(संतों के
पारमार्थिक वचन –I)
v भक्ति सुख का मूल है, भक्ति सुख की खान|
जाके ह्रदय भक्ति बसे, पावे पद निर्वाण||
v यह अवसर दुर्लभ महान, नित पाया नहीं जाय|
जो अबके चेतयो नहीं, पछतावा रह जाए||
v सार वस्तु है जगत में, पावन हरि का नाम|
नाम हरि का सिमरते, पूरण हो सब काम||
v प्रभु नाम अमृत भरा, जो पीवे तृप्ताय|
सुखी बसे संसार में, और परम पद पाये||
v बकरी जो मैं -2 करे, अपना गला कटाये|
मैंना जो मैं ना करे, तो सबके मन को भाये||
v सेवा ऐसी कीजिये, जैसे की श्री हनुमान|
रोम-2 में बस गए, प्यारे प्रभु श्री राम||
v भक्त है मेरे ह्रदय, और मेरा है उनमे निवास|
मुझ बिन वे ना जाने किसी को, मैं रहता सदा उनके पास||
v एक तरफ भगवान है, दूजी माया जान|
संसारी माया चहै, भक्त चहै
भगवान||
v लख चौरासी जून में, मानुष देह परधान|
बिना भजन भगवान के, चली अकारथ जान||
v अब तो जागे ही बने, सोये बने न काज|
सोये सो खोये सदा, सुन आवै मोहि लाज||
v सकल स्वांस सकल सो जानिए सुमिरन में जो जाए
और स्वांस यूही गए कर कर बहुत उपाए
v एक सोच सुख रास है, एक सोच दुःख रास|
एक सोच बंधन कटै, एक सोच गल फास||
v नाम सोच सुख रास है, काम सोच दुःख रास|
नाम सोच बंधन कटे, काम सोच गल फासं||
v आये थे जिस काम को, भूल गई वह बात|
क्या ले मिलिए राम से, जब खाली दोनों हाथ||
v मान बढाई ना करे, बढ़े ना बोले बोल|
हीरा मुख से ना कहे, लाख हमारा मोल||
v कर से कर्म करो विधि नाना|
मन में राखो कृपा निधाना||
v नर तन पाय यतन कर ऐसा, जिससे वह करतार मिले|
ऐसी उत्तम जूनी पदारथ, फिर नहीं बारम्बार मिले||
v रहे सदा मन में मेरे, तव चरणन की आस|
जन्म -2 में हे प्रभो, रहूँ तुम्हारा ‘दास’||
v गुण अवगुण नहीं देखते, न ही जात और पात|
जो आवे चरणार में, बख्शे भक्ति की दात||
v राजपाट धन पायके, क्यों करता अभियान|
पड़ोसी की जो दशा, भई सो अपनी जान||
v सब जग दुःख भरा, सुखिया नहीं संसार|
सुखिया केवल भगतजन, जाके नाम
आधार||
v आग लगी आकाश में, झर -2 करत अंगार|
संत ना होते जगत में, तो जल मरता संसार||
v चार वेद किये व्यास ने, अर्थ विचार विचार|
ता में निकासी भक्ति, राम नाम तत सार||
v प्रेम भक्ति एक लाल है, मिले जो संतन पास|
लाल
सभारों भाव से, चहूँ दिश होए उजास||
v अपनों ने मारा न गैरो ने मारा|
मुझे जब भी मारा, मेरे मन ने मारा||
v तीनो लोको में नहीं, तुम सा कोई दयाल|
जो शरणागत जीव की, पल -2 करते संभाल||
v माया में दुःख है घना, कहते संत सुजान|
जो इसके फंदे पड़ा, गया चौरासी खान||
v स्वाँसो की मिली अनमोल पूंजी, इसकी कदर तू जान ले|
त्रिलोकी से बढ़कर इक स्वास की
कीमत, देख जरा पहचान ले||
v सत्संगति के तीर्थ में, मज्जन करे जो कोय|
तिस सौभागी जीव का, तन मन शीतल होय||
v जो जन बिछुड़े राम से, तिनको जम धरि खाय|
जो सुमिरें नित राम को, तिनके निकट न आय||
v यह अवसर दुर्लभ महा, नित पाया नहीं जाय|
जो अब कि चेत्यो नहीं, पछतावा रह जाय||
v सकल सृष्टी का राजा दुखी, बेमुख राम ते होय|
सो जन सुखी संसार में, राम भक्ति चित्त जोय||
v जनम जाय जो भक्ति में, सो ही सफल कहाहिं|
भक्ति
बिना मानुष जनम, कहो किस लेखे माहिं||
v मौज में जब आ गये|
कतरे से दरिया कर दिया||
v ना खुशी अच्छी है, न मलाल अच्छा है|
जिस हाल में तू रखे, वो हाल अच्छा है||
v फकीरी में मजा जिसको, अमीरी क्या बेचारी है|
मिला आनंद है इस में, हुआ जीवन सुखारी है||
v बहुत बढ़ते है सब रिश्ते, जब पैसे पास होते है|
टूट जाते है गरीबी में, जो रिश्ते ख़ास होते है||
v जन्म जन्म भटकत रह्यो, जेहि अवसर के हेत|
सो अवसर अब पाइयो, हर दम रहो सचेत||
v लख चौरासी भ्रमते भ्रमते, दुर्लभ देह है पाई|
मोह निद्रा से जाग जरा, प्रभु मिलने की बारी आई||
v अकल
कहे सिआना हो, प्रेम कहे दीवना हो ।
अकल कहे कुछ महल पवाईये, प्रेम कहे सब खाक रुलाइये ।।
v प्रेम भक्ति एक लाल है, मिले जो संतन पास|
लाल संभारो भाव से, चहु दिश होय उजास||
v तने उरयानी से बेहतर नहीं दुनिया में लिबास|
यह वोह जामा
है कि जिसका नहीं सीधा उल्टा||
v मीठा बोलन, नीव चलन, पल्लो वी कुछ दे|
रब तिन्हा दी बुक्कली, जंगल क्या ढूंढे||
v अति सुखद पाठ भक्ति का, दीन्हा प्रभु बताय|
आवागमन जासे कटै, जीव परम पद पाय||
v जाति-पाती पूछे नही कोय |
हरी को
भजे सो हरि का होय ||
v जा पल दर्शन साध का, ता पल के बलिहार|
सतनाम
रसना भजे, लीजे जन्म सवार||
v साध मिले दुःख सब गए, मंगल भये सरीर |
वचन सुनत ही मिट गई, जन्म-मरन की पीर ||
v अंध गिरै जो कूप में, ताका दोष न होय |
नेत्रवान जो गिर पड़े, उसकी चर्चा होय ||
v तन सागा न मन सगा, सगा न ये संसार |
परसराम या जीव का, सगा सो सिरजनहार ||
v ऐ खुदा! तैथो एक वार मंगदा, जदों वक़्त मेरा अखीर
होवे |
इस जुबा ते तेरा ही नाम रहे, अखां आगे तेरी
तस्वीर होवे ||
v हीरा परखते जौहरी, शब्द को परखे साध |
जो कोई परखे साध को, ता का मता अगाध ||
v जाको राखे सईंयाँ, मारि सकै न कोय |
बाल न
बांका करि सके, जो जग वैरी होय ||
v जो लिखा तकदीर में, हाथ उतनी आएगी |
लाख सर फोड़ो मगर, किस्मत न फोडी जाएगी ||
v सेवक स्वामी एक मत, जो मति में मति मिल जाय |
चतुराई
रीझै नही, रीझै मन के भाय |
v दुनिया सराय फानी देखी, हर चीज़ यहाँ की आनी जानी
देखी |
आकर न जाय वो बुढ़ापा देखा, जाकर न आये वो
जवानी देखी||
v मोती माया सब तजे, भीनी तजि न जाए |
कवि कोविद ज्ञानी मुनि, भीनी सब को खाय ||
v निंदक दूर न कीजिए, रखिए आदर मान|
बिना परिश्रम भाव से, आन मिले भगवान्||
v यह संसार दुखो का घर है, दुःख का कारण तृष्णा |
तृष्णा तुम छोड़ के देखो, सुख मिलता है कितना
||
v जो बीत गई सो बीत गई, बीती का शिकवा कौन करे |
जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन
करे ||
v जग माहिं ऐसे रहौ, ज्यो जिभ्या मुख माहिं |
घीव घना मच्छन करे, तो भी चिकनी नहीं ||
v प्रेम छुपाये न छूपे, जा घट परगट होय|
जो मुख न बोले नही, नयन देत है रोय ||
v चौबीस हजार खर्च बंदे दा, आमदन मूल न थीवे |
जिस
बंदे नूँ इतना घाटा, ओह बन्दा क्यों जीवे ||
v चाह चिंता का रूप है, चाह सकल दुःख खान |
जब लग
मन में चाह है, मिटै न आवन जान ||
v चाह चूहड़ी चमारनी, चाह नीचन की नीच |
तू तो पूरत ब्रह्म था, जो चाह न होती बीच ||
v जो पल बीते भक्ति में, सोइ सफल कहाहिं|
बिना भक्ति जो जीवन, सो किस लेखे माहिं||
v सकल विपत टरि जात है, सुमिरे से हरि नाम |
ताते श्रद्धा भाव से, सुमिरो आठो याम ||
v सब संतो का मत यही, सब ग्रंथो का सार
चित्त
राखो प्रभु चरण में जो चाहो भवपार
v आस बेगानी त्याग कर, रख दिल में मेरी आस|
जो तू
मेरा हो रहे, सब सुख तेरे पास||
v बिज मन्त्र सर्व को ज्ञान, चहुँ वरणा में जपे कोई
नाम|
जो -2 जपे
तांकी गति होय, साध संग पावे जन कोए||
v फानूस बनके जिसकी हिफाजत हवा करे |
वो शमा
क्या बुझे जिसे रोशन खुदा करे ||
v हजारो साल नर्गिस अपनी बेनूरी पर रोती है |
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
||
v जीवन सोई सराहिये, भक्ति भाव में जाय|
सो जीवन किहि काम का, जा में प्रभु बिसराय ||
v भाव का भूखा हूँ मैं, भाव ही मेरा सार है
भाव से जो मुझको भजता तो उसका बड़ा पार है
v संत ना देखे बोल ना चाल |
वे देखे अंतर का हाल ||
v जब तक बिका न था कोई पूछता न था |
तुमने
खरीद कर मुझे अनमोल कर दिया ||
v दूरी का तो वहम है तुझको, दिल से कोई दूर नही |
पास खड़े है सुनने वाले, देके
जरा आवाज़ तो देख ||
v कल नजारा था लेकिन ये आँखे न थी |
आज नजर मिली तो नजारा गया ||
v मंदिर ढाह दे मस्जिद ढाह दे, ढाह दे जो कुछ ढहता |
पर किसे दी दिल न ढ़ाई, दिल विच दिलबर रहन्दा ||
v काल के हाथ में तीर कमान |
न वह देखे बच्चा, न बुढा, न जवान ||
v नाम रत्न जिन पाया, सो जन भये निहाल|
बंधन
छुटे कर्म का, सुखी भये त्योही काल||
v जब लग हरि सिमरे नही, जो सन्तन के मीत |
वे दिन गिनती में नही, गए वृथा सब बीत ||
v आँखकान मुँह ढांप के, निरंजन लेय |
भीतर के
पट तब खुले, जब बाहर के पट देय||
v
राम कृष्ण से कौन बड़ा, तिन्ह ने भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के हैं धनी, गुरू आगे आधीन।।
v जो है जौके नज़र कामिल तो कर खिदमत फकीरों की |
नही मिलता है यह जौहर बादशाहों के खजाने में
||
v याद करते है जो लोग मुझे, बासिदक और सफा|
उनकी इमदाद और इफजत फर्ज अव्वल है मेरा||
v हर जगह मौजूद है लेकिन नज़र आता नहीं|
योग साधन के बिना उसको कोई पाटा नहीं||
v जो कछु
किया सो तुम किया, मैं कछु किया नाहीं |
कबहूँ कहीं जो मैं किया, तुम ही
थे मन माही ||
v भुक्ति मुक्ति माँगौं नहीं, भक्ति दान दे मोहि |
और कोई याचौं नहीं, निसदिन
याचौं तोहि ||
v नौ निधि अमृत प्रभु का नाम|
देही में तिसका विश्राम||
v जो
तेरे घर खाना खाये, उसका तू मशकूर हो|
क्योंकि वोह खाता है अपना, तेरे दस्तरख्वान
पर||
v जां घर
साध न सेविये, हरि की पूजा नांहि|
ते घर मरघट सारखे, भुत बसें तहिं मांहि||
v जो बात दवा भी कर न सके, वोह बात दुआ से होती है|
जब मुर्शिद कामिल मिलता है, तो बात खुदा से
होती है||
v "संत न छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले
असंत ,
चन्दन विष व्यामत
नही लिपटे रहत भुजंग "
v हाजी लोक मक्के नूं जांदे, असां जाणा तख्त हजारे |
जित वल यार उसे वल काबा, भावें खोल किताबां चारे |
v खुदा कबूल करता है दुआ जो सच्चे दिल से होती है
मुश्किल ये है की ये बड़ी मुश्किल से होती है
v नित
सुनदे हो गुण बन्ह, पल्ले ओगुण नूं बिसराओ |
की फायदा है कथा सुनन दा, जे न
हृदय बसाओ ||
v अटल राज महाराज का ,जा में अटक बहाय |
जाके मन में अटक है , सोई अटक
रह जाय ||
v माया दे धन्धियां विच उलझिया
फिरें, बन्दिया
तूं सांझ सवेरे।
ज़िन्दगी तेरी मुक जाणी, पर कम्म नहीं
मुकने तेरे।
v अपने गुनाहों का लगा लेना हिसाब
रोज़-रोज़।
उन पे रोना रोज़ और, आँसूं बहाना रोज़-रोज़।।
v झुकते वो है जिनमे जान होती है |
अकड़ तो
मुर्दे कि पहचान होती है ||
v बीती को चितवै नहिं, आगे करे न शोक।
वर्तमान में वरत रहे, सत्संगी
निर्दोष।।
vना वो भी कुछ ले गए साथ, जो मुलकों के वाली थे |
सिकंदर जब
गया यहाँ से, दोनों हाथ खली थे
||
v वैरी तेरा
को नहीं, वैरी
तेरा मन ।
इस मन नूं तूं वस करें, ते पावें मुक्ति धन।।
v आप की जिसमें हो
रज़ा वह हाल अच्छा।
आपकी
जिसमें हो खुशी वह ख़्याल अच्छा।।
vजीने से मरना भला, बिसरयो गोबिंद नाम ।
कंचन देह
किस काम की, जा
मुख नाहीं नाम ।।
v सत्तनाम
हिरदे बसा, भया
पाप का नाश ।
अज्ञान
तिमिर सब मिट गया, अन्तर
भया प्रकाश ।।
v कहा भरोसा देह का, बिनस जाय छिन माहिं ।
बिना भजन भगवान के, काल कर्म भरमाहिं ।।
v"बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई
एक पलक के
कारने, ना कलंक लग जाए"
v मिथ्या सब संसार है, साचा हरि का नाम ।
हरि नाम जा घट बसै, पावै सुख बिसराम ।।
v सकल सृष्टि का राजा दुःखी, विमुख राम से होय ।
ते जन सुखी संसार में, राम नाम चित्त होय ।।
v नित ही खुशियाँ मानता, नित सुख उसेक पास ।
और न दिल में चाह कोई, केवल नाम भक्ति की प्यास ।।\
v हरि नाम जपते रहो, रखो न और की आस ।
जेती आस संसार की, सो सब काल की फास ।।
v हर जन तो हारा भला, जीतन दे संसार।
हारा तो हरि सों मिले, जीता जम के द्वार।।
v काम दाम की प्रीत जग, नित नित होत पुरान ।
राम प्रीत नित ही नई, वेद पुरान परमान ।।
vकाम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।
क्या मूर्ख क्या पण्डिता , दोनों एक समान ।।
vतिमिर अज्ञान सब मिट गया, पाया सन्तों का संग ।
मन में उजाला
हो गया, चढ़ा
भक्ति का सच्चा रंग ।।
v चतुर शिरोमणि सोई जग में, जिस नाम से लिव लगाई।
छोड़ के झूठी ममता जग की, प्रीत प्रभु संग लाई ।।
v साचा प्रभु का नाम एक, मिथ्या सब संसार ।
नाम प्रभु का सुमिर ले, भव से हो जाय पार ।।
v मोक्ष मुक्ति तुम चाहते हो, तजो कामना खाम ।
मन से इच्छा मेट कर, भजो निरंजन नाम ।।
v करता तू वह है जो तू चाहता है, परन्तु होता वह है
जो में चाहता हूँ
कर तू वह जो
में चाहता हूँ, फिर होगा वो जो तू चाहेगा ।
v सच्चाई को रखो हमेशा अजीज, सच्चाई बराबर नहीं कोई चीज||
सच्चाई से होती है दिल की सफाई, सच्चाई बुजुर्गो ने है आजमाई||
v चेत जरा और नाम सुमिर ले, समय से लाभ उठा ले तू
भजन भक्ति में दिल लगाकर, जीवन सफल बना ले तू||
v जब तक न धन दिया था, तब तक ग़रीब था
मैं।
सब कुछ तुझे ही
देकर, अब मैं धनी हुआ हूँ।।
v जो कछु किया सो तुम किया, मैं कछु नाहीं|
कबहूँ
कहीं जो मैं किया, तुम ही थे मन माही||
v चाह चिंता का रूप है, चाह सकल दुःख खान|
जब लग मन में चाह है, मिटै न आवन जान||
v खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले|
खुदा तुझसे खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है||
v मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मर्तबा चाहे|
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलजार होता है||
v भवसागर के तरन को, मानुष जन्म है नाव|
बार बार
नहीं पाइये, ऐसा
उत्तम दाव||
मानुष-
जन्म को भवसागर से पार होने के लिए बेडा इसलिए कहा गया है क्योंकि
चौरासी लाख योनियों में मानुष जन्म ही एक ऐसा जन्म है जिसमे जीव संसार सागर से पार
हो सकता है और चौरासी के चक्र से मुक्ति प्राप्त कर सकता है| अन्य किसी भी योनि में यह कार्य नहीं हो सकता||
v अभिमानी चढ़ि कर गिरे, गये वासना माहिं।
चौरासी भरमत भये, कबहीं निकसैं नाहिं।।
अर्थः-रुप, विद्या,
बल, तप कुल आदि के अभिमान में डूबे हुए पुरुष
यदि कहीं ऊँची पदवी भाग्यवश पा भी जायें-तो भी उन्हें भाग्यवान न जानना। वे अभी
वासनाओं के जाल में फँसे पड़े हैं। चौरासी लाख योनियाँ उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं।
वे अभागे जीव नरकों के कुण्डों में अभी डुबकियाँ खाएँगे उन्हें छुड़ाने भी कोई नहीं
जायेगा। दया निधान सन्त यदि उनके कल्याण के लिये जाएँ भी तो भी वे उन्हें "न'
कह देंगे। ऐसा उदण्ड होता है यह अभिमान। यह किसी के घट में पाँव जमा
ले सही फिर जब तक उस जन का सर्वनाश न कर ले उसे कल नहीं पड़ती।
v मतवादी जानै
नहीं , ततवादी की
बात।
सूरज
उगा उल्लुओं, गिनी अंधियारी रात।।
पाण्डवों की सच्चाई तथा भगवान
कृष्ण का तेज और उनकी महिमा-क्या दुर्योधन को अच्छे लगते थे? कदापि नहीं।
v ज़ुबां बेमहल
खोलना ऐब है , अज़ीज़ो बहुत बोलना
ऐब है।।
ज़ुबां अपनी हद में है बेशक ज़ुबां, बढ़े एक नुक़्ता तो
है यह ज़िआं।।
प्रियवर! बिना अवसर बोलना बहुत
बड़ा अवगुण है। हर समय बोलते रहना भी एक प्रकार का अवगुण है। कम बोलने वाली जिह्वा
ही वास्तव में जिह्वा है। एक बिन्दु बढ़ जाने से ज़बां (जिह्वा) शब्द ज़िआं बन जाता
है। जिसका अर्थ हानि है। ज़बां और ज़िआं के शब्द लिखने में उर्दू में केवल एक ही
बिन्दु का अन्तर है। इसलिये मनुष्य को बोलचाल में संयम बर्तना चाहिये।
v भक्ति का रस्ता नहीं तलवार की ये
धार है,
वही इस
पर चल सके जो सिर से खेले पार है।
काम
कमज़ोरों का इस रस्ता पर चलने का नहीं,
कदम
जो धर कर दिखावे पहलवां हुशियार है।।
प्रेमाभक्ति का मार्ग तलवार की
धार पर चल कर तय करना पड़ता है। जो सिर-धड़ की बाज़ी लगाकर चले,वही इस मार्ग पर
पग रख सकता है। जिनके चित्त में संसार के विचार तथा काम, क्रोध, लोभ, मोहादि भरे हुये हैं, वे
दुर्बल चित्त हैं; वे इस मार्ग पर कदापि पग नहीं रख सकते।
v चंचलं चित्तं भवेत् जीवः। स्थिरं
चित्तं भवेत् शिवः।।
अर्थः-जिसका मन चंचल है, वह साधारण जीव है
और जिसका मन स्थिर हो गया है, वह शिव स्वरुप है। ऐसा
परिवर्तन लाने के लिये ही मनुष्य सन्त सत्पुरुषों की शरण-संगति में जाता है।
सत्पुरुषों की शरण-संगति में रहकर भी जिसके मन में मित्र-शत्रु का विचार विद्यमान
रहा, उसने मानो अपना समय व्यर्थ किया। उसने अपने मन पर
सत्संग और नाम का रंग चढ़ने ही नहीं दिया, वरना सत्संग और
शब्दाभ्यास के प्रताप से उसका मन अवश्यमेव निश्चल हो जाता, उसके
अन्दर से मित्र-शत्रु की भावना नष्ट हो जाती और उसे सबमें अपने मालिक का स्वरुप
दिखाई देता।
v कोई तो तन मन दुःखी, कोई चित्त उदास।
एक एक दुःख सबन को, सुखी सन्त का दास।।
अर्थः-इस संसार में कोई तन से दुःखी है, तो कोई मन से दुःखी है तथा कोई
अन्य अपने चित्त में सांसारिक चिन्ताओं को बसाकर दुःखी हो रहा है। तात्पर्य यह कि
प्रत्येक व्यक्ति को एक न एक दुःख एक न एक रोग चिमटा हुआ है। परन्तु जो सन्तों
महापुरुषों का सच्चा दास अथवा सेवक है, वही वास्तविक अर्थों
में सुखी है। इसलिये कि वह महापुरुषों की आज्ञा एवं मौज अनुसार आचरण करता हुआ अपने
जीवन को भक्ति के साँचे में ढालता है।
v वासर सुख नहीं रैन सुख, ना सुख धूप न
छाँह।
कै
सुख सरने राम के, कै सुख सन्तों माँह।।
अर्थः-ऐ मनुष्य! हरि की शरण में
अथवा सन्त सत्पुरुषों की संगति में ही सच्चे सुख की आशा की जा सकती है नहीं तो जीव
के मन में दिन हो या रात, धूप हो या छाया किसी दशा में भी पूर्ण शान्ति
नहीं आ सकती। जीवन काल में इस उपरिलिखित दोनों की प्राप्ति का सफल प्रयत्न करना ही
मनुष्य का "अपना काम' है। अन्यथा इस प्रपंच का तो यह
स्वरुप भर्तृहरि-निति शतक में वर्णन करते हैः-
v प्रेम
हरि को रुप है, त्यौं
हरि प्रेमस्वरुप |
एक होई है यों लसै, ज्यों
सूरज औ धूप ||
प्रेम को हरि अर्थात परम तत्व के
समान बताते हुए रसखान ने प्रेम एवं परम् को एक दूजे का रूप कहा है। प्रेम और परम
ऐसे सम्बद्ध हैं जैसे सूरज एवं धूप।
v जब एक हुआ तब दस होते, दस हुए तो सौ की
इच्छा है।
सौ पाकर भी तो चैन नहीं, अब सहरुा होयें
तो अच्छा है।।
बस इसी तरह बढ़ते-बढ़ते राजा के पद
पर पहुँचा है।
इतने पर भी सन्तोष नहीं, ऐसी यह डायन
तृष्णा है।।
जब तक यह मन में तृष्णा है, तब तक सुप्रकाश
नहीं होता।
आयु सब नष्ट हो जाती है, तृष्णा का नाश
नहीं होता।।
अर्थः-जिसके पास एक है, वह दस चाहता है।
तथा जिसे दस प्राप्त हैं, वह सौ को पाने की इच्छा करता है।
जब सौ मिल जाते हैं, तब भी मन को चैन नहीं पड़ता। तब कहता है
कि मेरे पास हज़ार हों तो अच्छा रहे। इसी प्रकार तृष्णा क्षण क्षण बढ़ती जाती है।
तृष्णा के बढ़ते बढ़ते मन की अवस्था यह हो जाती है कि यदि मनुष्य को तीनों लोक के
राजा का पद भी प्राप्त हो जाये; तब भी मन में शान्ति का उदय
नहीं होता। यह तृष्णा ऐसी डायन है कि तृप्त होने में आती ही नहीं। जब तक मन में
संसारी भोगों की तृष्णा का निवास है; तब तक भक्ति और सच्चाई
का प्रकाश मन में हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार तृष्णा के पंजे में फँसे रहकर
मनुष्य की पूरी आयु नष्ट हो जाती है, किन्तु तृष्णा का नाश
फिर भी नहीं होता। यह पूर्ववत् प्रबल बनी रहती है तथा मनुष्य को सर्वदा निन्नानवें
के फेर में फिराती रहती है।
v तू दरौ-गुम शौ विसाल र्इं
अस्तोबस।
तू मबाश असला कमाल र्इं अस्तोबस।।
ऐ जिज्ञासु! तू अपने मालिक के
ध्यान में पूर्णतः लीन हो जा, क्योंकि इसी का नाम ही योग है। और तू स्वयं को
मिटा दे, भक्ति-मार्ग में बस यही पूर्णता है।
vदया कौन पै कीजिए, का पै निर्दय
होय।
सार्इं
के सब जीव हैं, कीरी कुञ्जर दोय।।
अर्थः-ऐ मुमुक्षु पुरुष! तू किस विचार
में पड़ा है कि मैं किस जीव को मारुँ और किस पर दया कर दूँ। धिक्कार है तेरी ऐसी
समझ को। सभी जीव कीड़ी से लेकर हाथी तक में वही तेरा आत्मा ही ओत-प्रोत है। तू अपने
से भिन्न किसको देखना चाहता है? सब में तू ही स्थित है। तू योग पथ पर
चला है। तेरी दृष्टि में कण कण के अन्दर वही तेरा मालिक ही मुस्करा रहा है ऐसा
विश्वास रखना चाहिये। जन्म मरण के भीषण दुःखों से पहले ही प्राणी आकुल व्याकुल
हैं। दुःखियों को तू और क्यों पीड़ा पहुँचाना चाहता है?
v तू दरो
गुम शौ विसाल र्इं अस्तो-बस।
तू
मबाश असला कमाल र्इं अस्तो-बस।।
अर्थः-""ऐ जीव! तू
स्वयं को मालिक के स्वरुप में गुम करदे, यही मालिक से
मिलन है। तू मध्य में कदापि न रह केवल मालिक ही रह जाये, तभी
तू पूर्णता को प्राप्त होगा।"" इसलिये सेवक को उचित है कि सन्त सद्गुरु
के चरण कमलों में पूर्ण आत्म-समपर्ण करके केवल उन्हीं की कृपा का सहारा ले। ऐसा
करने से उसके मार्ग की समस्त बाधायें दूर हो जायेंगी और वह हर प्रकार से सुखी जीवन
व्यतीत करता हुआ परमशान्ति और शाश्वत आनन्द की प्राप्ति कर लेगा।
v एक दिल लाखो तमन्ना उस पै ओर ज्यादा हवस|
फिर
ठिकाना है कहाँ उसके ठिकाने के लिए||
अर्थ – जब एक मन में अनेको कामानाएँ निरंतर भरी
रहती है तो वह सर्वशक्तिमान ईश्वर कहाँ रहेगा| उसके रहने के लिए ह्रदय में स्थान
नहीं है| कोई भी व्यक्ति वहाँ न रहना चाहेगा, जहाँ कूड़े करकट के ढ़ेर हो| तब हम
ईश्वर से कैसे आशा रख सकते है कि वह हमारी बुराइयों और काम वासनाओं से भरे मन में आकर रहे|
v जिन्हों को इश्के सादिक है वो कब फ़रियाद करते हैं |
लबो पर
मुहरे-ख़ामोशी दिलो में याद करते हैं ||
अर्थात जिनके मन में सच्ची प्रेम भावना होती है वे
फ़रियाद नही करते, अपितु मौन रहकर मन ही मन अपने इष्टदेव प्रियतम का सिमरन करते
रहते हैं|
v जहाँ प्रेम वहां नेम नही, तहाँ न बुद्धि व्यवहार |
प्रेम मग्न जब मन भया, कौन गिने तिथि वार ||
प्रेम भक्ति का मार्ग ऐसा मार्ग है जहाँ नेम आदि
अपने आप से छूट जाते हैं| जैसे फल के लगने से फूल अपने आप गिर जाते हैं और फिर
वहां बुद्धि का व्यवहार भी काम नही देता अर्थात अकल की दौड़ धूप भी समाप्त हो जाती
है| जिस समय मन प्रेम में मग्न हो जाता है तब तिथि वार कौन पूछता है |
v जेहि घट प्रेम न सँचरै, सो घट जानि मसान।।
जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।।
अर्थः-जिस मनुष्य के ह्मदय में प्रेम की लगन नहीं है, उसका ह्मदय श्मशान के सदृश सूना है
और वह स्वयं जीते जी मृतक समान है। जिस प्रकार लोहार की धोंकनी निर्जीव खाल होने
पर भी साँस लेती है। वैसे ही प्रेम से हीन मनुष्य भी देखने में निस्सन्देह साँस
लेता, चलता फिरता और काम काज करता दिखायी देता है; किन्तु यथार्थतः वह मृतक ही है।
v क्या
क्या न बादशाहों का नामो-निशाँ मिटा।
हर एक
अपने वक्त का नौशीरवाँ मिटा।।
मौसम
गया बहार का, रंगं-खिज़ाँ मिटा।
जो फूल
इस चमन में खिला बेगुमाँ मिटा।।
दरपेश
सब के वासते मंज़िल अजीब है।
ग़ाफ़िल
ब होश बाश, अजल अनकरीब है।।
अर्थः-कैसे कैसे महान चक्रवर्ती
सम्राटों का नाम निशान जगत से मिट गया। अपने समय का प्रत्येक नौशीरवां और
विक्रमादित्य जैसा पराक्रमी होकर भी अन्ततः नष्ट हो गया। बसन्तऋतु की बहार कुछ
दिनों तक अपनी ध्वजा फहराती रही, फिर वह भी मिट गयी और उसका
स्थान पतझड़ ने ले लिया। पतझड़ का रंग भी चार दिन से अधिक न टिक सका। इस परिवर्तनशील
संसार में किसी को भी स्थायित्व प्राप्त नहीं है। जगत के उपवन में जो भी पुष्प
खिला, वह निस्सन्देह एक दिन विनाश की भेंट चढ़ गया।
क्योंकि प्रकृति के अटल नियमानुसार सब के लिये एक विचित्र गन्तव्य स्थान की ओर
जाना निश्चित है। इसलिये ऐ ग़ाफ़िल मनुष्य! सचेत हो कि मृत्यु सिर पर खड़ी है तथा वह
क्षण क्षण तुझसे निकटतर होती जा रही है। क्या खबर कब आकर तुझे दबोच लेगी।
v हेच नकुशद नफ़स रा जुज़ ज़ुल्ले-पीर।
दामने आँ नफ़स कुश रा सख़्तगीर।|
पूर्ण सन्त सद्गुरु के बिना कोई भी नफ़स अर्थात् मन को वश में
नहीं कर सकता। इसलिये ऐ जिज्ञासु! तू पूर्ण सन्त सद्गुरु का पल्ला दृढ़ता के साथ
पकड़ ले। अर्थात सन्त सद्गुरु के वचनों की दृढ़ता से पालना कर और कमाई कर।
v गंगा पापं शशी तापं दैन्यं
कल्पतरुस्तथा ।
पापं तापं च
दैन्यं च घ्नन्ति सन्तो महाशयाः ॥
गंगा पापों को दूर
करती है, चन्द्रमा ताप को दूर करता है। कल्पवृक्ष दीनता
को दूर करता है। वहीं सन्तजन इन तीनों को, यानी पाप, ताप और दीनता को दूर कर देते हैं।
v तुम तो समरथ साँइयां, दृढ़ करि पकरो
बाहिं।।
धुर ही लै पहुँचाइयो , जनि छाँड़ो मग
माहिं।।
""आप परम शक्तिमान हैं मेरे प्राणेश्वर! मेरी भुजा को बड़ा दृढ़ता से थाम
लीजिए-और मुझे परमपद तक पहुँचा दें, मार्ग में न छोड़
देना-अपने आप अकेले बिना आपका सहारा लिये भवसागर से निकल जाना मेरी शक्ति से बाहर
है।''
v हंसा पय को काढ़ि लै, छीर नीर निरवार।
ऐसे गहै जो सार को, सो जन उतरै पार।।
छीर रुप सतनाम है, नीर रुप व्यवहार।
हंस रुप कोई साध है, तत का छाननहार।।
हंस की चोंच में यह शक्ति होती है कि दूध और पानी को पृथक्-पृथक् कर देती
है और हंस दूध का सेवन करके पानी को छोड़ देता है अर्थात् सार वस्तु को ग्रहण करके
असार वस्तु का त्याग कर देता है। इसी प्रकार विचारवान गुरुमुख सत्संगी पुरुष भी इस
मिले-जुले संसार में से सार वस्तु को ग्रहण करके असार वस्तु को त्याग देता है, परिणामस्वरुप वह सुगमता से इस
भवसागर को पार कर लेता है। परमसन्त श्री कबीर साहिब जी फरमाते हैं कि वह सार वस्तु
अथवा दूध मालिक का नाम है और असार वस्तु अथवा नीर माया-काया का व्यवहार है। सन्त
सद्गरु के प्यारे गुरुमुखजन संसार में रहते हुये भी हंस के समान सार वस्तु मालिक
की भजन भक्ति को ही ग्रहण करते हैं।
v कामी तरे क्रोधी तरे, लोभी तरे अनन्त |
अभिमानी
मोही तरे, जा का आदि न अंत ||
o काम- ‘काम
नाम कामना यानि ख्वाहिश का है, कामना करो मालिक की भक्ति की, जो संसार में सार
वस्तु है| इसके सिवाय और कोई इच्छा दिल में न लाओ|
चिंता तो सत नाम की, और न चितवे दास |
जो कुछ चितवे नाम बिन, सोई काल की फास ||
o क्रोध-
‘क्रोध नाम गुस्से का है| गुस्सा करो अपने मन पर, जो तुमको भक्ति की तरफ
नही लगने देता और हर समय रुकावट डालता है, इसको अपनी क्रोध की अग्नि से भस्म करो|
o लोभ- ‘लोभ
नाम लालच का है| लालच करो गुरु की सेवा की| जिससे तुम्हारे मन की मैंल दूर हो और
किसी की लालच मत करो|
भक्ति दान मोहे दीजिये, गुरु देवन के देव|
और कछु नही चाहिए
,निसदिन तुम्हरी सेव ||
v मोह- ‘मोह
नाम प्यार का है| यदि तुम प्यार पैदा करना चाहते हो तो अपने गुरुदेव के साथ करो,
जो तुम्हारा असली सहायक है| दुनिया के लोगों का प्यार तुम्हें अंत में तकलीफ
देगा|’
कबीर तासो प्रीत कर,जाको ठाकुर राम |
पंडित राजे भूपति, आवे कौनै काम ||
v अहंकार
-‘अहंकार नाम अभिमान का है| अभिमान करो अपने स्वामी का, अपने मालिक का
जिनकी सेवा का तुमको गर्व हासिल है|
जैसे कहा भी है-
अस अभिमान जाय जनि बोरे |
मैं सेवक रघुपति पति मोरे ||
v मिटते सूँ मत प्रीति करि, रहते सूँ करि नेह |
झूठे कूँ तजि दीजिये, साचे में करी गेह ||
फरमाते हैं कि जो असत् वस्तु है, जो मिट जाने वाली
वस्तु है, उससे प्रीती मत कर, उसे दिल से त्याग दे| प्रीती सत् वस्तु से कर, सदा
रहने वाली वस्तु से कर, उसे ही दिल में बसा |
vया दुनियां में आइके, छाँड़ि देइ तू
ऐंठ।
लेना होइ
सो लेइ ले, उठी जात हैं पैंठ।।
सन्तों के वचन हैं कि ""इस संसार में आकर ऐ मनुष्य!
तू मिथ्या अभिमान को छोड़ दे। जो कुछ तुझे लेना हो उसे ले ले। जगत् की हाट तो बन्द
हो रही है।''
v घुँघची भर जे बोइयै, उपजै पंसेरी आठ।
डेरा परिया काल का, निशिदन रोकै बाट।।
अर्थः-खाहिश का बीज ऐसा है कि यदि मुट्ठी भर बोया जाये, तो मन भर उगता
है। ज़रा सी खाहिश बढ़कर और फैलकर इतना दीर्घ सूत्रपात करती हैं कि फिर उनके फैलाये
जाल को तोड़ सकना असम्भव सा हो जाता है। और यह तो मानी हुई बात है ही कि जिस
मन में वासनाओं का तूफान होगा वहाँ काल का डेरा भी अवश्य जमा रहेगा और वह रात-दिन
तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति मार्ग में रुकावट डालता रहेगा।
v मन भरि के जे बोईयै, घुँघची भर नहीं
होय।
कहा हमार मानियो नहीं, जन्म जायेगो
खोय।।
अर्थः-इन मानसिक विकारों को जिस कदर भी तरक्की दी जाये, इनसे कुछ भी
हासिल नहीं होता। अगर ये बढ़ते-बढ़ते मन भर की मात्रा में भी हो जायें तो भी ये जीव
को मुट्ठी भर लाभ तक नहीं पहुँचा सकते। ये जिस कदर ज़्यादा बढ़ेंगे उसी कदर ही इनसे
रुहानी नुकसान की उम्मींद है। इसीलिये सन्त जन फरमाते हैं कि ऐ जीव! अगर हमारे
सत्उपदेश से लापरवाही करके इन्हीं मानसिक विकारों के फेर में ही पड़े रह गये तो फिर
यह कीमती इनसानी जन्म यों ही खोया जायेगा। इसलिये जहाँ तक हो सके जीव को इन मानसिक
विकारों से और बुराईयों से किनारा करके सत्पुरुषों की राहनुमाई में चलकर नाम और
भक्ति की सच्ची कमाई करके ऊँचे दर्ज़े को प्राप्त करना चाहिये।
v यह मन भूत समान है, दौड़े दाँत पसार I
बाँस गाड़ि उतरै चढै, सब बल जावै हार||
यह मन भूत के समान है| जब इसे खाली छोड़ दो तो यह
खाने को दौड़ता हैं| सन्त महापुरूष फरमाते है कि जब इसका कोई काम न हो तो इसे बांस
पर उतरने -चढ़ने के काम पर लगा दो तो उसकी शक्ति समाप्त हो जायगी| अंत: हर समय
सद्गुरू के शब्द में मन को लगाये रखना चाहिए ताकि लक्ष्य को प्राप्त कर सके| यह
बांस अजपा- जाप का संकेत है| श्री सद्गुरू महाराज जी इसकी युक्ति बतलाते है उनकी
आज्ञा में, उनके श्री वचनानुसार चलने से ही इस बलवान मन को वश में किया जा सकता
हैं|
v निद्रा भोजन भोग भय, ये पशु पुरुष समान |
नरं ज्ञान निज अधिकता, ज्ञान बिना
पशु जान ||
अर्थात नींद करना, खाना-पीना, विषय-भोग ये सब पशु
और पुरुष में एक समान है| केवल ज्ञान पूर्वक जीवन व्यतीत करना ही मनुष्य की
विशेषता है| यदि वह विवेक से काम न ले तो उसमे और पशु में कोई भेद नही |
v दिल है तेरा एक इसमें ऐ हज़ी |
उल्फ़तें दो दो समा सकती नहीं ||
माया और भक्ति दोनों इकट्ठी नहीं रह सकती|
v मन गोरख मन गोबिंदा, मन ही औघड़ सोय।
जो
मन राखै जतन करि, आपै करता होय।।
मन
मोटा मन पातला, मन पानी मन लाय।
मन
के जैसी ऊपजै तैसी ही ह्वै जाय।।
मन
के बहुतक रंग हैं, छिन छिन बदले सोय।
एक
रंग में जो रहै, ऐसा विरला कोय।।
अर्थः-""यह मन बड़ा कुशल
अभिनेता है। यह गोरखनाथ भी बन सकता है और गोबिन्द भी। यही अवधूत भी बन जाता है और
जो कोई मन को जतन से रखना सीख ले, तो वह मालिक से भी मिला देता है। यही मन
स्थूल भी है और सूक्ष्म भी। यह आग भी है और पानी भी। मन में जैसी जैसी तरंगें पैदा
होती हैं, वैसा ही रुप बन जाता है। यह मन क्षण क्षण में रंग
बदलता रहता और इसके अनेक रुप हैं। परन्तु कोई विरला गुरु का सेवक ही गुरु के ध्यान
में मन को लीन करके एक रस रह सकता है।''
v मन रिपु जीता, सब रिपु जीते |
मन रिपु जीता, सब रिपु जीते ||
इन पंक्तियों के पढने में तो कोई अंतर दिखाई नहीं
देता, परन्तु इनके अर्थ में बहुत अंतर है अर्थात इसका अर्थ यह है कि जिसने मन रुपी
शत्रु को जीत लिया उसने अपने सब शत्रुओं को जीत लिया | यदि किसी का मन रुपी शत्रु
जीवित है तो उसके सब सह्त्रू जीवित हैं | इस मन रुपी शत्रु को नियंत्रण में रखने
के लिए अपने शरीर को, अपने ख्यालों को सद्गुरु कि सेवा, भजनाभ्यास व सत्संग में
लगाना चाहिए |
v मुश्किलें नेस्त कि आसां न शवद |
मर्द
बायद कि हिरसा न शव्द ||
अर्थ- ‘ऐसी तो कोई कठिनाई नहीं है जिसे सरल न बनाया
जा सके|इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वीर पुरुष बने और कठिनायों से कभी न डरे |’
v सब कोई वणजे खार खल, हीरा कोई न लेय ।
हीरा
लेवे जौहरी, जो
मांगै सो देय
।।
सारा संसार खार खल अर्थात् तुच्छ पदार्थों का खरीददार है। जिस मनुष्य ने
मानव-तन के बदले तुच्छ पदार्थ विषय-विकारों को खरीदकर यूँ ही गँवा दिया तो क्या
लाभ हुआ? हीरा
रूपी भक्ति कोई विरले ही खरीदते हैं जिन्हें इसकी समझ आ जाती है। वे अनमोल भक्ति
रूपी हीरे के बदले नश्वर पदार्थ तो क्या, शरीर न्यौछावर करने
से नहीं घबराते। क्योंकि शरीर तो नश्वर है, नश्वर चीज़ के
बदले सच्ची चीज़ प्राप्त कर ली।
v साथ
जायेगा तेरे बस प्रभु का
नाम ही।
जिस दुनिया को तू समझा
है अपना,
दर हकीकत है नफ़ी ।।
मालिक की भक्ति और सच्चे नाम की कमाई सत्पुरुषों की संगति से प्राप्त होती
है। कोई चाहे कि मालिक के नाम को और दुनिया के सामान------दोनों को इकट्ठा कर
लूँ-----यह दोनों चीज़ें इकट्ठी नहीं रह सकतीं।
v बस नाम वर बज़ेरे ज़मीं दफ़न करदा अन्द ।
कज़ हस्ती अश बरूये ज़मीं यक निशां नमाँद ।।
ज़िन्दां अस्त नामे फरोख नौशेरवाँ बा अदल ।
अगरचे बसे गुज़श्त नौशेरवाँ
ना माँद ।।
बड़े-बड़े राजा
महाराजा गुज़र गये, उनका
दुनिया में कोई नामोनिशान भी नहीं है। परन्तु हज़ारों वर्ष गुज़र गये, एक नौशेरवां बादशाह का नाम ज़िन्दा है, विक्रमादित्य
का नाम अमर है, किस कारण से दोनों का नाम अमर है? उन्होंने परोपकार के अनेकानेक कार्य किये, भक्ति की
कमाई की, सच्चे नाम को दिल में बसाया जोकि नित्य, सत् और अमर है। इन्सान जिसका ध्यान करता है, जिसे
दिल में स्थान देता है वही रूप बन जाता है, उसे वही पदवी मिल
जाती है।
v हिम्मत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता |
वो कौन
सा उकदा है जो वो हो नहीं सकता ||
अर्थ- ‘यदि मनुष्य साहस से काम ले तो ऐसा कौन सा
कार्य है जो नहीं हो सकता? ऐसे कौन सी कठिन समस्या है जिसका समाधान न हो सके? भाव
यह है कि प्रत्येक कठिनाई अथवा समस्या का कोई न कोई समाधान अवश्य है, केवल उस
समाधान को साहसपूर्वक खोज निकालने की आवश्यकता है|
vगुज़श्ता ख़्वाब व आयंदा ख़्याल
अस्त।
ग़नीमत दां हम र्इं दम के हाल अस्त।।
अर्थः-बीता हुआ समय स्वप्न और आने
वाला विचार के समान है। लाभदायक और उत्तम समय तो वही है जो आज हमारे पास है।
इसीलिये इन वचनों में यह फरमाया गया है कि भूत और भविष्य के व्यर्थ बोझ में न दब
कर वर्तमान समय की कद्र करो और इसी में ही अपना काम संवार लो। इसी एक वचन पर आचरण
करने से करोड़ों जीव दुःख और चिंताओं के बोझ से मुक्त होकर सुखी बन जाते हैं।
v संसारी का टुकड़ा नौ नौ उंगल दांत |
भजन करे तो उभरे नहीं फाड़ उखाड़े आंत ||
साधु
गृहस्थी के अन्न को ग्रहण तो करता है , परन्तु बिना भजनाभ्यास और परोपकार के वही
अन्न उसका पतन कर देता है | गृहस्थी तो उसे साधु जान कर सेवा करता है , परन्तु उसे
भी साधु बनना चाहिये | यदि वे साधु नहीं बन पाया और केवल भगवे वस्त्रों को ही साधु
मान बैठा है तो वे नरकगामी होगा | पूजा के योग्य न होकर पूजा करवाना साधु का धर्म
नहीं |
v हरचे बर खुद न पसन्दी, ब दिगरां म पसन्द,
जैसा
व्यवहार तुम अपने साथ चाहते हो वैसा दुसरों से करो |
v करो इख़लास सबसे एक जैसा, माहेताबां ने यह
नुस्खा पढ़ाया
इख़लास का अर्थ है व्यवहार और माहेताबां का अर्थ है चांदनी। जैसे
चांदनी हर स्थान पर और हर वस्तु पर एक सी रोशनी व ठंडक बरसाती है वैसे ही मनुष्य
को हर किसी से हमदर्दी और प्रेम का व्यवहार करना चाहिये। जैसे चांद रोशनी देता है
वैसे ही परमार्थी का जीवन लोगों के लिये आत्मिक रोशनी देने वाला एवं पथ प्रदर्शक
सिद्ध हो। ऐ जिज्ञासु! तुझे भी यदि जीवन के लक्ष्य को पाने की अभिलाषा है तो सबके
साथ समान भाव और निःस्वार्थ भाव से प्रेम भरा व्यवहार कर तभी तू अपने लक्ष्य को पा
सकेगा। कितना परमार्थ अर्थात् रुहानी राज़ भरा हुआ है सत्पुरुषों के एक एक वचन में।
vभले से भला करे, यह जग का
व्यवहार।
बुरे
से भला करे, ते विरले संसार।।
प्रायः संसार में यही देखने में
आता है कि जो भलाई करे लोग उसके साथ ही भलाई करते हैं, परन्तु उदारता तो
इसी में है कि मनुष्य बुराई के बदले भलाई करे जैसे कि वृक्ष पत्थर मारने वाले को
भी फल और छाया देता है। अतएव ऐ जिज्ञासु! तू भी ऐसा करना सीख और बुराई के बदले
भलाई कर।
v तराज़ू से अदल का हुनर पायाः-
अदल का अर्थ है न्याय अर्थात् उचित और अनुचित का विवेक। तराज़ू
सबको न्याय सिखाता है। ज़रा सी वस्तु घट-बढ़ जाने पर फौरन ही पलड़ा नीचे-ऊपर हो जाता
है। दूसरे की आत्मा को अपनी आत्मा के सदृश जान कर ऐसा कोई कार्य मत करो जिससे
दूसरों की आत्मा को दुःख हो। अपनी आत्मा में तनिक सी मलिनता आने पर उसका प्रभाव
दूसरों की आत्मा पर पड़ता है। भाव यह कि दूसरों के लिये वह मत सोचो जो तुम्हें
स्वयं के लिये अच्छा नही लगता। दूसरों को अपने से हीन समझना अपनी ही हीनता है।
v जो जन जाकी सरन है, ताकी तिस को लाज।
उलटि धार मछरी चलै, बहै जातु गजराज।।
अर्थः-गजराज बड़े डील-डौल का तथा बलवान प्राणी है, किन्तु नदी की तीव्र धारा के
सम्मुख नहीं ठहर सकता। धारा के बहाव में वह बहा चला जाता है। कारण इसका सन्तों ने
यह बतलाया है कि वह जल का शरणागत नहीं है अर्थात् उसका मन जल से मिला हुआ नहीं है।
इसलिये उसे जल बहा ले जाता है। जबकि मछली जो जल की शरणागत है और जिसका मन जल से
मिला हुआ है, छोटी और निर्बल होती हुई भी नदी की तीव्र धारा
के विपरीत दिशा में सरलतापूर्वक तैरती चली जाती है। जल की तीव्र धारा का बहाव भी
उसे मार्ग दे देता है और वह उसे चीरती हुई निकल जाती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो
कोई जिसकी शरण शुद्ध मन से ग्रहण कर लेता है; शरण्य को उसकी
लाज रखनी होती है।
v यथा खरश्चन्दन भार वाही, भारस्य वेत्ता न तु
चन्दनस्य|
चन्दन का भर धोने वाला गधा केवल चन्दन के भर को ही
जनता है, उसके गुणों से अनभिज्ञ ही रहता है
v तद् हरेव विरजते यद हरेव प्रवजते|
अर्थात्- “जिस दिन वैराग्य हो उसी दिन सन्यासी हो
जाए फिर न जाने क्या विघ्न पड़ जाए?”
v संत विटप सरिता गिरी धरनी , पर हित हेतु सबन की करनी
|
अर्थात –“ संत , वृक्ष , नदी , पर्वत , और धरती –ये
सब परोपकार के लिए ही प्रकट होते हैं|
v जे राज दें तो क्या वडयाई, जे भीख मँगायें तां क्या
घट जाई|
अर्थात्
हे मेरे मालिक तू अगर मुझे तकलीफ देगा तो भी मैं तुझसे प्रेम करूँगा और यदि तू मुझ
पैर रहम करगा तो भी तुझसे प्रेम करूंगा|
v ध्यान लगावहु त्रिपुटी द्वार, गहि सुषमना
बिहँगम सार।
पैठि पाताल में पश्चिम द्वार, चढ़ि सुमेरु भव उतरहु पार।।
हफ़त कमल नीके हम बूझा, अठयें बिना एको नहिं दूजा।
"शाह फकीरा' यह सब धंद, सुरति लगाउ जहाँ वह चंद।।
अर्थः-ऐ जीव! त्रिकुटी के द्वार में अपना ध्यान लगा। सुषमना नाड़ी को पकड़कर
बिहंगम चाल की सार गहनी को धारण करके। पश्चिम के द्वार से पाताल में प्रवेश कर जाओ
और सुमेरु-पर्वत पर चढ़कर भवसागर के पार कर लो। हमने सात कमलों को भली-भान्ति समझ
लिया है। उन सातों से आगे कोई आठवाँ नहीं है। शाह फकीर साहिब का कथन है कि संसार
के धन्धे सब मिथ्या हैं। अपनी सुरति को वहाँ लगाओ, जहाँ चन्द्रमा का
प्रकाश तथा उजाला है। यह सब अन्तरीव अभ्यास का इशारा है। मनुष्य के शरीर के अंदर
ईड़ा-पिंगला और सुषमना तीन बड़ी नाड़ियाँ, जो नाभि देश से उठकर
दिमाग की तरफ या पिण्डदेश से ब्राहृाण्ड देश को जाती है। इनमें से मुख्य सुषमना
नाड़ी है, जो बीच की है। इसी के द्वारा प्राण को ऊपर चढ़ाकर
त्रिकुटी में मालिक की ज्योति का ध्यान किया जाता है। जब सुरति शरीर को छोड़कर ऊपर
चढ़ने लगती है, तो सात कमलों के सात स्थान है, जो उसके मार्ग में आते हैं सुरति इनको पार करती हुई और ऊपर चढ़ती हुई उस
उच्चतम स्थान पर जा पुहँचती है, जिसे सुमेरु पर्वत की चोटी
का नाम दिया गया है और जहाँ प्रकाश ही प्रकाश सब ओर फैला हुआ है। इसका भेद पूर्ण
गुरु से प्राप्त होता है। सतगुरु की दया से ही ये मन्ज़िले तय हो सकती हैं। जिससे
अन्तरीव शान्ति प्राप्त होती है।
vबन्दा जानै मैं करौं, करणहार करतार।
तेरा किया न होयगा, होवै होवनहार।।
होवै होवनहार, भार नर यों ही ढोवै।
अपजस करै अपार, नाम नारायण खोवै।।
कहै दीन दरवेश, परै क्यों भरम कै फन्दा।
करणहार करतार, करैगा क्या तूँ बन्दा।।
अर्थः-मनुष्य समझता है कि जो कुछ कर रहा हूँ, बस मैं ही कर रहा
हूँ; जबकि वास्तविकता यह है कि सब कुछ करने और कराने वाला
मालिक ही है। ऐ मनुष्य! तेरे करने धरने से कुछ भी होने वाला नहीं। होगा तो वही,
जो होनहार है। अर्थात् जो मालिक की मौज है तथा जैसा मालिक चाहेगा,
वैसा और वही कुछ होगा। सो जब होना वही कुछ है, जो मालिक ने पहले से ही रचा रखा है; तो फिर यही कहा
जायेगा कि मनुष्य अंह अभिमान के वशीभूत होकर व्यर्थ ही मैं मेरी का बोझा अपने सिर
पर ढोता है तथा इस अभिमान में मालिक के नाम को भुलाकर बहुत बड़ी हानि उठा रहा है।
सन्त दीन दरवेश साहिब का कथन है कि ऐ बन्दे! तू भ्रम के फन्दे में क्यों फँस रहा
है। सब कुछ करने करानेहार तो वह मालिक ही है। तू किस गणना में है कि कुछ करके
दिखला सकेगा।(इस शब्द में मालिक की मौज को शिरोधार्य करने का उपदेश है। जिसे भक्ति
कहते हैं। वह यथार्थतः मालिक की मौज में राज़ी रहने तथा सिर झुका देने का ही नाम
है।
v मानुष मानुष अन्तरा| कोई हीरा कोई कंकरा |
अर्थात मनुष्य और मनुष्य में बड़ा अंतर है| एक
प्रकार के वे मनुष्य हैं, जिनकी कीमत संतो ने हीरे मोतियों के बराबर कही है| तथा
एक वे भी मनुष्य हैं, जिनका दर्जा संतो ने कंकर के समान रख छोड़ा है| कारण क्या है?
कि पहले प्रकार के मनुष्य के ख्याल कुछ और तरह के है| एक के ख्यालों का रुख नेकी
और सच्चाई की तरफ है| उसका दिल मालिक की याद और भजन बंदगी की तरफ लगा हुआ है|
लेकिन दूसरे इंसान के ख्याल बुरे, पाप, और माया की तरफ झुकाव रखते है| एक के दिल
में मालिक बस गया है और दूसरे के दिल में माया या दुनिया बस चुकी है| इसी अंतर को देखते
हुए ही संतो ने एक की कीमत हीरे, मोती के बराबर और दूसरे की कीमत कंकर के बराबर
कही है| हमेशा ख्यालों के मुताबिक ही इंसान दर्जा और कीमत को पायेगा| जिस तरह के
ख्याल, वैसा ही हाल, वैसा दर्जा और उसकी कीमत होगी| जिसके दिल में मालिक की याद और
भजन बंदगी का लगाव है, जिसके अंदर में प्रेमा भक्ति और रूहानियत के ख्याल काम कर
रहा है, उसके बराबर दर्जा भला और किसका हो सकता है? वह भी शहंशाहो का भी शहंशाह और
बड़ों से भी बड़ा है|
v फल से तरु नीचे झुके, जलधर भी झुक जाहिं।
भक्तिवन्त तैसे झुके, भक्ति सम्पदा पाहिं।।
अर्थः-वृक्ष पर जब फल लगते हैं तो जितने ही अधिक फल लगते हैं, उसकी शाखायें उतनी ही अधिक झुक
जाती हैं। ऐसे ही जल से भरे हुये मेघ भी धरती की ओर झुकते हैं। ठीक इसी प्रकार जो
भक्ति मान पुरुष होता है, वह भक्ति की सम्पदा प्राप्त करके
झुक जाता है अर्थात् विनम्र बन जाता है।
v त्वमेव माता च पिता त्वमेव|
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव||
त्वमेव
विधा द्रविणं त्वमेव|
त्वमेव
सर्वं मम देव देव||
अर्थ -
हे मालिक| आप ही मेरी माता तथा आप ही मेरे
पिता हो| आप ही मेरे सच्चे मीत हो| आप
ही मेरी सच्ची विधा हो और मेरे जीवन- धन हो| वास्तव मेरे सर्वस्व आप ही हो||
v जैसे प्रीत बालक अरु माता|
ऐसा हरि
सेती मनु राता||
जैसे मधु माखी की प्रीति|
भावत नृप
नगर की नीति||
प्रीत
शब्द संग जिवे कुरंगा|
दीप शिखा
संग प्रीत पतंगा||
सेवे जिम
पैपीहा स्वांति |
रवि मुख
रवि सेवे जिह भांति||
समर प्रीत सूरे को जैसे|
हरि
सिमरन मन लावो तैसे||
कायर
प्रीत जिवें संग प्राण|
ऐसा मन
सिमरो भगवाना||
जैसे बालक की माता के साथ और माता की बालक के साथ
प्रीति होती है| वैसे
भक्त की भगवान के साथ प्रीति हो तो भगवान की प्रीति भी भक्त के साथ होती है|
जैसे हरिण को शब्द से प्रीति है| शब्द सुनते
ही वह प्राणों का मोह छोड़कर उस नाद पर मस्त हो जाता है| जैसे
दीपक को देखते ही पतंगे सर्वस्व न्यौछावर करने में नहीं हिचकिचाते| चकोर की चन्द्रमा से प्रीति है, मछली की पानी से,
मछली एक श्रण पानी से विलग हुई तो प्राण निकल गये| जैसे पपीहा स्वाति बूँद का अनुरागी है| सात समंद्र,
नदियाँ, तालाब सब पानी से भरपूर होते हुए उसे
पीना है तो केवल स्वाति जल| सूर्यमुखी फूल सूर्य उदय होते ही
खिल उठता है और उसकी ओर मुँह किये रहता है| जैसे सूर्य घूमता
है उसका मुहं भी उसी ओर घूम जाता है| सूर्यास्त होते ही वह
पंखुड़िया बंद कर लेता है| उसे चाँद, सितारे,
आकाश गंगा आदि से क्या लेना| उसे सूर्य की छठा
ही प्रिय है| जैसे शूरवीर को युद्ध से प्रीति है और कायर का
मन अपने प्राणों में लगा रहता है, वह युद्ध नहीं चाहता|
इसी प्रकार भक्त की प्रीति भगवान से होनी चाहिए|
v संत सदा उपदेश सुनावत,
केस सबै
सिर सेत भये है |
तू ममता
अजहूँ नही छाडत ,
मौतहू आय
सन्देश दिये है|
आज कि
काल्ह चलै उठ मूरख,
तेरे तो
देखत केते गए है|
सुंदर
क्यों नही राम संभारत,
या जग
में कहौ कौन रहे है ||
‘संत महापुरुष सदैव जीव को उपदेश सुनाते और सचेत
करते रहते हैं कि ऐ जीव! तेरे सिर के बाल तक सफ़ेद हो गए परन्तु जगत की मोह-ममता को
अब भी नही त्यागता| सिर के सफ़ेद बाल मानो मृत्यु का सन्देश दे रहा है| यह इस बात
की अगर सूचना है कि मृत्यु अब बस आना ही चाहती है| ऐ नादान! आज अथवा कल तू भी जगत
से उसी प्रकार उठ जायेगा, जैसे कि तेरे देखते ही देखते कितने चले गए| संत
सुन्दरदास जी समझाते है –ऐ प्राणी| इस जगत में आकर भला कौन रह सका है? फिर तू क्या जीवन का भरोसा करता है?
तथा जब प्रत्येक अवस्था में जगत को छोड़कर चले ही जाना है तो फिर प्रमाद में पड़कर
भगवान के भजन को क्यों भूला है? क्यों नही मालिक का सिमरण करता?
v बन्दे कोलों रुख चंगेरा, जेहड़ा लग पवे बिन लायों |
ढीमा खाये ते फक खवायें, अते
फरक न करदा छायों ||
चंगा खावे ते चंगा पहने, अते
रब्ब दा नाम भुलायों |
आख ग्वाला मोयां जीवंदीयां, तू
केहड़े कम्म आयों ||
वृक्ष
का यह स्वभाव होता है कि वह जंगलों में तो बिना उगाये ही उगता है कुदरत की ओर से
परन्तु कहीं कहीं पर लगाना पड़ता है| फिर उसके स्वभाव की विशेषता का का वर्णन करते
हैं कि जब उस पर फल लगता है तो वह नीचे की ओर
झुक जाता है| लोग उसको पत्थर मारते हैं और वह उन पत्थरों के बदले में मीठे,
स्वादिष्ट फल प्रदान करता है, जिनके सेवन से स्वास्थ्य बनता है| वृक्ष के पत्तो से
झोपड़ें बनाए जातें हैं, खाद बनाई जाती है| वृक्ष की लकड़ी मकानों में घरेलू वस्तुओं
अर्थात मेज, कुर्सी, चारपाई बनाने तथा आग जलाने आदि के प्रयोग में लाई जाती है|
v भर रहे है दिल में दुनियावी ख्याल |
आवे क्योंकर इसमें
नूरे-जुल-जुलाल ||
चाहिए तुमको अगर वसले-सलम |
दिल को खाली गैर से कर चक-कलम
||
हुब्बे-जाहो
–मालो-फर्जन्दो-पिदर |
उल्फ़ते –लालो-जवाहर-सीमो-जर ||
तबअ को जिए जिस तरह का है ख्याल
|
है यही बस मानय –राहे –विसाल ||
भावार्थ –“ ऐ मनुष्य! तेरे दिल अंदर जो संसारिक
विचार भरे पड़े है| फिर इसमें परमात्मा –ज्योति क्योकर प्रकट हो सकती है? इसलिए यदि
दिल में परमात्मा साक्षात्कार करने की अभिलाषा है तो फिर परमात्मा के प्रेम उनके ध्यान तथा उनकी याद
के अतिरिक्त दिल को दूसरे सभी विचारों तथा कामनाओं से खाली कर दे| धन, माल,
लाल-जवाहर, सोना, रिश्तेदार-सम्बन्धी आदि के प्रति यदि दिल में चाह है और उस तरह
यदि सूरत अथवा विचारधारा जाती है तो समझ लो कि वह परमात्मा के मिलाप में रुकावट
है|
v मोह निशा जग सोवन हारा। देखहिं
स्वपन विविध प्रकारा।।
ये सारा संसार ही मोह की नींद में
सो रहा है और विभिन्न प्रकार के स्वपन देख रहा है कोई मान प्रतिष्ठा प्राप्त करने
के,कोई सुख
ऐश्वर्य के स्वपन देख रहा है कोई धनी बनने के स्वपन
देख रहा है कोई राज्य पदवी को प्राप्त करने के स्वपन देख रहा है। महापुरुष फरमाते
हैं कि चाहे कोई झुग्गी झोंपड़ी में रह रहा है या भव्य महलों में, चाहे कोई पैसे पैसे के लिये तरस रहा है या किसी ने धन केअम्बार लगा रखे
हों। चाहे कोई कर्ज़दार बना हुआ है या साहूकार बना हुआ है। हैं ये सब सपने के दृश्य
ही। रोज़ाना जो हम नींद करते हैं ये ज़रा सपना छोटा है पाँच छः घन्टे का है आठ नौ
घन्टे का है और जो जीवन का सपना है ज़रा लम्बा है पचास साठ वर्ष,अस्सी नब्बे वर्ष का है फर्क इतना ही है बस। हैं दोनों सपने ही।
****
v तमन्ना है हर इंसान की,
मैं हमेशा सुखी और आनन्द में रहूँ|
कभी भी दुःख मुझको न सताऐ,
सदा खुशियों से भरपूर रहूँ||
भुला कर प्रभु के नाम को,
यह सुख चैन कैसे पाऐगा||
सुख की इच्छा तभी होगी पूरी,
जब मालिक का नाम दिल में बसायेगा||
v दुर्लभ जन्म को पाकर बन्दे, मन में जरा विचार कर|
कौड़ी बदले हीरे जन्म को, यूँही न बर्बाद कर||
ऐसा
जन्म अमोलक पाया, कुछ
नेक कमाई कर ले तू|
भजन प्रभु का करके बन्दे, जीवन सफल बना ले तू||
यही है अवसर यही है वेला, नाम प्रभु का ध्या ले तू|
अन्त में होगा संगी साथी, परलोक का तोशा बना ले तू||
v मात पिता की सेवा करना, फ़र्ज़ है एहसान नही|
उपकार है इनका तेरे सिर पर, भिक्षा या कोई दान नही||
मात पिता के चरण छुए जो, चार धाम तीर्थ फल पावे|
आशीर्वाद जो दिल से देवे, भगवान से भी ना टाली जावे||
v बड़ी खुशकिस्मती से मिली तुझे यह ज़िंदगी|
इस ज़िन्दगी को पाकर कर ले मालिक की बन्दगी||
गर ना
की बन्दगी तो फिर किया ही क्या|
ऐश-ओ-इशरत
में गया वक़्त फिर हाथ आया ही क्या||
यह
जन्म नहीं मिला यूही गवाने के लिये|
यह
गरीमत वक़्त मिला है प्रभु को पाने के लिये|
v बन्दगी मालिक की करना, असली तेरा काम था|
गैर खयालो को हटा कर, दिल में बसाना प्रभु का नाम था||
चेत जा और जाग जा, है ज़िन्दगी दो चार दिन|
कर ले नाम भक्ति की कमाई, संवर जाये तेरा जीवन||
v मनुष्य जन्म दुर्लभ है, बार-बार नहीं पायेगा|
निकल गया जब समय हाथ से, फिर पीछे पछताएगा||
स्वांस-स्वांस में नाम सुमिर ले, जन्म सफल हो जाऐगा|
आवागमन का चक्कर छूटे, मुक्ति पदारथ पाऐगा||
v मनुष्य जन्म को पाकर बन्दे, कर ले अपना काम|
फिर पीछे पछतायेगा, जब निकल जाऐंगे प्राण||
नाम भक्ति की कमाई करके, पूरा कर ले काम|
आवागमन का चक्कर छूटे, तेरी रूह का हो कल्याण||
v तुझे मालूम है किस वास्ते इस बाग़ में आया|
वो क्या मकसद था जिसके वास्ते मालिक ने
भिजवाया||
न भूले से भी कभी तूने, इधर कुछ गौर फ़रमाया|
कि मैं हूँ कौन जाता हूँ किधर, किस दिशा से
आया||
vभक्ति भोजन में मिल जाये तो वह प्रसाद बन जाता है
भक्ति पानी में मिल जाये तो वह चरणामृत बन जाता है
भक्ति घर में प्रवेश कर जाये तो वह घर मंदिर बन जाता है
भक्ति इन्सान के ह्रदय में प्रवेश कर जाये तो वह भक्त बन जाता है
v जब फिक्र नहीं तेरी फिकरे लगी हुई थी
अब फिक्र लगी है तेरी बेफिक्र हो गया हूँ
जब गम नहीं था तेरा, गम में बंधा हुआ था
गमगीन गम में तेरे, गम से बरी हुआ हूँ
जब भय नहीं था तेरा भयभीत हो रहा था
जब भय हुआ तेरा, निर्भय हो गया हूँ
हसता था रात दिन मैं, दिल में ख़ुशी नहीं थी
रो -2 के गम में तेरे खूब खुश हुआ हूँ
सब कुछ था पास में भी, गरीबी बिता रहा था
सब कुछ तुझी को देके, धनवान हो गया हूँ
v इस वक्त ही कुछ विचार कर ले, फिर नहीं वेला हथ आवन दा|
टूटा शीशा न कारीगर जोड़ सके, भजिया मोती न फिर गढ़ावन दा||
डिगा फल न डाली दे नाल जुडदा, फिटिया दुध न फिर जमावन दा|
सब सन्त पुकारदे साईं लोको, एही वेला ई रब्ब दे पावन दा||
v “दीन कहे धनवान सुखी, धनवान कहे सुखी राजा हमारा|
राजा कहे महाराजा सुखी, महाराजा
कहे सुखी इंद्र प्यारा|
इंद्र कहे ब्रह्मा जी सुखी, और
ब्रह्मा कहे सुखी सिरजनहारा |
विष्णु कहे इक भक्ति सुखी, बाकी
सब दुखिया है संसार ||”
v स्वांसो की मिली अनमोल पूँजी, इस की कदर तू जान ले|
त्रिलोकी से बढ़कर इक स्वांस की कीमत, देख जरा पहचान ले||
सत्पुरुषो का संयोग मिला है, हर बार नहीं मिल पायेगा|
सत्संग सुमिरण भजन भक्ति का, फिर समय हाथ नहीं आयेगा||
निकल गया जब समय हाथ से, फिर तालियाँ मल पछतायेगा|
चेत जा अब भी नाम सुमिर ले, दरगाह में ढोई पायेगा||
v बार बार ऐसी नर देह नहीं पाईये,
ऐसी देह पाये समय वृथा न गवाइए|
स्वांस स्वांस प्रभु की भजन भक्ति करके,
मानुष जनम अपना सफल बनाइये||
v तू निशाने बेनिशां है, तू बहार –ए-सरमदी है |
तेरा देखना इबादत, तेरी याद
बन्दगी है ||
तेरे दर पे सज्ज्दे करना, तुझे याद करके रोना |
यही है नमाज मेरी यही मेरी
बंदगी है ||
मैं बुरा हूँ या भला हूँ, मगर
हूँ तो तेरा बन्दा |
मुझे जिस तरह निभा ले तेरी
बन्दा परवरी है ||
v जरा सोच समझ ऐ प्राणी, इस जग में क्योंकर आया है|
क्या मतलब है यहाँ आने का, किस खातिर मालिक ने भिजवाया है||
बीत गया सब वक्त कीमती, कभी ध्यान न इधर फ़रमाया है|
धन यौवन और प्रभुता के मद में, अपना काम भुलाया है||
है वक्त अभी तू जाग जरा, संतो की शरण में आ प्यारे|
करके भजन-भक्ति की सच्ची कमाई, जीवन का लाभ उठा प्यारे||
v इंसान साधन से नहीं साधना से बड़ा बनता है
इन्सान
भवनों से नहीं भावना से बड़ा बनता है
इंसान
उच्चारण से नहीं आचरण से बड़ा बनता है
v जब लग जाने मैं कछु कर्त्ता, तब लग गर्भ जून में
फिरता|
जब लग मेरी -2 करे, तब लग काज एक
न सरे||
जब लग धारे वैरी मीत, तब लग
निश्चल नाहिं चीत|
v जिनके नज़ारे –कर्म से तकदीरे सवंर जाती है|
बिन माँगे ही हर इक मुराद वर
आती है ||
हर सुबह नई खुशिया नई बहार लाती है |
जिंदगी फूल की मानिंद मुसकराती है ||
उनका तसव्वुर अपने दिल में हम बसायेंगे |
श्रद्धा और प्रेम के हम फूल नित चढ़ायेंगे ||
v मुर्शिद नजर मेहर दी कीती दित्ता प्रेम प्याला |
पिन्देया सार ही आ गई मस्ती साफ़
होया दिल काला ||
चौदह तबक डीठ्ठे दिल अंदर होया
नूर उजाला |
बुल्ले नू रूब अन्दरों मिलेया
टूट्टेया कुफर दा ताला ||
v जो नेक है वो नेकी से सदा रखते हैं काम|
दुनिया
में यही लोग हैं दरअसल खुश अंजाम ||
इस
जिन्दगी में करके दूसरों की भलाई |
वो पाते
है तकलीफ व मुसीबत से रिहाई|
v जो प्रभु के सच्चे प्रेमी हैं, वे जरा नही घबराते
हैं|
मग में आये चाहे लाख कष्ट, पग पीछे नही हटाते हैं |
होकर प्रभु –प्रेम में मतवाले, कष्टों को सहते जाते हैं |
जब तक न
पहुंचे मंजिल पर, बस आगे कदम बढाते है||
v किसलिये दुनिया में आया, समझा न इस राज को|
लग गया रोजी की फिकर में, भूल गया असली बात को||
छोड़ दे तू फिकर अपनी, जिकर कर भगवान का|
फिकर तेरी आप करेगा, जिस जामा दिया इन्सान का||
बन्दगी मालिक की करना, असली तेरा काम था|
गैर खयालो को हटाकर, दिल में बसाना प्रभु का नाम था||
चेत जा और जाग जा, है जिन्दगी दो चार दिन|
कर ले नाम भक्ति की कमाई, सँवर जाये तेरा जीवन||
v लेना चाहते हो तो आशीर्वाद लो |
देना चाहते हो तो अभय दान दो ||
खाना चाहते हो तो क्रोध और गम
को खाओ |
मारना चाहते हो तो बुरे विचारो
को मारो ||
जानना चाहते हो तो परमेश्वर को
जानो |
जितना चाहते हो तो तृष्णाओं को
जीतो ||
पीना चाहते हो तो ईश्वर चिन्तन
का शर्बत पीओ |
पहनना चाहते हो तो नेकी का जामा
पहनो ||
करना चाहते हो तो दीन-दुखियों
की सहायता करो |
छोडना चाहते हो तो झूठ बोलना
छोड दो ||
बोलना चाहते हो तो मीठे वचन
बोलो |
तोलना चाहते हो तो अपनी वाणी को
तोलो ||
देखना चाहते हो तो अपने अवगुणों
को देखो |
सुनना चाहते हो तो दुखियो की
पुकार सुनो ||
पढना चाहते हो महापुरुषों की
जीवनी पढो |
दर्शन करना चाहते हो तो प्रभु
दर्शन करो ||
चलना चाहते हो तो सत्मार्ग पर
चलो |
पहचानना चाहते हो तो अपने आप को
पहचानो ||
v अकल कहे मैं सब तो उच्ची, जेहड़ी विच कचहरी लहंदी |
दौलत कहे मैं सबतो वडी, मेरा
दुनिया पानी भरदी ||
हुस्न कहे मैं सबतो उत्ते,
मैंनू खलकत सजदे करदी |
‘होनी’ कहे तुसाँ सभे झूठे, मैं
जो चाहवाँ सो करदी ||
v रहो जग में रखो सुरती गगन में,
रंगों मन अपना भक्ति की लगन में
|
करो दुनिया के सारे काम बेशक,
न दुनिया को बसाओ अपने मन में|
रहो जैसे जहाँ जी हो तुम्हारा,
मगर गफलत न हो हरि के भजन में |
मोहब्बत मत बढाओ झूठे जग से,
रहो मानिक कवल इस चमन में ||
v गुले मकसुद पा सकते नही इशरत के दीवाने |
जिन्हें पुरखार राहों से गुजर
जाना नहीं आता ||
तलाशो - जुस्तजू ए -दोस्त लाजिम
है मगर गौहर |
उसे पाते नहीं जिन को मिट जाना
नहीं आता ||
v कुदरत के आँचल में, खड़ा हूँ मैं भी दामन पसारे |
सुन लो पुकार ऐ मांझी !
बे-सहारों के हो सहारे ||
हम भी ठूंठ काँटों के, बने जन्मो
से प्रभु प्यारे |
करो कृपा की एक दृष्टि,लगा दो हमको भी किनारे ||
v काफ़ –कुछ ऐस वक्त खरीद कर लै,
फेर लगना नहीं बाज़ार मुड़के |
जे तू आखें मैं भलके खरीद
करसां,
ऐसा वक्त ना मिले हर वार मुड़के
||
औखा होवेंगा वक्त हिसाब दे तूँ,
ओहदों आखेंगा भेज इक वार मुड़के |
‘इमामदीन’ अगे जिसदी रकम मारी,
कदों करेगा फेर ऐतबार मुड़के ||
(फ़कीर इमामदीन साहिब)
v सच्चे आशिक मूल न डरदे, दुःखां तानियां पासों |
लावण ते च तोड़ निभावण, भांवे
निकल जाण स्वासों ||
दिल कमजोर फसे विच दुनिया, रीस
आशिकां करदे |
उन्हां मंजिल तय की करनी,
जिन्हां दा दिल धड़के ||
vकारुं कंज खजाना जोड़ा, आखिर सब कुछ छोड़ गया
मुलक गिरी
की हवस हुई ना पूरी, सिकंदर भी दम तोड़ गया
गए दोनों
हाथ खली जहाँ से, साथ नहीं कुछ ले गए
हसरत किसी
की हुई ना पूरी, आखिर सबको ये कह गये
करना मत
भरोसा इस दुनिया पर, ये साथ ना किसी के जाएगी
एक प्रभु
की भक्ति केवल, अंत में साथ निभाएगी
vखूब किस्मत से तुझे ये जामा मिला इंसान का
लक्ष्य
अपने को समझकर, भजन कर भगवन का
भजन भक्ति
से हो जाएगा, तेरी रूह का कल्याण
आवागमन मिट
जाएगा, पाएगा पद निरमान
v किसी की किस्मत में हैं लड्डू
पेड़े खाने को।
तेरी किस्मत में गर छोले खुशी से
तू चबाता जा।।
हैं किस्मत में किसी की मोटर
गाड़ियां चढ़ने को।
तुम्हारी किस्मत में पैदल खुशी से
पांव बढ़ाता जा।।
चला चल चला चल का चक्र चल रहा दिन
रात।
चलते को तू चलाता जा गुज़रते को
भूलाता जा।।
vखुदा जमीं पर उतर आया है हमारे लिए
बशर का भेष बन
कर आया है हमारे लिए
खजाना बन्दगी
का लाया है हमारे लिए
नूरानी देख के
सूरत मेरे दिल ने कहा
खुदा खुद ही
चला आया है हमारे लिए
v जो
करोगे दुनिया में, पाओगे आखिर को वही ।
नेक है
नेकी का बदला, बद का बदला है बदी ।।
बीज
होगा जैसा, वैसा फल उगेगा खेत मे ।
बोए जौ
और मिले गन्दुम (गेहूँ), यही नहीं होगा कभी ।।
v है ख्वाहिश हर इन्सान के दिल में
मिले खुशी
आनन्द अपार हरदम।
पड़े कभी
न दुःख की छाँव काली रहें दूर
सब गम अज़ार हरदम।
कहें सन्त सुख
की चाह अच्छी बेशक रखो ऊँचे विचार हरदम।
मगर सुख केसाधन भी करना है वाज़िब पूर्ण पूरुष कहें बारबार हरदम।
बिना मालिक की भजन बन्दगी के रहे
आत्मा दुःखीऔर खुआर हरदम।
मिले सुख कैसे मिटें
दुःख क्योंकर जब तक न सिमरे करतार हरदम।।
v मैंनूं बाहर कढ दे इस नरक विचों
तेरी बन्दगी दे विच चित लगावांगा।।
तेरा बन के रहसां संसार अन्दर किथे होर न मन अटकावांगा।
तेरी बन्दगी करसां कबूल हरदम कदी दिलों न तैनूं भुलावांगा।।
ऐत्थे आ के बन्या दुनियाँ दा बन्दा दासन दास ए गल शर्म दी ए।
कोई दोष न मालिक दा जान इस विच सारी मार ए अपने कर्म दी ए।।
vविषय वासना विच गल्तान बन्दा दीन
दुःखी आजीज़ सुबह शाम रहंदा।
नित लोड़दा सुखां ते खुशियाँ
नूं अफसोस मगर नाकाम रंहदा।
सुख मूल नहीं विषयाँ विच दासा ना
ही सुख दा नाम निशान हरगिज़।
जिन्हां चीज़ां विच खुशी लभदा तूँ खुशी वाले ऐ नाहीं
सामान हरगिज़।
v शीलवन्त सब तें बड़ा, सर्व रतन
की खानि।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आनि।।
ज्ञानी ध्यानी संजमी ,
दाता शूर अनेक।
जपिया-तपिया बहुत हैं, शीलवन्त कोउ एक
v लख चौरासी भ्रमते-भ्रमते, दुर्लभ देह है पाई ।
मोह निद्रा से जाग ज़रा, प्रभु मिलन की बारी आई ।।
सन्तों की संगति में आकर, नाम भक्ति का धन कमा ले ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला ले ।।
v आये हो जिस काम को, कर लो अपना काम ।
दोनों लोक सँवर जायेंगे, दरगह में पाओगे मान ।।
काम अपनी यही है, कर लो भजन भक्ति की कमाई ।
जो आत्मा परमात्मा में मिल जाये, सब दुःखों से हो रिहाई ।।
vकिस काम के लिये आया, किसलिये मिली यह ज़िन्दगी ।
ज़रा स पर तू कुछ विचार कर, यूँ चली न जाये रायेगाँ ज़िन्दगी
।।
सन्तों सत्पुरुषों की संगति में आकर, इस पर विचार कर ले ।
नाम भक्ति की कमाई करके, अपनी रूह का सुधार कर ले ।।
v रेत की दीवार सम, नश्वर सकत संसार है।
थिर यहाँ कुछ है नहीं, जो कुछ है चालनहार है।।
एक प्रभु का नाम सच्चा, परम सुख का सार है।
जिसके दिल में बस गया, उसका बेड़ा पार है ।।
vबड़े भागों से मानुष जन्म मिला, बार बार नहीं पाओगे ।
इसमें अपना काम बना लो, वरना फिर पछताओगे ।।
सन्तों की शरण में कर, नाम भक्ति का धन कमा लो ।
जन्मों से बिछुड़ी अपनी रूह को, मालिक के संग मिला लो ।।
v अगर तू चाहता है खुशियों से हमेशा रहूँ शाद ।
तो एक दम भूले नहीं तेरे दिल सेप्रभु की याद ।।
प्रभु की याद से ज़िन्दगी सँवर जायेगी ।
ग़म चिन्ता से होगा बरी सुख शान्ति दिल में भरी
रहेगी ।।
v रहो जग में रखो सुरति गगन में, रंगो मन अपना भक्ति की लगन में ।
करो दुनिया के काम बेशक, न दुनिया को बसाओ अपने मन में ।
रहो जैसे जहाँ हो जी तुम्हारा, मगर गफ़लत न हो हरि के भजन में ।
मुहब्बत मत बढ़ाओ झूठे जग से, रहो कमल की न्याई इस चमन में ।।
vएक रतन है इस जहां में जो मिलता बारम्बार नहीं ।
ज्यों फूल गिरा जब डाली से, फिर होता वो गुलज़ार नहीं ।।
इस रतन की क़ीमत भारी, जानत लोग गँवार नहीं ।
काँच किरिच बदले में लेवें, जपते हर हर सार नहीं ।।
v मानुष जन्म को पाकर बन्दे, कर ले अपना काम ।
फिर पीछे पछतायेगा, जब निकल जायेंगे प्राण ।।
नाम भक्ति की कमाई करके, पूरा कर ले काम ।
आवागमन का चक्कर छूटे, तेरी रूह का हो कल्याण ।।
v खूबी-ए-किस्मत से तुजे जामा मिला इन्सान का,
अपने लक्ष्य को समझकर भजन कर भगवान का ।
भजन भक्ति से हो जायेगा तेरी रूह का कल्याण,
आवागमन मिट जायेगा पायेगा पद निर्वाण ।।
v सच्ची खुशियों को वो पाते हैं,
जो अपने दिल में राम को बसाते हैं।
झूठी दुनिया की ममता छोड़ करके,
जो प्रभु नाम से चित्त लगाते हैं ।
v कर्म ऐसा होना चाहिये कि जीवन में खुशहाल हो जाये ।
सन्तों की संगत और भक्ति की कमाई से
परलोक भी निहाल हो जाये ।।
v बड़े भागों से तुझको, यह मानुष जन्म है मिला ।
यह दुर्लभ अवसर मिला है, इसको यूँही न गँवा ।।
संतों की संगति में आकर, नाम और भक्ति का सच्चा धन कमा ।
न कर देर इसमें, जल्दी से ले अपना काम बना ।।
नाम और भक्ति की कमाई कर ले, जन्म सफल हो जायेगा ।
आवागमन का चक्कर मिट जाये, मुक्ति पदारथ पायेगा ।।
v आदमी का जिस्म क्या है मानिंद पानी का इक बुलबुला ।
चंद स्वाँस की ज़िन्दगी है इसमें भजन भक्ति का लाभ
उठा ।।
मानुष जन्म का बार बार ऐसा अवसर फिर मिलेगा नहीं ।
प्रभु भक्ति की कमाई कर ज़िन्दगी का असली मक़सद है
यही ।।
v दुनिया में तू आया बन्दे वणज की ख़ातिर, कर ले वणज खरा ।
सोच समझकर सौदा करना, यह बाज़ार है ख़ूब सजा ।।
तेरे पास है स्वाँसों की पूँजी, इससे काम चलाना है ।
निख परख कर सौदा करना, अगर कुछ लाभ उठाना है।
ऐसा सौदा भूल न करना, जिससे होवे हानि भारी ।
कई मुद्दत के बाद ये अवसर मिला है, फिर मिले न दूजी बारी ।।
चमकत दमक की देख के चींजें, इस पे धन न लुटाना ।
प्रभु नाम का सुमिरण करके, सच्चा धन कमाना ।।
ऐसा सच्चा सौदा कर ले, जो परलोक में तेरे संग जाये ।
सच्चे नाम की कर ले कमाई, सहु देखे पतियाये ।।
v बड़े भागों से मिला तुझे यह जामा-ए-इन्सानी ।
अफ़सोस सद बार तूने इसकी क़द्र न जानी ।
बेशक़ीमत मिला था ये जामा मालिक की बन्दगी के लिये
।
बन्धनों से छुटकारा पाने और रूह की फ़र्ख़न्दगी के
लिये ।।
क्या काम तूने इस तन इन्सानी से लिया ।
विषयों में फँस कर जन्म यूँही बरबाद किया ।
महापुरुष इस दुर्लभ अवसर की याद दिलाते हैं।
कि ऐसे अवसर फिर न बार-बार हाथ आते हैं ।
मानकर सन्तों के वचन जो अपना काम कर जाते हैं ।
नाम भक्ति की सच्ची कमाई कर वो भव से तर जाते हैं
।।
vकई जन्मों से जीवात्मा को, बहुत इन्तज़ार थी ।
वो अपने मक़सद को पाने के लिये, बहुत बेक़रार थी ।।
भागों से मिल गया मानुष जन्म, इससे सच्चा लाभ उठा ले ।
मालिक की कर भजन बन्दगी, जीवन सफल बना ले ।।
v सत्त नाम को छोड़कर, माया संग करे प्यार ।
सत्न त्याग कौड़ी संग रचै, देखा यह संसार ।।
सत्संग मिले तो सोझी पावै, मिटे अज्ञान अंधकार ।
ज्ञान प्रकाश जब हिरदै जागै, तब पावै तत् का सार ।।
v वो जीवन की घड़ियाँ तेरे किसी काम की नहीं |
जिन घड़ियों में आये याद राम की नहीं ||
चौबीस हजार श्वास तुझको रोज का मिला |
घाटे की इस दुकान का कुछ ख्याल कर इंसा ||
फिर तेरी दुकान कौड़ी काम की नहीं |
जिस दुकान पर आस हरी नाम की नहीं ||
दुनिया के रंग तमाशे देख -2 होता है शाद तू |
और तन देने वाले को ना करता कभी याद तू ||
रखता है तमन्ना आराम की पर राम की नहीं |
फिर तो जीवन की घड़ियाँ तेरे किसी काम की नहीं ||
v तुम्हे पाकर मैंने ये जहां पा लिया है |
जमीं तो जमीं आसमां पा लिया है ||
जमाने के गम प्यार में मिट गए है |
ख़ुशी के लाखों दी जल गए है ||
ना उजड़े गा वो आशिया पा लिया है |
तुम्हे पाके मैं जहां पा लिया है ||
v अगर आग के पास बैठोगे जाकर |
तो उठोगे एक रोज कपड़े जलाकर ||
ये माना के कपड़े बचाते रहे तुम |
मगर सेक तो फिर भी खाते रहे तुम ||
v हाथ से जाता है जो एक स्वांस भी |
साथ उसके जा रहे है जिंदगी ||
कीमती दौलत तेरी लुट रही |
और तू बेखबर है ऐ आदमी ||
ये जन्म यूँ ही गवाने का नहीं |
वक्त फिर से पास आने का नहीं ||
v ये महल माड़ियाँ धन दौलत , जिनको तू माने अपना है
ये रिश्ते नाते सम्बन्धी सारी ही मन की कल्पन्ना है
एक नाम प्रभु का साचा है, जो स्वांस -2 में जपना है
एक शब्द गुरु का सच्चा है बाकी जग झूठा सपना है
v ऐ तन मेरिया चश्मा होवन, मैं मुर्शिद वेख न रजा हूँ
|
लू -२ दे विच लख-२ चश्मा, एक खोला एक तजा हूँ ||
इतने दिठियाँ मैनू समझ न आवे मैं होर कित्थे वाल
भजा हूँ |
मुरसिद दा दीदार वे बाहू मेनू लाख करोड़ो हज़ा हूँ ||
v कोई तुमसे धन मालो जार मांगता है
बड़ा रुतबा कोई बशर मांगता है
कोई रहने का उम्दा वर मांगता है
कोई राज पदवी का वर मांगता है
मगर मैं तुझसे तुझही को मांगता हूँ
फकत नजरे रहमत तेरी मांगता हूँ
v नाम रह जाएगा बाकी, बस खुदाए पाक का |
नक्श वो मिट कर रहेगा जो बना है ख़ाक का ||
साथ तेरे जाएगा एक केवल नाम ही |
जिस दुनिया पर तू है फिदा वो गर हकीकत है नहीं ||
कर कमाई नेक और ले प्रभु के नाम को |
बंदगी मालिक की करके पा ले इतमिनान को ||
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