गुरु अमरदास जी की
दो बेटियां बीबी दानी व बीबी भानी जी थी । बीबी दानी जी का विवाह श्री रामा जी से और
बीबी भानी जी का विवाह श्री जेठा जी (श्री गुरु रामदास जी) के साथ हुआ । दोनों ही संगत
के साथ मिलकर खूब सेवा करते । गुरु जी दोनों पर ही खुश थे । इस कारण दोनों में से एक
को गुरुगद्दी के योग्य निर्णित करने के लिए आपने उनकी परीक्षा ली । एक दिन सांय काल
गुरु जी ने बाउली के पास खड़े होकर रामा को कहा कि एक तरफ चबूतरा बनाओ जिसपर बैठकर
हम बाउली की कार सेवा देखते रहें । फिर बाउली के दूसरी तरफ जाकर जेठा जी को एक चबूतरा
तैयार करने की आज्ञा दी । दूसरे दिन दोनों ने ईंट गारे के साथ चबूतरे बनाए । गुरु जी
ने पहले रामा जी का चबूतरा देखकर कहा यह ठीक नहीं बना । रामा ने कहा महाराज! मैंने
आपके बताये अनुसार ठीक बनाया है । पर गुरु जी ने उसे दोबारा चबूतरा बनाने की आज्ञा
दे दी । दूसरी ओर गुरु अमरदास जी ने जेठा जी का चबूतरा देखकर कहा, तुम हमारी बात नहीं
समझे । इन्हें भी दोबारा बनाने की आज्ञा दे दी । जेठा जी ने चुप-चाप बिना कुछ कहे उसी
समय ही चबूतरा तोड़ दिया और हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं अल्पबुद्धि जीव हूँ मुझे
फिर से समझा दो । गुरु जी ने छड़ी के साथ लकीर खीचकर कहा कि इस तरह का चबूतरा बनाओ
। दूसरे दिन जब गुरूजी फिर दोनों के द्वारा बनाए गए चबूतरो को देखने के लिए गए तो फिर
पहले रामा जी तरफ गए । गुरु जी ने फिर से वही कहा इसे गिरा दो और कल फिर बनाओ । रामा
जी ने चबूतरा गिराने से इंकार कर दिया । परन्तु गुरु जी ने एक सेवक से चबूतरा गिरवा
दिया । फिर गुरूजी जेठा जी के पास गए । गुरु जी का उत्तर सुनते ही उन्होंने चुप-चाप
चबूतरा गिरा दिया और कहा मुझे क्षमा कीजिये मैं भूल गया हूँ । आपकी आज्ञा के अनुसार
ठीक चबूतरा नहीं बना पाया । गुरु जी फिर दोनों को समझाकर चले गए । तीसरे दिन जब फिर
दोनों ने चबूतरे तैयार कर लिए तो गुरु जी ने रामा के चबूतरे को देखकर कहा तुमने फिर
उस तरह का चबूतरा नहीं बनाया जिस तरह का हमने कहा था । इसको गिरा दो, परन्तु उसने कहा
मुझसे और अच्छा नहीं बन सकता आपको अपनी बात याद नहीं रहती, फिर मेरा क्या कसूर है?
आप किसी और से बनवा लो । गुरु जी उसका उत्तर सुनकर, चुप-चाप जेठा जी की तरफ चल पड़े
। गुरु जी ने जेठा जी को भी वही उत्तर दिया कि तुमने ठीक नहीं बनाया, आप हमारे समझाने
पर नहीं समझे । जेठा जी हाथ जोड़कर कहने लगे महाराज! मैं कम बुद्धि करके आपकी बात नहीं
समझ सका । आप जी की कृपा के बिना मुझे कुछ समझ नहीं आ सकता । आपका यह उत्तर सुनकर गुरु
जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे कि हमें आपकी यह सेवा बहुत पसंद आई । आप अहंकार नहीं करते और
सेवा मैं ही आनन्द लेतें हैं| जो सेवक मन कर्म वचन से अपने सतगुरु की आज्ञा मान
कर उनके वचनों पर चलता है फिर ऐसे सेवक को तो सतगुरु अपना ही रूप दे देते हैं । जैसे
गुरु रामदास जी को गुरु अमरदास जी ने अपना ही रूप दे दिया। गुरु रामदास जी जब अपने
गुरु की सेवा में थे तो दो ही बातें उन्होंने अपने मन में बैठा रखी थी । एक ‘भला जी’
और दूसरी ‘भूला जी’। अर्थात् कोई सेवा मिले तो बोलते थे ‘भला जी’ सिर झुकाकर और अगर
कोई गलती हो जाए तो सिर झुकाकर कहते थे ‘भूला जी’ (अर्थात् गलती हो गई)। सेवक का यही
भाव उनके गुरु को ऐसा भाया कि उन्होंने गुरु रामदास जी को गुरु गद्दी का मालिक बना
दिया ।
एक बार श्री दूसरी पादशाही जी टेरी
में पलंग पर विश्राम कर रहे थे और चौथी पादशाही जी (भक्त वेष में) श्री चरणों में
उपस्थित थे| आपने विनय की
–प्रभु! निजी (श्री चरण कमल दबाने की सेवा) सेवा प्रदान की जाए | स्वामी
जी ने आपकी तरफ निहारते हुए फरमाया –‘हम जो भी सेवा बतायें, क्या
आप करने को तैयार है? आपने विनय
की-‘प्रभु! श्री कृपा की आवश्यकता है |’ स्वामी
जी ने मौज वश फरमाया-‘एक हाथ ऊँचा करो |’ आपने
श्री वचनों का पालन किया | स्वामी जी ने
दोबारा फरमाया अब दूसरा हाथ भी ऊपर करो | आप
श्री आज्ञानुसार दोनों हाथ ऊपर करके खड़े हो गए | स्वामी
जी ने लीला के रूप में करवट बदलकर आँखे बंद कर ली और विश्राम में चले गए और सारी
रात करवट न बदली | आप श्री आज्ञा
पालन में दृढ़ थे, आप रात्रि भर
दोनों हाथ ऊपर किये हुए खड़े रहे | आपको रात भर न
तो नींद आई और न ही हाथ नीचे करने का ख्याल आया| आप
दोनों हाथ ऊपर किये हुए श्री दर्शन के मधुर-2 अमृत
का रस पान करते रहे | प्रातः काल जब
स्वामी जी विश्राम से उठे और करवट बदली तो क्या देखा कि आप दोनों हाथ ऊँचे किये
हुए खड़े है | स्वामी जी
आज्ञापालन में आपकी इतनी तत्परता देखकर बहुत प्रसन्न हुए | स्वामी
जी ने आपके हाथों को
अपने कर कमलो में लेकर फरमाया-‘तुम्हरी महानता के अनुरूप तुम्हारे गुण भी उच्च
कोटि के है |’ ये होते हैं सच्चे सेवक के गुण के बिना कुछ सोचे बस अपने गुरु की
आज्ञा को मान लेना| उस समय ये ख्याल भी मन में ना आने पाए की गुरु महाराज जी ने ऐसा क्यूँ
कहा | अगर वे थोड़ी देर के
लिए अपने हाथ नीचे कर लेते थोडा आराम कर लेते तो क्या हो जाता गुरु महाराज जी तो उस समय विश्राम में थे, पर
नहीं उन्होंने ऐसा नहीं किया क्यूँकी वे अपने गुरु की आज्ञा को ठुकराना नहीं चाहते
थे| सेवा में दृढ़ता का कितना बड़ा उदाहरण है जोकि
हर सेवक के लिए प्रेरणा दायक है|
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