Wednesday, April 29, 2020

परमसंत दूलनदास जी (दोहावली)


(परमसंत दूलनदास जी)

v  जग रहु जग तें अलग रहु, जोग जुगति की रीति |
   दूलन हिरदे नाम तें, लाइ रहौ दृढ़ प्रीति ||
अर्थात संसार में रहकार परमहात्मा से मिलाप की सर्वोतम युक्ति यह है कि सर्वदा सुमिरण में सुरति को लगाये रखो| सांसारिक कार्य व्यवहार करते हुए उनमें अपना मन न फंसाओ |

v दूलन गुरु तें विषै बस, कपट करहिं जे लोग।
 निर्फल तिन की सेव है, निर्फल तिनका जोग।।
सन्त दूलनदास जी कथन करते हैं-जो लोग विषय विकारों के वश में होकर अपने गुरु से कपट करते हैं उनकी भक्ति सेवा और यौगिक साधना सब निष्फल हो जाती है। उस का फल कोई नहीं मिलता। दीवार का झुकाव जिधर होगा वह उधर ही गिरेगी। इसी तरह मनुष्य की सुरति का झुकाव जिस ओर होगा वह अन्त में वहां ही समाएगी।

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