जीवन परिचय श्री गुरु हरि कृष्ण जी
जन्म : जुलाई 7, 1656
(कीरतपुर)
पिता : गुरु हर राय
जी
माता : माता कृष्ण
कौर जी
भाई : राम राय जी
जोति जोत : मार्च 30,
1664
गुरु गद्दी मिलना
कीरत पुर में गुरु हरि राय जी के दो समय दीवान लगते थे| हजारों
श्रद्धालु वहाँ उनके दर्शन के लिए आते और अपनी मनोकामनाएँ पूरी करते| एक
दिन गुरु हरि राय जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक पाया और देश परदेश के सारे मसंदो को
हुक्मनामे भेज दिये कि अपने संगत के मुखियों को साथ लेकर शीघ्र ही कीरत पुर पहुँच
जाओ| इस तरह जब सब सिख सेवक और सोढ़ी, बेदी, भल्ले, त्रिहण, गुरु, अंश
और संत महंत सभी वहा पहुँचे| आप जी ने दीवान लगाया और सब को बताया कि हमारा अन्तिम
समय नजदीक आ रहा है और हमने गुरु गद्दी का तिलक अपने छोटे सपुत्र श्री हरि कृष्ण
जी को देने का निर्णय किया है|
इसके उपरांत गुरु जी ने श्री हरि कृष्ण जी को सामने बिठाकर उनकी तीन परिकर्मा की और पांच पैसे और नारियल
आगे रखकर उनको नमस्कार की|
उन्होंने साथ -2 यह
भी वचन किया कि आज हमने इन्हें गुरु गद्दी दे दी है| आपने
इनको हमारा ही रूप समझना है और इनकी आज्ञा में रहना है| गुरु
जी का यह हुकुम सुनकर सारी संगत ने यह वचन सहर्ष स्वीकार किया और भेंट अर्पण की| इस
प्रकार संगत ने श्री हरि कृष्ण जी को गुरु स्वीकार कर लिया|
यह सब गुरु हरि कृष्ण जी के बड़े भाई श्री राम राय जी बर्दाश्त ना कर सके| उन्होंने
क्रोध में आकर बाहर मसंदो को पत्र लिखे कि गुरु की कार भेंट इक्कठी करके सब मुझे
भेजो नहीं तो पछताना पड़ेगा| उसने
इसके साथ -2 दिल्ली जाकर औरंगजेब को जाकर कहा कि मेरे साथ अन्याय हुआ है| गुरु
गद्दी पर बैठने का हक तो मेरा था परन्तु मुझे छोडकर मेरे छोटे भाई को गुरु गद्दी
पर बिठाया गया| जिसकी उम्र केवल पांच वर्ष की है| आप
उसको दिल्ली में बुलाओ और कहो कि गुरु बनकर सिखो से कार भेंटा ना ले और अपने आप को
गुरु ना कहलाए| श्री राम राय के बहुत कुछ कहने के कारण बादशाह ने मजबूर होकर
राजा जयसिंह को कहा कि अपना विशेष आदमी भेजकर गुरु जी को दिल्ली बुलाओ| जयसिंह
ने ऐसा ही किया| राजा जयसिंह कि चिट्टी पड़कर और मंत्री की जुबानी सुनकर गुरु
हरि कृष्ण जी ने
माता और बुद्धिमान सिखों से विचार किया और दिल्ली जाने की तैयारी कर ली|
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जयसिंह की रानी की परख करनी
राजा जयसिंह की रानी ने जब यह सुना कि बाल गुरु जी शक्तिवान हैं
तो उसने आपको भोजन खिलाने के लिए महलों में बुलाया| रानी
गुरु जी की शक्ति को परखना चाहती थी| इस
मकसद से रानी ने सेविकाओं वाले वस्त्र पहन लिए और उनके बीच में जाकर बैठ गई| अन्तर्यामी
गुरु जी जब अपनी माता सहित राजा के महल में गए तो सभी सेविकाओं ने आपको माथा टेका
और बैठ गई| गुरू जी अपने हाथ की छड़ी सबके सिर ऊपर रखते गए और साथ -2 यह
भी कहते रहे कि यह भी रानी नहीं, यह भी रानी नहीं है| परन्तु जब असली रानी की बारी
आई तो गुरु जी ने उसके सिर पर भी छड़ी रखी और कहने लगे यह ही रानी है| यह
सुनकर रानी फूले नहीं समाई और बड़े प्यार से उन्हें गोदी में बिठा लिया| साथ
ही साथ श्रद्धा के साथ उनके चरण पकडे और सिर झुकाया| राजा-रानी
ने बड़े प्रेम से उन्हें भोजन खिलाया व जवाहरात की थाली भी उनको भेंट की|
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चरणामृत से रोगियों के रोग दूर करना
पंजोखरे से चलकर और स्थान पर संगतों को दर्शन की ख़ुशी देते हुए
गुरु हरि कृष्ण जी दिल्ली पहुँच गए| गुरु जी के रहने का प्रबंध राजा जयसिंह ने
अपने बंगले में कराया|
उसने गुरु जी के
दिल्ली पहुँचने की खबर बादशाह को भी दे दी|
उस समय दिल्ली शहर में हैजे की बीमारी से बहुत लोग बीमार थे| गुरु
जी के आने की खबर सुनकर बहुत से रोगी आपके पास आने लगे| आप
जिन्हें भी अपने चरणों का चरणामृत देते वह जल्द ही स्वस्थ हो जाता| इस
प्रकार आपकी उपमा को सुनकर बहुत रोगी आपके पास आने लगे| आपने
एक कुंड बनवाया जिसमे अमृत समय के स्मरण से उठकर अपने चरणों की छोह का पानी भर
देते| इस कुंड में आए हुए रोगियों को सेवादार आठों पहर चरणामृत देते| जिससे
बहुत से रोगी स्वस्थ हो गए| वह
गुरु जी की महिमा गाते और भेंट अर्पण करते|इस
वार्ता को सुनकर श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अरदास में यह शब्द रखे – "श्री हरि कृष्ण जी
धिआईअै जिस डिठै सभ दुख जाइ||"
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बादशाह औरंगजेब के शहिजादे का गुरु जी से
प्रभावित होना
राजा जयसिंह ने जब बादशाह को यह बताया कि गुरु जी ने मेरे बंगले
में निवास कर लिया है तो दूसरे ही दिन उसने अपने शहजादे को गुरु जी के पास भेज
दिया| शहजादे ने बादशाह की ओर से गुरु जी को भेंट अर्पण की और माथा
टेका| उसने गुरु जी से यह प्रार्थना की कि बादशाह आपके दर्शन करना
चाहते हैं| पर गुरु जी आगे से कहने लगे कि हमारा प्रण है कि हम किसी बादशाह
के माथे नहीं लगेंगे|
शहजादे गुरु जी से बातचीत करके बहुत प्रभावित हुआ| उसने
यह सारी बात बादशाह को बताई कि गुरु जी उम्र में चाहे बच्चे हैं परन्तु उनकी सूझ
बूझ वृद्धो वाली| इस प्रकार शहजादा गुरु हरि कृष्ण जी से प्रभावित हुए बिना ना रह
सका|
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अनपढ़ झीवर से गीता के अर्थ कराने
कीरतपुर से दिल्ली को जाते हुए गुरु जी अम्बाले के पास पंजोखरे
गाँव में ठहरे| पंडित जो उसी गाँव के रहने वाले थे आपसे कहने लगे कि आप छोटी
उम्र में ही ईश्वर अवतार और गुरु कहलाते हो| अगर
आपमें शक्ति है तो मुझे आप गीता के अर्थ करके दिखाओ| पंडित
की ऐसी बात सुनकर गुरु जी ने कहा पंडित जी आपने अगर गीता के अर्थ सुनने है तो गाँव
में से किसी भी आदमी को लेकर आओं, हम उससे ही गीता के अर्थ आपको सुनवा देंगे| गुरु जी की यह बात सुनकर पंडित जी ने एक अनपढ़ झीवर को बुलाया| गुरु
जी ने उस झीवर को हाथ मुँह धुलवा कर एक आसन पर बिठा दिया|गुरु
जी ने अपने हाथ की छड़ी उसके सिर पर रख कर कहा कि “पंडित जी को गीता का
अर्थ करके सुनाओ|" गुरु जी की कृपा से उस झीवर ने गीता पड़कर शास्त्र अनुसार अर्थ
करके पंडित को सुनाए| गुरु जी के ऐसे कौतक को देखकर पंडित जी दंग रह गए| उनकी
ऐसी प्रत्यक्ष शक्ति को देखकर पंडित ने गुरु जी को प्रणाम किया और क्षमा माँगी| अब
इस स्थान पर एक सुन्दर गुरुद्वारा बना हुआ है|
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ज्योति
ज्योत समाना
रानियों के महल से वापिस आकर कुछ समय बाद गुरु जी को बुखार हो
गया जिससे सबको चिंता हो गई| बुखार
के साथ -2 ही गुरु जी को शीतला निकल आई| जब
एक दो दिन इलाज करने से बीमारी का फर्क ना पड़ा तो इसे छूत की बीमारी समझकर राजा
जयसिंह के बंगले से आपको यमुना नदी के किनारे तिलेखरी में तम्बू कनाते लगाकर भेज
दिया| इस प्रकार दो दिन दो राते गुरु जी को बहुत कष्ट रहा जिससे आपकी
हालत खराब हो गई| सिखो ने प्रार्थना की महाराज संगत के लिए क्या आज्ञा है, घर-घर
गुरु बन बैठेंगे| इसलिए संगत की बाजू किसे पकड़ाओगे| कृपा
करके हमें बताए| गुरु जी ने अपने मसंद भाई गुरुबक्श जी से पांच पैसे मंगवाकर थाल
में रखकर उनको माथा टेक कर कहा –
"बाबा बसहि जि गराम बकले|| बनि गुर संगति सकल समाले||"
यह वचन करके आपजी कुश के आसन पर चादर तान कर लेट गए और शरीर
त्यागकर स्वर्ग सिधार गए|
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