ताकि तुम्हारा संसार में आना सफल हो |
v झूठे सुख को सुख कहै, मानत है मन मोद|
जगत चबैना
काल का, कछु मुख में कछु गोद ||
श्री कबीर साहिब जी कथन करते हैं कि लोग झूठे सुख
को ही असली सुख मानकर माया के झूठे समानों को प्राप्त करके मन में ख़ुशी मनाते हैं|
परन्तु यह समस्त जगत काल ही है|
v कबीर कुआ एक है पनिहारी अनेक ।
बरतन में ही भेद है पानी सब में एक ।।
किसी कुएं से पानी निकालो तो बरतन
में भेद हो सकता है। किसी का बरतन छोटा किसी का बड़ा हो सकता है। लेकिन पानी में
कोई भेद नहीं होगा|
इसी तरह जिसमें हृदय ने प्रभु के
प्रेम ज्यादा होगा उसका पात्र बड़ा होगा वह ईश्वर की उतनी प्रसन्नता प्राप्त करेगा|
vसूली
ऊपर घर करै, विष का करै आहार।
ता का काल कहा करै, जो आठ पहर हुसियार।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब जी का
कथन है कि जिसने सूली पर अपना घर बना रखा है और जो सदा विष का आहार करता है। तथा
जो आठों पहर सचेत रहता है, भला काल उसका क्या बिगाड़
सकेगा? (विषयलोलुपता, स्वार्थपरता
और अन्तर में बसे पाँच चोरों के साथ लड़ना, यही सूली पर
घर बनाना है। और मन की विषय वृत्तियों के साथ संघर्ष करना ही विष के घूँट पीना है।
यही जीते जी सूली पर घर करना है।)
v एक वस्तु के नाम बहु, लीजै वस्तु पिछानी |
नाम पच्छ नहिं कीजिये, सार तत्त
ले जानि ||
एक वस्तु के अनेकों ही नाम होते है| जैसे एक मनुष्य
जिसे कोई भाई कहता है कोई पिता, किसी का वह चाचा है तो किसी का मामा, नाम भिन्न –
भिन्न हैं परन्तु मनुष्य एक ही है| इन नामो के भिन्न – भेद में न पड़कर सार वस्तु
को पहचानना है कि वह मनुष्य क्या है? वह चेतन है, परमपिता परमात्मा का अंश है,
आत्मस्वरूप है| उसी आत्मस्वरूप ( सार तत्व ) की पहचान करनी है| अंत मानव जन्म को
पाकर नाम और स्वरूप को मिटाना है और अपनी सत्ता के नाम (आत्म -स्वरूप) को पहचानना
है| यही मानव जीवन को पाने का उद्देश्य है |
v तीन
लोक चोरी भई, सबका धन हर लीन्ह।
बिना
सीस का चोरवा, पड़ा न काहू चीन्ह।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब
जी का वचन है कि तीनों लोकों में चोरी हो रही है। हर किसी की गाँठ से
सुख शान्ति का धन चुरा लिया जाता है परन्तु बिना सीस का
वह चोर किसी को नज़र नहीं आता।
v प्रभुता को सब को भजै, प्रभु को भजै न
कोय।
जे कबीर प्रभु को भजैं , प्रभुता चेरी होय।।
अर्थः-प्रभु की दी हुई माया और
बड़ाई को तो हरेक चाहता है, किन्तु उस मालिक को कम लोग ही चाहते हैं। श्री कबीर साहिब
जी का कथन है कि जो जीव प्रभु का भजन करते हैं, तो माया और
बड़ाई खुद-बखुद ही दासी बनकर उसकी सेवा में हाज़िर रहती हैं।
vकबीर मन तीखा किया लाइ बिरह
खरसान।
चित चरनों
से चिपटिया, का करै काल का बान।।
अर्थः-बिरह और प्रेमाभक्ति एक
प्रकार की खरसान है। जब मन को इस खरसान पर लगाया जाता है; तो उसकी सब
मलिनता, अपवित्रता, सुस्ती और कमज़ोरी
दूर होती है। तथा इन दुर्गुणों के बदले उसमें सच्चाई, भक्ति
प्रेम और परमार्थ का बल भर जाता है। तब यही मन मनुष्य को आत्मोन्नति के शिखर की ओर
ले जाने का साधन बन जाता है। भक्ति-बल पाकर मन प्रतिक्षण मालिक से मिलने की तड़प
में व्याकुल रहता है। मानो प्रतिपल मालिक के चरणों से चिमटा हुआ है। क्योंकि जिस
मन में सच्ची तड़प और लगन है, उसे सदा मालिक से मिला और जुड़ा
हुआ ही जानना चाहिये। तथा जब मन मालिक से मिला रहेगा। तो काल का बाण उसका क्या
बिगाड़ सकता है?
v कहा कियौ हम आइ कै, कहा करहिंगै जाय।
इत्त के भये न उत्त के, चालै मूल गँवाय।।
श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि
जब ऐसी अवस्था है तो जीव ने संसार में आकर क्या कुछ किया तथा यहाँ से जाते हुये
क्या मुख लेकर मालिक के दरबार में जायेगा। यह तो न इधर का रहा न उधर का अर्थात् न लोक
सँवारा और न परलोक ही। प्रत्युत् अपनी सच्ची पूँजी अर्थात् मानव जन्म के अधिकार को
भी गँवाकर चल दिया। तात्पर्य यह कि यदि आत्मा के कल्याण के लिये कुछ करता, तो मानव जन्म का
अधिकार तो कम-अज़-कम बना रहता। किन्तु जीवन में बुराई की और रुख रखने के कारण अपना
यह अधिकार भी गँवा बैठा।
v कथा कीरतन कलि विषै, भव सागर की नाव।
कबीर जग के तरन को, नाहीं और उपाव।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब के
विचारानुसार इस घोर कलिकाल में जब कि चहुँ ओर दूषित वातावरण दृष्टिगोचर होता है
तथा तपस्यादि कठिन साधनों का आश्रय ग्रहण करना असम्भवप्राय प्रतीत होता है; भवसागर से तरने
के लिये कथा-कीर्तन ही वह सुदृढ़ नौका है, जो जीवात्मा को पार
पहुँचा सकती है। इसे छोड़कर कोई अन्य उपाय अथवा साधन नहीं दिखायी देता, जिसके आधार संसारी प्राणी भव-पार हो सकें।
vकबीर मन परबत हुआ,
अब मैं पाया जानि।
टाँकी
लागी सबद की, निकसी कंचन खानि।।
अर्थः-""श्री
कबीर साहिब जी का कथन है कि मुझे अब यह ज्ञात हुआ कि मन तो पर्वत के समान कठोर था।
परन्तु जब इस पर गुरु शब्द की टाँकी से चोट लगाई गई, तो मन की चट्टान
में से भक्ति परमार्थ रुपी सोने की खान निकल आई।''
vपहले यह मन काग था, करता जीवन घात।
अब तो मन हंसा भया, मोती चुगि चुगि
खात।।
""पहले यह मन कौव्वे के समान
स्वभाव वाला था अर्थात् विषय भोगों के मलिन आहार का मतवाला होकर आत्मा का घात कर
रहा था। परन्तु अब तो गुरुकृपा से यह मन हंस का रुप बन गया है और परमार्थ के मोती
चुन चुन कर खाता है।''
v मन मनसा को मारि करि नन्हा करि के
पीस।
तब सुख पावै सुन्दरी, पदुम झलक्कै सीस।।
""ऐ जीव!
मन के समस्त नीच विकारों तथा वासनाओं को मार कर और बारीक करके पीस डाल। जैसे
संखिया को भस्म करके पीस दिया जाता है और वह अमूल्य औषध बन जाता है। इसी प्रकार मन को बारीक करके पीसने का अर्थ है मनोविकारों में सुधार करना।
जब मन का सुधार हो जाए; तब यह अन्तर्मुख होकर परमार्थी मन बन
जावेगा तथा आत्मा रुपी सुन्दरी को अपूर्व आनन्द प्राप्त होगा। वह मन की खटपट से
मुक्त होकर सुखी होगी तथा उसके सिर पर सौभाग्य का कमल खिलकर जगमगाने लगेगा।''
v मनहीं को परमोधिये, मन हीं को उपदेस।
जो यहि मन को बसि करै, सिष्य होय सब देस।।
""मन ही
को समझाने और उपदेश करने की आवश्यकता है मन ही को सुधारकर और साधकर आज्ञाकारी
बनाना आवश्यक है। जो कोई इस मन को अपने वश में कर लेता है, तो
समस्त संसार ही उसका शिष्य बनने को तत्पर हो जाता है।
v गुरु धोबी सिष कापड़ा, साबुन सिरजनहार |
सुरती सिला पर धोइये, निकसै
जोति अपार ||
सद्गुरू ही शिष्य के मैंले मन को धो सकते है|
सद्गुरू के बताये हुए भजन-अभ्यास के साधन से ही मन पवित्र हो सकता हैं| किसी भी
वस्तु को नये रूप-रंग में बदलने के लिए उसी वस्तु के जानकार को ही वस्तु देने से
वह नये रूप में बनती है| जैसे लकड़ी बढ़ई के पास तथा लोहा लोहार के पास जाये तो नए
रूप में सुन्दर और बढ़िया रूप में बनकर सामने आता है, इसी प्रकार मैंला मन भी श्री
सद्गुरू का पास जाकर ही मायावी विचार छोड़कर भक्ति भाव के पवित्र -उज्ज्वल विचार
ग्रहण कर शुद्ध मन बन जाता है, क्योंकि सन्त सद्गुरू निष्काम कर्म कराते हैं,
जिससे संचित बुरे कर्म भी दग्ध हो जाते हैं और मन में सद्- विचार आने लगते हैं |
vमन
दिया कहुँ और ही, तन साधों के संग।
कहैं
कबीर कोरी गज़ी, कैसे लागै रंग।।
अर्थः-श्री कबीर साहिब जी का
कथन है कि जिस प्रकार कोरी गज़ी (कोरे थान) पर रंग नहीं चढ़ सकता, क्योंकि उस पर माँडी चढ़ी रहती है। जब तक उसकी माँडी नहीं उतरेगी, रंग कदापि नहीं चढ़ सकेगा। इसी प्रकार ही कई लोग अपने शरीर तो सत्संग में
बेशक रखते हैं, किन्तु उनके मन पर रंग इसलिये नहीं चढ़
सकता कि मन पर नफ़सानियत और खुदगर्ज़ी के स्थूल आवरण चढ़े रहते हैं।
v मन मनसा को मारि ले, घट ही माहीं घेर |
जब ही चालै पीठी दै, आँकुस दै
दै फेर ||
सन्त महापुरूष फरमाते हैं कि मन को काबू करके इसे
अंतर्मुख करो| जब-जब भी यह बाहर की ओर भागे, नाम के अंकुश से पुन: अपने वास्तविक
स्थान पर ले आओ| तभी यह वश में हो सकेगा, अन्यथा नाम के बिना इसे वश में करने का
कोई साधन नहीं |
v साधु आवत देखि कै, मन में करै मरोर।
सो तो होसी चूहरा, बसै गाँव की छोर।।
अर्थः-""जो
मनुष्य घर पर बैठे सन्तों के दर्शन पाकर अपने अहोभाग्य नहीं मानता प्रत्युत मन में
खीझता है, वह
शूद्र कुल का नीच प्राणी बनेगा और उसे अपने गाँव के अन्दर कोई भी नहीं रहने देगा।
उसका निवास गाँव के पार किनारे पर होगा।''
v आवत साधु न हरषिया, जात न दीया रोय।
कह कबीर वा दास की, मुक्ति कहाँ ते होय।।
""उचित तो यह है कि सन्तों के शुभ, मनोरम दर्शन हों तो
चित्त गुलाब के फूल की न्यार्इं खिल कर प्रफुल्लित हो जाए और उनसे वियुक्त होने पर
ह्मदय में विषाद भर जाये। जिस प्रकार शरीर से सम्बन्ध रखने वाले किसी सगे सम्बन्धी
के बिछुड़ने पर दुःख होता है उसी प्रकार आत्मा के निकट सम्बन्धी सन्त सत्पुरुषों के
वियोग में भी आँसू छलक पड़ें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। आत्मा की अपेक्षा शरीर के
सम्बन्धियों को हम अधिक महत्त्व देते हैं। अपने आत्मीयजन यदि घर से जाने लगें तो
हम लाख विचार करते हैं और कहते हैं कि इसे हमारे घर से खाली नहीं जाना है। कुछ न कुछ
अवश्य देना चाहिये। नहीं तो हमारी मान-हानि होगी। लोग हमारी निन्दा अथवा चर्चा
करेंगे। ऐसी अनेक बातें सोचकर जैसे भी हो, जहाँ से भी माँग
कर लाना पड़े, उस समय अतिथि का यथोचित आदरसम्मान अवश्य करेंगे
और करते हैं और ऐसा करना भी चाहिये। मतलब यह है कि जिस प्रकार इन झूठे सम्बन्धियों
से सम्बन्ध जोड़े रखने में अपनी शान समझते हैं उसी प्रकार आत्मा के जो सच्चे
सम्बन्धी हैं उनके प्रति हमारे दिल में कितने गुना अधिक सम्बन्ध जोड़े रखने की
तीव्र उत्कण्ठा का होना अनिवार्य है।
v एक घड़ी
आधी घड़ी, आधी सूं से आध।
कबीर
संगति साध की, कटै कोटि अपराध।।
अर्थः-परिपूर्ण महापुरुषों की
एक पल की शुभ संगति सौ वर्ष के भजन-सुमिरण से बढ़कर और लाभदायक है। फरमाते हैं कि
सत्पुरुषों की संगति एक घड़ी अथवा आधी घड़ी अथवा उससे भी आधी घड़ी यदि सच्चे दिल से
की जाये तो वह कभी निष्फल नहीं जाती,अपितु करोड़ों अपराधों को नष्ट कर
देती है। भाव यह कि परिपूर्ण सन्त सत्पुरुषों की शरण-संगति संजीवनी का काम करती है
और समय पर मनुष्य की सहायक होती है।
v बहुत पसारा जनि करै, कर थोरे कि आस |
बहुत पसारा जिन किया, तेई गये निरास ||
अर्थात् जितना भी कुटुम्ब शारीरिक सम्बन्धी वस्तुओं
से नेह बढ़ाते जाओ, उतनी ही आशा बढ़ती जाती है| इसलिए इस पसारे को न बढ़ाते हुए काम
करना चाहिए| जिन्होंने भी इस दुनियावी वस्तुओ से लगाव बढ़ाया, उन्हें अन्त समय यहाँ
से निराश होकर पश्चात्ताप करते हुए जाना पड़ा|
v माली आवत देखि कै, कलियाँ करै पुकार|
फूली फूली
चुनि लिय, काल्हि हमारी बारिं ||
माली को आते देखकर कलियाँ पुकार -2 कर कहती है कि
जो कलियाँ फूल बनकर खिल रही थी, उनको तो माली ने चुन लिया, इसी तरह कल हमारी बारी
आ जायेगी| अर्थात माली रूपी काल तो सदा जीवों को ग्रसने में लगा हुआ है, कुछ को तो
उसने आज ग्रस लिया है कुछ को कल ग्रस लेगा, बारी सबकी आएगी|
v आसा एक जो नाम की, दूजी आसा निवार |
दूजी आसा मारसी, ज्यों चौपड़ की
सार ||
केवल नाम को जपने
की आशा दिल में रखकर दूसरी आशाओं का अंत करना है | यदि अन्य आशाएँ दिल में
घर कर गईं तो चौपड़ के खेल कि भांति कभी न समाप्त होने वाला चक्र आरम्भ हो जाएगा|
इस चक्र से निकलना एक असाध्य प्रश्न बन जाएगा |
v हंसा बगुला एक रंग, मानसरोवर माहिं
बगुला ढूंढे माछरी, हंसा मोती
खाहिं ||
मान सरोवर पर हंस और बगुला दोनों ही रहते हैं दोनों
पक्षी है और दोनों एक ही रंग रूप के होते हैं, परन्तु दोनों के आहार में आकाश धरती
का अन्तर होता है| हंस तो मोती चुगता है, जबकि बगुला मछलियाँ ढूँढ कर खाता है| ठीक
इसी प्रकार इस संसार में गुरुमुख और मनमुख दोनों ही रहते हैं| रूप रंग में तो दोनों ही एक जैसे है परन्तु गुरुमुख
एव भक्तजन जहाँ नाम, भक्ति, सत्संग और सेवा के मोती चुगते हैं, वहा मनमुख विषय
भोगों तथा ऐन्द्रिक रसों की मछलियाँ ढूँढते है|
v कबीर
कलह अरु कल्पना, सतसंगति से जाय ।
दुःख वहाँ
से भागा फिरे, सुख में रहे समाय ।।
सत्पुरुषों की संगति में आ जाने
से कलह-कलपना समाप्त हो जाते हैं; दुःख वहां से कोसों दूर भागता
है। क्योंकि सत्संगति में दुःख के लिए स्थान ही नहीं है। जब दुःख नहीं रहेगा तो
स्वयमेव इन्सान सुखी हो जायेगा। सुखी वह हो गया जिसकी सुरति नाम में लग गई।
सौभाग्यवश उसे सुखवाली चीज़ मिल गई।
v छाजन भोजन प्रीति सों, दीजै साधु बुलाय।
जीवत
जस है जगत में, अन्त परम पद पाय।।
अर्थः-जो मनुष्य अत्यन्त प्रीति
से विभोर होकर हर्षित ह्मदय से, बड़े चाव और निष्ठा से सन्त महात्माओं को
अपने घर बुला कर रहने के लिये आवास और खाने के लिये परम श्रद्धा-भावनायुक्त परम
प्रीति से सना हुआ सात्विक भोजन अर्पित करता है वह संसार में जीते जी यशस्वी कहलाता
है। और मरणोपरान्त मोक्ष-पद को प्राप्त करता है।
v सतगुरु मारा तां कर, सबद सुरंगी बान |
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ ण गहुँ कमान ||
परब्रह्म सदगुरुदेव जी की पहचान ही यही है कि उनका
उपदेश गुणों से ऊपर होता है| उनका दिया हुआ नाम मन्त्र एक अचूक बान है, जिसके
ह्रदय में वह प्रवेश कर लेगा, वह अपनी बुद्धि के समस्त कौशल को भूल जायेगा| अपनी
आत्मा के साक्षात्कार करने में उसे कोई कठिनाई ण होगी, यह शत प्रतिशत निश्चित है|
v मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पुजा गुरु पावं |
मूल नाम गुरु बचन है, मूल सत्य
सत भाव ||
अर्थात यदि परमात्मा की ज्योति को देखने की अभिलाषा
हैं तो सद्गुरू का ध्यान ही मूलमंत्र है, उपासना के लिए सद्गुरू के चरणों की सेवा
मूलमंत्र है, नाम जपने के लिए सद्गुरू के श्री वचनों के अनुसार अपना जीवन बनाना ही
मूलमंत्र जाप है और सच्चाई एवं विश्वास से सब काम करना ही परमात्मा को पाने का
मूलमंत्र है |
v पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान|
वह लोहा कंचन करै, ये कर ले आप
सामान ||
पारस (एक पत्थर, जो लोहे से छू जाए तो लोहा सोना बन
जाता है) और संत महापुरुषों में अत्यधिक भेद नहीं होता है| पारस यदि लोहे को छू
जाए तो उसे सोना अवश्य बना देता, परन्तु उसे अपना रूप नहीं बना सकता| संत
महापुरुषों कि संगति में यह विशेष गुण होता है की जो जीव उनकी पावन संगति श्रद्धा
विभोर होकर करते हैं वे उन्हें अपना ही रूप बना देते हैं| संस्कारी और अधिकारी
आत्मा ही ऐसे बनने में समर्थ होती है|
v करता केरे बहुत गुण, औगुण कोई नाहिं।
जे
दिल खोजौं आपणा, तौ सब औगुण मुझ माहिं।।
""आप सर्वकला समर्थ
परिपूर्ण इष्टदेव हो मेरे-आप सकल गुणों के अक्षय भण्डार हो-आपमें कोई भी अवगुण हो
ही नहीं सकता। मेरे देव! सम्पूर्ण दोष तो मेरे ही इस अन्तर्मन में खचाखच भरें
हैं-एक भी गुण ढूँढ नहीं मिलता।''
v तू मत जानै बावरे, मेरा है सब कोय।
पिंड प्रान से बँधि रहा, सो अपना नहिं होय।।
अर्थः- ऐ बावले मनुष्य! तू यह मत समझ कि मैं जगत के भोगों और सुख-सामग्री
को पाकर उनका मालिक बन गया हूँ और यह सब कुछ मेरा है। नहीं, इस भ्रम में मत रह। अन्यान्य
सांसारिक सम्पत्ति का मालिक बनना तो दूर की बात रही; यह तेरा
शरीर जो प्राणों की डोरी से बँधा हुआ हर समय तेरे साथ लगा है, यह भी तेरा अपना नहीं हो सकता। क्योंकि यह काल के मुख का ग्रास है और वह
इसे एक दिन अवश्य तुझसे छीन ले जावेगा।
v मानुष जन्म दुर्लभ अहै, होय न बारम्बार |
तरुवर से
पत्ता झरै, बहुरि न लागै डार ||
अर्थ:- ‘जैसे वृक्ष से जब पत्ता एक बार टूटकर गिर
जाता है तो वह दुबारा डाली के साथ नही लगता, वैसे ही यह मनुष्य जन्म जो अत्यंत
दुर्लभ है और चिरकाल के बाद जीव को मिलता है, इसकी प्राप्ति भी बार-2 नही होती |
v मन पंछी तब लगि उड़ै, विषय वासना
माहिं।
प्रेम बाज़ की झपट में, जब लगि आयौ नाहिं।।
अर्थः-जिस प्रकार दाना चुगने वाला पक्षी दाने की तलाश में
चहुँओर उड़ता और घूमता फिरता है; वैसे ही मनुष्य का मन भी विषय रसों को प्राप्त
करने तथा अन्यान्य अनेक इच्छाओं की पूर्ति हेतु यत्र-तत्र भटकता रहता है। परन्तु
वह तभी तक भटकता है, जब तक कि प्रेम रुपी बाज़ कि झपट में
नहीं आया। तथा जब प्रेम रुपी बाज़ ने मन पंछी को झपटकर दबोच लिया, तो फिर भटकने भटकाने वाला ही कहाँ शेष रहा?
v कसतूरी कुण्डल बसै, मृग ढूँढे बन माहिं।
ऐसे ही घट में पीव है, दुनियाँ जानै नाहिं।।
तेरा सार्इं तुझ में, ज्यों पुहपन में बास।
कसतूरी का मिरग ज्यों, फिरि फिरि ढूँढै घास।।
अर्थः-कसतूरी तो मृग की अपनी नाभि में ही विद्यमान है; किन्तु भ्रमवश वह उसे जंगल की
झाड़ियों में तलाश करता रहता है। इसी प्रकार मनुष्य के घट ही में प्रभु की दिव्य
ज्योति का दर्शन सहज सुलभ है; किन्तु संसारी प्राणी उससे
बेखबर हैं। ऐ इन्सान! तेरा सच्चा मालिक तेरे अन्दर इस प्रकार समाया हुआ है,
जिस प्रकार फूलों के अंदर सुगंधि बसी हुई रहती है, परन्तु जिस प्रकार कस्तूरी वाला हिरण उस सुगंधि को बार बार घास में ढूँढता
और व्यर्थ परेशान होता है। इसी प्रकार तू भी अपने से बाहर सच्चे रुहानी सुख की खोज
केवल भूल भरम के कारण करता फिरता है।
v सतगुरु पूरा न मिला , रही अधूरी सीख |
स्वांग यति का पहन कर , दर-दर मांगी भीख ||
ऐसे
गुरु जो शिष्य को जल्दी सन्यास भेष दे देते हैं , वे स्वयं भी भूल में हैं और वे
भजन सिमरण की युक्ति नहीं जानते| वे शिष्यों को यतियों जैसा स्वांग धारण कराके भीख
मांगने के लिए भेज देते हैं | साधु तो दाता है , वे मांगता नहीं|
vसो दिन कैसा होयगा, गुरु गहैंगे
बाँहि।
अपना करि बैठावहीं, चरन कमल की
छाँहि।।
अर्थः-""वह कैसा भाग्यवन्त दिन होगा जब कि गुरुदेव
मेरा हाथ अपने हाथ में थाम लेंगे और मुझे अपना जान कर अपने चरणकमलों की छाया में
बिठलायेंगे?''
v कबीर संगति साध की, हरै और की
ब्याधि।
संगति
बुरी असाध की, आठौं पहर उपाधि।।
अर्थः-""श्री कबीर
साहिब जी कथन करते हैं कि साधुओं की संगति दूसरों के दुःख और कष्ट को हर लेने वाली
है। परन्तु असाधु-पुरुषों की संगति बुरी है; जिसमें रहकर आठों
पहर उपाधि का सामना होता है।''
vमूरख से क्या बोलियै , शठ से कहा बसाय।
पाहन
में क्या मारियै, चोखा तीर नसाय।।
""मूरख
पुरुष से बोलने का क्या लाभ? और शठ (मूढ़) व्यक्ति पर किसी का
क्या बस चल सकता है? पत्थर में तीर मारने से आखिर लाभ ही
क्या है? कि उलटे तीर भी टूटकर रह जाता है।''
v लहसन से चन्दन डरै, मत रे बिगारै
बास।
निगुरा
से सगुरा डरै, डरपै जग से दास।।
""चन्दन
लहसुन से डरता है कि कहीं उसकी संगति से चन्दन की सुगन्धि ही न बिगड़ जाये। इसी
प्रकार ही निगुरे मनुष्य से गुरुमुख जीव डरते हैं कि उनकी संगति से कहीं बुरे
संस्कार न अन्दर में प्रविष्ट हो जायें और मालिक का सच्चा दास इसी भान्ति संसारी
मनुष्य की संगति से डरता है।''
vहरिजन सेती रूसना, संसारी से हेत।
ते
नर कधी न नीपजै, ज्यों कालर का खेत।।
""मालिक
के भक्तों से रुठे रहना और संसारी मनुष्यों से प्रेम करना-जिस मनुष्य का ऐसा
स्वभाव हो; वह कभी भी फल फूल नहीं सकता, जैसे कि कालर भूमि में खेती उत्पन्न नहीं हो सकती।''
v ऊँचे कुल कहा जनमिया, जो करनी ऊँच न होय।
कनक
कलस मद से भरा, साधन निन्दा सोय।।
""यदि
मनुष्य की करनी ऊँचे दर्ज़े की नहीं है, तो फिर ऊँची कुल में
जन्म लेने से लाभ ही क्या? क्योंकि सोने का कलश भी यदि शराब
से भरा हुआ हो, तो साधु-पुरुषों ने उसकी भी निन्दा की है।''
v ज्ञान रतन की कोठरी, चुप करि दीजै
ताल।
पारख आगे खोलिये, कुंजी बचन रसाल।।
परमसन्त श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि ऐ जीव! तेरे अन्दर ज्ञान
के रत्नों से भरी हुई कोठरी विद्यमान है। उस पर मौनता का ताला लगा दे। जब कोई
पारखू मिले तब मधुर शब्दों की चाबी लगा कर खोलना। जो लोग स्थान-स्थान पर बिना आवश्यकता
के अपारखुओं के समक्ष वचनों के हीरे-रतन बिखेरते रहते हैं, वह अपनी अनमोल
पूंजी व्यर्थ में नष्ट करते रहते हैं क्योंकि वस्तु की कद्र तो पारखुओं के पास ही
हुआ करती है। इसलिये सत्पुरुषों का फरमान उचित है कि अपनी जिह्वा पर मौनता का ताला
लगा दो। जब कोई पारखू और श्रद्धावान मिले तब उस ताले में मधुर वचनों की कुँजी डाल
कर खोलो। अर्थात् मौनता को जब भी तोड़ो तो मधुर वचन
बोलो। कटु वचन बोलने की अपेक्षा चुप रहना लाख गुणा श्रेष्ठ और लाभदायक है। किसी ने
सच कहा है कि ""जब मिलेगा पारखू, लेगा महंगे मोल।'
v चींटी चावल लै चली, बिच में मिलि गइ
दार।
कह कबीर दोउ ना मिलै, इक लै दूजी डार।।
अर्थः-च्यूंटी का उदाहरण देते हुए फरमाते हैं कि वह चावल का
दाना ले जा रही थी। मार्ग में उसे दाल का दाना पड़ा हुआ मिल गया। लोभ वश उसने सोचा
कि इसे भी ले चलूँ। जब वह उसे उठाने लगी तो चावल गिर पड़ा। उस एक छोटे से मुख में
दो दाने तो समा नहीं सकते थे। परन्तु वह उसे भी छोड़ना नहीं चाहती थी। जब वह दोबारा
चावल उठाती तो दाल का कण गिर पड़ता। इसी उधेड़ बुन में उसे पर्याप्त समय लग गया।
उसकी यह दशा देखकर महापुरुषों ने कथन किया कि दोनों वस्तुएं एक साथ नहीं मिल सकतीं।
तुझे हर अवस्था में एक को छोड़ना और दूसरी को लेना होगा।
v दीपक झोला पवन का, नर का झोला नार।
साध
झोला वचन का, बोले नहीं विचार।।
जलते हुये दीपक को वायु का झोंका
बुझा देता है और उसके प्रकाश को अंधकार में बदल देता है। जिस व्यक्ति की
चित्तवृत्ति स्त्रियों की ओर लग जाती है, वह नाम-सुमिरण के
मार्ग में आगे नहीं बढ़ सकता। इस पर सन्तवाणी में फरमान है-जहां काम तहां नाम नहीं।
काम और नाम का आपस में मेल ही नहीं है।इसी प्रकार उस
साधु की भी सम्पूर्ण साधनायें व्यर्थ चली जाती हैं जो कि बिना विचारे अर्थात् बिना
तोले बोल देता है। और यह भी निश्चित है कि जो लोग बहुत बोलने के आदी होते हैं उनसे
प्रायः भूल-चूक भी हो जाती है। कई बार शीघ्रता में गलत और अनुचित शब्द भी मुख से
निकल जाते हैं। जिनको चुप रहने की आदत है, वे प्रायः ऐसी भूल
चूक और गलत शब्द कहने से बचे रहते हैं। भाव यह कि बहुत बोलने वाले के लिये गलती से
बचना इतना सुगम नहीं जितना कि चुप रहने वाले के लिये सुगम है।
v सोता साध जगाइये करे नाम का जाप |
यह तीनों सोते
भले साकत सिंह और सांप ||
साधु
जागता ही शोभा पता है , परन्तु चोर शेर और सांप ये तीनों सोते अच्छे हैं | जगा हुआ
साधु भजनाभ्या करेगा और अपनी नाम-सिमरण की शक्ति से लोकोपकार होगा | यदि साधु ही
सो गया तो संसार को कौन जगायेगा ?
v बानी तो अनमोल है, जो कोई जानै बोल।
हीरा
तो दामों मिलै, शब्द का तोल न मोल।।
प्रकृति की ओर से मनुष्य को जो
बोलने का अधिकार मिला हुआ है, यह एक दुर्लभ और मूल्यवान् रत्न है, यदि कोई सौभाग्यशाली सत्पुरुषों की संगति में जाकर उसके प्रयोग का ढंग सीख
ले अर्थात् बोलने की युक्ति जिसे आ जाये तो वह व्यक्ति बहुत अधिक मालदार हो सकता
है, क्योंकि हीरे-जवाहर तो दाम से मिल जाते हैं, परन्तु सत्पुरुषों का शब्द किसी भी मूल्य से नहीं मिल सकता। यह जब भी
मिलेगा, उनकी कृपा से मिलेगा। हीरे का मूल्य लगाया जा सकता
है, परन्तु शब्द के मूल्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
इसलिये सत्पुरुष उपदेश करते हैं किः-हिये तराजू तोल के, तब
मुख बाहर खोल।। अर्थात् जब भी बोले, पहले मन में अच्छी
प्रकार सोच समझ लो कि बोलने में क्या लाभऔर क्या हानि है? इस
प्रकार जो लाभ-हानि का अनुमान लगाकर और भलीभांति सोच-विचार कर बोलता है,तो वह सौभाग्यशाली सदैव सम्मान और सुख से जीवन व्यतीत करता है। जो बिना
तोल के जैसा आया बोल दिया, उनका जीवन सदैव फ़साद और अशान्ति
का शिकार बना रहता है।
v जोहि खोजत ब्रह्मा थके, सुर नर मुनि अरु देव |
कहे कबीर सुन साधवा, कर सतगुरु की सेव ||
कि
जिस परमात्मा को पाने के लिए देव, मानव, मुनि, ब्रह्मा तप कर हार गए है, वही संत
महापुरुषों की सेवा करने से प्राप्त हो जाते है| इसलिए सद्गुरु सेवा ही अत्युतम भक्ति
का साधन है जिससे मालिक की प्रप्त सुलभ है|
v भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ लै जाय |
कह कबीर कछु भेद नहि, कहा रंक
कहा राय ||
अर्थात संसार के मैंदान में ईश्वर ने भक्ति की गेंद
उछाल दी है| जैसे खिलाड़ी गेंद के साथ खेलते हैं, ऐसे ही भक्ति की गेंद भी चतुर
गुरूमुख ही ले सकता है| इसके लिए ग़रीब –अमीर का कोई प्रश्न नही| जो भी चाहे इसे
प्राप्त कर सकता है| इस भक्ति रुपी गेंद से खेलने के लिए सिर –धड़ की बाजी लगानी
पडती है| अपनी मनमति का त्याग कर गुरु के बताए हुए उपदेशों पर चलना ज़रुरी हो जाता
है| इस भक्ति को पाने के लिए त्याग, सेवा एवं अनन्य प्रेम की ज़रुरत है |
v द्वार
धनी के पड़ि रहै, धका धनी का खाय।
कबहुँक
धनी निवाजई, जो दर छाड़ि न जाय।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब
फरमाते हैं कि ऐ सेवक! दृढ़ निश्चय से सद्गुरुदेव पूर्ण धनी के द्वार पर पड़े रहो और
उनकी ओर से कितने भी कष्ट झेलने पड़ें और धक्के खाने पड़ें, प्रसन्नतापूर्वक सहन करो। यदि दृढ़ निश्चय के साथ डटे रहोगे और द्वार छोड़
कर भाग न जाओगे तो एक न एक दिन धनी की कृपादृष्टि अवश्य ही तुम पर पड़ेगी और तुम
प्रभु के प्रेमास्पद बन जाओगे।
v कबीर
वैरी सबल है, जीव एक रिपु पांच ।
अपने अपने
स्वाद को, सभी नचावैं नाच ।।
जीव स्वयं निर्बल है। मन शत्रु
और बलवान है क्योंकि उसके साथ काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार साथी हैं। जीव के शत्रु
हैं। इनके द्वारा सारी दुनिया को अपने अधीन कर रखा है। अपने इन रसों एवं
विषय-इन्द्रियों के द्वारा सबको नाच नचा रहा है। इनके पंजे से छूटना कठिन नहीं
बल्कि असम्भव हो गया है। जिन सौभाग्यशाली गुरुमुखों को सत्पुरुषों की संगति मिल
जाती है उन्हें इनसे आज़ाद होने का मार्ग मिल गया, साधन मिल गया।
v जा सुख को मुनिवर रटें, सुर नर करै विलाप|
सो सुख
सहजै पाइये, संतन
सेवत आप||
बेद थके
ब्रह्मा थके, थाके
सेस महेस|
गीता हूँ
की गम नहीं, तहँ
संत किया परबेस||
"जिस परम सुख को पाने के लिए मुनिजन साधनरत रहते हैं, देवता एवं मनुष्य व्याकुल रहते हैं, वही सुख सन्त
सेवा से जीव को सहज ही प्राप्त हो जाता है| जिस ज्ञान की थाह
पाने के लिए ब्रह्मा, वेद, शेषनाग एवं
शिव जी ने अत्यधिक प्रयत्न किया| गीता आदि शास्त्रों द्वारा
जिसे स्वयं नहीं पाया जा सकता उसी को संतो ने पा लिया अर्थात सन्त-सदगुरु ही धुर के वासी हैं और आत्मा-तत्व के सब भेद
जानने वाले हैं| सो, आत्मिक सुख के
अभिलाषी सतगुरु की शरण- संगति में इस सुख को प्राप्त करते
आये हैं"||
v चल सतगुरु की हाट, ज्ञान बुधि लाइये |
कीचे साहेब से हेत, परम पद
पाइये ||
सतगुरु सब कुछ दीन्हा, देत कछु
न रह्यो |
हमहि आभगिनि नारि, सुक्ख तज दुख
लह्यो ||
आध्यात्मिक ज्ञान सतगुरु के द्वार से ही मिलेगा|
गुरु से नेह लगाकर परम पद की प्राप्ति होती है| शिष्य जब सद्गुरु के अर्पण तन –मन
धन कर देता है तो सद्गुरु भी उसको समस्त सम्पदाए प्रदान कर देते हैं| जिन्होंने
सुरती का सम्बन्ध सद्गुरु के ध्यान से नही जोड़ा, वे सुख प्राप्त करने के स्थान पर
दुःख उठाते है |
v ऐसो दुर्लभ जात शरीर। राम नाम भजु
लागै तीर।
गये
बेणु बलि गेहै कंस। दुर्योधन गये बूड़े बंस।।
पृत्थु
गये पृथ्वी के राव। विक्रम गये रहे नहिं काव।।
छौं
चकवै मंडली के झार। अजहूँ हो नर देखु विचार।।
गोपीचन्द
भल कीन्हों योग। रावण मरिगो करतै भोग।।
जात
देखु अस सबके जाम। कहैं कबीर भजु रामैं राम।।
अर्थः-ऐसा दुर्लभ एवं अनमोल मानुष
शरीर हाथों से चला जा रहा है। यदि तू मालिक का भजन करे, तो तेरी नाव
किनारे पर लगे। संसार की झूठी बड़ाई तथा मिथ्याभिमान किस काम का? जबकि बेणि, बलि और कंस जैसे महासम्राट भी संसार से
मिट गये। दुर्योधन जैसे भी मृत्यु के मुख में चले गये और उनके वंश का नाम तक डूब
गया। समस्त भूमण्डल के एकाधिपति राजा पृथु भी न रहे और
विक्रमादित्य भी शेष न रहे। ये छहों राजा जिनके नाम ऊपर आये हैं; कोई साधारण राजा नहीं थे, वरन् छत्रपति सम्राट थे। ऐ
मनुष्य! अब भी तनिक विचार करके देख कि जब ऐसे ऐसे सृष्टि में होकर मिट गये,
तो फिर स्वयं तू किस गिनती में है? परन्तु
इनकी तुलना में राजा गोपीचन्द भी हुए हैं, जिन्होने संसार के
भोगैश्वर्य तथा विलास-सामग्रियों में आसक्त न रहकर मालिक के भजन में मन लगाया,
फलतः आज तक उनका नाम संसार में उज्ज्वल एवं अमर है। रावण भी तो कुछ
कम सामथ्र्यवान और वैभवसम्पन्न नहीं था, किन्तु वह सांसारिक
भोगों का मतवाला होकर मर मिटा। सृष्टि के रंगमञ्च से उसका नाम भी मिट गया। उसकी
असत्य एवं अधर्म-प्रियता तथा उसके मिथ्याभिमान के कारण आज तक संसार उसके नाम से
घृणा करता है और सब उसकी निंदा-भत्सर्ना करते हैं। ऐसे वैभव तथा ऐश्वर्य से लाभ भी
क्या? श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि इसी प्रकार सबके शरीर
नश्वर हैं और नष्ट होंगे ही। परन्तु यदि जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त करना है और
मर कर भी अमर रहने की कामना है, तो मालिक के भजन मे मन लगाओ।
मालिक का भजन ही केवल मनुष्य को उस अजर अमर पद की प्राप्ति करा सकता है। जहाँ काल
अथवा मृत्यु की पहुँच नहीं।
v एक नाम को जान करि, दूजा देइ बहाय |
तीरथ ब्रत जप तप नही, सतगुरु
चरन समाय ||
सब आये उस एक में, डार पात फल
फूल |
अब कहो पाछे क्या रहा, गहि पकड़ा
जब मूल ||
अर्थात
सद्गुरु का नाम वृक्ष की जड़ की न्याई हैं| जब सद्गुरु की शरण मिल जाए और ह्रदय में
नाम का प्रकाश हो जाए तो जप ताप, तीर्थ सभी उसमे आ जाते हैं, फिर किसी भी अन्य
कर्म करने की आवश्यकता शेष नही रह जाती |
v राजन कउनु तुमारै आवै।।
ऐसो
भाउ बिदर को देखियो ओहु गरीबु मोहि भावै।।1।।रहाउ।।
हसती
देखि भरम ते भूला रुाी भगवानु न जानिआ।।
तुमरो
दुधु बिदर को पानी अंमृतु करि मैं मानिआ।।1।।
खीर
समानि सागु मैं पाइआ गुन गावत रैनि बिहानी।।
कबीर
की ठाकरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी।।2।।
हे महाराजा दुर्योधन! तुम्हारे
पास कोई क्यों आये जब कि तुम्हारे ह्मदय में राज्य का मद है, परन्तु विदुर जी
की दीनता,नम्रता और भक्ति-भावना को देखकर हमारा दिल उस पर
रीझ गया है। हे राजन्! तुम तो अपने राजमद के भ्रम में पड़कर ऐसे भूल गये हो कि श्री
भगवान को भी नहीं जानते। परन्तु विदुर जी के ह्मदय में भगवान का अत्यन्त प्रेम है,इसी कारण तुम्हारे घर के दूध को त्याग कर विदुर के घर के जल को मैंने अमृत
करके माना और साग को खीर के समान जानकर बड़े प्रेम से खाया। मालिक के गुणानुवाद
गाते हुए रात बड़े सुख से व्यतीत की। श्री कबीर साहिब फरमाते हैं कि प्रभु को सदा
श्रद्धालु भक्त ही प्रिय होते हैं। किसी की जात-पात को न देखकर वे केवल उसकी
श्रद्धा-भावना निहार कर उस पर दयाल हो जाते हैं।
vकथनी मीठी खाँड सी, करनी विष की लोय।
कथनी तजि करनी करै, तो विष से अमृत
होय।।
करनी बिन कथनी कथे, गुरु पद लहै न
सोय।
बातों के पकवान से, ध्रापा नाहीं
होय।।
करनी बिन कथनी कथ, अज्ञानी दिन रात।
कूकर ज्यों भूँसत फिरे, सुनी सुनाई बात।।
अर्थः-""कथनी तो खाँड
जैसी मीठी भासती है तथा करनी अथवा आचरण विष के समान कड़वा प्रतीत होता है। परन्तु
मनुष्य यदि कथनी बातें त्यागकर अपने सात्विक ज्ञान को आचरण का रुप दे दे, तो विष को भी
अमृत बना सकता और बना लेता है।'' ""जो व्यक्ति
कथनी बातें तो बढ़ बढ़कर बनाता है, किन्तु आचरण से कोरा है;
वह गुरु भक्ति को कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। क्योंकि बातों के
पक्वान्नों से आज तक किसी की क्षुधा शान्त होती नहीं देखी गयी। अर्थात् क्षुधातुर
मनुष्य यदि उत्तमोत्तम स्वादिष्ट पक्वान्नों के नाम ही रटता रहे, तो उसका पेट कभी भरेगा नहीं। विपरीत इसके यदि रुखी सूखी रोटी के दो कौर खा
ले, तो उसकी क्षुधा एवं व्याकुलता का अन्त हो सकता है तथा मन
को तुरन्त शान्ति एवं तृप्ति उपलब्ध होती है।'' उन्हें
ज्ञानवान नहीं जानो जो शास्त्र ज्ञान को कहते ही रहते हैं उसके अनुसार जीवन को
नहीं बनाते। उसकी यदि अज्ञानी से उपमा दी जाये जो रात-दिन अपने मन के विचारों के
अनुसार व्यर्थ ही विवाद करता रहता है-तो अनुचित न होगा। ऐसे अविवेकी पुरुष सन्त
सत्पुरुषों के विमल वचनों के मरम को नहीं समझ सकते। उसे बुद्धिमान कौन कहेगा?
""यस्तु क्रियावान् पुरुषः स विद्वान्''-ज्ञानपूर्वक जिसका कर्म है वह वास्तव में विद्वान है। सन्त महात्माओं के
सत्संग का पूरा लाभ किन को होता है? जो महापुरुषो के वचन को
जीवन में उतार लेते हैं। जो केवल वाणी के धनी हैं, शास्त्रों
के अर्थ ही लगाया करते हैं उन वचनों पर अपने जीवन को नहीं चलाते|
v मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होइ रे।
मैं कहता हूं आंखिन देखी, तूं कागद की लेखी रे।
मैं कहता सुरझावन हारी, तूँ राख्यों
अरुझाइ रे।
मैं कहता हूँ जागत रहियों, तूँ रहता है सोई
रे।।
मैं कहता निर्मोही रहियो, तूँ जाता है मोहि
रे।
सतगुरु धारा निरमल वाहै, वा में काया धोइ
रे।
कहत कबीर सुनो भाइ साधो, तब ही वैसा होइ
रे।।
श्री
कबीर साहिब जी तो काशी के वेदपाठी पंडितों को अनुभव शून्य देखकर मन ही मन खीझ कर
कहते थेः-
ऐ वेदशास्त्रों के स्वाध्याय करने वालो! सुनो तो! तुम्हारा और
हमारा मन एक कैसे हो सकता है? मैं जो कुछ भी आपसे कहता हूँ वह सब मेरे अपने
अनुभव के रंग में रंगा होता है और तुम केवल पुस्तकीय ज्ञान की ही व्याख्या कर देते
हो। मैं जो कुछ भी कहूँगा उसका सच्चे भाव से श्रवण करने से तुम्हारा कोई भी संशय
शेष न रहेगा किन्तु शास्त्रों की पंक्तियों में जो सारतत्त्व है उस तक तुम स्वयं
नहीं पहुँचे हो तो औरों को क्या समझाओगे? मैं कहता हूँ कि
माया और ब्राहृ के भेद को जानने के लिये योग साधना करो जिससे तुम्हारी अन्तरदृष्टि
खुले और तुम केवल शब्दों के जाल में लोगों को फँसा देते हो क्योंकि उन शब्दो के
अन्तर्भाव से स्वयं शून्य हो-मैं तुम्हें कहता हूं जगत का मोह छोड़ दो और तुम अपने
को मोह ममता के जाल में उलझा देते हो। इसलिये आवश्यक है कि जीव किसी पूर्ण गुरुदेव
की शरण ले सन्त सद्गुरुदेव जी के लिये हुए निर्मल उपदेश की जब तक कमाई नहीं होगी
तब तक मन निर्मल नहीं होगा। नाम-मन्त्र के जाप की युक्ति उनसे सीख कर अपने
अन्तह्र्मदय में डुबकी लगाओ तभी अपने स्वरुप को जान पाओगे और तुम्हारे सब संशय
निवृत्त हो जायेंगे।
vसन्तो! सहज समाधि भली।।
गुरु
परताप भयौ जा दिन से, सुरति न अनत चली।।
आँखि
न मूँदौं कान न रुधौं, काया कष्ट न धारौं।।
खुले
नैन मैं हँस हँस देखौं, सुन्दर रुप निहारौं।।
कहौं
सु नाम सुनौं सोइ सिमरन, खावौं पियौं सो पूजा।
गृह
उद्यान एक सम लेखौं, भाउ मिटावौं दूजा।।
जहाँ
जहाँ जावौं सोइ परिकरमा, जो किछु करौं सु सेवा।
जब
सोवौं तौ करौं डंडवत, पूजौं और न देवा।।
सबदि
निरंतरि मनुआ राता, मलिन वासना तियागी।
ऊठत
बैठत कबहुँ न बिसरै, ऐसी ताड़ी लागी।।
कहैं
कबीर यह उन्मुनि रहनी, सो परगट करि गाई।
दुःख
सुख कै इक परै परम सुख, तेहि सुख रहा समाई।।
अर्थः-ऐ सन्तो! सहज-समाधि की
अवस्था अत्युत्तम है। जब से मुझपर पूर्ण सतगुरु की कृपा हुई है; तब से मेरी सुरति
अचल होकर सहज-समाधि की अवस्था में स्थिर है और कभी भूलकर भी अन्यत्र नहीं जाती।
मैं न नेत्र बंद करता हूँ, न कान मूँदता हूँ और न ही शरीर को
कठिन तप अथवा भूख-प्यास सहन करने का कष्ट देता हूँ। प्रत्युत् खुले नयनों से हँस
हँस कर सर्वत्र अपने मालिक इष्टदेव के सुन्दर स्वरुप का दर्शन प्रतिक्षण प्राप्त
करता रहता हूँ। जो कुछ मैं जिह्वा से कहता हूँ, वही मालिक का
नाम और मालिक की महिमा है। जो कुछ श्रवण द्वारा सुनता हूँ, वही
मानों मालिक का सुमिरण है। तथा जो कुछ मैं खाता पीता हूँ, वह
मानो प्रभु की पूजा है। घर हो या जंगल, मेरे लिये दोनों में
कोई भेद नहीं। मैं दोनों को एक समान देखता हूँ, क्योंकि मैंने
अपने चित से द्वैत अथवा भेदभाव को मिटा दिया है। मैं जहाँ जहाँ चलकर जाता हूँ,
वह मानो मालिक की परिक्रमा है। तथा जो कुछ मैं करता हूँ, वह सब मेरे मालिक की सेवा-टहल है। जब मैं सो जाता हूँ, तब मानों मालिक के चरणों में दण्डवत कर रहा होता हूँ। मैं अपने इष्टदेव
सतगुरु को छोड़कर किसी अन्य देव की पूजा नहीं करता। मेरा मन गुरु के शब्द में अनवरत
रचा रमा रहता है। मन में से समस्त मलिन वासना-वृत्तियाँ मैंने निकाल फेंकी हैं।
मलिक के चरणों के साथ मेरी ऐसी लिव लगी है कि उठते बैठते, सोते
जागते, चलते-फिरते, खाते-पीते और
काम-काज करते कभी एक क्षण भी मैं मालिक के ध्यान से ग़ाफिल नही होता। श्री कबीर
साहिब जी का वचन है कि यह उन्मुनि अर्थात् मन को प्रभु चरणों में लीन कर रखने की
रहनी है, जिसे मैंने स्पष्ट सब्दों में वर्णन कर दिया है।
सांसारिक सुख-दुःख तथा हर्ष शोकादि द्वन्द्वों की अवस्था से बहुत ऊपर एक परम सुख
अथवा परमानन्द की सहज अवस्था है; जिसमें मेरा मन निरन्तर
समाया रहता है।
v ऐसी दीवानी दुनिया, भक्ति भाव नही बूझै जी|
कोई आवे तो बेटा माँगे, भेट रुपैया लीजै जी||
कोई आवै दुःख का मारा, हम पर किरपा कीजै जी|
कोई आवे तो दौलत मांगै, यही गुसाई दीजै जी||
कोई करावे व्याह सगाई, संत गुसाई रीझै जी|
साँचे का कोई गाहक नाही, जूते जगत पतीजै जी||
कहे कबीर सुनो भाई साधो, अन्धों को क्या कीजै जी||
v नश्वर यह संसार साधो, नश्वर यह संसार हो|
नश्वर यह माता और पिता है, नश्वर घर की नार हो||
नश्वर भाई नश्वर बंधु, नश्वर सुत परिवार हो|
नश्वर राजा नश्वर प्रजा, नश्वर राज दरबार हो||
नश्वर सोना नश्वर चाँदी, नश्वर महल द्वार हो|
नश्वर हीरे नश्वर मणियाँ, नश्वर साहूकार हो||
नश्वर घोड़े नश्वर हाथी, नश्वर रथ असवार हो|
प्रभु नाम बिन सब है नश्वर, मन में देख विचार हो||
कहै कबीर यह तब सूझै, जब मिले गुरु दातार हो|||
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