Thursday, April 30, 2020

श्री गुरु हरि राय जी


जीवन परिचय श्री गुरु हरि राय जी

जन्म      : 16 जनवरी, 1630
पिता      : बाबा गुरदिता जी
माता      : माता निहाल कौर जी
पत्नी       : माता कृष्ण कौर जी
साहिबजादे : राम राय जी, हर कृष्ण जी
जोति जोत : अक्टूबर 6, 1661

सिक्खी का जहाज
एक दिन गुरु हरि राय जी कुछ सिखों को साथ लेकर बाबा गुरु दित्ता जी के समान वाले स्थान के दर्शन करने के लिए पहाड़ी पर गए| वहाँ गुरु जी काफी देर खड़े रहे और देखते रहे| जब बहुत समय ऐसे ही बीत गया तो सिखों ने गुरु जी से पूछा महाराज आप इधर क्या देख रहे हो| तब आपने कहा कि भाई श्री गुरु नानक देव जी ने संसार के उद्धार के लिए जो जहाज बनाया था, वह भंवर में पड़कर टुकड़े-टुकड़े हो गया है| इस में जो सिक्ख सवार थे कोई डूब गया, कोई बह गया और कोई किनारे लग रहा है| सबको आपा धापी पड़ी है| हम इस जहाज की दयनीय दशा को देख रहे हैं|जब सिखों ने इस बात को स्पष्ट करने की माँग की तो आपने बताया सिक्ख सेवक धन के लालच में पड़ गए हैं| वह सिक्खी का मार्ग ही भूल गए हैं| कच्चे गुरुओं के पीछे लगकर पार उतारा किस प्रकार हो सकता है| इस तरह सिक्खी का जहाज टूट-फूट गया है| गुरु जी की बाते सुनकर सिखों ने फिर प्राथना की कि महाराज! यह जहाज कभी जुड़ेगा या नहीं? महाराज ने कहा की जब हम दसवा जामा धारण करेंगे और दुष्टों और पाखंडियों का नाश करेगें और नया पंथ चलायेगें| यह जहाज फिर जुड़ जाएगा| इस पर वाहिगुरु की भक्ति करने वाले सिक्ख चढ़ेंगे और उनका पार उतारा हो जाएगा|
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गुरु जी द्वारा भाई भगतू के पुत्र गौरे को बक्शना

भाई भगतू का पुत्र गौरा जो की बठिंडे का राजा था गुरु हरि राय जी के आने की खबर सुनकर उनके पास पहुँचा उसने एक अच्छा घोड़ा और पांच सौ रुपये भेंट करकर गुरु जी को माथा टेका| गुरु जी ने गौरे से पूछा जिस लड़की से भाई भगतू ने अपनी मृत्यु से पहले वचन के द्वारा ही शादी की थी उसका क्या हाल है| गौरे ने कहा महाराज हमारी धर्म माता खुश है | गौरे की यह बात सुनकर गुरु जी के शिष्य बरदार भाई जस्से ने हँसी में कहा वह स्त्री तो अभी जवान है| आप उसका मेरे साथ विवाह कर दो| यह बात सुनकर गौरे को गुस्सा आया और उसने अपने आदमियों से जस्से को गोली मारकर मरवा दिया| जब इस बात का पता गुरु जी को लगा तो गुरु जी ने सबसे कहा कि कोई हमे गौरा की सिफारिश ना करे और ना ही वह हमे मुहँ दिखाए| जब गौरा को गुरु जी की नाराज़गी का पता लगा तो उसने डर कर प्रण किया कि जब तक वह गुरु जी को खुश नहीं करेगा तब तक घर वापिस नहीं जाएगा| यह निश्चय करके गौरा अपनी सेना सहित गुरु जी के पीछे लग गया और रात दिन भूल बक्शवाने के लिय मन में आराधना करने लगा| जब गुरु जी कीरतपुर वापिस चले गए तब गौरा भी कीरतपुर से बाहर आवास करके छ महीने बैठा रहा| एक दिन गुरु जी अपने परिवार सहित कीरतपुर से सतलुज नदी से साथ साथ चल रहे थे गुरु जी घोड़े पर सवार थे पीछे कुछ योद्धा भी थे| वहाँ गौरा भी अपने तीन सौ शूरवीरों के साथ चल पड़ा| उधर से लाहौर से एक नवाब कुछ सवार लेकर दिल्ली को जा रहा था| उसने डोले पर सामान जाता देखकर पूछा कि यह कौन जा रहा है| तो एक सिक्ख ने बताया यह गुरु हरि राय जी के घर डोलियों पर सामान जा रहा है| मुस्लिम उमराव ने अपने साथियों से कहा कि सब कुछ लूट लो|गुरु जी तो बहुत आगे आगे चल रहे थे| परन्तु गौरा पीछे पीछे आ रहा था| उसने जब देखा कि तुर्क सेना के आदमी गुरु जी का समान लूटने के लिए आगे आए हैं| तो उसने उनके साथ डट कर मुकाबला किया और सब को मार भगाया| गुरु जी का सामान सही सलामत पहुँच गया| इस बात का पता जब गुरु जी को लगा तो तो वह बहुत प्रसन्न हुए|गुरु जी ने उसको माफ भी कर दिया| तब गुरु जी ने उसको आज्ञा दी कि बठिंडे जा कर अपना राज भोगो| गुरु  घर तुम पर प्रसन्न है| ऐसी बात सुनकर और गुरु जी का आशीर्वाद लेकर लेकर गौरा बठिंडे को चल पड़ा|
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काले के भतीजे को वरदान देना

एक दिन काला अपने यतीम भतीजो लोहिया और संदली को साथ लेकर गुरु हरि राय जी के पास लाया| पहले उसने गुरु जी को माथा टेका फिर अपने भतीजो को ऐसा करने के लिए कहा| परन्तु वहाँ खड़े खड़े ही बच्चों के पेट बजने लगे| गुरु जी ने कहा कालेआ ये क्या कहते है| काले ने कहा महाराज मेरा भाई मर चूका है मेरे भतीजे पेट से भूखे है| यह आपसे रोटी मांगते हैं| गुरु जी खुश होकर कहने लगे कालेआ यह औरो को भी रोटी देंगे| यह बड़े सौभाग्यशाली होंगे| यह वरदान लेकर काला घर वापिस आ गया| वह बहुत खुश था| उसने आकर अपनी स्त्री को बताया कि वह अपने भतीजों के लिए राज्य का वरदान ले आया है| पत्नी कहने लगी कि अपने बच्चे तो इनकी प्रजा बनकर रहेंगे| तुमने इन का क्या सोचा है? अपनी स्त्री की ऐसी बात सुनकर काला अपने बच्चों को भी गुरु जी के पास ले आया और प्रार्थना करने लगा कि गुरु जी जब से मेरी पत्नी ने मेरे भतीजों के बारे में यह सुना है कि उन्हें राज्य प्राप्त होगा और मेरे पुत्र इनकी अधीनता में रहेंगे| इनकी प्रजा बनकर रह जायेगे| इसलिए मेरे पुत्रों को भी राज्य का वरदान बक्शो| आगे से गुरु जी मुस्कुरा पड़े और कहने लगे तुम्हारे पुत्र भी स्वतंत्रता से खेती करेगें और किसी का हाला नहीं भरेगे| यह वरदान लेकर काला खुशी खुशी घर आ गया| उसने सारी बात पत्नी को बताई कि गुरु जी ने ऐसा वरदान दिया है| तब उसे शांति प्राप्त हुई| गुरु के वरदान से काले के भतीजों के संतान नाभे और पटियाला के राजा हुए| और उसके अपने पुत्रों की संतान बिना किसी को हाला दिए अपनी खेती करते रहे|
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भाई जीवन को वरदान देना

करतारपुर में एक ब्राहमण का इकलौता लड़का मर गया| लड़के के माता पिता गुरु हरि राय जी के पास आ गए और कहने लगे कि हमारे पुत्र को जिवित कर दो, नहीं तो हम भी आपके द्वार पर प्राण त्याग देंगे| तब गुरु जी ने कहा अगर कोई इस लड़के की जगह प्राण देगा तो यह जीवित हो जाएगा| गुरु जी का यह वचन सुनकर जब उसके माँ बाप भी प्राण देने को तैयार ना हुए तो उनकी कुरलाहट पर तरस करके भाई जीवन ने सोचा एक दिन तो मरना ही है तो फिर क्यों ना गुरु के हुकम के अनुसार ही प्राण त्यागे जाए और जीवन सफल हो जाए| यह सोच कर भाई जीवन ने डेरे जाकर कपड़ा बिछाया और ऊपर लेटकर अपने प्राण त्याग दिए| इधर जैसे ही भाई जीवन ने प्राण त्यागे उधर ब्राहमण का पुत्र जीवित हो गया| भाई जीवन का ऐसा बलिदान देखकर सबने उन्हें धन्य कहा| गुरु जी ने भाई जीवन का संस्कार भाई भगतु की शमशान भूमि के पास ही कराया और वचन दिया कि जीवन का निवास गुरु के चरणों में होगा| जब गुरु जी को यह पता लगा कि भाई जीवन की स्त्री गर्भवती है तो अपने वचन दिया कि इसको लड़का होगा जिसका वंश बहुत बड़ेगा| इस तरह गुरु जी ने  भाई जीवन की प्रशंसा की और उसे वरदान देकर सबको धैर्य दिया| इस प्रकार भाई जीवन ने गुरु का हुकम मानकर अपना जीवन सफल किया और अपने वंश के लिए वरदान प्राप्त किया|
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शाहजहाँ के बेटे (दारा शिकोह) को स्वस्थ करना

शाहजहाँ के बेटे का नाम दारा शिकोह था| शाहजहाँ अपने बड़े पुत्र को ताज़ देना चाहता था| परन्तु इसका तीसरा लड़का औरंगजेब अपने भाई से इर्ष्या करता था जिसके कारण औरंगजेब ने रसोइए की ओर से शेर की मूंछ का बल अथवा कोई जहरीली चीज़ खिला दी जिससे दारा शिकोह बीमार हो गया| बादशाह ने उसका बहुत इलाज़ करवाया परन्तु दारा शिकोह ठीक ना हुआ| शाहजहाँ ने देश के सभी हकीमो को बुलाकर पूछा तब उन्होंने उसकी बीमारी को देखकर बताया कि एक लौंग जिसका वजन एक माशा हो और एक हरढ़ जिसका वज़न 15 सिरसाही हो रगड़कर कर शाहिजादे को दिए जाए तब शेर का बल अथवा कोई ऐसी जहरीली चीज़ बाहर निकल आएगी और शहजादा स्वस्थ हो जाएगा| राजा ने वैसा ही किया जैसे हकीमो ने बोला था| बादशाह ने सारे देश में अपने आदमी भेजे परन्तु यह चीजे कहीं ना मिली| बादशाह चिंता में पड़ गए| तब वजीर खाँ ने बताया बादशाह मुझे किसी सिक्ख से पता चला है कि यह दोनों चीजे गुरु नानक जी की गद्दी पर विराजमान गुरु हरि राय जी के पास हैं अगर आप चाहे तो उनसे मंगवा को| बादशाह ने अपने दो अहिलकार गुरु जी के पास चिट्ठी देकर भेजे और प्रार्थना की कि यह दोनों चीजे दे दो आपकी बड़ी कृपा होगी| यह चिट्ठी पढ़कर गुरु जी ने अपने तोशे खाने में से हरढ़ और लौंग मँगवाकर उन्हें दे दी| जब यह दोनों चीजे रगड़कर हकीमो ने दारा शिकोह को दी तो वह थोड़े दिनों में ही स्वस्थ हो गया| बादशाह और उसके दरबारियों ने गुरु घर की बहुत महिमा की और उनकी प्रसन्नता का ठिकाना ना रहा|
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एक माई की श्रद्धा पूरी करनी

एक बजुर्ग माई जो कि निर्धन थी| उसके मन में यह भाव था कि गुरु जी उसके हाथ का तैयार किया हुआ भोजन खाये| जिस दिन गुरु जी उसके हाथ का बना भोजन खायेगें वह किस्मत वाली हो जायेगी| उसने मेहनत मजदूरी करके कुछ पैसे जोड़ लिए और गुरु जी के भोजन के लिए रसद भी तैयार करके रख ली|  एक दिन उसने स्नान करके रसोई का लेप किया और गुरु जी के लिए भोजन तैयार करने लगी| मन में उसके श्रद्धा भाव था कि गुरु जी मेरा भोजन अवश्य ग्रहण करेगें| उसने दो रोटियाँ तैयार करके उसके ऊपर घी, चीनी डालकर साफ कपड़े में लपेट लिया और गुरु दरबार की ओर चल पड़ी| लेकिन मन में बार बार यही भाव थे कि वह किस तरह कपड़े में लपेटा हुआ भोजन गुरु जी को देगी| उधर गुरु जी ने माई की प्रार्थना सुन ली और उसकी श्रद्धा को देखकर दीवान से उठ गए| उन्होंने जल्दी-जल्दी घोड़ा तैयार करवाया और शिकार के बाहने उधर ही चल पड़े जिस तरफ से गरीब माई गुरु गुरु का जाप करते हुए आ रही थी| जब माई ने देखा कि गुरु जी कुछ सिखों के साथ घोड़े पर सवार होकर इधर ही आ रही है तो वह एक तरफ खड़ी हो गई| माई को एक तरफ खड़ी देखकर गुरु जी ने घोड़ा उसके पास जाकर ही खड़ा कर दिया और कहने लगे - "माई हमे बहुत भूख लगी है हमें रोटी दो|" यह वचन सुनते ही माई ने कपड़े में लपेटी हुई रोटी दोनों हाथों से गुरु जी के आगे कर दी| गुरु जी ने कपड़े में से रोटी निकाली और हाथ के ऊपर रखकर खाने लगे| साथ-2 गुरु जी ने यह कहना भी शुरू कर दिया कि यह भोजन बहुत स्वाद है, हमें बहुत आनन्द आया है| गरीब माई की आँखों से आंसू बहने लगे| गुरु जी ने भोजन किया और कपड़ा वापिस माई को दे दिया| गुरु जी ने वचन किया कि माई तू निहाल हो गई है| तब माई ने गुरु के चरणों पर माथा टेका और उनकी महिमा गाती हुई घर की ओर चल दी|
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भाई भगतु व भाई फेरु की वार्ता

भाई भगतु गुरु घर का सेवक था| जब गुरु हरि राय जी गुरु गद्दी पर बैठे तो कुछ समय बाद भगतु जी ने प्रार्थना की कि महाराज सेवा के बिना मनुष्य की आयु बेकार है इसलिए मुझे कुछ सेवा दो| गुरु जी हँस कर कहने लगे कि अब आप बहुत वृद्ध हो गए हो| अपने मनोरंजन के लिए कोई चरखा लाओ| भगतु कहने लगा महाराज आपकी जैसी इच्छा है वैसी सेवा बक्शो, परन्तु मुझे सेवा जरूर दो| गुरु जी प्रसन्न होकर कहने लगे तुम गुरु के लंगर के लिए खेती कराओ| गुरु की आज्ञा आते ही भगतु जी ने कर्मचारी और बैल तैयार करवाकर धरती को जोता और बीज डाल दिया और संभाल करनी शुरू कर दी| एक दिन खेत में काम करने वालों ने कहा, भाई जी घी के साथ हमे दो रोटी और दे दो हम और उत्साह के साथ काम करेंगे| भाई जी ने जब उनकी बात सुनी तो इधर उधर देखने लगे| उधर से एक फेरी वाला जा रहा था जिसके पास नमक, मिर्च, गुड़, घी इत्यादि था| उसको बुलाकर भाई जी कहने लगे इनको रोटी के साथ जितना घी चाहिए उतना दे दो| इस घी का मूल्य हमसे कल ले लेना| तब फेरी वाले ने काम करने वालो को अपनी कुपी में से एक एक पली घी दे दिया| फेरी वाले ने घर जाकर घी वाली कुपी जिसमे थोड़ा सा घी बचा था, खूंटी पर टांग दिया| सुबह उठकर जब कुप्पी को तोलकर देखने लगा कि श्रमिकों को कितना घी खिलाया है| जिसके पैसे भगतु से लेने हैं| उसने जैसे ही कुप्पी को देखा व घी से लबा लब भरी हुई थी| यह कौतक देखकर फेरी वाला भगतु जी के पास गया और उनके पैरों में माथा टेका और कहने लगा कि मुझे अपना सिक्ख बनाओ| भाई भगतु ने जब उसकी श्रद्धा देखी तो व उसे गुरु दरबार पर ले गया| भाई भगतु को देखकर गुरु जी कहने लगे परोपकारी भगतु किसको साथ लाये हो? भाई भगतु ने सारी बात बताई और यह भी कहा कि यह आपका सिक्ख बनना चाहता है| गुरु जी फेरी वाले से पूछने लगे कि आपका क्या नाम है और क्या करते हो| उसने कहा मेरा नाम संगत है मैं फेरी लगाने का काम करता हूँ| गुरु जी ने वचन किया कि तू फेरी करता हुआ हमारी शरण में आया है इसलिए आज से तेरा नाम फेरु है| गुरु जी ने उसको अपना चरणामृत देकर सिक्ख बना लिया और वचन किया फेरी का काम छोडकर सतिनाम का सिमरन किया और देग चलाया करो तुम्हें कभी कमी नहीं आएगी| इस प्रकार फेरु जी ने गुरु जी का वचन मानकर अपना ध्यान सतिनाम की याद में लगा दिया|
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भाई गोंदा जी
श्री गुरु हरिराय जी एक बार कीरतपुर की धरती पर विराजमान थे| उनके दर्शनों के लिए काबुल से संगत आई| उन्होंने कई दिन वहां रहकर दर्शन किये जब जाने लगे तो श्री चरणों में विनय की महाराज हम वापिस जा रहे है हमारी यह इच्छा है कि आप भी हमारे साथ काबुल चले और वहां की धरती के भाग जगाए| तब आप जी ने फरमाया कि हमारे दर्शनों के लिए संगत दूर-दूर से आती है अगर हम चले गए तो संगत निराश हो जाएगी| आप ले जाना ही चाहते हो तो हमारे सेवक भाई गोंदा जी को ले जाओ| संगत ने विनय की महाराज आपके सेवक को हम ले जाएंगे लेकिन आप चलोगे तो बात कुछ और ही होगी तब आप जी ने वचन फरमाये कि जो भी भाई गोंदा के दर्शन करेगा, उसके रूप में सबको हमारे ही दर्शन होंगे| जब भाई गोंदे को इस बात का पता चला तो श्री गुरु महाराज जी से विनय की महाराज आपने संगत को तो कह दिया कि जिसको हमारे दर्शन करने हो तो वह गोंदे के दर्शन करे| लेकिन मुझे जब आपकी याद आएगी मेरा दर्शन करने का मन करेगा तो मैं किसको देखूंगा| तब श्री प्रवचन हुए कि भाई गोंदा जब भी तेरा मन हमारे दर्शन के लिए करें तो ध्यान पर बैठ जाना हमारे दर्शन हो जाएंगे| अब काबुल की संगत के साथ भाई गोंदा जी चले गए| रोज काबुल में कीर्तन होने लगे| लोग भाई गोंदा जी के दर्शनों को आते| भाई गोंदा जी उन्हें दात भी बांटते| एक दिन भाई गोंदा जी का मन दर्शन को उतावला हो गया, अब वे श्री आज्ञा अनुसार श्री चरणों का ध्यान लगा कर बैठ गए और अपना कमरा बंद कर दिया| जब भाई गोंदा ने गुरु हरिराय जी के दर्शन किये तो उसने श्री गुरु महाराज जी के चरणों को कस के पकड़ लिया| इधर कीरतपुर में श्री गुरु महाराज जी के शिष्यो ने विनय की महारज लंगर तैयार है आप भोजन के लिए चले| तब श्री गुरुमहाराज जी ने फरमाया कि हम कैसे उठे काबुल में भाई गोंदा जी ने हमारे चरण जो पकड़े है| संगत ने उस समय को नोट कर लिया कि जब भाई गोंदा जी वापिस आएँगे तो उनसे पूछेंगे| जब संगत का भाई गोंदा जी से मिलाप हुआ तो उन्हें पता चला कि सच में भाई गोंदा जी ने चरणों को पकड़ा हुआ था| इस प्रकार गुरु महाराज जी अपने भक्तो के सदा अंग संग रहते है|
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औरंगजेब के दरबार में चमत्कार
जब औरंगजेब दिल्ली के तखत पर बैठा तो उसने हिन्दुओ पर घोर अत्याचार करना शुरू कर दिया, फलस्वरूप मौलवी उसके आस पास इकट्ठे हो गए और हिन्दुओ के विरुद्ध फतवे पर फतवा देने लगे| उस समय श्री गुरु हर राय साहिब जी श्री गुरु नानक देव जी कि रूहानी गद्दी पर विराजमान थे| मौलवियों ने औरंगजेब के खूब कान भरे कि गुरु नानक देव जी कि गद्दी मुसलमानों के विरुद्ध है और उनकी गुरुबानी में एक स्थान पर ऐसा लिखा है कि-
मिट्टी मुसलमान की पेड़ै पई कुम्हिहार||
घड़ि भांडे ईटा कीआ जल्दी करे पुकार||
जलि जलि रोवै बपुड़ी झड़ि झड़ि पवहि अंगियार||
मुसलमानों में ऐसी मान्यता है कि हिन्दुओ में मुर्दे को जलाते है तो उनकी रूह नर्को में जाती और दुःख पाती  है| जबकि मुसलमानों में मुर्दे को दफनाते है तो उसकी रूह स्वर्ग को जाती है और सुख पाती है| सत्पुरुष श्री गुरु नानक देव जी महाराज इस बात का खंडन करते हुए फरमाते है कि मुसलमान मुर्दे को धरती में दफनाते है और कुम्हार उन कब्रों की मिट्टी लाकर उसके बर्तन और ईटें बनाता तथा उन्हें आग में तपाता है | आग में जलती हुई वह मिट्टी पुकार करती है| बेचारी जल-2 कर रोती है और उस में अंगार झड़ते है| मौलवियों ने बादशाह औरंगजेब को भरा कि इस बानी में मुसलमानों की तौहीन की गई है| इसलिए गुरु हरिराय जी को दिल्ली बुलाकर आप इस बारे में पूछताछ करे| इसके अतिरिक्त यह भी सुनने में आया है कि वे बहुत करामाते दिखाते है, अत: उनकी करामाते भी देखनी चाहिए| इस प्रकार जब औरंगजेब के खूब कान भरे गए तो औरंगजेब ने सतगुरु जी के पास अपना दूत भेजा और उन्हें दिल्ली आने के लिए कहा गया| दूत कीरतपुर पंहुचा और औरंगजेब का सन्देश सतगुरु जी को कह सुनाया| सतगुरु जी की सेहत उस समय ठीक नहीं| अत: उन्होंने मुखिया लोगो को बुलाया और सारी  बात बतलाकर फरमाया कि आप में से कोई दिल्ली चले जाओ| परन्तु उनमे से कोई भी दिल्ली जाने को तैयार न हुआ| एक-2 करके सभी वहाँ  से खिसक गए| तब सतगुरु जी ने बड़े साहिबजादे रामराय जी को बुलाकर फरमाया –बेटा| आप हमारे प्रतिनिधि बनकर दिल्ली चले जाओ, परन्तु घबराना नहीं| निर्भय होकर औरंगजेब के समक्ष जाना और वहाँ जो भी प्रश्न पूछे जाये, निर्भय होकर उनका उत्तर देना| सतगुरु जी की बरकते और परमेश्वर की शक्ति आपके अंग- संग है| रामराय जी सोच में पड़ गए कि यदि न करता हूँ तो सतगुरु जी नाराज हो जायेंगे और ऐसा होने पर गद्दी हाथ से चली जाएगी और यदि हाँ करता हूँ तो औरंगजेब बड़ा ही जालिम है, पता नहीं क्या सलूक करे| सतगुरु जी ने पुन: फरमाया बेटा  क्या सोच रहे हो? रामराय जी सतगुरु जी को नाराज करना नहीं चाहते थे, अत: बोले- आपकी आज्ञा शिरोधार्य है| परन्तु आप मुझे अपनी कुछ शक्तियाँ देवे| सतगुरु जी ने फरमाया –बेटा| हमने तो पहले ही बोला कि सतगुरु जी की बरकते और परमेश्वर की शक्ति आपके संग संग है| रामराय जी जाने के लिए तैयार हो गए| दूसरे दिन प्रात: जब बैलगाड़ी में बैठने लगे तो मन में फिर संशय आ गया| सोचने लगे कि पहले आजमाकर देख लेना चाहिए कि सतगुरु जी ने मुझे कोई शक्ति दी भी है या नहीं| रामराय जी के मन में संशय आ गया| बैलगाड़ी में अभी बैल नहीं जोते गए थे| उन्होंने ख्याल उठा कि यदि सचमुच ही सतगुरु जी ने मुझे शक्तियाँ प्रदान की है तो बैलगाड़ी बिना बैलो के चलने लगे| उनका यह ख्याल उठना था कि बैलगाड़ी अपने आप चलने लगी| यह देखकर उन्हें कुछ विश्वास हुआ और वे दिल्ली की ओर चल पड़े और दिल्ली पहुँच कर मजनू के टीले पर जा डेरा लगाया| संगतों प्रेमियों ने जब सतगुरु जी के बड़े साहिबजादे रामराय जी के आने का समाचार सुना तो उनके दर्शन के आने लगे| दूसरे दिन औरंगजेब ने अपने विशेष आदमी को भेजकर रामराय जी को दरबार में बुलवाया| वार्तालाप के मध्य बादशाह ने रामराय जी से कहा कि मैंने ऐसा सुना है कि आपके पिता जी तथा उनसे भी पहले जो गुरु हुए है, सभी करामाती पुरुष हुए है और करामाते दिखाते रहे है? तो क्या आप भी मुझे कोई करामात दिखा सकते है? इतिहास में वर्णन है कि रामराय जी ने वहाँ कई दिन तक भरे दरबार में अनेको करामाते दिखलाई उनकी करामाते देखकर बादशाह तथा मौलवी आदि सभी दंग रह गए| एक दिन बादशाह ने रामराय जी को दरबार में बुलाया| उस दिन बादशाह के आदेश से दरबार में विशेष रूप से इस्लाम धर्म के उसूलो पर चर्चा हो रही रही थी| चर्चा के मध्य एक मौलवी ने रामराय जी को संबोधित करके कहा- आपके बुजर्गो ने जो बाणियां उच्चारी है, उनमे से कई मुसलमानों के बारे में है| उनमे यह शब्द भी है कि-
मिट्टी मुसलमान की पेड़ै पई कुम्हिहार||
घड़ि भांडे ईटा कीआ जल्दी करे पुकार||
जलि जलि रोवै बपुड़ी झड़ि झड़ि पवहि अंगियार||
रामराय जी ने उत्तर दिया- हाँ , आसा दी वार में श्री गुरु नानक देव जी का यह शब्द मौजूद है | मौलवियों ने पूछा इसका क्या मतलब है? क्या इसमें मुसलमानों के रीति- रिवाज पर कटाक्ष करते हुए मुसलमानों का अपमान नहीं किया गया है| रामराय जी मन में सोचने लगे कि यदि मै इसका सही अर्थ करता हूँ तो हो सकता है कि बादशाह नाराज हो जाए| सतगुरु जी का मैं बड़ा पुत्र हूँ| कल को मैंने ही गुरु गद्दी पर बैठना है | बादशाह को नाराज करके हमेशा के लिए उससे दुश्मनी मोल लू? क्यों न इसे खुश कर दूँ ताकि यह हमेशा मेरे हक़ में रहे| रामराय जी ने सतगुरु जी के वचनों की अवज्ञा करते हुए उत्तर दिया- बात असल में यह है कि सतगुरु श्री गुरु नानक देव जी ने तो यह बानी इस तरह उच्चारी थी कि ‘मिट्टी बिमान की पेड़ै पई कुम्हिहार, वाणी लिखने वालो ने बाद में इसे मिट्टी मुसलमान की कर दिया| रामराय के इस उत्तर ने औरंगजेब को तो प्रसन्न कर दिया, परन्तु सतगुरु देव जी को जब यह बात पता चली कि बादशाह को प्रसन्न करने के लिए रामराय ने महापुरुषों कि बाणी बदल दी है तो वे अप्रसन्न हुए और उन्होंने अपने कृपा का हाथ रामराय से खींच लिया| सतगुरु जी ने उसी समय आज्ञा कर दी कि रामराय ने चूँकि श्री गुरु नानक देव जी कि बाणी को बदल दिया है, इसलिए वह हमारे सम्मुख न आये और हमे अपना मुहँ न दिखाए| अब विचार करो कि जिन सतगुरु जी कि बख्शी हुई शक्ति और उनके अनुग्रह एव आशीर्वाद से रामराय जी ने बादशाह के दरबार में इतनी करामाते दिखलाई थी , उनकी शक्ति एव कृपा को भूलकर और उनके वचनों कि अवज्ञा करके रामराय ने बादशाह को प्रसन्न करने का यत्न किया, यह उनकी कितनी भारी भूल थी ? और इस भूल का फल भी उन्हें भोगना पड़ा| सत्तपुरुषो की नजरो से गिर जाने के कारण वह जीवन पर्यन्त अशांत एव परेशांन रहे| अपना लोक परलोक भी बिगाड़ गए|
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