सेवक की मांग सदा यही रहती है कि वह एक पल भी
अपने स्वामी को न विसरे| सेवक सदैव अपने प्रभु से सच्ची चीज ही मांगता है | एक बड़ा ही सुंदर भाव है किजब
भगवान श्री राम जी केवट की नांव में संवार हुए तो रास्ते में केवट से प्रभु श्री
राम जी से वार्तालाप करते जा रहे थे| तब केवट ने श्री राम जी कहा
कि प्रभु मैं यहाँ पर रोज देखता हूँ कि अनेकों मछवारे आ कर जाल फैलाते है और
मछलियाँ उनमें फस जाती है लेकिन जो मछलियाँ मछवारे के चरणों की तरफ
आ जाती है वह जाल में आने से बच जाती है| इसलिए हे प्रभु आज मैं भी
आप के चरणों में आ गया हूँ मैं भी माया में कैसे फस सकता हूँ| कहते हैं परमात्मा की कृपा
से जिनकों विवेक प्राप्त हो जाता है उन्हें पता होता है कि सही अवसर का फायदा कैसे
उठाना है केवट ने भगवान के चरणों में विनय की कि प्रभु
मैं गंगा जी के तट पर
आप भव सागर के तट पर
मैं गंगा जी का मांझी
आप भव सागर के माझीं
उसने विनय
की कि एक मांझी भी किसी दूसरे माझीं से मजदूरी लेता है मैंने
आपको नौका में बिठा कर नदी पार करवाई आप मुझे अपनी नौका में बिठा कर भव से पार लगा
देना| इस तरह भगवान ने उस पर अपनी कृपा बरसाई| सेवक को पता है कि उसे भगवान से क्या मांगना है कौन सी वस्तु सच्ची है या
कौन सी झूठी|
एक बार की बात है श्री आनंदपुर
में रात के समय कुछ भगत भजन संध्या कर रहे थे| भजन बोल रहे थे, नाच गाना हो रहा था| तभी किसी भक्त ने श्री गुरु महाराज जी की लीला सुनाना शुरू
किया, अब सभी भगत लीला सुन रहे थे
और ख़ुशी भी अनुभव कर रहे थे| तभी किसी की नज़र वहाँ बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी जो पीछे बैठा रो रहा था तो सबने
उससे पूछा कि भगत जी आप क्यों रो रहे हो? तो उसने बताया की 2-3 दिन पहले मैं दोपहर को श्री दर्शन हॉल
में सेवा कर रहा था तो मेरेको किसी भगत ने मिठाई के कुछ डिब्बे दिए और कहा कि इसे श्री गुरु महाराज
जी के सिंहासन के पास रख दो| तो मेरे मन में बहुत इच्छा हुई कि काश इनमे से एक डिब्बा मुझे मिल जाये तो मैं
रात को खाने के बाद खा लूँगा| रात के समय दर्शन खुले तो लीला शुरू हो गई, सारे नाच रहे थे तो मैं भी नाचने लगा तो श्री गुरु महाराज
जी ने मुझे बुलाया और 2 डिब्बे दिए और फरमाया भगत जी रात को खाने के बाद खा लेना| तो सभी भक्त जो यह बात सुन रहे थे तो उन्होंने कहा कि ये तो
बहुत ख़ुशी की बात है कि श्री गुरु महाराज जी ने तुम्हारी इच्छा पूरी कर दी, पर तुम रो क्यों रहे हो? तो भगत जी ने कहा कि मैं रो इसलिए रहा हूँ कि मैंने भगवान्
से माँगा भी तो क्या माँगा मिठाई का डिब्बा| अगर माँगना था तो ऐसा कुछ मांगता जिससे मेरा कल्याण हो जाता|
एक बार श्री गुरु नानक देव
जी ने बड़ा वैराग रूप धारण कर लिया| आप
आगे-आगे और संगत पीछे-पीछे जा रही थी| आगे जाकर
क्या देखा कि तांबे का ढेर पड़ा है तब गुरुनानक देव जी ने संगत को फरमाया कि ले जाओ
तांबा और अपने घर का निरवा करो हमारे साथ आकर आपको क्या मिलेगा? कई लोग
जो तांबे के इच्छुक थे वे तांबा लेकर वापिस चले गए| आगे चले
तो चाँदी के ढेर लगे हुए थे|
गुरुनानक जी ने फरमाया कि
ले जाओ चाँदी, हमारे साथ आकर आपको क्या मिलेगा? आगे चले
तो सोने का ढ़ेर पड़ा था|
गुरु जी ने फरमाया ले जाओ
झोलिया भरके अपने घर|
आगे चले तो हीरे, मोती के
ढ़ेर पड़े थे| हीरे,
मोती के चाहने वाले हीरे, मोती ले
गए| अब जब गुरु नानक जी ने पीछे मुड़ कर देखा तो भाई लहणा जी
अकेले रह गए तो गुरु नानक जी ने फरमाया कि आप भी कुछ ले जाते, हमारे
साथ आकर आपको क्या मिलेगा?
तब भाई लहणा जी ने कहा की
स्वामी जी जो तांबा,
चाँदी, हीरे, मोती ले गए हैं उनका परिवार है घर, गृहस्थी
है समाज में भी रिश्ते,
नाते है लेकिन मेरा तो
आपके सिवा और कोई भी नहीं है|
मैं इसका क्या करूँगा? यह सुनकर
गुरु नानक जी ने लहणा जी को गले से लगा लिया| लहणा को
अपने अंग से लगा उसे अंगद बना दिया तभी से वे गुरु अंगद देव जी के नाम से जाने गए|
सेवक को सदैव अपने प्रभु से
प्रभु को ही मांगना चाहिये | एक बार श्री पंचम पादशाही जी श्री गुरु महाराज जी ने
अपने पावन वचनों में फरमाया कि अगर
तुम्हे मांगना ही है, अगर मांगने कि आदत ही है तो दुनिया कि ख्वाहिशो से मन को कभी
काला मत करना अगर तुम्हे सौभाग्य मिल जाए तो परमात्मा से परमात्मा को मांगना
सतगुरु से सतगुरु को मांगना| यही सेवक के लिए सबसे उत्तम मांग है |
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