(गुरु ग्रन्थ साहिब जी)
v जो
प्राणी ममता तजे, लोभ मोह अहंकार|
कहे नानक आपन
तरे, औरन लेट उभार||
v बड़े बड़े जो दीसन लोग। तिन को
व्यापै चिन्ता रोग।।
v चार पदार्थ जे को मांगे| साधजनों की सेवा लागे||
v ओ धन्वंत कुलवंत पतवंत | जीवन मुक्त जिस ह्रदय
भगवंत ||
vभागु होआ गुरि संतु मिलाइआ| प्रभु
अबिनासी घर महि पाइआ ||
v फिरत
फिरत बहुते युग हारयों, मानुष देह लई|
नानक कहत मिलन की बरिया, पर
सिमरत नाहिं ||
v गुरु का सबदु रखवारे-चौकी चौगिरद
हमारे।'
चौगिर्द
हमारे रामकार, दुःख लगै न भाई।।
v गुर का सबद लगो मन मीठा।
पारब्राहृ ताते मोहि डीठा।।
v घर सुख वसया बाहर सुख पाया |
कहो नानक गुरु मन्त्र ध्याया ||
v वाणी गुरु गुरु है वाणी, विच वाणी अमृत सार ए|
वाणी कहे सेवकजन माने, प्रत्यक्ष गुरु
ब=निस्तार ए||
v सगल सृष्टि का राजा दुखिया| हरि का नाम जपत होइ
सुखिया||
vसतगुरु सुख सागर जग अन्तर होर
थार्इं सुख नाहीं।
v देंदा
दे लैंदा थक पा, युगों युगान्तरों तक खा ही खा ||
v आसाड़ु तपंदा तिसु लगै हरि नाहु न जिंना पासि
॥
v नानक
सतगुरु भेंटियां पूरी होवे जुगत |
हस्दियाँ
खेल्दियाँ पीनदियाँ खान्दियाँ विचे होवे मुक्त ||
v गुरु
उपदेश ले काज सिधावा |
धुर
पहुंचे कोई ठाक न पहावा ||
v कहो नानक एह तत्
विचारा
बिन हरि भजन
नहीं छुटकारा।।
v नानक
तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥
जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥
अर्थ: हे नानक! जिन (जीव-) सि्त्रयों का पति
घर में बसता है उनके लिए तो बसंत ऋतु आई हुई है; पर जिनके पति परदेस में (गए हुए) हैं, वह दिन-रात जलती फिरतीं हैं।
v ""मान
अभिमान मंधे सो सेवक नाहीं''
यह तो संसारी लोगों में देखा जाता
है कि वे सुखी-दुःखी हुआ करते हैं। कहीं से मान-बड़ाई मिल गई तो फूले न समाये और
कहीं अपमान हुआ तो मुँह फुलाकर बैठ गये। यदि गुरु के सेवक का भी यही बर्ताव रहा तो
सन्त उसे सेवक कोटि में नहीं गिनते।
v कोटि जन्म भ्रमि भ्रमि आइउ। वडै
भागि साध संगु पाइउ।।
अर्थः-करोड़ों जन्मों से जीव मोह माया के चक्र में भटकता चला आया
है। बड़े भाग्यों से इसे करोड़ों जन्मों के पश्चात् साधु सन्तों
की शरण-संगत का अमूल्य अवसर प्राप्त हुआ है। जब बड़े भाग्यों से सन्तों सत्पुरुषों
की चरण-शरण में आने का सुनहरी अवसर मिल गया तो मनुष्य को इससे पूरा-पूरा लाभ
प्राप्त करना चाहिये।
v
जे गुरु झिड़के ता मीठा लागै।।
जब कभी कृपा करके श्री सद्गुरुदेव
जी कुछ समझावें या ताड़ना करें तो हमें उनकी बातें प्रिय लगनी चाहियें।
v सिमरउ सिमरि सिमरि सुखु पावउ। कलि
कलेस तन माहि मिटावउ।।
अर्थात् मालिक के नाम का सुमिरण
करो और सुमिर-सुमिर कर सुख की प्राप्ति कर लो और कलिकाल के कष्ट-क्लेश तन में से
दूर कर दो।
v बोलत बोलत बढहि विकारा। बिनु बोले
किआ करहि बीचारा।।
अर्थः-परमसन्त श्री कबीर साहिब गुरुवाणी में वर्णन करते हैं कि
अधिक बोलने से कई बार विवाद बढ़ जाता है, परन्तु बोले बिना
भी तो वास्तविकता का विचार नहीं मिलता। उत्तम यह है कि सत्पुरुषों, विचारवानों की संगति में रहकर बोलने का ढंग सीखना चाहिये। विचार के तराजू
में वाणी को तोल कर बोलने वाला लोक-परलोक में सुखी रहता है।
v कहु नानक जा के पूरे भाग | गुर
चरणी ता का मनु लाग ||
अर्थात जिनके पूरे भाग है तिनका
मन ही गुरु चरणों में लगता है|
v सिर ऊपर ठाण्डा गुरु सूरा| नानक ताके कारज पूरा ||
अर्थात जिसके सिर के ऊपर पूरे गुरु का हाथ
है उसके हर कारज पूरे अपने अप हो जाते है|
v जन्म -2 की इसु मन कउ मलु लागी
काला होआ सिआहु
अर्थात इस मन पर जन्म -2 से मैंल
लगी हुई है|
v मन लोचे बुरिआइयां गुर सब्दी एह
मन होड़िये।
अर्थः-मन तो बार-बार बुराईयों की इच्छा उत्पन्न करता है। इसलिये
मन जब भी बुराई की ओर जाने लगे गुरु के शब्द की लगाम देकर इसे उस ओर जाने से रोकना
चाहिये। यह सत्य है कि भक्ति की धन-सम्पत्ति के सामने तीन लोक की सम्पदा भी निम्न
कोटि की है। जैसे हीरे के सामने कौड़ियों का कोई मूल्य नहीं, वैसे ही जो
मनुष्य भक्ति का मूल्य जानता है उसकी दृष्टि में संसार की धन-सम्पत्ति का कोई
मूल्य नहीं।
vनाम के धारे सगले जन्त। नाम के
धारे खण्ड ब्राहृण्ड।।
नाम से अर्थात् शब्द से ही खण्ड और ब्राहृाण्ड बन गये। उसी नाम
के ही आधार पर सब स्थित हैं।
v जो तोहे प्रेम खेलन का चाओं| सिर धर तली गली मेरी
आओ ||
अर्थात
अगर तुझे मालिक से प्रेम करने की इच्छा है तो अपना सिर देना पड़ेगा सिर की कुर्बानी
देकर ही भगवान की गली में जाया जा सकता|
v मेरा मन लोचै गुरु दरसन ताई| बिलाप करे चात्रिक की
निआई||
अर्थात हे मेरे
सतगुरु आपके दर्शन के बिना मेरा मन उदास हो रहा है वो विलाप कर रहा है चात्रिक की
तरह| जिस तरह चात्रिक स्वाति की बूंद का इन्तजार करता है स्वाति ही बूंद को वो
ग्रहण करता है अन्य किसी जल को ग्रहण नहीं करता उसी तरह मेरा मन भी आपके दर्र्श के
लिए विलाप कर रहा है|
v सभ सुख दाता रामु है, दूसर नाहिंन को|
कहु नानक सुनि रे मना, तिह सिमरत गति होइ||
अर्थात सब सुख के दाता भगवान ही है दूसरा कोई भी
नहीं है, इसलिए हे मन उसी का सिमरन कर उसी के सिमरन से ही तेरी गति होगी|
v संग सखा सब तज गयो, कोई ना निभयो साथ|
कहो ना नक एक विपद में, टेक एक
रघुनाथ||
अर्थात तेरी विपत्ति में सभी संगे सम्बन्धी सब तुझे
छोड़ जाएगे कोई भी तेरा साथ नहीं देगा, केवल विपदा में एक भगवान ही तेरा साथ देंगे|
v जौ सुख को चाहे सदा, शरण राम की लेह|
कहू नानक सुन रे मना, दुर्लभ मानुष देह||
अर्थात जो अगर तुझे सच्चे सुख की चाहना है तो परमात्मा
की शरण में आना पड़ेगा| इसलिए हे मन इस दुर्लभ मानुष देह को प्राप्त करके परमात्मा
की शरण में जा!
v जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु के काल |
नानक हरी गुन गाइ ले छाड़ सगल जंजाल ||
अर्थ- “इस संसार में जो भी पैदा हुआ है, वह नष्ट हो
जाने वाला है| वह आज या कल नष्ट हो जायेगा| श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज फरमाते
हैं कि समस्त संसारिक जंजाल को त्यागकर प्रभु के गुणों का गान करो|”
v गरब करतु है देहि को बिनसै छिन मैं मीति |
जिह प्राणी हरि जसु कहिओ नानक तिह जगु जीति ||
अर्थ- “ऐ
मित्र| तुम देह का क्या गर्व करते
हो? यह तो क्षण भर में ही नष्ट हो जाएगी| श्री गुरु तेग बहादुर जी फरमाते हैं कि
जिस प्राणी ने प्रभु का यशोगान किया है, उसी ने संसार में आकर जीवन की बाजी जीती
है अर्थात मनुष्य जन्म सफल किया है |”
v जग रचना सभ झूठ है, जानि लेहु रे मीत|
कहि नानक
थिरु न रहै, जिउ बालू की भीति||
महापुरुष फरमाते हैं कि ऐ मेरे मित्रो! यह जो संसार
की जितनी भी रचना है, सब मिथ्या है, नष्ट हो जाने वाली है| जिस प्रकार रेत की दीवार स्थिर नहीं रहती, बनते ही
टूट जाती है| उसी प्रकार ही इस जगत एवम जगत की समस्त वस्तुएँ
भी नश्वर और श्रणभंगुर है||
v जिह घट सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु।।
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ।।
जिस इन्सान के दिल में मालिक की याद है, वह मुक्त है, आजाद है और सुखरूप है। ऐसे मानुष का दर्जा बहुत ऊँचा है। उस मानुष अर्थात्
हरि कुल मालिक में कोई अन्तर नहीं। यह सच कर जानो कि उनका दर्जा एक ही है। वह
इन्सान ई·ार का रूप हो जाता है।
v जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानी |
इन में कुछ साचो नही नानक बिनु भगवान ||
सत्पुरुष श्री तेग बहादुर जी फरमाते हैं कि जैसे
सपना अथवा नाटक असत एवं मिथ्या होता है| ऐसे ही इस संसार की रचना को भी असत् एवं
मिथ्या जानो| इस संसार की रचना में परमात्मा की जात के अतिरिक्त कुछ भी सत् नही
है|
vमनु माइया मैं रमि रहिउ निकसत
नाहिनि मीत।
नानक
मूरति चित्र जिउ छाडित नाहनि भीत।।
फरमाते हैं कि इस जीवात्मा को जो
मानुष चोला प्राप्त हुआ है तो उसके साथ ही प्रकृति ने मनुष्य को एक महान शक्ति भी
प्रदान कर दी है जो मनुष्य के अन्दर काम कर रही है। वह शक्ति है मनुष्य का मन, परन्तु यह मन
कैसा है? यह माया के संग मिला हुआ है। माया के संग मिलकर यह
उसमें रच गया है। किस प्रकार? सत्पुरुष उदाहरण देते हैं कि
जिस प्रकार चित्रकार लोग दीवार पर चित्र बना देते हैं तो उसे फिर दीवार से अलग
करना सम्भव नहीं होता क्योंकि वह दीवार में रच गया है, इसी
प्रकार यह मन माया के साथ कुछ ऐसा गहरा मिल गया है कि अब यह माया को छोड़ता नहीं,
उससे अलग नहीं होता।
v गुण गोबिंद गाइयो नहीं, जनमु अकारथ कीन|
कहू नानक हरि भजु मना जिहि बिधि जल का मीन||
फरमाते हैं कि ऐ मनुष्य! यदि तुमने परमात्मा के
गुणों का गान और उसका भजन – सुमिरन ना किया, तो तुमने अपना जन्म अकारथ खो दिया |
इसलिए ऐ मन! परमात्मा को इस प्रकार भजो जैसे मीन जल का सुमिरन करती है| जल ही मछली
का प्राण है; उसके बिना वह जीवित नहीं रह सकती| इसी प्रकार तुम भी परमात्मा के नाम
में प्रण टिका लो|
vनिज करि देखिओ जगतु मैं को काहू
को नाहि ।
नानक थिर हरि भगति है
तिह राखो मन माहि ।।
किसी के कहने पर नहीं अपितु स्वयं अच्छी तरह विचार करो कि कौनसी
वस्तु साथ जानेवाली है और इसकी तुलना इन्सान तभी कर सकता है जब इन्सान सत्पुरुषों
की संगति में आता है। तब पता लग सकता है कि कौन सी चीज़ अपनी है और कौनसी परायी।
मालिक की भक्ति ही संगी-साथी है।
v साथि न चालै बिन भजन, बिखिआ सगली छार |
हरि-हरि नाम कमावना, नानक ऐहो धन सार ||
गुरबाणी की इन पंक्तियों द्वारा पांचवें नानक श्री गुरु
अर्जुनदेव जी मानव मन को समझाते देते हुए फरमा रहे हैं कि प्रभु सिमरन बंदगी कर जो
साचा धन हम इकट्ठा करेंगे वही हमारा साथ जाने वाला है बाकी सारा धन यहीं का यहीं
धरा रह जाने वाला है। इसलिए प्रत्येक इंसान को चाहिए कि वह प्रभु परमात्मा की
सर्वश्रेष्ठ कृति मानव जन्म पाकर उसका संपूर्ण लाभ उठाते हुए प्रभु सिमरन बंदगी
में मन रमावें। मानव जीवन पाने की असली मनोरथ भी यही है।
v तुम आगे अरदास हमारी, जियो पिंड सब तेरा |
कहो नानक सब तेरी वडीयाई, कोई नाम न जाने मेरा
||
अर्थात
हे वाहगुरू तेरे आगे हमारी अरदास है कि जो कुछ भी इस ब्रह्माण्ड में
है
वो सब आपका है, आपकी कृपा से मेरा हर काम संवर रहा है नहीं तो मेरा तो कोई नाम भी
नहीं जानता|
v जैसा सतगुरा सुनिदा तैसो ही मै
डिठो|
अपने सतगुरु का बहुत ही सुन्दर वर्णन किया गया है की
जैसा हमने अपने
सतगुरु के बारे में सुना था वैसा ही हमने पाया
है
v साचे साहिबा किआ नाहिं घर तेरै|
घर त
तेरै सब किछु है जिस देहि सु पावए ||
अर्थात हे सच्चे साहिब ऐसा क्या है जो आपके
घर नहीं है, आपके घर तो सब कुछ है पैर मिलता उसकों है जो अधिकारी है जो आपकी शरण
में आ गया है|
v मन मुख दुख का खेत है, दुख बीजे दुख
खाइ।
दुख विच जंमैं दुख मरै , हउमैं करत विहाई ।।
मनमुखों की जीवन कहानी दुःख से आरम्भ होती है। दुःख में ही कटती है और उसका
अन्त भी दुःख में होता है। वे स्वप्न में भी सुख का मुँह नहीं देखते। उनकी पीठ सदा
ही विश्वपिता की ओर रहती है। वे संसार के पदार्थों में ही सुख की खोज करते हैं।
उन्हें सांसारिक भौगैश्वर्य कितना ही प्राप्त हो जाय। धन सम्पदा कितनी संचित कर ले, उस ऐश्वर्य से
सुख-सामग्री तो खरीद सकते हैं परन्तु निश्चिन्त नींद नहीं मिल सकती। नरम-नरम
बिछोने भी उन मनमुखों को काँटे की न्यार्इं चुभेंगे।
v भई परापत मानुख देहुरिया। गोबिंद
मिलण की इह तेरी बरिआ।।
अवरि
काज तेरै कितै न काम। मिलु साध संगति भजु केवल नाम।।
अर्थः-ऐ मनुष्य! तुझे जो यह
मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, यह परमात्मा से मिलने का अवसर तेरे हाथ आ गया
है। यदि इस शरीर में परमात्म-प्राप्ति का कार्य न किया और अन्य संसारिक कार्यों
में ही फँसा रहा, तो स्मरण रख कि भजन-सुमिरण के अतिरिक्त
अन्य सभी कार्य तेरे किसी काम नहीं आयेंगे अर्थात् परलोक में तुझे कोई लाभ नहीं
पहुँचायेंगे। इसलिये सन्तों सत्पुरुषों की शरण-संगति में जाकर प्रभु-नाम का सुमिरण
कर।
vजनम मरण दुहहू महि नाही जन
परउपकारी आए ॥
जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ
लैनि मिलाए ॥२॥
अर्थात जो
जन्म और मृत्यु दोनों से परे है जो सिर्फ -2 परोपकार के कारण ही धरा पर आये है, वे आध्यात्मिक जीवन का उपहार देते
हैं, वे जीवों को अपनी भक्ति देते हैं, और इन्सान को भगवान के साथ मिलते हैं
v ‘जे सौ चंदा उगवे सूरज चढ़े हजार |
एते चानन
होंदया गुरु बिन घोर अंधार||
चाहे सैकड़ो चन्द्रमा उदय हो और चाहे हजारो सूर्य
अपना प्रकाश फैलाते हो, परन्तु ब्रह्म जगत में इतना अधिक प्रकाश होते हुए भी
गुरु-ज्ञान के बिना मन की सृष्टि में गहरा अन्धकार छाया रहता है|
v जाके संग एह मन निरमल। जाके संग
हर हर सिमरन।।
जाके
संग किलविख होये नास। जाके संग रिदै प्रगास।।
पंचम पादशाही श्री गुरु अर्जुन
देव जी महाराज के वचन हैं कि जिनके संग से यह मन निर्मल हो जावे, जिसकी संगति से
भजनाभ्यास में वृत्ति लगे, जिनके संग से पिछले पापों का नाश
हो जाये- जिनके संग से ह्मदय में प्रकाश हो जाये-वे कौन हैं? इसका उत्तर में देते हैं किः-
से सन्तन हरि के मेरे मीत। केवल
नाम गाइये जाके नीत।।
वे भगवान के भेजे हुए सन्त मेरे
मित्र हैं जिनके संग करने से नाम की कमाई होती है। उनकी सत्संगति में रहने से मन
निर्मल होगा, भजनाभ्यास में मन लगेगा पिछले जन्मों के पाप धुल जायेंगे
और ह्मदय में आत्मा की ज्योति जगमगा उठेगी।
v सा धरती भई हरीआवली जिथै मेरा
सतिगुरु बैठा आइ ॥
से जंत भए हरीआवले जिनी
मेरा सतिगुरु देखिआ जाइ
||
वो धरती हरी भरी हो जाती है जहाँ
मेरे सतगुरु चरण धरते है और वो लोग भी हरे भरे हो जाते जो सतगुरु का दर्शन करते है
|
v अति सुंदर कुलीन चतुर मुखि ङिआनी धनवंत |
मृतक कहीअहि नानका जिह प्रीति नहीं भगवंत ||
सत्पुरुष श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज फरमाते
हैं कि कोई बहुत ही सुंदर हो, उच्च कुल का हो, सांसारिक व्यवहार में चतुर हो,
विद्वान और श्रेष्ठ वक्ता हो तथा अत्यंत धनी हो, परन्तु उसके ह्रदय में यदि मालिक
की प्रीति नहीं तो उसे मृतक ही कहना उचित है|
v कई जन्म भये कीट पतंगा। कई जन्म
गज मीन कुरंगा।।
कई जन्म पंछी सरप होइयो। कई जन्म हैवर वृच्छ
जोइयो।।
मिल जगदीश मिलन की बरिया। चिरंकाल एह देह
संजरिया।।
फरमाते हैं कि ऐ जीव इस जीवन से
पहले तूने कई बार कीड़े, पतंगों, हाथी मछलियों की योनियों में
भरमता रहा है कई बार पक्षी, सर्प, हिरन
के शरीर तूने धारण किये कई बार वृक्ष और पहाड़ों की योनि भरमता रहा है। अब तुझे
ईश्वर से मिलने की बारी है ये देहि तुझे चिरकाल के बाद मिली है इसलिये ऐसा यत्न कर
कि तुझे फिर नीच योनियों में न जाना पड़े। इससे सिद्ध होता है कि जीव ने लाखों शरीर
धारण किये हैं। वे सब यमराज की भेंट कर चुका है।
v इह कुटम्ब सभ जीअ के बन्धन
भाई-भरम भुलासैं सारा।
बिन गुरु
बन्धन टूटहि नाहीं गुरुमुख मोख दुआरा।।
कथन करते हैं कि यह जितना कुटुम्ब-परिवार है इनका मोह मनुष्य की
आत्मा को बन्धन में बाँध देता है। परन्तु सारा संसार उन्हें अपना हितकारी समझने के
भ्रम में फँस गया है। यह बन्धन पूर्ण सद्गुरु की भक्ति के अतिरिक्त अन्यत्र नहीं
टूट सकते। जो भाग्यशाली सद्गुरु की मौज को मुख्य रखकर कुटुम्ब परिवार में जल कमल
जैसे रहता है वह ही मोह-जाल से विमुक्त होकर मुक्ति पद को प्राप्त कर लेता है।
नहीं तो झूठे भ्रम में भूलकर इस लोक में भी यह जीव दुःखी रहता है और अपना परलोक भी
बिगाड़ लेता है। ""जहाँ आसा तहां वासा'' का अटल नियम उसे
खींचकर जन्म मरण में डाल देता है।
v भाई रे भगतिहीण काहे जग आया।
पूरे गुरु की सेव न कीनी विरथा जन्म गवाँया।।
तात्पर्य यह कि मानुष देह पाकर जिसने तन मन धन से पूरे सद्गुरु
की सेवा नहीं की उसका इस जग में आना न आने के बराबर है।
v जिनी नामु धिआइया गए मसकति घालि।
नानक ते मुख उजले केती छुटी
नालि।।
जिन्होंने नाम की कमाई की, उन पर कठिनाईयां और कष्ट भी आये। उनका
मुकाबिला करते हुये भी वे अपने काम में लगे रहे। परिणाम यह हुआ कि उनका मुख परलोक
में उज्जवल हुआ और लोक में कीर्ति छा गई। वे स्वयं भी तर गये और कई लोग भी उनकी
संगत में आकर तर गये।
v एक भक्ति भगवान जिह प्राणी कै नाहिं मन |
जैसे सूकरू सुआन नानक मानो ताहि वन ||
सुअर को विष्टा खाते वक़्त यह ख्याल बिल्कुल नही
सताता कि वह गंदगी खा रहा है| वह उस गंदगी के अंदर भी स्वर्ग का सुख भोग रहा है
अगर उस वक़्त उसे देवताओं के लोक का भी सुख पेश किया जाए तो ख्याल है कि वह उस तरफ
दृष्टि भी नही फेरेगा| यही हाल उन आदमियों का भी समझ लेना चाहिए जो संसारिक सुखों
को पाकर केवल इन्द्रियों के भोगों के शौदाई बने रहते हैं| इसलिए इस मार्ग वाली की
कमाई का नतीजा सिवाय शरीरिक सुखों के और कुछ भी नहीं| इन्हें हम तपस्वी तो बेशक कह
सकते हैं परन्तु भक्त का खिताब किसी सूरत में भी नहीं दे सकते| भक्त कैसे होते
हैं? उसका उत्तर श्री कृष्ण महाराज ने गीता सातवें अध्याय में इस तौर पैर दिया है|
v कवणु सु अखरु कवण गुणु कवणु सु मणीआ मंतु।।
कवणु से वेसो हउ करी जितु वसि आवै कंतु।।
अर्थः-मैं कौन सी विद्या पढ़ूँ कौन सा गुण अपनाऊँ, कौन सी मणियों की माला पहनूँ तथा
कौन सा मंत्र जपूं और कौन सा वेष धारण करुं, जिससे अपने
मालिक को प्रसन्न कर सकूं और उसे अपना बना सकूं?
v निवणु सु अखरु खवणु गुणु जिहवा मणिआ मंतु।
ऐ त्रै भैणे वेस करि तां वसि आवी कंतु।।
अर्थः-दीनता और नम्रतापूर्वक रहने की विद्या पढ़, दूसरे की भूल को क्षमा कर देने का
गुण अपना तथा मधुर और नम्र वचनों की माला पहन। जब आत्मा यह वेष धारण करेगी,
तभी मालिक को प्राप्त करने में सफल होगी। दीनतापूर्वक रहना, क्षमा करना तथा मधुर वचन बोलना-ये तीनों ही एक प्रकार के वशीमंत्र हैं
जिनको जीवन में अपनाने से मालिक तो क्या तीनों लोकों को वश में किया जा सकता है।
v गुर का बचनु बसै जीअ नाले ।।
जलि नही डूबै तसकरु नही लेवै भाहि न साकैजाले
।।
सद्गुरु का शब्द ऐसी सच्ची वस्तु
है, ऐसा सच्चा सरमाया है जिसे कोई ख़तरा नहीं। दुनिया की प्रत्येक चीज़ को भय
है। सद्गुरु का शब्द व नाम ऐसा सच्चा सरमाया है कि जिसके ह्मदय में इसका वास हो
जाये तो यहां भी हर जगह पर सहायक और परलोक में भी संगी। आखिरकार
इन्सान को यहां से कूच करना ही है, इस दुनिया को
छोड़ना ही छोड़ना है। आगे इसके साथ क्या जायेगा?
v सुखु नहीं बहुतै धनि खाटे| सुख नाहीं पेखे निरति
नाटे ||
सुखु नाहीं बहु देस कमाए| सरब सुखा हरि हरि गुण गाये||
अधिक धन अर्जित कर लेने में सुख नही है, अधिक
नाच-तमाशे देखने में अर्थात मन का मनोरंजन कर लेने में भी सुख नही है तथा अनेको
देशो पर अधिकार कर लेने में भी सुख नहीं है, सुख तो सब प्रकार से प्रभु का गुणगान
में और उसके नाम का सिमरण करने में है|
v निरभउ नामु विसारिआ नालि माइआ रचा।
आवै जाइ भवाईऐ बहु जोनि नचा।। गुरुवाणी मारू
म.-5
निर्भय बनाने वाली वस्तु थी नाम, उसे तो भुला दिया
और माया के पदार्थों से सुरति जोड़ ली। ऐसा मनुष्य बार-बार आएगा और जाएगा, बार-बार अनेक योनियों में नाचता फिरेगा; भाव यह कि
जन्म-मरण के चक्र में पड़ा रहेगा।
vदारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ
लागे।।
जब
ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे।।
सत्पुरुष फरमाते हैं कि स्त्री, मित्र, पुत्र और सम्बन्धी तब तक तुम्हारे साथ प्यार, एवं
सहानुभूति रखते हैं जब तक तुम्हारे पास धन है अथवा तुम उनके लिये कमा सकते हो। जब
धन और बल नहीं रहा तो उनके प्यार का रुख भी बदल जायेगा।
vदूजी सेवा जीवनु बिरथा। कछु न होई
है पूरन अरथा।।
माणस
सेवा खरी दुहेली। साध की सेवा सदा सुहेली।।
अब विचार करो कि एक सेवा तो अकारथ
जाये; जीवन भी नष्ट हो जाये, कोई काम भी सिद्ध न होवे और
बहुत कुछ करने धरने पर भी दुःख ही पल्ले पड़े। दूसरी ओर साधु सत्पुरुषों की,
की हुई सेवा भी सफल हो और मनुष्य का जन्म भी सुधर जाये; यह कितना लाभ है?
v जिनि जनि गुरमुखि सेविआ तिनि सभि
सुख पाई।
ओह
आपि तरिआ कुटंब सिउ सभु जगतु तराई।।
सन्त सत्पुरुषों का कितना उपकार
है जीव पर कि वे उसे सच्चे प्रेम के रंग में रंग कर जहाज़ के समान बना देते हैं। वह
स्वयं तो सद्गुरु के आत्मिक प्यार में सराबोर होकर भवसागर से पार हो ही जाता है, साथ ही दूसरों को
भी पार उतारने वाला बन जाता है।
v लख
चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ।।
नानक
नामु समालि तूँ सो दिन नेड़ा आइओइ ।।
अर्थात् इस जीवात्मा को
मानुष-देही मिली चौरासी लाख योनियों के बाद। इसने प्रार्थना की कि मुझे इन योनियों
से मुक्ति दिला दो। कुदरत ने इसकी याचना पर इसे मानव-देही प्रदान की और इसी में
जीवात्मा का कल्याण हो सकता है। यह कत्र्ता भी है और भोक्ता भी। दोनों काम कर सकता
है। शेष जितनी योनियां हैं सब भोक्ता हैं। पशु-पंछी, कीट-पतंग आदि सब भोक्ता हैं। उन को यह ज्ञान नहीं कि वे किस काम के लिए आए
हैं। उनको तो केवल खाना-पीना और जन्म बिताना है। मानुष-जन्म की यह विशेषता है कि
सत्पुरुषों की संगति में जाकर यह ज्ञान प्राप्त करे, नाम
और भक्ति की कमाई करे। पूर्व जन्मों के संस्कार जो अन्दर भरे पड़े हैं, उनके अनुसार मन बार-बार विषयों की ओर जाता है। सत्पुरुषों की संगति में
नाम एवं भक्ति की कमाई करके जिस इन्सान की सुरति इच्छाओं से रिक्त हो, वही निर्मल आत्मा ही बलवान होगी और आत्मा परमात्मा से जा मिलेगी। यह मानुष
देही केवल मालिक की भक्ति के लिए ही मिली है परन्तु मनुष्य ने अन्य कामों में उलझा
दिया है। ये सब काम अपने नहीं हैं।
v किलविख
सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ।।
कोटि
कलेसा ऊपजहि नानक बिसरै नाउ ।।
मालिक के नाम का सुमिरण करोगे, सुखी हो जाओगे। उसकी याद में कभी दुःख नहीं आ सकता। माया की याद में कई
प्रकार के दुःख उत्पन्न होते हैं। मालिक के नाम-सुमिरण से सुख उपलब्ध होता है।
क्या यह सौदा घाटे का है? इसी समय में मालिक की भक्ति
और नाम का सुमिरण करो-----सुख मिलता है। दूसरी ओर माया-धन-दौलत के चिन्तन करने से
दुःख मिलता है। चाहता तो इन्सान सुख है और चिन्तन माया के सामानों का करता है।
करोड़ों क्लेश सम्मुख उपस्थित हो जाते हैं।
vप्रभ मिलने की एह निसाणी। मनी इको
सचा हुकमु पछाणी।।
सहज
सन्तोखि सदा त्रपतासे। अनदु खसम कै भाणै जीउ।।
जिसे मालिक का मिलाप हो चुका है
उसकी निशानी यह है कि मन एकाग्र होकर प्रभु की आज्ञा में जुड़ जाता है। वह अपने मन
को इधर उधर भटकाता नहीं। सदा ही आज्ञाकारी रहता है। चाहे उसे कितना लोभ दिया जाय
अथवा डराया धमकाया जाय- किन्तु वह प्रभु की लकीर से बाहर कदापि नहीं आता- न ही वह
किसी के बहकाने से किसी लालच में आता है और किसी के दबाव से वह भयभीत भी नहीं होता
है। उसे दृढ़ विश्वास है कि मैं यदि सद्गुरु की आज्ञा अर्थात् शब्द की रेखा के भीतर
रहूँगा तो कोई मेरा बाल भी बाँका नहीं कर सकता क्योंकि गुरु का शब्द मेरा प्रहरी
है-शत्रु की क्या शक्ति कि शब्द की सीमा के अन्दर प्रवेश करके मुझे हानि पहुँचा
सके।
vपसू
मिलहि चंगिआईआ खड़ु खावहि अंमृतु देहि ।।
नाम विहूणे आदमी धृगु जीवण करम करेहि ।।
गाय, भैंस भूसा और खली खाते हैं तथा अमृत के समान दूध देते हैं जो मानव के लिए
अमृत-तुल्य है। मनुष्य सब कुछ अच्छा खाता-पीता हुआ, भोग
भोगता हुआ, कुदरत की सभी वस्तुओं का उपभोग कर उसका
आनन्द लेता हुआ यदि मालिक की भक्ति नहीं करता तो पशु से भी बदतर (अधम) है। इस बात
को कोई सोचे या न सोचे, अन्त में परिणाम तो अवश्य
निकलेगा। प्रकृति की ओर से नियम निर्धारित हैं, अन्त
में निर्णय होगा ही। जिस हकीकत के लिए मानुष को भेजा है वह काम तो कर। कभी एकान्त
में बैठकर विचार कर। तुझे एक न एक दिन जाना है और हिसाब भी देना होगा। हिसाब लेने
वाला भी वही मालिक ही है। वह सौदा करके जाओ जो मालिक को पसन्द हो और परलोक भी संवर
जाय। वह सौदा कौनसा है?
v जिन्हा अंतरि गुरमुखि प्रीति है
तिन्ह हरि रखणहारा राम राजे।।
तिन्ह की निंदा कोई किआ करे जिन्ह हरि नामु पिआरा।।
जिन्ह हरि सेती मनु मानिआ सभ दुसट झख मारा।।
जन नानक नामु
धिआइआ हरि रखणहारा।।
उन गुरुमुखी जो अपने दिल में परमेश्वर का प्रेम रखते हैं, उनके रक्षक भगवान, भगवान राजा हैं। कोई उन्हें कैसे निंदा कर सकता है, जिसे
भगवान का नाम प्रिय है जिनकी आत्माएं भगवान के साथ चली जाती हैं, उन सभी अपराधों ने उन्हें निंदा करते हैं। दास दास ने भगवान के नाम पर
ध्यान दिया, जो सभी का संरक्षक है।
v वणजु
करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ।।
तैसी
वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ।।
अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ।।
भाई रे
रामु कहहु चितु लाइ ।।
हरि
जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतिआइ ।।
गुरुमुखो! ऐसा सौदा करो, ऐसी कमाई करो कि मालिक प्रसन्न हो जायें। वह केवल नाम और भक्ति की कमाई है।
यदि मालिक को ह्मदय में बसा लिया तो मालिक प्रसन्न हो जायेंगे और उन्हें कुछ ज़रूरत
नहीं। उन्हें केवल नाम और भक्ति की कमाई ही पसन्द है,दुनिया
के पदार्थ नहीं। इसलिए जो वस्तु मालिक को अच्छी लगे वही काम करो। यदि मालिक
प्रसन्न हैं तो अन्य किसी को प्रसन्न करने की आवश्यकता नहीं। बूँद समुद्र में मिल
गई तो समुद्र रूप हो गई। यदि मालिक को प्रसन्न कर लिया तो सब वस्तुएँ उसमें आ
गर्इं, यह कितना लाभ .का सौदा है। समय बहुत व्यतीत हो
गया, शेष थोड़ा रहा,इन्सान को समझ
लेना चाहिए। महापुरुषों से नाम की प्राप्ति हो चुकी है, उससे जीवन का पूरा-पूरा लाभ उठावें। यहां भी ज़िन्दगी सुखपूर्वक गुज़रे और
मालिक की दरगाह में भी सुर्खरुई मिले।
v चाला निराली भगताह केरी बिखम
मारगि चलणा।
लबु
लोभ अंहकारु तजि त्रिसना बहुतु नाही बोलणा।।
खंनिअहु
तिखी वालहु निकी एतु मारगि जाणा।
गुर
परसादी जिन्हीं आप तजिआ हरि वासना समाणी।।
कहै
नानकु चाल भगता जगहु जुगु निराली।।
मालिक के प्रेमियों-भक्तों की चाल
निराली हुआ करती है। कौन सा निरालापन हुआ करता है भक्तों की चाल में? यही कि वे
अत्यन्त कठिन मार्ग पर चलते हैं। लोभ, अहंकार, तृष्णा आदि को त्याग कर वे सदैव मौन रहते हैं और तलवार की धार से तीव्र और
बाल से भी सूक्ष्म भक्ति-मार्ग पर चलते हैं। गुरु-कृपा से जिन्होंने अहंता एवं
अहंकार को तिलांजलि देकर सम्पूर्ण कामनाओं को समाप्त कर दिया है, ऐसे भक्तजन ही इस भक्ति मार्ग पर चल सकते हैं। श्री गुरु नानकदेव जी
फरमाते हैं कि प्रत्येक युग में भक्तों की चाल आम संसारियों से निराली हुआ करती
है।
v अंतरि गुरु आराधणा, जिहवा जपि गुर
नाउँ।
नेत्रीं सतगुरु पेखणा, श्रवणी सुनना
गुरु नाउँ।।
सतगुर सेती रतियाँ, दरगह पाइयै
ठाउँ।।
कहु नानक कृपा करे जिसनों एह वथु
देइ।।
जग महि उत्तम काढीअहि विरले केई
केइ।।
अर्थः-प्रेमी औेर गुरुमुख को
चाहिए कि अपने अन्तर में सदैव गुरु की आराधना करे अर्थात् इष्टदेव सतगुरु को
अन्तर्मन में बसाकर रखे। जिह्वा द्वारा वह सदा गुरु की महिमा उपमा का गान तथा गुरु
के नाम का जप करे। नेत्रों द्वारा सर्वदा सतगुरु का दर्शन करे। तथा जब सतगुरु के
स्थूल स्वरुप का दर्शन उपलब्ध न हो, तब नेत्रों को
उनके ज्योति-स्वरुप के ध्यान में निमग्न रखे। अपने कानों के द्वारा वह निरन्तर
गुरु के नाम की महिमा, गुरु उपदेश तथा महापुरुषों के वचन
श्रवण करे। ये सब कार्य-क्रम उसके लिये अनुकूल एवं पौष्टिक भोजन का काम देगा। इस
अभ्यास से प्रेमा भक्ति के विचारों को परिपक्वता तथा दृढ़ता प्राप्त होगी। तथा इस
प्रकार की कार्यप्रणाली का परिणाम यह कि तन मन प्राण और इन्द्रियाँ सब के सब
सतगुरु-प्रेम के रंग में रंगे जावेंगे तथा उस रंग में डूबे रहेंगे। फिर जो कोई
स्वयं को पूर्णरुपेण गुरु प्रेम के रंग में डुबो देता है, उसे
मालिक की दर्गाह में ठिकाना मिलता है। ऐसा सच्चा प्रेमी ही मालिक के दरबार में
समादर प्राप्त करता तथा मालिक की दृष्टि में प्रिय होता है। प्रेमा भक्ति को अपने
अंग-प्रत्यंग में रचा लेने से ही ऐसा उत्तम पद प्राप्त किया जा सकता है। श्री गुरु
नानकदेव जी फरमातें हैं कि जिस पर मालिक की दया-कृपा हो; उसे
ही इस उत्तम पदार्थ भक्ति का वरदान प्राप्त होता है। प्रेम के रंग में पूरा तरह
डूबे रहना एवं इष्टदेव के ध्यान में निरन्तर मग्न रहना वरदान ही तो है। इस प्रकार
की प्रेमी गुरुमुख आत्माएँ संसार में उत्तम आत्माएँ होती हैं तथा ऐसी आत्माएँ
विरली ही हुआ करती हैं।
v सतगुरु की सेवा गाखड़ी सिरु दीजे
आपु गवाइ।
सबदि
मरहि फिरि ना मरहि, ता सेवा पवै सभ थाइ।।
पारस
परसिऐ पारसु होवै, सचि रहे लिव लाइ।
जिसु
पूरबि होवै लिखिआ, तिसु सतिगुरु मिलै प्रभु आइ।।
नानक
गणतै सेवकु ना मिलै जिसु बखसे सो पवै थाइ।।
""सन्त
सतगुरु की सेवा एक कसौटी है। इस कसौटी पर खरा उतरने के लिये सन्त सद्गुरु की सेवा
में अपने आप को मिटा देना चाहिये। जो जीव सद्गुरु के शब्द में मिट जाते हैं वे फिर
जन्म-मरण के चक्र में नहीं आते और उनकी की हुई सेवा सफल हो जाती है। जिस तरह लोहा
पारसमणि के साथ छू जाने से सोना बन जाता है। जीव भी इसी तरह सत्य स्वरुप पारस रुप
सन्त सद्गुरु से प्रेम के तार जोड़ लेने पर स्वयं भी उनकी भाँति पारस ही हो जाता
है। जिन जीवों के विगत जन्मों के शुभ संस्कार अति प्रबल होते हैं उन्हीं को ही
सन्त सद्गुरुदेव जी से भेंट होती है। विशेष बात यह है कि सेवक अपने गुणों के
बलबूते पर मालिक के रुप में कभी लीन नहीं हो सकता अपितु जिन जीवों पर सन्त सद्गुरु
की विशेष दया और कृपा होती है उन्हीं की कमाई फलवती सिद्ध होती है। वे ही जीव
निजधाम में पहुँच सकते हैं।
v गुरु के ग्रिह सेवक जो रहै| गुरु की आगिआ मन महि
सहै ||
आपस कउ कछु न जनावे| हरि हरि नाम
रीदै सद धियावै ||
मन बेचे
सतिगुर कै पास| तिसु सेवक के कारज रासि ||
सेवा करत
होइ निहकामी| तिसु कउ होत परापति सुआमी ||
अर्थ:- ‘जो सेवक गुरु की शरण में रहता है और गुरु
की आज्ञा मन में मानता है, जो अपने आप को कुछ जतलाता नही अर्थात अहंकार नही करता,
जो प्रभु का नाम सदैव ह्रदय में सिमरण करता रहता है तथा जो अपना मन सतगुरु के पास
बेच देता है अर्थात अपना मन उन्हें पूरी तरह समर्पित कर देता है, उस सेवक के सब
कारज सिद्ध हो जाते हैं| जो सेवक निष्काम भावना से कर्म करता है और सेवा करते हुए
मन में फल की इच्छा नही रखता, उसे ही परमात्मा की प्राप्ति होती है|
v जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मैं डीठु ||
विछुड़िआ
मेले प्रभु हरि दरगह का बसिठु ||
हरि नामो मंत्रु द्रिड़ाइदा काटे हउमैं रोगु ||
नानक
सतिगुरु तीन मिलाइआ जीना धुरे पइआ संजोगु ||
भावार्थ –जैसा हम सुनते थे हमने सद्गुरु को ठीक
वैसा ही पाया| वे बिछुड़ी हुई आत्माओं को प्रभु से मिलाने आये है| सच्चे नाम का जाप
कराकर अहंभावना का समूल नाश कर देते है| संत
सत्पुरुष कथन करते हैं कि ऐसे संत सद्गुरुदेव जी से उन्ही आत्माओं का सम्बन्ध होता
है जिन्हें परब्रह का आदेश होता है| सार यह है कि पिछले अनेक जन्मों के शुभ कर्म
जागते है तब कहीं जाकर महापुरुषों के पावन दर्शन होते है|
v गुरु सेवा ते भगति कमाई | तब इह मानस देही पायी ||
इस देही को सिमरहि देव | सो देही भजु हरि की सेव ||
भजहु गोबिंद भुलि मत जाहु | मानस जन्म का एही लाहु ||
अर्थ- “सतगुरु की सेवा से जब भक्ति की कमाई की जाती
है, तभी मनुष्य –देह सफल होती है| ये मनुष्य देह ऐसी अनमोल है कि देवता भी इसकी
प्राप्ति की इच्छा करते हैं| इसलिए इस देह को प्राप्त करके परमेश्वर की सेवा-भक्ति
में सदा संलग्न रहो| भगवान की भजन-भक्ति करना कदापि न भूलो, क्योंकि मनुष्य जन्म
का यही एकमात्र लाभ है|
v जह मात पिता सुत मीत न भाई| मन उहा नाम तेरे संग
सहाई,
जह महा भइयान दूत जम दलै, तह केवल
नाम संगि तेरै चले,
जह
मुसकलु होवै अति भारी, हरि को नामु खिन माहि उधारी,
अनिक
पुनह चरन करत नही तरै , हरि को नाम कोटि पाप परहरै,
गुरुमुख
नामु जपहु मन मेरे, नानक पावहु सुख घनेरे||
अर्थ :-‘जहाँ माता, पिता, पुत्र, मित्र ,भाई आदि
कोई भी साथ नही निभाता, हे मन! वहाँ प्रभु का नाम तेरे संग साथ रहने वाला और तेरी
सहायता करने वाला है| जहाँ माया भयानक यमदूत का दल है, वहाँ केवल प्रभु का नाम ही
तेरे साथ जाता है और तेरी सहायता करता है| जहाँ किसी भारी विपदा का सामना करना
पड़े, वहां प्रभु का नाम निमिषमात्र में ही उसे बचा लेता है दान आदि शुभ कर्म करके
भी मनुष्य पापो से छुटकारा नही प्राप्त कर पाता, जबकि प्रभु का नाम करोड़ो पापो का
नाश कर देता है, इसलिए श्री गुरु नानक साहिब बड़े प्यार से समझाते हैं कि ऐ मन| गुरु की शरण लेकर नाम का सिमरण कर|
नाम के प्रताप से तू बहुत सुख पायेगा |
vजब लग जानैं मुझ ते कछु होइ। तब
उस कउ सुखु नाही कोइ।।
जब इह जानै मैं किछु करता। तब लगु गरभ जोनि महि
फिरता।।
जब धारै कोऊ बैरी मीतु। तब लगु निहचलु नाही चीतु।।
जब लगु मोह मगन संगि माइ। तब लगु धरमराइ देई सजाई।।
प्रभ किरपा ते बंधन तूटै। गुरु प्रसादि नानक हउ
छूटै।।
अर्थः-सब बंधनों का मूल
""हूँ मैं'' है। इस ""हूँ मैं'' के भ्रम-जाल में बंधा हुआ जीव जब तक यह समझता है कि मैं भी कुछ कर सकता
हूँ, तब तक सुख की स्थिति कदापि प्राप्त नहीं हो सकती। जब यह
समझेगा कि अमुक कार्य मैंने किया है, यदि मैं अमुक कार्य न
करता तो वह काम हो ही न पाता, तो इस अभिमान के कारण ही उसे
जन्म मरण के चक्र में भटकना पड़ता है। अपने को कर्ता मान कर जब तक किसी को मित्र और
किसी को शत्रु जानेगा, तब तक उसका चित्त भी चंचल बना रहेगा
और उसे सुख शान्ति प्राप्त न होगी। जब तक मोह माया में मन मग्न रहेगा तब तक
धर्मराज का दण्ड भी सहना पड़ेगा। परन्तु जब सन्त सद्गुरु के सत्संग के प्रताप से
उनसे नाम-रत्न की प्राप्ति हो जायेगी और भाग्यशाली जीव उस नाम की कमाई करने लगेगा,
तो नाम के प्रताप से उस पर कुल मालिक की दया हो जायेगी और सब बंधन
टूट जायेंगे सन्त सद्गुरु द्वारा प्रदत्त नाम में वह शक्ति है जो पल भर में पापी
को पावन बना दे।
v सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥
ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥
सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥
सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥
सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥
नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥१॥
गुरु की बताई सेवा चाकरी करना अच्छे से अच्छे सुख का तत्व है (गुरु की
बताई सेवा करने से) जगेअत में आदर मिलता है, और प्रभु की हजूरी में सुर्खरुई का दरवाजा। (गुरु-सेवा की
यही) सच्ची कार कमाने-योग्य है, (इस से) मनुख को (परदे ढकने
के लिए) सच्चा नाम-रूप पोशाक मिल जाता है, सच्चा नाम-रूप
सहारा मिल जाता है, सच्ची संगत की प्राप्ति होती है, सच्चे नाम में प्यार पैदा होता है और सच्चे प्रभु से मिलाप होता है। (गुरु
के)सच्चे शब्द की बरकत से (मनुख के मन में) सदा ख़ुशी बनी रहती है, और प्रभु की हजूरी में मनुख सुर्खरू हो जाता है। परन्तु, हे नानक ! सतगुरु की बताई हुई कार वोही मनुख करता है, जिस के ऊपर प्रभु संवय कृपा की नज़र करता है।१।
v रतनु तिआगि कउडी संगि रचै ।।
साचु छोडि झूठ संगि मचै।।
जो छडना सु असतिरु करि मानै।।
जो होवनु सो दूरि परानै।।
छोडि जाइ तिसका रुामु करै।।
संगि सहाई तिसु परहरै।।
चंदन लेपु उतारै धोइ।।
गरधप प्रीति भसम संगि होइ।।
अंध कूप महि पतित बिकराल।
नानक काढि लेहु प्रभ दइआल।।
महापुरुषों ने फ़रमाया है कि जो
वस्तु हीरे रत्नों सम कीमती है अर्थात् मालिक की भक्ति,मालिक का सच्चा नाम-----जोकि कीमती वस्तु है उसको इन्सान छोड़कर झूठे संसार
के सामानों में दिल लगा बैठा है। जो वस्तु यहाँ रह जानी है, अवश्यमेव छोड़नी है, उसके लिए परिश्रम करता है
और मालिक का सच्चा नाम जो साथ जायेगा-----उसकी चिन्ता ही नहीं; ऐसा उलटा मार्ग इन्सान ने अपनाया है। अज्ञानता के अन्धेरे में पड़े हुए ऐसे
जीव का कल्याण क्योंकर होगा।
v हरि बिनु तेरो को न सहाई ।।
कां की मात पिता सुत बनिता को काहू को भाई ।।1।।रहाउ।।
धनु धरनी अरु संपति सगरी जो मानिओ अपनाई ।।
तन छूटै कछु संगि न चालै कहा ताहि लपटाई ।।
दीन दइआल सदा दुःख भंजन ता सिउ रुच न बढ़ाई ।।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ जिउ सुपना रैनाई ।।
महापुरुषों ने स्पष्ट बतला दिया
है कि हरि अथवा सतगुरु के बिना तेरा कोई भी सहायक नहीं है। माता, पिता, पुत्र, मित्र, प्रियजन तथा भाई
आदि----कोई भी किसी का नहीं है। धन-सम्पत्ति, धरती आदि सभी
पदार्थों की गणना कर दी कि जिसमें तूने सुरति अटकाई है अथवा जिन्हें अपना समझा है;
जब तेरा शरीर छूट जाएगा------ये तेरे साथ नहीं जायेंगे। दीनदयाल जो
सब दुःखभंजन है, सर्व सुखों के प्रदाता हैं उनमें तेरी रुचि
नहीं है जोकि अपनी चीज़ है। करुणानिधान प्रभु
जिसने मानुष पर असीम कृपा की है उससे नेह नहीं बढ़ाया, उनसे
अपना नाता नहीं जोड़ा। झूठी वस्तुओं से दिल लगा रखा है। महापुरुष फ़रमाते हैं कि जो
अपनी वस्तु है उसके साथ अपना नेह लगाओ, जो यहां भी सुख दे और
परलोक में भी इन्सान के साथ जाय।
v धनु संपै माइआ संचीऐ अंते
दुखदाई।।
घर
मंदर महल सवारीअहि किछु साथ न जाई।।
हर
रंगी तुरे नित पालीअहि कितै कामि न आई।।
जन
लावहु चितु हरिनाम सिउ अंति होइ सखाई।।
जन
नानक नाम धिआइआ गुरमुखि सुख पाई।।
अर्थः-धन-सम्पत्ति तथा माया के
पदार्थ मनुष्य संचित करता है, पर अन्त में वे दुखदायी ही सिद्ध होते हैं।
घर-मकान तथा महल और अनेक प्रकार की सवारियाँ-इनमें से कुछ भी मनुष्य के साथ नहीं
जाता। अनेक रंगों के घोड़े आदि पाले जाते हैं और इस प्रकार अपनी सम्पन्नता तथा अपना
वैभव प्रदर्शित किया जाता है; परन्तु ये अन्ततः किसी काम
नहीं आते। हे सज्जनो! हरि के नाम के साथ मन लगाओ जो अन्त में मित्र बने और काम आए।
श्री गुरु अमरदास जी फरमाते हैं कि जो मनुष्य सद्गुरु से सान्निध्य में रहकर तथा
गुरुमुख बनकर नाम-स्मरण करता है, वह सदा सुख पाता है।
v श्री गुरुदास जी जिन्होंने गुरुबाणी को लिखा है
किसी ने उनसे पूछा कि आप गुरु के सिख का आदर सत्कार कैसे करोंगे तो उन्होंने शब्द
उच्चारण किया|
नख सिख लउ सगल अंग रोम रोम करि |
काटि काटि सिखन के चरन पैर वारीऐ ||
अगनि जलाइ, फुनि फुनि पीसाइ ताहि |
लै उड़े पवन हुइ अनिक प्रकारिऐ ||
जत कत सिख पग धरै गुर पंथ प्रात |
ताहू ताहू मारग मैं भसम कै डारिऐ ||
तिह पद पादक चरन लिव लागी रहै |
दया के दयाल मोहि पतित उधारिये ||
श्री गुरूदास जी फरमाते हैं कि मेरे सिर से लेकर
नाखुनो तक शरीर के छोटे -2 टुकड़े कर लो| फिर उन टुकड़ों को अग्नि में डाल दो| जो
हड्डियाँ हैं वो चक्की में पीस लो| फिर पीसी हुई हड्डियों को और राख को इकठ्ठा
करके चौराहे पर रख दो फिर मैं पवन से विनय करूँगा की हे पवन! मेरी रख को ऐसी जगह
ले चल जहाँ पर कोई गुरु का सिख सुबह -2 उठ कर साध संगत में जा रहा हो| जब उस सिख
के चरण मेरी राख पर पड़ेंगे तो मेरा जीवन भी सफल जायेगा| इस तरह उन्होंने गुरु के
सिख की सिफत की|
v श्री गुरु रामदास जी गुरुबाणी में वचन फरमाते हैं
कि
गुरु सतिगुरु का जो सिखु अखाए सु भलके उठि हरि नाम धिआवै
उदमु करे भलके परभाती इसनानु करे अमृत सरि नावै ||
उपदेसि गुरु हरि हरि जपु जापै सभी किलविख पाप दोख लहि जावै |
फिरि चड़ै दिवसु गुरुवाणी गावै बहदिया उठदिया हरि नाम धिआवै ||
जो सासि गिरासि धिआए मेरा हरि हरि सो गुरुसिख गुरु मनि भावै |
जिस नो दयालु होवै मेरा सुआमी तिसु गुरसिख गुरु उपदेसु सुनावै ||
जनु नानक धुड़ि मंगै तिसु गुरसिख की जो आपि जपै अवरह नामुजपावै ||
v दुलभ देह पाई वडभागी ।।
नामु न जपहि ते आतमघाती ।।
मरि न जाही जिना बिसरत राम ।।
नाम
बिहून जीवन कउन काम ।। 1 ।। रहाउ।।
खात पीत खेलत हसत बिसथार ।।
कवन अरथ मिरतक सीगार ।।
जो न सुनहि जसु परमानंदा ।।
पसु पंखी तृगद जोनि ते मंदा ।।
कहु नानक गुरि मंत्रु दृड़ाइआ ।।
केवल नामु रिद माहि समाइआ ।।
महापुरुषों ने
जीव को चेतावनी दी है और अपने अनुभवी वचन लिखे हैं। यह मानुष-देही दुर्लभ और
क्षणभंगुर है। इससे दुर्लभ काम लेना है। इस शरीर को आत्मा के काम में लगा
देना-----यह दुर्लभ काम है। अब अपने अन्तर्मानस में झांककर देखो कि इस शरीर को किस
काम में लगा रखा है। खाना-पीना, ऐश-इशरत और
शारीरिक रसभोगों का काम क्या अपना काम है? इस शरीर को
शरीर के लिए ही समाप्त कर देना क्या बुद्धिमानी है? यदि
इन्सान नाम नहीं जपता, भक्ति नहीं करता, आत्म-कल्याण का मार्ग कैसे प्रशस्त हो। आत्मा की उन्नति कैसे होगी? आत्मा जन्म-मरण के चक्र से कैसे आज़ाद होगी? यह
तो आत्मा के साथ घात है। जिस लक्ष्य के लिए शरीर मिला था, उससे वह काम न लिया तो चौरासी के चक्र में एक बार नहीं कई बार जाना पड़ेगा।
पहले भी चौरासी भोगकर आया है। जीव को पता हो या न हो परन्तु महापुरुषों के अनुभवों
से स्पष्ट प्रतीत होता है।
v मन तूं मत माण करहिं जे हौं किछु
जाणदा गुरुमुख निमाणा होहु।।
अंतरि
अज्ञान हौं बुद्धि है सच सबदि मलु खोहु।
होहु
निमाणां सद्गुरु अगै मत किछु आप लखावई।
आपणे
अहंकार जगत जलिया मत तूँ आपणा आप गवावई।
सतगुरु
कै भाणै करहिं कार सतगुरु के भाणै लागि रहु।।
इउ
कहै नानक आप छडि सुख पावहिं मन निमाणा होय रहु।।
सेवक सच्चा वह है जो अपने मन को
सद्गुरु के पास बेच देता है। जब कोई वस्तु बेच दी जाती है तो बेचने वाले का उस पर
कोई स्वत्व नहीं रह जाता। मन को गुरु के हवाले सदा के लिये कर देना ही सच्ची भक्ति
है ऐसा सेवक जिसने मनमति को सब प्रकार से त्याग दिया है उसके समस्त कार्य अपने आप
सिद्ध हो जाते हैं। जो प्राणी मनमति के अनुसार चलते हैं और आशा करते हैं कि उनके
सब कार्य सिद्ध् हों भला यह क्योंकर हो सकता है? सच्चे सेवक के
गुरु ज़िम्मेवार हो जाते हैं और सेवक सब विपदाओं से निश्चिन्त हो जाता है। ऐसे
सेवकों की रक्षा गुरु सर्वथा करता है।
v बिनु सतिगुर को नाउ न पाए प्रभि ऐसी बणत बणाई हे |
दुलभ देह पाई वडभागी ॥नामु न जपहि ते आतम
घाती ||
कहते
हैं कि बिना सत्गुरु के नाम की प्राप्ति नहीं हो सकती,प्रभु ने ऐसा नियम बनाया है | आज जो मनुष्य तन हमें मिला है
| यह बहुत दुर्लभ है | लेकिन एस दुर्लभ
तन की प्राप्ति के बाद यदि प्रभु के नाम का सुमरिन न किया तो कहते हैं |
वह आत्म हत्यारा है |
*****
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