(परमसंत चरनदास जी)
vगद गद बानी कंठ में, आँसू टपकै नैंन।
वह तो
बिरहिन राम की, तलफत
है दिन रैन।।
प्रेम
बराबर जोग ना, प्रेम
बराबर ज्ञान।
प्रेम
भक्ति बिन साधिबो, सबही
थोथा ध्यान।।
अर्थः-""सन्त चरनदास जी का कथन है कि जब गला रुँधा हो, वाणी पर नियन्त्रण न रहे तथा इसके
साथ ही नेत्रों से छम छम अश्रु बहते हों: तो कहना चाहिए कि आत्मा प्रभु दर्शन के
लिये व्याकुल है तथा दिन रात प्रभु प्रियतम के बिरह में तड़प रही है।''
""पुनः कहते हैं कि प्रेम के समान न योग है, न तप साधन, न ही ज्ञान। अन्य शब्दों में यह कि प्रेम
ही सच्चा योग है, यही सच्चा तप है तथा सच्चा ज्ञान भी प्रेम
ही है। ऐ साधो! प्रेमाभक्ति के बिना सब ज्ञान ध्यान थोथा और खोखला है।
vकरनी बिन कथनी इती, ज्यों ससि बिन रजनी।
बिन साहस जिमि सूरमा, भूषण बिन सजनी।।
बाँझ झुलावे पालना, बालक नहीं माहीं।
वस्तु विहीना जानिये, जहँ करनी नाहीं।।
बहु डिम्भी करनी बिना,कथि कथि करि मूए।
सन्तों कथि करनी करी,हरि के सम हूए।।
अर्थः-बिना करनी के कथनी ऐसी है जैसे बिना चन्द्रमा के रात या साहस के
बिना शूरवीर,नारी
के बिना गहना। आचरण के बिना भाषण करते रहना तो ऐसा है जैसे कोई बाँझ स्त्री पालने
मे कल्पित बालक को झुलाया करती हो। जहाँ करनी ही नहीं वहां अभीष्ट वस्तु कहां से
आयेगी? कितने ही दम्भी अर्थात् केवल दिखावा करने वाले लोग
करनी के बिना आत्म ज्ञान की कोरी चर्चा करते करते प्रयाण कर गये-परन्तु सन्त
सत्पुरुषों का आदेश है कि जो कुछ कहो उसके अनुसार आचरण भी करो। जिन्होने भी ऐसा
किया वे ब्राहृ रुप ही हो गये।
v चरनदास यों कहत हैं, सुनियो संत सुजान |
मुक्ति मूल आधीनता, नरक मूल अभिमान ||
अर्थ
– नम्रता से ही मुक्ति मिलती है| इसलिए मुरीद बनने के लिए नम्रता का गुण आवश्यक
है| अभिमान तो पतन की ओर ले जाने वाला है| अंत: जब तक अहंकार की भावना विद्यामान
है, तब तक मुरीद नही कहला सकता|
v इन्द्रिन के बस मन रहै, मन के बस रहै बुद्ध।
कहो ध्यान कैसे लगै, ऐसा जहां विरुद्ध।।
कहो ध्यान कैसे लगै, ऐसा जहां विरुद्ध।।
अर्थः-इन्द्रियों ने मन को अपने अधीन कर लिया और मन ने बुद्धि को अपने अधीन कर लिया जबकि चाहिये यह था कि बुद्धि मन को अपने अधीन रखती और मन इन्द्रिर्यों को अपने अधीन रखते। सन्त चरणदास जी फरमाते हैं कि जब ऐसी विपरीत स्थिति हो तो फिर सुरति एकाग्र कैसे हो सकती है?
v गुरुसेवा सों विघ्न विनाशे, दुर्मति भाजै
पातक नाशै।
गुरुसेवा चौरासी छूटै, आवागमन का डोरा
टूटै।।
गुरुसेवा यम दंड न लागै, ममता मरै भक्ति
में जागे।
गुरुसेवा सूं प्रेम प्रकाशे, उनमत होये
मिटै जग आशै।।
गुरुसेवा परमातम दरशै, त्रैगुण तजि चौथा
पद परशै।
श्रीशुकदेव बतायो भेदा,चरनदास कर गुरु की सेवा।।
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