Wednesday, April 29, 2020

परम संत फरीद जी (दोहावली)


(परम संत फरीद जी)

v  फिकर करते बावरे, जिकर करते साध |
   उठ फरीदा जिकर कर, फ़िक्र करेगा आप ||
फरमाते हैं कि जो लोग हर समय आजीविका की चिंता में परेशान रहते हैं वे नासमझ हैं, जो चिंता छोडकर प्रभु का सिमरण भजन में चित्त लगते हैं, वे ही साधुजन एवमं प्रभु के प्यारे हैं| इसलिए ऐ मनुष्य! उठ और सिमरण ध्यान में चित जोड़, तेरी चिंता प्रभु स्वयं करेगा|

v  गलियाँ चिकड़ दूर घर नाल प्यारे नेह|
   चलां तां भिज्जे कंबली रहां तो टुट्टे नेह||
वर्षा में अगर मैं चलूँ तो यह मेरी कंबली भीगती है और इसकी परवाह करके मैं रुक जाता हूँ तो मेरी प्रीत टूट जाती है| इंसान को खुद अपना विचार करना होता है कि उसे कंबली(कम्बल) भीगने की परवाह है कि प्रीत को निभाने की चिंता है| इसका फैसला भक्त खुद ही करता है और जो प्रीत को निभा लेता है, वह हर प्रकार से आनंद प्राप्त कर लेता है| आज हम पुरातन इतिहास भी देखते हैं कि भक्तों ने कभी दुनिया की परवाह नहीं की|

v फरीदा बुरे दा भला करे गुस्सा मनि न द्रढ़ाइ।।
 देही  रोगु    लगई  पलै  सभु  किछु पाई।।
इन वचनों में क्या कमाल के वर दिये हुए हैं कि देह के दुःख भी नष्ट हो जावें और जो भी मनःकामना हो वह भी पूरी हो जाये। इससे बढ़कर मनुष्य को क्या चाहिये। परन्तु फिर भी खेद की बात है कि लाखों में से कोई कोई इस वचन का सहारा लेकर वैर और घृणा से बचा रहता है। अन्यथा सर्वसाधारण बुराई करने वाले तो क्रोध कर के ऐसे अमूल्य आशीर्वादों को हाथ से गँवा देते हैं।

vफ़रीदा चारि गाँवाइया ङंढि कै, चारि गँवाइया संमि।
 लेखा रब्बु मंगेसिया, तूँ आयौं केरे कंमि।।
अर्थः-शेख फरीद साहिब का कथन है कि ऐ मनुष्य! तूने दिन के चार पहर तो सांसारिक धन्धों तथा इन्द्रियों की भोग वासनाओं की पूर्ति करने में गँवा दिये तथा रात्रि के चार पहर ग़फ़लत की नींद में सोकर नष्ट कर दिये। घड़ी भर के लिये कभी भूलकर भी मालिक की याद और भजन-सुमिरण तूने नहीं किया। परन्तु जब मृत्यु के उपरान्त मालिक के दर्बार में जा उपस्थित होगा। वहाँ मालिक तुझसे तेरे कर्मों का व्योरा माँगेगा तथा पूछेगा कि तू जगत मे किसलिये आया था और क्या कुछ करके आया है? तब क्या उत्तर देगा? भजन भक्ति की कमाई से हीन होने पर वहाँ तो घोर तिरस्कार एवं लज्जा का सामना होगा।

vफरीदा दुखु सुखु इकु करि दिल ते लाहि विकारु।
अलह भावै सो भला तां लभी दरबारु।।
जो सेवक गुरु दरबार में रहता हुआ भी कभी सुखी कभी दुःखी होता है और मनमति पर चलता है उसे चाहिये कि इस महापुरुषों की वाणी का सहारा लेकर सच्चा सेवक बनने का प्रयत्न करे और अपने जीवन को सफल बनाये।

****

No comments:

Post a Comment