(परमसंत
तुलसी दास जी)
v एक भरोसा एक बल, एक आस विश्वास|
स्वाति सलिल सतगुरु चरण, चात्रिक तुलसीदास||
v गंगा जमुना सरस्वती
, सप्त सिन्धु भरपूर |
तुलसी चात्रिक के मते बिन स्वांति सब धूर ||
v बने
तो गुरु से बने, ना
बिगड़े भरपूर |
तुलसी' बने
जो और से, उस बनने पर धूर ||
v यतन बहुत सुख के किये, दुःख को किया ना कोय|
तुलसी यह आश्चर्य है, अधिक -2 दुःख होय||
v है घट में
सूझे नहीं लानत ऐसी जिंद|
तुलसी या संसार को भया मोतियाबिन्द||
v तुलसी या संसार में, पांच रत्न है सार|
साध संग सतगुरु शरण, दया दीन उपकार||
v तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजत चहुँ ओर|
वशीकरण ये मन्त्र है, तजि दे वचन कठोर||
v सुख के साधन बहुत किये, दुःख का किया ना कोय|
तुलसी यह आश्चरज है, अधिक अधिक दुःख होय||
v प्रारब्ध पहले बन्यो, पाछे बन्यो सरीर|
तुलसी यह आश्चर्य, मन नहीं बांधे धीर||
v तुलसी या संसार में, सबसे मिलिए धाय |
न जाने किस रूप में, नारायण मिल जाए ||
v दिल का हुजरा साफ़ कर जानां के आने के लिये |
ध्यान गैरों का उठा उसके बिठाने के लिये ||
v राम नाम को अंक है, सब साधन है सून|
अंक गए कछु हाथ नहि, अंक रहे दस गून||
v जल ओला गोला भयो, फिर घुल पानी होय |
संत चरन गुरु ध्यान से, मन घुल जावे सोय ||
जैसे पानी जम कर ओले और बर्फ का रूप बन जाता है और
सूर्य की गर्मी से पिघलकर फिर वह वास्तविक रूप में आ जाता है, इसी प्रकार सन्त
महापुरुषो के श्री चरणों में जाने से तथा सद्गुरू के ध्यान से मन (जोकि पहले बर्फ
और ओले की भांति होता है) उनके शब्द में घुल जाता है और वहां से आनन्द तथा शान्ति
प्राप्त करता है| इसलिए सदा स्थायी रहने वाले सुख (आत्मिक सुख) को प्राप्त करने की
इच्छा रखने वाले जिज्ञासु को चाहिए कि मन को पूर्णतया गुरु के हवाले कर दे| गुरु
उसे अपनी मौज अनुसार ही सेवा, सत्संग, भजन आदि के ढंग बताकर उसे ठीक रास्ते पर
लगायेंगे| जब मन को पूर्ण रूप से सद्गुरू को अर्पण कर दिया जाये तो निश्चित ही
सुख–आनन्द प्राप्त होगा| बस, मन को सद्गुरू के उपदेशानुसार चलाना और अपने लक्ष्य
को पाना ही जीव का असली कर्तव्य और धर्म है जिससे कि आनन्द–सुख-शान्ति को प्राप्त
कर सदा सुखी बना रह सके |”
v जे
जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ ।
तुलसी ते प्रिय राम को कानन बसहि कि गेहूँ
तुलसीदास जी कहते है कि जो विषय- रससे
विरक्त हैं और राम प्रेमके रसिक हैं, वे ही श्री राम जी के प्यारे हैं
फिर चाहे वे वन में रहें या घर में (सन्यासी हों या गृहस्थ)
v जग से
छत्तीस ह्वै रहो, राम चरण छह तीन।
तुलसी
हरि के मिलन को, यही मतो प्रवीन।।
अंक तो वही छह और तीन ही रहेंगे, केवल उनके स्थान में परिवर्तन करना है। स्थान में परिवर्तन करने से परिणाम
में रात दिन का अन्तर पड़ जाता है। यदि जग से 63 रहते हैं तो असत् में ही रच-पच
जाते हैं जिससे हाथ पल्ले कुछ नहीं पड़ता और जन्म व्यर्थ चला जाता है। इसके विपरीत
यदि जग से 36 हो रहते हैं अर्थात् जग को पीठ देकर मालिक की ओर प्रवृत्त होते हैं
तो सत्य में लीन हो जाते हैं और जन्म मरण के चक्र से छूट कर मुक्ति प्राप्त कर
लेते हैं। यह कोई कम लाभ नहीं है।
v जिन जैसी संगत करी, तैसो ही फल लीन|
कदली सीप भुजंग मुख, बूंद एक गुण तीन||
संगति के प्रभाव का वर्णन करते हुए कवि श्री
तुलसीदास जी कहते हैं कि स्वाति नक्षत्र के समय वर्षा की बूंद जब कदली के पुष्प पर
गिरती तो वह कपूर बन जाती है, यदि वहीं बूंद सीप के मुँह में जाती है तो वह
अत्यधिक सुंदर मूल्यवान मोती बन जाती है| परन्तु वर्षा की वह बूंद यदि साप के मुँह
में चली जाती है तो वह घटक विष का रूप धारण कर लेती है|
v सुत दारा और लच्छमी, हर काहू के
होय।
सन्त
समागम हरि कथा, तुलसी दुर्लभ दोय।।
अर्थः- इस जगत में स्त्री-पुत्र
और धन-सम्पत्ति प्रभुति तो हर किसी के पास अपनी अपनी प्रारब्ध अनुसार होते ही हैं।
इनका होना कोई बड़ी बात नहीं। ये कुछ ऐसी दुर्लभ विभूतियाँ नहीं, जिनकी कामना की
जाये। जगत में बहुमूल्य एवं दुर्लभ विभूतियाँ तो केवल दो ही हैं, जिन्हें प्राप्त कर मनुष्य का जीवन धन्य और जन्म सफल हो जाता है तथा जिनकी
आकांक्षा सदैव करनी ही चाहिये। वे हैं सत्पुरुषों का सत्संग और मालिक का भजन। जो
इनकी कामना करता है, वही बुद्धिमान है।
vभवजल अगम अथाह, थाह नहीं मिलै ठिकाना।
सतगुरु केवट मिलै, पार घर अपना जाना।।
जग रचना जंजाल, जीव माया ने घेरा।
तलुसी लोभ मोह बस परै, करैं चौरासी फेरा।।
इन्द्री रस सुख स्वाद, बाद ले जनम बिगारा।
जिभ्या रस बस काज, पेट भया विष्ठा सारा।
टुक जीवन के काज, लाज नहिं मन में आवै।
तुलसी काल खड़ा सिर ऊपर, घड़ी घड़ियाल बजावै।।
अर्थः-""यह संसार एक सागर है। इसकी थाह
पाना जीवट का काम है। कोई विरला साहसी पुरुष ही इसमें कूदकर इससे पार होने की
प्रबल चेष्टा करता है। तिस पर भी अपने बल पर भला कौन पार हो सका है। जब तक सतगुरु
मल्लाह को अपने जीवन की नैय्या न सौंप दी जाये, पार हो सकना असम्भव।''
""इस अटपटे संसार की रचना को समझ लेना आसान नहीं। लोभ और
मोह यहाँ ऐसे मदमत्त गजराज हैं कि जीव को अपने पाँव तले मसलकर रख देते हैं। जिस
आवागमन के चक्र से छूटने के लिये जीव मानव देह में आया था, ये
बरबस ही उस ऊँचाई से खींचकर नीचे गिरा देते हैं और जीव फिर उसी चौरासी के चक्र में
जा पड़ता है।'' ""इन्द्रियों के रसों के स्वाद में
पड़कर जीव ने अपना सारा जीवन अकारथ गँवा दिया। संसार के भाँति भाँति के स्वादिष्ट
पदार्थों का रस लेने को जीभ लपलपाती है; मगर खाने के बाद वे
सब पेट में गन्दगी बन जाते हैं। जीवन के वास्तविक उद्देश्य की पूर्त्ति के लिये
कुछ भी जतन नहीं किया, इतने पर भी जीव को लाज नहीं आती।
तुलसी साहिब का कथन है कि काल सिर पर खड़ा हर समय कूच का नक्कारा बजा रहा है और
सचेत कर रहा है कि इस रहे सहे समय में अपना काम बना ले। परन्तु इन्द्रियों के रसों
में गाफिल इनसान सुनता कहाँ है?''
v अलि पतंग मृग मीन गज, जरत एक ही आँच।
"तुलसी' ताकी कौन गति, जाको
लागे पांच।।
"तुलसी' ये तो पांच हैं, और भी
होत पचास।
रघुवर
जाकै रिदै बसे, ताको कौन त्रास।।
अर्थः-भंवरा, पतंगा, मृग, मछली और हाथी- ये सब एक-एक ही इन्द्रिय के
स्वाद की आग में जल कर जीवन को नष्ट कर बैठते हैं। भंवरा सुगन्ध के लोभ में मारा
जाता है, मृग मधुर संगीत का आखेट होता है, मछली को जिह्वा का स्वाद जाल में फंसा देता है, पतंग
दीपक की सुन्दरता पर मोहित होकर प्राण गंवा बैठता है और हाथी विषय वासना के अधीन
होकर ज़ंज़ीरों मे जकड़ा जाता है। सन्त तुलसीदास जी कथन करते हैं कि वह मनुष्य जो इन
पांचों स्वादों के अधीन हो, उसकी क्या दशा होगी? परन्तु फिर कहते हैं कि सम्पूर्ण संसार की दशा एक समान नहीं। आम संसार
निःसन्देह इन स्वादों का आखेट हो रहा है परन्तु भाग्यशाली गुरुमुख प्रेमी जो सन्त
सद्गुरु की चरण शरण का सहारा ले लेते हैं, उनकी आज्ञा और मौज
के अन्दर चलते हैं, तो उनके लिये सन्त तुलसीदास जी का फरमान
है कि पांच तो क्या चीज़ हैं चाहे पचासों शत्रु भी एक साथ आक्रमण करें, तो भी उसका बाल तक बांका नहीं कर सकते जिसके सिर पर सद्गुरु धनी का हाथ हो।
v अरब खरब लौं लच्छमी, उदय अस्त लौं राज।
तुलसी जौ निज मरन है, तौ आवै कौनै काज।।
अर्थः-सन्त तुसली साहिब का विचार है कि चाहे अरबों
खरबों के मूल्य का धन एकत्र कर लिया जाये और चाहे सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक
अर्थात् जहाँ से सूर्योदय होता है,
वहां से लेकर सूर्यास्त की सीमा तक का साम्राज्य भी अपने अधिकार में
हो। परन्तु जबकि अपना मृत्यु के मुख में जाना निश्चित है और यह भी सिद्ध है कि
मृत्यु-समय ये धन और अधिकार अपनी कुछ भी सहायता नहीं कर सकेंगे; तो फिर इनका लाभ क्या हुआ?
v कंचन तजना सहज है, सहज त्रिया का
नेह।
मान बड़ाई
ईष्र्या दुरलभ तजनी येह।।
अर्थः-फरमाते हैं कि सोने, चांदी और स्त्री
के प्रेम का त्याग करना सुगम है। इनका त्याग करना इतना कठिन नहीं, जितना कि मान,बड़ाई और ईष्र्या का त्याग करना कठिन
है।
v तुलसी पिछले पाप से, हरी चर्चा न सुहाय |
जैसे
ज्वर के होते ही, भोजन की रूचि जाय ||
संत तुलसीदास जी कहते हैं जैसे अंदर बुखार होनेसे
भोजन अच्छा नही लगता, ऐसे ही जिनके मन में पाप होता है उनको सत्संग और भजन-अभ्यास
रुपी रूहानी भोजन अच्छा नही लगता |
vतुलसी ममता
राम सों , समता सब संसार।
राग
न रोष न दोष दुःख, दास भये भवपार।।
यह कथन सन्त तुलसीदास जी का है कि
ऐ मानव! यदि तुझे इस भवसागर से पार उतरना है तो यह काम कर-तुझे यदि ममता करनी ही
है तो केवल उस परमपिता परमात्मा से कर और इस संसार के प्रति तेरी दृष्टि समता भरी
हो। प्राणिमात्र को समानता के भाव से देखने का प्रयत्न कर। भवसागर से पार उतरने की
यदि तेरे मन में उत्कट उत्कण्ठा हो तो अपने ह्मदय पटल पर से इन नीचे लिखे अवगुणों
को दूर कर-वे कौन से दोष हैं? 1.राग,2. रोष, 3.दोष, 4. दुःख। इनको हटाने के साथ साथ तुझे दास्य भाव
अपनाना होगा-सेवक बनकर अपने में से अभिमान का नाश करना होगा-तब जाकर तू भवजल निधि
से पार हो जाएगा। तुझे उस दशा में फिर चौरासी के चक्र में नहीं आना होगा-जन्म मरण
की उपाधियां तुझसे सर्वदा के लिये छूट जाएंगी।
v आसन इष्ट उपासना, खान पान पहरान |
तुलसी
जहाँ ये षट् मिले, वहाँ मित्रता जान ||
आस न एक हो, इष्टदेव एक हो, उपासना एक हो तथा खान
पान पहनावा एक हो| तुलसीदास जी कहते हैं जहाँ ये 6 वस्तुएं मिल जाती है, वहां
मित्रता समझनी चाहिए| यह मित्रता निष्काम होती है|
v बिगड़ी जन्म अनेक की सुधरे अबही आज |
होई राम को नाम जप तुलसी तज कुसमाज||
संत तुलसी दास जी फरमाते है तेरी जन्मों की बिगड़ी
आज ही बन जाएगी उसके लिए तीन काम करने है पहला राम का बनना है दूसरा उसका बन के
नाम जपना है और तीसरा कुसंग (जिस सांगत से मन में बुरे विचार उत्पन्न हो) से दूर
रहना है|
v जैसी हो भवितव्यता, वैसा उपजै बुध |
होनहार हिरदै बसै, बिसर जाय सब सुध ||
अर्थ
–जैसा जिसने भविष्य में बनना हो, वैसा ही उसकी बुद्धि तथा विचार बचपन में होते हैं
| होनी बलवान है इसीलिए वही होनहार बुद्धि में पहले से आकर स्थिर हो जाती है| आपके
विचार पहले से ही उच्च उद्देश्य के लिए हुए थे|
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