(परमसंत सहजो बाई जी)
v बार -2 नाते मिले, लाख चौरासी माहिं|
सहजो सतगुरु ना मिले, पकड़ निकासै बाहिं||
v जब चेतै जबहि भला, मोह नींद सूँ जाग|
साधू की संगत मिलै, सहजो ऊँचे भाग||
v आये जगत में क्या किया, तन पाला कि पेट|
सहजो दिन
धन्धे गया, रैन
गई सुख लेट||
v साध संग में चांदना, सकल अँधेरा ओर|
सहजो दुर्लभ पाइए, सत्त संगति में ठौर||
v साध संग तीर्थ बड़ो, जा में नीर विचार|
सहजो
नहाय पाइये, मुक्ति पदारथ चार||
v सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहीं |
हरि तो
गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ||
v स्वास खजानों जात है , ता की सोधी नाहिं |
सहजो खर्चो का रह्रो, कर हिसाब
घर माहिं ||
v सीस कान मुख नासिका, ऊँचे ऊँचे नांव|
सहजो नीचे कारने, सब कोउ पूजै
पावं||
मनुष्य
के शरीर के अंगों में सिर, मुँह, नाक, कान ये उच्च पद पर स्थित हैं, परन्तु पावं
नीचे होने के कारण सब कोईं पावों (चरणों) की ही पूजा करता है | चरणोदक और चरणरेणू
ही सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है|
v अनन्य
भक्ति उपजी नहीं गुरु सों नाहीं सीर।
सहजो मिलै न सिन्धु कूँ, ज्यौं तालाब को नीर।।
अर्थः-जिस जीव के ह्मदय में
अनन्य प्रेम भक्ति उत्पन्न नहीं हुई तथा गुरु से जिसका गहरा सम्बन्ध अथवा प्रेम
नहीं है, सहजोबाई जी के विचार से उसकी
अवस्था तालाब के उस जल जैसी है, जो चारदीवारी में बन्द
हो जाने के कारण समुद्र तक नहीं पहुँच सकता क्योंकि वह सरोवर की परिधि में बंद है, इसलिये समुद्र में उसका समाहित होना असम्भव है। विचार किया जाये तो सरोवर
के जल का उद्गम भी समुद्र ही है और वह समुद्र का अंश है, इसलिये उसे अपने अंशी अर्थात् समुद्र से मिलना ही चाहिये। ग्रीष्मकाल की
उष्णता के कारण समुद्र-जल वाष्प बनकर उड़ा। उस ने मेघ का रुप धारण किया और पृथ्वी
पर बरसा। वर्षा का जो जल नदी नालों में एकत्र हुआ, वह
तो दौड़ता हुआ समुद्र में जा मिला। परन्तु वर्षा के जो बूँद छोटे बड़े गढ़ों, झीलों तथा सरोवरों में जा एकत्र हुए, वह समुद्र
नें नहीं मिल सकते। कारण यह कि वह चारदीवारी में बंद हैं। इस कैद में पड़ा पड़ा वह
जल कीच बनकर गंदा और खराब होगा, खड़ा-खड़ा सड़ता रहेगा, उसमें मच्छर मक्खी तथा अन्यान्य विषैले कीटों के आवास बनेंगे। सड़ाँध और
दुर्गन्ध उत्पन्न होगी। वह जल स्वयं खराब हुआ, लोगों
में रोग फैलाने का हेतु भी बनेगा। परन्तु जिस सागर का वह अंशज था और जिससे बिछुड़कर
यहाँ आया था; उस अंशी तक लौट जाने की न कोई सम्भावना है, न आशा ही।
vजाकी गुरु में वासना सो पावै
भगवान।
सहजो चौथे पद बसै, गावत वेद पुरान।।
साध-संग की बासना, जेहि घट पूरी सोय।
मनुष-जन्म सतसंग मिलै, भक्ति परापत होय।।
सहजो चौथे पद बसै, गावत वेद पुरान।।
साध-संग की बासना, जेहि घट पूरी सोय।
मनुष-जन्म सतसंग मिलै, भक्ति परापत होय।।
अर्थः-""अन्त समय जिसकी
सुरति गुरु के ध्यान में जुड़ जाती है। उसे परमेश्वर की प्राप्ति होती है। सहजो बाई
जी कथन करती हैं ऐसा जीव चौेथे पद अर्थात् परमपद का अधिकारी बनता है। वेद और पुराण
भी इसका समर्थन करते हैं।'' "" देह त्यागने के समय अगर ध्यान
सत्संग और सन्तों के दर्शन की ओर चला जावे तो दूसरा जन्म उसे मनुष्य का मिलेगा
जिसे पाकर वह भक्ति और सत्संग की ओर पग बढ़ावेगा।''
v सहजो गुरु पग ध्यान करि, गुरु बिन और न
भाख।
अर्थः- जिसको भी नित्य सुख और
पूर्ण शान्ति की इच्छा हो वह दृढ़ विश्वास एवं अचल श्रद्धा के साथ श्री सद्गुरुदेव
जी के चरणारविन्दों का स्पर्श करे। उन्हें अपने ह्मदय में धारण करे-आठों पहर अपने
मन को उनके ध्यान में स्थिर करने का प्रयत्न करे और उनकी महिमा के बिना और किसी के
गीत न गाये।
v जब चेतै जबही
भला, मोह नींद सूँ जाग ।
साधू की
संगत मिलै, सहजो ऊँचे
भाग ।।
इन्सान को जब भी समझ आ जाय तो
जागृति आ गई। यह जागृति कब आती है? जब ज्ञान की रोशनी मिलती है, तब विदित होता है कि मेरा अपना काम क्या है और मेरे साथ जानेवाली चीज़
कौनसी है? तब इन्सान अपने काम की ओर ध्यान देता है।
जन्म-जन्मान्तरों से रूह दुःख उठा रही है, जबतक यह मालिक से
नहीं मिल जाती, उसको चैन नहीं मिल सकता। महापुरुषों की संगति
में आकर उन साधनों का पता चलता है जिससे कि रूह मालिक से मिल सकती है।
v पसु पंछी नर असुर, जलचर कीट पतंग |
सब ही उतपति कर्म की, सहजो नाना अंग ||
सभी
सन्त महापुरुषों का यही उपदेश है| वेद अथवा शास्त्रों का न्याय भी यही है कि पशु,
पक्षी, मनुष्य, देवता, राक्षस, जल में रहने वाले जीव, कीड़े, पतंगे – ये सब भिन्न –
भिन्न प्रकार कि योनियाँ अपने कर्मों से ही पैदा कि गयी हैं| जैसे किसान खेत में
जिस वस्तु का बीज डालता है, वैसा ही पौधा फल – फूल देता है, ऐसे ही मनुष्य भी जो
कर्म करता है, वही फल अन्याय योनियों के रूप में भोगना पड़ता है |
v हरि किरपा जो होय तो, नाहीं होय तो नाहिं |
पै गुरु किरपा दया बिनु, सकल बुद्धि बहि जाहिं
||
अर्थात
भगवान की कृपा यदि होती है तो अच्छा है –परन्तु पूर्ण संत महापुरुष की चरण –शरण
प्राप्त होनी चाहिये | उनकी दया बिना जीव की बुद्धि, चतुराई सब निरर्थक हैं |
v गुरु आज्ञा दृढ़ करि गहै, गुरु मत सहजो चाल |
रोम रोम गुरु को रटै, सो सिष
होय निहाल ||
जो सेवक सद्गुरू की आज्ञा में दृढ़ रहता है और गुरु
की मति में अपनी समस्त बुद्धि- चतुराई विलीन कर देता है, वही निहाल हो जाता है
अर्थात् वास्तविक मंजिल पर पहुँच जाता है |
v गुन सब गुरु के बचनै माहिं| सहजो सिष जो बिसरै
नाहीं||
जब
शिष्य समस्त आपाभाव सद्गुरू की आज्ञा में खो देता है तो सद्गुरू भी सेवक पर
प्रसन्न होकर उसे निज देश, अनामी लोक का अधिकारी समझते हैं, परन्तु वचन मानना और
समझना अपने अपने दर्जे और भावना के अनुसार है| जितनी अधिक गुरु के वचनों पर
श्रद्धा होगी, उतना ही अधिक लाभ प्राप्त करेगा | जैसेकी समुन्द्र में तो जल अथाह
है, परन्तु जो व्यक्ति जितना बर्तन लेकर वहां जयेगा, उतना ही भर कर लौटेगा,
समुन्द्र में कोई कमी नही इसी प्रकार जो
शिष्य अधिक सद्गुरू के वचनों पर विश्वास रखेगा और जैसे श्री आज्ञा हो, प्रत्येक
श्री आज्ञा को बिना कुछ हानि -लाभ सोचने के वैसे ही करता जाएगा, वही इस ऊँचे पद पर
पहुँचने का अधिकारी बन सकेगा |
vराम तजूं पर गुरु न बिसारूँ, गुरु के सम हरी को न
निहारू |
हरि ने जन्म दिया जग माहि, गुरु ने आवागमन मिटाहिं ||
हरि ने माया जाल में गेरी, गुरु
ने काटी ममता –बेरी|
हरि ने पांच चोर दिया साथ, गुरु
ने लई छुडाय अनाथा ||
हरि ने रोग-भोग उरझायो, गुरु ने आत्म रूप लखायो |
हरि ने अपना आप छुपायो, गुरु दीपक
दे ताहि दिखायो ||
‘चरणदास’ पे तन-मन वारु, हरि को
तजूं पर गुरु न बिसारूँ |
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