(परमसंत
रहीम जी)
v बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय.
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय.
v रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय.
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय.
v रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार.
रहिमन फिरि फिरि पोइए, टूटे मुक्ता हार.
v रहिमन विपदा हूँ भली, जो थोरे दिन होय
हित अनहित या जगत
में, जान परत सब कोय
v रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए
डारि|
जहां काम आवे
सुई, कहा करे तरवारि||
v क्षमा
बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात |
कहा ‘रहीम’ हरी को घट्यो, जो
भृगु मारी लात||
v चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह|
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह ||
v जैसे जाकी बुद्धि है, तैसे कहै बनाय |
ताकौ
बुरो न मानी, ले कहाँ सो जाय ||
कविवर रहीम जी कहते हैं कि जिस मनुष्य की जैसी
बुद्धि है वह उसके अनुरूप ही तो काम करता है| उस मनुष्य का बुरा मत मानिये क्योंकि वह और बुद्धि लेने कहाँ जायेगा |
v मीन काटि जल धोइयै, खाये अधिक प्यास।
रहिमन प्रीति सराहियै, मुएहू मीत की आस।।
अर्थः-मछली
को काटकर जल में धो दिया जाता है फिर उसे पकाकर खाया जाता है। खाने के उदरस्त होने
पर भी जल की प्यास लगती है। यह इस बात का प्रमाण है कि मछली मरकर, कटकर और पककर भी अपने प्रियतम के
मिलन के लिये तड़प रही है। वह अब भी "जल-जल' पुकार रही
है।
मरे
हुये भी उदर में जल चाहत है मीन।।
अर्थात्
मछली मरकर भी पेट में जल माँगती है। प्रिय-मिलन की तीव्र उत्कण्ठा का भला इससे
बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है?
सन्तों का कहना है कि अपने मालिक से प्रेम करना है तो ऐसा ही करो।
यह एक आदर्श उदाहरण है। कि प्रेम तो वही है कि प्रेमी प्रियतम के बिना क्षणमात्र
जीवित न रह सके तथा मरकर भी प्रियतम का ही नाम पुकारता रहे।
v रहिमन ओछे नरन सों, वैर भलो न प्रीत |
काटे
चाटे स्वान के, दोउ भांति विपरीत ||
रहीम कहते हैं कि ओछे लोगों से न प्रीत अच्छी न
दुश्मनी, जैसे कि कुत्ता प्यार में मुहं चाटता है वरना काटता है |
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