(परमसंत सुंदर दास जी)
v सुंदर अंदर पैसि करि, दिल में गोता मार |
तौ दिल ही में पाइये, साईं
सिरजनहार ||
सन्त सुन्दरदास जी फरमाते है कि अपने अंदर अर्थात
घट में ही मालिक को ढूँढो, क्योंकि परमत्मा का घर अपना ह्रदय ही है| जैसे बाहिरी
रूप में ही पूजा के लिए धुप, दीप, नैवेद्य की जरुरत है, वैसे ही आन्तरिक पूजा के
लिए दृढ़ विश्वास और अटूट श्रद्धा की जरुरत है| घट में विराजमान प्रभु की आरती
उतारने के लिए ये दीप, धुप, नैवेद्य हैं|
श्रद्धा भावना का दीप जलाने से ह्रदय का अँधेरा दूर हो जयेगा| विश्वास के नैवेद्य
से विषयों की दुर्गन्धि दूर होगी| फिर रोशनी और सुगंधि में घट ही में मालिक के
दर्शन होंगे| आवश्यकता है नित्यप्रति श्रद्धा और विश्वास के दीप जलाकर पूजा करने
की, क्योंकि----
|| दोहा||
जो जागै तौ पिय लहै, सोयें लहिये नाहिं |
सुन्दर करिये बंदगी, तौ जाग्या दिल माहिं ||
गफलत की निद्रा में सोने और विषय विकारों की मलिनता
से घट में दर्शन नहीं हो सकते| बन्दगी करने के लिए नित्यप्रति नियमानुसार घट
-मंदिर की पूजा के लिए सद्गुरू के प्रेम के दीप जलाए व नित्यप्रति अपने मन पर
ध्यान रखे तब प्रभु का दीदार सम्भव हो जाएगा|
v
सन्त सुन्दरदास जी ने एक प्रेमी से फरमाया कि विषय-विकारों से
बचकर रहोगे तो तुम्हारी आत्मिक उन्नति होगी अन्यथा सुख का मुख भी न देख सकोगे।
किन्तु उस सेवक ने उनके उपदेश पर ध्यान न दिया। तब उन्होंने ये वचन कहेः-
सुन्दर तेरी मति गई, समझत नहीं लगार।
कूकर रथ नीचे चलै, हम खैंचत हैं बाहर।।
सुन्दर तेरी मति गई, समझत नहीं लगार।
कूकर रथ नीचे चलै, हम खैंचत हैं बाहर।।
ऐ
सेवक! तेरी मति कहां गई जो तू हमारा संकेत नहीं समझता। कूकर तो फिर-फिर रथ के नीचे
घुसता है, परन्तु हम उसे बाहर खींचते हैं।
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