Thursday, April 30, 2020

श्री गुरु तेग बहादुर जी


जीवन परिचय श्री गुरु तेग बहादुर जी
जन्म       : अप्रैल 1, 1621 अमृतसर पंजाब
पिता       : गुरु हरगोबिन्द जी
माता     : माता नानकी जी
भाई      : बाबा गुरदिता जी, बाबा वीरो जी, बाबा सूरजमल जी,
           बाबा अनीराय जी, बाबा अटल राय जी
पत्नी      : माता गुजरी जी पुत्री (लाल चन्द जी, करतारपुर जिला  
           जालंधर)
साहिबजादे : गोबिंद राय जी
जोति जोत : नवम्बर 11, 1675 चांदनी चौक, दिल्ली

बकाले में गुरु जी
जब श्री गुरु हरिगोबिंद जी ने गुरु गद्दी अपने छोटे पोत्र श्री हरि राय जी  को दी तथा स्वंय ज्योति ज्योत समाने का निर्णय कर लिया- तो माता नानकी जी ने आपको हाथ जोड़कर विनती की कि महाराज मेरा पुत्र जोकि संत स्वरुप है, उनकी ओर तो आपने ध्यान नहीं दिया| उनका निर्वाह किस तरह होगा? गुरु हरि गोबिंद जी ने जब अपनी पत्नी की यह बात सुनी तो उन्होंने वचन किया कि आप इस समय अपने पुत्र श्री तेग बहादर जी को लेकर अपने मायके बकाले गाँव चले जाओ| समय पर इन्ही को गुरु गद्दी प्राप्त हो जायेगी| गुरु जी का वचन मानकर माता नानकी जी श्री तेग बहादर जी को लेकर बकाले आ गई| वहाँ आकर श्री तेग बहादर जी अलग बैठकर भजन सिमरन करते रहते| वह किसी भी काम काज की ओर अपना ध्यान न देते| इस तरह ऐसी तप साधना में आप जी ने 21-22 साल व्यतीत किए| आठवें गुरु श्री हरि कृष्ण जी ने दिल्ली में ज्योति जोत समाने से पहले पांच पैसे और नारियल थाली में रखकर और उसको माथा टेक कर वचन किया था कि  "गुरु बाबा बकाले"| जब यह वचन सारे सिक्ख सेवकों में प्रकट हो गया तो श्री तेग बहादर जी कोष्ठ में समाधि लगाकर छुप कर बैठ गए| 15 दिनों के बाद जब आपकी समाधि खुली तो माता जी ने कहा कि बेटा आप संगत  में प्रकट होकर दर्शन दो और उनकी मनोकामना पूर्ण करो| पर गुरु जी अपनी लिव जोड़कर बैठे गए| दूसरी ओर धीरमल जी गुरु गद्दी लगाकर बकाले आकर गुरु बनकर बैठ गए| उसने जगह-जगह यह प्रचार किया कि मैं ही गुरु हूँ| इनको देखकर और सोढ भी यहाँ डेरा लगाकर बैठ गए| यह आपा धापी देखकर श्रधालु सिक्ख विचलित से होने लगे| मखन शाह लुभाना जिला जेहलम गाँव टांडा में रहता था, जो कि देश विदेश में व्यपार का काम करता था| एक बार वह किसी विदेश से जहाज का माल लादकर समुन्द्र के रस्ते देश को आ रहा था| तूफान के कारण जहाज रेतीली जगह में फस गया| कोई चारा ना चलता देखकर उसने गुरु जी से हाथ जोड़कर अरदास की कि सच्चे पातशाह मैं आपके घर का सेवक हूँ, मेरी सहायता करके पार लगाओ| मैं आपके आगे पांच सौ मोहरे भेंट करूँगा| अपने भगत के हृदय की पुकार सुनकर अन्तर्यामी गुरु ने अपना कंधा देकर मखन शाह का डूबता जहाज पार लगा दिया| और अपने सेवक की प्रार्थना कबूल की| जहाज पार लगाकर मखन शाह ने सारा माल बेच दिया| तो वह अपनी मन्नत पूरी करने के लिए पंजाब आया| पंजाब आकर उसको पता लगा इस समय गुरु बकाले में निवास करते हें| तब उसने यह विचार किया कि अन्तर्यामी गुरु स्वंय ही मुझसे पांच सौ मोहरे माँगेगे| बकाले जाकर उसने देखा कि वहाँ कई गुरु बैठे हैं| उसने हर एक गद्दी लगाकर बैठे गुरु के आगे दो दो मोहरे रखकर माथा टेका| पर किसी भी गुरु ने पांच सौ मोहरे पूरी ना माँगी| फिर वह सच्चे गुरु को पूछता-पूछता श्री गुरु तेग बहादर जी के पास पहुँच गया| आप जी कोष्ठ में बैठे थे| आपने माता जी से पूछ कर कोष्ठ में जाकर जब दो मोहरे रखकर माथा टेका तो आपने हँस कर कहा -  मखन शाह तू पांच सौ मोहरे गुरु घर की मन्नत मानकर अब दो ही  मोहरे रखता है| तुम्हें गुरु घर की मन्नत पूरी करनी चाहिए| गुरु जी के यह वचन सुनकर मखन शाह को यकीन आ गया कि यही सच्चे गुरु हैं| उसने पांच सौ मोहरे गुरु जी के आगे भेंट कर दी और खुशी से कोठे पर चढ़कर कर ऊँची-2 कपड़ा फैककर कहाँ गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे| इस तरह जब सबको पता लग गया कि बकाले वाले बाबा श्री गुरु तेग बहादर जी हैं तो सांगत उमड़ -2 कर आपके दर्शन करने के लिए आने लगी| मखन शाह ने अपनी वार्ता सबको सुनाई कि सच्चे गुरु की परख किस तरह हुई है| यह वार्ता सुनकर श्रद्धालु सिक्ख सेवकों ने गुरु जी के आगे भेंट रखकर माथा टेका| दूसरे दिन माता जी तथा भाई गढ़ीये से सलाह करके मखन शाह ने चंदोआ और नीचे दरियाँ बिछाई और गुरु जी के दीवान के लिए तैयारी करके गुरु जी को गद्दी लगवाकर बिठा दिया| गुरु जी का दीवान में प्रगट होकर बैठना सुनकर सिक्ख सेवक उमड़ -2 कर दर्शन करने को आए| आए हुए सभी श्रदालुओं ने यथा शक्ति भेंट अर्पण की और गुरु जी को माथा टेका| धीरमल ने इस तरह संगत की आवाजाई और गुरु जी भेंट अर्पण होते देखकर आदमी भेजकर सारा चढ़ावा जो संगत ने भेंट किया था उठवा लिया| इस समय शीहें मसंद ने गुरु जी को मारने के लिए गोली भी चलाई| परन्तु वह खाली गई और गुरु जी बच गए| मखन शाह अपने साथ आदमी लेकर धीरमल के डेरे से श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ के साथ -2 डेरे से सब कुछ ले आया जो धीरमल के आदमी लूट कर ले गए थे| परन्तु गुरु जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ के अतिरिक्त सब कुछ धीरमल को वापिस करा दिया| इस तरह अपना आदर ना होता देखकर अपना सामान उठवाकर वह करतारपुर चला गया|
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गुरु तेग बहादर जी हडियाए नगर पहुँचे वह नगर से बाहर बरगद के पेड़ के नीचे आ ठहरे| उस समय गाँव का एक बीमार आदमी लेटा हुआ था|बुखार के साथ उसकी हडियाँ टूट रही थी| गुरु तेग बहादर जी ने पुछा इसको घर क्यों नहीं ले जाते? उसको घर वालों ने कहा की महाराज गाँव में बुखार का बड़ा जोर है कोई विरला ही बचा है| बहुत लोग मर भी गये है|वह पास ही पानी का एक जौहड़ था| गुरु जी कहा कि इसे इसमें स्नान करा दो| बुखार भी उतर जायेगा| उन्होंने गुरु जी का वचन माना| बीमार व्यक्ति को उठा कर जौहड़ में स्नान कराया गया| उसका बुखार शीघ्र ही उतर गया|बीमार आदमी भी स्वस्थ हो गया| इस बात का पता जब गाँव वालों को लगा तो वो सारे बीमार लोगों को लेकर गुरु जी के पास ले आये| सबको जौहड़ में स्नान कराया गया| सभी स्वस्थ हो गये| यह कौतक देखकर सभी दंग रह गये| सभी भेंट लेकर गुरु जी के दर्शन करने आने लगे| सतिनाम का उपदेश ले कर सिक्ख बन गये|
गुरु जी यह एक धर्मशाला व लंगर चलाने का हुकुम देकर आगे चल दिए| इस जौहड़ को संगत ने पक्का सरोवर करा दिया, जिसका नाम प्रसिद्ध गुरुसर है| संगत ने गुरु जी कि आज्ञा अनुसार धर्मशाला भी तैयार कर दी|
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संत मलूक दास का भ्रम दूर करना

चलते -2 गुरु तेग बहादुर जी मानकपुर नगर के पास पहुँचे| इस गाँव में एक वैष्णव संत मलूक दास रहते थे| वह गुरु जी के दर्शन करना चाहता था, परन्तु वह यह निश्चय करके बैठा रहा कि गुरु जी अगर अंतर्यामी है, तो स्वयं मुझे बुलाकर दर्शन देंगे| अन्तर्यामी गुरु मलूक दास की प्रतिज्ञा जान गये| उन्होंने एक सिक्ख को कहा कि मलूक दास के डेरे जाकर उसे पालकी में बिठाकर हमारे पास लाओ| एक सिक्ख ने मलूक दास को जाकर बताया कि गुरु जी आपको याद कर रहे है|पालकी में बैठ जाओ, हम आपको ले चलते है| गुरु तेग बहादर जी का ऐसा हुक्म सुनकर मलूक दास बहुत प्रसन्न हुआ| वह पालकी में बैठकर गुरु जी के पास पहुँच गया| पालकी से उतरकर उसने गुरु को माथा टेका और फिर यह दोहा उच्चारण किया-
मलूका पापी खेड को भगति ण जानी तोहि||
भगति लिखी थी और को प्रभू धोखा दे मोहि||४७||
गुरु जी ने कहा-
सुनि मलूक हरि के भगति नहि राखो मन दरोहि ||
भगति लिखी थी अवर को करि किरपा दई तोहि||४९||
गुरु जी के वचन सुनकर और दर्शन करके मलूक दास आनंदमय हो गया| उसने प्रार्थना कि आप मेरे डेरे चले|मैं भी आपकी सेवा करके जन्म सफल करना चाहता हूँ|उसकी प्रार्थना सुनकर गुरु जी ने डेरे पे जाना स्वीकार किया| मलूक ने भोजन तैयार करके गुरु जी के आगे रख दिया| उसने यह भी प्रार्थना की कि महाराज! पहले मैं पत्थरो के ठाकुरों को भोग लगाया करता था| आज प्रत्यक्ष ठाकुर मेरे पास बैठकर भोग लगा रहे हो| गुरु जी अब तो मेरा भ्रम भी दूर हो गया है| अब मैं प्रत्यक्ष ठाकुर की  पूजा ही किया करूँगा| मलूक दास के पास एक रात का विश्राम और वार्तालाप करके गुरु जी दूसरे दिन प्रातकाल ही मलूक दास को खुशी देकर आगे की ओर चल पड़े|
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श्री दसमेश जी का गर्भ प्रवेश

प्राग राज के निवास समय एक दिन माता नानकी जी ने स्वाभाविक श्री गुरु तेग बहादर जी को कहा कि बेटा आप जी के पिता ने एक बार वचन दिया था तेरे घर तलवार का धनी, प्रतापी, शूरवीर पोत्र ईश्वर का अवतार होगा| मैं उनके वचनों को याद करके प्रतीक्षा कर रही हूँ कि आपके पुत्र का मुँह मैं कब देखूँगी| बेटा जी! मेरी यह मुराद पूरी करो, जिससे मुझे सुख की प्राप्ति हो|  अपनी माता जी के यह मीठे वचन सुनकर गुरु जी ने वचन किया कि माता जी! आप जी का मनोरथ पूरा करना अकाल पुरख के हाथ में है| हमें भरोसा है कि आप के घर तेज प्रतापी ब्रह्मज्ञानी पोत्र देंगे| गुरु जी के ऐसे आशावादी वचन सुनकर माता जी बहुत प्रसन्न हुए|
माता जी के मनोरथ को पूरा करने के लिए गुरु जी नित्य प्रति प्रातकाल त्रिवेणी स्नान करके अंतर्ध्यान हो कर वृति जोड़ कर बैठ जाते व पुत्र प्राप्ति के लिए अकाल पुरुख की आराधना करते|
गुरु जी की नित्य आराधना और याचना अकाल पुरख के दरबार में स्वीकार हो गई| उसने हेमकुंट के महा तपस्वी दुष्ट दमन को आप जी के घर माता गुजरी जी के गर्भ में जन्म लेने की आज्ञा की|जिसे स्वीकार करके श्री दमन जी (दशमेश) ने अपनी माता गुजारी के गर्भ में आकर प्रवेश किया|
श्री दसमेश जी अपनी जीवन कथा बचितर नाटक में लिखते है-
चौपई  
मुर पित पूरब कीयसि पयाना|| भांति भांति के तीरथि नाना||
जब ही जात त्रिबेणी भए ||पुन्न दान दिन करत बितए||||
तही प्रकास हमारा भयो|| पटना सहर बिखे भव लयो||||
(दशम ग्रन्थ :बिचित्र नाटक ,7वा अध्याय)
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गुरु वचन मानने में ही सुख

श्री गुरु तेग बहादर जी कैथल विश्राम करके बारने गाँव आ गये| इस गाँव के बाहर ही ठहर कर गुरु जी ने पुछा  कि यहाँ कोई गुरु नानक देव जी का सिक्ख रहता है? उसने कहा महाराज यहाँ जमींदार सिक्ख रहता है| गुरु जी ने उसे बुलाने के लिए कहा| एक आदमी जाकर जमींदार को बुला लाया|उसने आकर गुरु जी के चरणों पर माथा टेका|उसने यह भी प्रार्थना की कि मेरे घर आकर विश्राम करो| तब तक मैं अपनी खेती की कूत करा आऊ| गुरु जी ने उसे कहा कि आप हमारे साथ घर चले|तुम्हारी खेती का गुरु रखवाला है| तुम कूत कराने ना जाओ| जमींदार ने वचन को काटते हुए कहा कि महाराज आप चले जाए| हम शीघ्र ही आ जायेंगे| ऐसा कहता हुआ वह सिक्ख वहाँ से चल दिया| जब उसके खेत कि कूत हुई तो पहले वह दो सौ बीघा थी, अब वह सौ बीघा हो गई| उसके शरीको ने कहा कि कूत करने वाला रिश्वत खा गया है| कूत दुबारा होनी चाहिए| जब खेती कि दुबारा कूत हुई तो वह सौ बीघा ही निकली| इस बात से उसे गुरु जी पर विश्वास हो गया कि उसे वचन नहीं काटना चाहिए था| उसने गुरु जी के चरणों पर माथा टेका| उसने सारी बात गुरु जी को बताई| गुरु जी प्रातकाल उठकर स्नान किया और उसे वचन किया कि आज से आप तम्बाकू पीना छोड़ दो व सिक्ख संगतो की सेवा किया करो| तुम्हारा परलोक सुधर जायेगा| तुम्हारा वंश जब तक हुक्के का त्याग करके खेती करेगा तब तक बहुत बढेगा| परन्तु यदि हूका तम्बाकू पीना आरम्भ कर देगा, तो कंगाल हो जायेगा| सारा धन भी जाता रहेगा| गुरु जी का वचन मानकर जमींदार ने गुरु जी के चरणों पर माथा टेका और हुक्का पीना छोड़ दिया| भाई संतोख जी लिखते है कि यह हमने अपनी आँखों से देखा कि जब उसकी कुल का एक आदमी हुक्का पीने  लगा तो वह अति गरीब हो गया|
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आसाम के राजा राम राय को पुत्र का वरदान

गुरु तेग बहादर जी की महिमा सुनकर आसाम देश का राजा अपनी रानी सहित गुरु जी की शरण में आया| उसने गुरु जी के आगे भेंट आदि अर्पण की| भेंट अर्पण करने के पश्चात उसने प्रार्थना की कि महाराज मेरे पास कोई औलाद नहीं है| मुझे पुत्र का वरदान दो जो हमारे राज्य का मालिक बने| गुरु जी राजा तथा रानी की श्रद्धा व प्रेम पर प्रसन्न हुए| प्रसन्न होकर गुरु जी ने वचन किया कि आपके घर एक धर्मात्मा तथा उदारचित पुत्र होगा| गुरु जी से ऐसा आशीर्वाद लेकर राजा व रानी बहुत प्रसन्न हुए| यह वचन करके गुरु जी ने अपने हाथ की मोहर का एक निशान राजे के माथे पर लगाकर कहा कि ऐसा निशान आपके घर होने वाले पुत्र के माथे पर भी होगा| तब तुम यह समझ लेना कि यह पुत्र गुरु घर की कृपा है| गुरु जी के ऐसे वचन सुनकर उनकी खुशी का ठिकाना न रहा| वह बहुत प्रसन्न थे| गुरु जी का चरणामृत लेकर उन्होंने सिखी धारण कर ली| गुरु जी के आशीर्वाद से उनके घर पुत्र पैदा हुआ|
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फग्गू का प्रेम

काशी से गुरु तेग बहादर जी सासाराम शहर की ओर चल पड़े| वहाँ पहुँच कर आपने गुरु घर के एक मसंद सिक्ख फग्गू की चिरकाल से दर्शन करने की भावना को पूरा करने के लिए गए| भाई फग्गू ने एक मकान बनवाया| उसने उसका दरवाज़ा बहुत बड़ा रखवाया| उसके आगे एक खुला आँगन भी रखा हुआ थालोगों ने फग्गू से जब इसका कारण पूछा कि उसके मकान बनवाकर उसका दरवाज़ा इतना बड़ा क्यों रखा है? फग्गू ने उनका उत्तर दिया कि यह मैंने गुरु जी के लिए बनवाया है| जब वह मेरे घर में आयेगें तब वह घोड़े पर सवार होकर आयेगें| उन्हें बाहर नहीं उतरना पड़ेगा| वह घोड़े पर बैठे -2 ही मेरे घर के अंदर आ जाये इसलिए मैंने दरवाजा खुला रखवाया है| फग्गू की इस श्रद्धा भावना को अन्तर्यामी गुरु जान गए| वह रास्ते में सभी को दर्शन देते हुए फग्गू के घर में जा पहुँचे| आप एक दम ही पहुँच गए जिसको देखकर फग्गू बहुत खुश हुआ| उसने गुरु जी के चरणों पर माथा टेका| फिर गुरु जी को पलंघ पर बिठाया जो की उसने विशेष रूप से गुरु जी के लिए ही तैयार किया था| गुरु जी कुछ दिन वहाँ रुके| वह फग्गू की श्रद्धा व प्रेम से की हुई सेवा से प्रसन्न हुए| प्रसन्न होकर आपने फग्गू ब्रह्म ज्ञान की दात बक्शी और उसको निहाल किया| इस नगर के बाहर गुरु जी को एक बाग भी संगत ने भेंट किया, जो कि गुरु का बाग करके प्रसिद्ध है
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जिमींदार द्वारा गुरु के वचनों की उलंघना करना

एक जमींदार गुरु तेग बहादर जी की बड़ी श्रद्धा के साथ सेवा करता था| गुरु जी उसकी सेवा पर बहुत खुश थे| उसकी सेवा पर खुश होकर गुरु जी ने वह सारी भेंटा उसको दे दी जो संगत की तरफ से आई थी| गुरु जी ने साथ-2 यह भी वचन किया कि इस धन से धर्मशाला भी बनवाओ साथ ही कुआँ लगवाओ, इसके साथ आपको और कुछ भी करना है पास ही फलदार वृक्षों का बाग लगवाओ| साथ ही साथ गुरु जी ने यह भी कहा कि इस धन के लालच में मत पड़ना| अगर आप इन्हें अन्य प्रकार से खर्च करोगे तो सब कुछ निष्फल हो जाएगा| जब गुरु जी चले गए तो जमींदार को लालच आ गया| उसने लोभ में आकर उस धन का कूआँ अपनी खेती में लगवाने की सलाह कर ली| उसने कारीगरों को बुलाया| कारीगरों को बुलाकर कुएँ का पाड़ खुदवाया| उसमे चक्क उतारा| तो वह वहाँ ही ठहर गया| बहुत जोर लगाया पर चक्क नीचे ना उतरा| इस कूएँ की खुडल आज तक जमींदार के खेत में उजाड़ है| इस तरह गुरु जी के वचनों की उलंघना करके जमींदार ने यह सारा धन ही निष्फल गँवा लिया|
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खारा कूआँ मीठा करना

श्री गुरु तेग बहादर जी जब गाँव मूलोवाल पहुँचे तो मईया व गोंदे ने आपकी खूब सेवा की| गुरु जी को बहुत प्यास लगी| उन्होंने पीने के लिए पानी मंगवाया| परन्तु पानी बहुत खारा था| गुरु जी ने उनसे पूछा कि यहाँ कोई मीठे पानी का कूआँ नहीं है? तब मईया ने कहा कि महाराज मीठे पानी का कुआँ गाँव से बहुत दूर है| यदि आप हुक्म करो तो वहाँ से मीठा पानी ले आऊँ| गुरु जी ने वचन किया जाओ वाहेगुरु कहकर यहाँ से ही हमारे पीने के लिए जल ले आओ| ये ही मीठा हो जायेगा| गुरु जी का वचन मानकर गोंदा ने वैसा ही किया जैसा गुरु जी ने कहा था| गोंदा जब पानी लाया तो गुरु जी ने पी कर बताया कि यह जल बहुत ठंडा और मीठा है| आज से यह कुआँ गुरु का कहावेगा| जब लोगों को यह ज्ञात हुआ कि गुरु जी के वचनों से खारे कूएँ का पानी मीठा हो गया है, तो संगत श्रद्धा से साथ भेंट लेकर आपके दर्शन को आई| इस गाँव में आपने दो दिन विश्राम किया| मईया के प्रेम और श्रद्धा से खुश होकर उसको गाँव का चौधरी बना दिया|
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एक दिन एक पीर जोकि रोपड़ में रहता था अपने मुरीदो से कार भेंट लेता हुआ आनंदपुर आया| गुरु जी के दरबार की महिमा व संगत का आना जाना देख कर वह बड़ा प्रभावित हुआ| उसने एक सिक्ख से पूछा यह किस गद्दी का गुरु है? सिक्ख ने कहा यह गुरु नानक साहिब जी की गद्दी पर बैठे नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादर जी हैं| पीर ने कहा गुरु नानक जी तो बड़े बली महापुरुष हुए हैं| अगर यह इनकी गद्दी पर विराजमान हैं तो इनमे भी शक्ति होनी चाहिए| सिक्ख ने कहा गुरु जी वैराग्य के पुंज और शक्ति के मालिक हैंपीर ने अगला प्रशन किया कि गुरु जी ग्रहस्थी हैं या फकीर? सिक्ख ने उत्तर दिया की गुरु जी ग्रहस्थी हैं| गुरु नानक देव जी भी ग्रहस्थी थे| पीर ने फिर कहा वैराग्य गुरु पीर होकर फिर यह ग्रहस्थ का आडम्बर क्यों? इसके पश्चात पीर ने गुरु जी के दर्शन करके जब यही सवाल पूछा तो गुरु जी ने कहा साईं लोगों! ग्रहस्थ सब धर्मों से ऊँचा है|
      यह सारे पीरो-फकीरों, ऋषि-मुनियों को पैदा करता है फिर सबकी गुजरान का आधार रहता है| जो पुरुष ग्रहस्थ धर्म में पूरे उतरते हैं उन्हें अन्तिम समय मुक्ति प्राप्त होती है| ग्रहस्थ का धर्म है अतिथि की सेवा करनी तथा अपनी नेक कमाई से पुण्य दान करना| ऐसा ग्रहस्थी परम सुख प्राप्त करता है| गुरु जी से यह बात सुनकर पीर ने गुरु जी को माथा टेका और कहा कि अब मुझे इस बात का ज्ञान हो गया है की ग्रहस्थ धर्म पुरुष का मुख्य उदेश्य है इसको बुरा समझना एक बड़ी भूल है|
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गुरु तेग बहादुर जी की शहीदी
औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान था| जो कि अपनी राजनीतिक व धार्मिक उन्नति चाहता था| इसके किए उसने हिंदुओं पर अधिक से अधिक अत्याचार किए| कई प्रकार के लालच व भय देकर हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाया| उसने अपने जरनैलो को भी आज्ञा दे दी हिंदुओं को किसी तरह भी मुसलमान बनाओ| जो इस बात के लिए इंकार करे उनका क़त्ल कर दिया जाए| औरंगजेब के हुकम के अनुसार कश्मीर के जरनैल अफगान खां ने कश्मीर के पंडितो और हिंदुओं को कहा कि आप मुसलमान हो जाओ| अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो क़त्ल कर दिया जायेगा| कश्मीरी पंडित भयभीत हो गए| उन्होंने अपना अन्न जल त्याग दिया और प्रार्थना करने लगे| कुछ दिन के बाद उन्हें आकाशवाणी के द्वारा अनुभव हुआ कि इस समय धर्म की रक्षा करने वाले श्री गुरु तेग बहादर जी हैं| आप पंजाब जाकर अपनी व्यथा बताओ| वह आपकी सहायता करने में समर्थ हैं| आकाशवाणी के अनुसार पंडित पूछते -2 श्री तेग बहादर जी के पास आनंदपुर आ गए और प्रार्थना की कि महाराज हमारा धर्म खतरे में है, हमे बचाए| उनकी पूरी बात सुनकर गुरु जी सोच ही रहे थे कि श्री गोबिंद सिंह जी  वहाँ आ गए| गुरु जी कहने लगे बेटा इन पंडितो की धर्म की रक्षा के लिए कोई ऐसा महापुरुष चाहिए जो इस समय अपना बलिदान दे सके| पिता गुरु का वह वचन सुनकर श्री गोबिंद जी ने कहा कि पिता जी इस समय आप से बड़ा कौन महापुरुष है, जो इनके धर्म कि रक्षा कर सकता है? आप ही इस योग्य हो| अपने नौ साल के पुत्र की यह बात सुनकर गुरु जी बहुत प्रसन्न हुए| आपने पंडितो को कहा कि जाओ अफगान खां से कह दो कि अगर हमारे आनंदपुर वासी गुरु जी मुसलमान हो जाएगें तो हम भी मुसलमान बन जाएगें| यह बात सुनकर औरंगजेब ने गुरु जी को दिल्ली बुला लिया| गुरु जी ने सन्देश वाहक को कहा कि तुम चले जाओ हम अपने आप बादशाह के पास पहुँच जाएगें| गुरु जी ने घर बाहर का प्रबंध मामा कृपाल चंद को सौंप कर तथा हर बात अपने साहिबजादे को समझा दी और आप पांच सिखों को साथ लेकर दिल्ली की ओर चल दिए|आगरे पहुँच कर गुरु जी ने एक गडड़ीए के द्वारा कौतक रच के अपने आप को बंदी बना लिया| औरंगजेब ने आपको बंदीखाने में बंद करके काजी को गुरु जी के पास भेजा और प्रार्थना की कि आप मुसलमान हो जाओ| गुरु जी ने वचन किया तुम सारे देश में एक धर्म करना चाहते हो परन्तु यदि परमात्मा चाहे तो दो धर्मो के तीन हो जायेगें| इस बात को सिद्ध करने के लिए गुरु जी ने एक मण मिर्च मंगाई और उन्हें जलाया| आगे से गुरु जी कहने लगे यदि राख में से एक मिर्च साबुत निकली तो परमात्मा को एक धर्म कबूल होगा यदि दो निकली तो दो धर्म और अगर तीन मिर्चे साबुत निकली तो समझ लेना कि परमात्मा को तीसरा धर्म कबूल होगा| इस तरह जब मिर्चो का ढेर जलाकर औरंगजेब ने राख को बिखेर कर देखा तो उसमे से तीन मिर्चे साबुत निकली| यह निर्णय देखकर बादशाह हैरान हो गया| इसके पश्चात जब गुरु जी किसी तरह भी मुसलमान होना ना माने तो उन्हें करामात दिखाने के लिए कहा गया| गुरु जी ने करामात को कहर का नाम दिया और करामात दिखाने से मना कर दिया| औरंगजेब ने कहा ना आप इस्लाम धर्म कबूल करना चाहतें हैं और ना ही कोई करामात दिखाना चाहतें हैं तो फिर कत्ल के लिए तैयार हो जाइए| गुरु जी ने कहा हमें आप की दोनों बाते स्वीकार नहीं परन्तु तुम्हारी तीसरी बात कत्ल होना हमे स्वीकार है|इस समय गुरु जी के साथ पांच सेवादार सिक्ख भी कैद थे-
·                     भाई मति दास
·                     भाई दिआला जी
·                     भाई गुरदित्ता जी
·                     भाई ऊदो जी
·                     भाई चीमा जी
जब गुरु साहिब जी किसी भी तरह ना माने तो औरंगजेब ने गुरु जी को डराने के लिए भाई मति दास को आरे से कटवा दिया और भाई दिआले जी को पानी की उबलती हुई देग में डालकर आलू की तरह उबाल दिया| दोनों सिखों ने अपने आप को हस हस कर पेश किया| जपुजी साहिब का पाठ तथा वाहेगुरु का उच्चारण करते हुए सच खंड जा विराजे| बाकी तीन सिक्ख गुरु जी के पास रह गए| गुरु जी ने अपना अन्तिम समय नजदीक जानकर बाकी तीन सिखों को वचन किया कि तुम अपने घरों को चले जाओ अब यहाँ रहने का कोई लाभ नहीं है| उन्होंने प्रार्थना की कि महाराज हमारे हाथ पैरो पैर बेड़ियाँ लगी है, दरवाजों पर ताले लगे हुए हैं हम यहाँ से किस तरह से निकले| गुरु जी ने वचन किया कि आप इस शब्द का "कटी बेडी पगहु ते गुरकीनी बन्द खलास" का पाठ करो| आपकी बेडियाँ टूट जाएगीं और दरवाजों के ताले खुल जाएगे और तुम्हें कोई नहीं देखेगा| गुरु जी का वचन मानकर दो सिक्ख आज़ाद हो कर चले गए| बाद में भाई गुरु दित्ता ही गुरु जी से पास रह गए| गुरु जी ने अपनी मस्ती में यह शलोक पड़ा|
शलोक महला ९ 
संग सखा सब तजि गए कोऊ न निबहिओ साथ||
कहु नानक इिह बिपत मै टेक एक रघुनाथ||55|
इसके पश्चात गुरु जी ने अपनी माता जी व परिवार को धैर्य देने वह प्रभु की आज्ञा को मानने के लिए शलोक लिखकर भेजे  
गुन गोबिंद गाइिओ नही जनमु अकारथ कीन||
 कहु नानक हरि भजु मना जिहि विधि जल कौ मीन||1||
यहाँ से आरम्भ करके अंत में लिखा
राम नामु उरि मै गहियो जाकै सम नही कोइि||
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइि||57|
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब पन्ना 1426-1429)
इन शालोको के साथ ही गुरु जी ने पांच पैसे और नारियल एक सिक्ख के हाथ आनंदपुर भेज के गुरु गद्दी अपने सुपुत्र श्री गोबिंद राय को दे दी|
अंत में जब 11 नवम्बर, 1675 का अभाग्यशाली दिन वीरवार आ गया| आप जी को चाँदनी चौक कोतवाली के पास सूर्य अस्त के समय बादशाह के हुक्म से जल्लाद ने तलवार के एक वार से शहीद कर दिया| इस निर्दय सके का वर्णन गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस तरह किया-
तेग बहादर के चलत भयो जगत को शोक||
 है है है सब जग भयो जै जै जै सुर लोक||१६||
(दशम ग्रंथ: बिचित्र नाटक, ५ अध्याय)
इस अत्याचार के समय इतिहासकार लिखते हैं कि बहुत भयानक काली आंधी चली| जिसके अंधकार मैं आपजी का पवित्र शीश भाई जैता जी अपने कपड़ो में लपेटकर जल्दी -2 चलकर आनंदपुर ले आया| यहाँ आप जी के शीश को बड़े सत्कार, वैराग्य तथा शोक सहित अग्नि भेंट किया गया| इस स्थान गुरुद्वारा शीश गंज सुशोभित है| इसके पश्चात इस आंधी के गुबार में ही आप जी का पवित्र धड़ एक लुबाणा सिक्ख अपनी बैल गाड़ी के माल में ले गया और अपनी कुटीर में रख दिया| फिर उसने आग लगाकर धड़ को वहीं अग्नि भेंट कर दिया| इस स्थान पर गुरुद्वारा  रकाब गंज सुशोभित है|
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