Wednesday, March 11, 2020

सच की पहचान

 

सच की पहचान

 

संसार में प्रायः यह देखा जाता है कि हर इन्सान सुख की तलाश कर रहा है। हर व्यक्ति चाहता है कि मुझे सुख हासिल  हो कोई गम चिन्ता मुझे ना सताये। हर कोई मुझसे प्यार करें।परन्तु देखने में यहीं आता हैं कि इन्सान साधन तो बड़े अपनाता है सुख को प्राप्त करने के लिए लेकिन सुख फिर भी नहीं मिलता। तुलसीदास जी के वचन भी है कि, 

सुख के साधन बहुत किये, दुख का किया ना कोय।

तुलसी यह आश्वर्य,और अधिक दुख होय।।

 

अब इन्सान खुद विचार करे कि ऐसा क्‍यों है। इन्सान सुख पाने के लिए अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है लेकिन वह इच्छाये पूर्ण होने के बावजूद भी सुख की तलाश खत्म नहीं होती। ऐसा इसलिए है कि इन्सान जिन वस्तुओं में सुख की खोज करता है वास्तव में वह शरीरिक सुख तो देती हैं पर हमारी आत्मा को उन वस्तुओं से रति मात्र भी सुख नहीं मिलता। उदाहरण के लिए गर्मी के समय में इन्सान चाहता है कि उसे ठण्डे पदार्थ खाने को मिले, पंखे के नीचे रहे, वह पूरी कोशिश करता हैं कि शरीर को ठण्डक मिले। तो ऐसे ही हमारी आत्मा भी तो चाहती है कि उसे भी ठण्डक मिले, शांति मिले तो इसके लिए आत्मा को भीं खुराक देनी पड़ती है। वो खुराक क्या है जब कहीं इस आत्मा को परमात्मा का अंश मिलता हैं या फिर परमपिता परमात्मा की कथाये सुनने को मिलती है तो आत्मा को शान्ति मिलती है। आत्मा को खुशी मिलती है। क्योकि उस समय आत्मा को उसकी खुराक मिल रही होती है तभी  जीव को आत्मिक सुख का अनुभव होता है। वहीं जीव/की वास्तविक खुशी होती है।कहते है कि जैसे सोना सुनार के पास मिलता है, लोहा लौहार कें पास मिलता है, ऐसे ही सुख के सागर के पास सुख मिलता हैं । सुख का सागर कौन है ? वो केवल और केवल मालिक है जो सुखों का भंडारी है हर किसी को सुख देने वाला हैं । अगर हम संसार में काम ना करे कि कोई व्यक्ति हमे सुख दे दे तो हम उस व्यक्ति कि बारे में अच्छी तरह से जानकार देखेंगे तो वो खुद भी पूरी तरह से सुखी नहीं होगा तो हमें क्या सुख देगा ।सुख की कामना तो उससे की जाए जो खुद सुखी हो वो तो केवल ओर केवल परमात्मा हीं हैं जो कि सबको सुख देने वाला है।

महापुरुषों के वचन भी हैं कि-

सब सुख दाता यम है, दुसर नाहिं न कोय।

कह नानक सुन रे मना, तेहिं सिमरत गति होय।।

 

अर्थात परमात्मा हीं सुखों के दाता है जिनको याद करने से इन्सान के सारे दुख दूर हो जाते है। कहते है जब महाभारत का युद्ध शुरु होना था तो उसी युद्ध भूमि पर टिटिहरी नाम के पक्षियों का जोडा था।जिन्होंने अण्डे दिये। अब उनको जब पता चला कि इस भूमि पर युद्ध शुरु होने वाला है तो वे काफी घबरा गये कि हमारे बच्चे जो अप्डो में है वो तो युद्ध मे मारे जाएगे तो उन्होने भगवान श्री कृष्ण जी की तपस्या की  और भगवान के श्री चरणों में प्रार्थना की कि भगवान हमारे बच्चों की रक्षा करना । भगवान नें उनकी पुकार सुनी जब युद्ध शुरु हुआ तो कौरवो की सेना में एक हाथी था उसके गले में बहुत बडा घंटा टंगा हुआ था उसी घंटे पर एक तीर लगा और वह उड़ता हुआ उन्ही अण्डो के ऊपर जाकर टिक गया। कई दिन तक युद्ध चलता रहा लेकिन घंटे की वजह से अण्डों को कोई हानि नहीं हुई। वे सुरक्षित रहे। जब युद्ध समाप्त हुआ तब भगवान श्री कृष्ण जी ने रुकमणि (श्री कृष्ण कीं धर्मपत्नी) से कहा कि चलों रुकमणीं आज मैं तुम्हे कोई लीला दिखाता हूँ, भगवान उन पक्षियों के अण्डों के पास गए।घण्टे को हटाया तो कया देखते है कि अण्डे टूटे पड़ें है और छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे हैं। तो रुकमणी को कुछ समझ नहीं आया तो उसने भगवान से प्रार्थना की कि भगवान मुझे समझाओ कि यह कैसी लीला है ? तब मगवान श्री कृष्ण जी ने कहाँ कि देखो रुकमणी इन छोटे-छोट पक्षियों के माता-पिता ने युद्ध शुरु होने से पहले मेरी तपस्या की थीं और विनय की थी प्रभु युद्ध में हमारे बच्चों की रक्षा करना तो मैने इनकी पुकार सुनी । तो जब मै इन पक्षियों की पुकार सुन सकता हूँ. तो क्या जो जीवात्मायें, जो मेरा ही अंश है वो मुझे याद करेगी तो क्‍या मै उसकी पुकार नहीं सुनूँगा ? कहते भी  हैं कि-

ख़्दा कबूल करता है दुओँ, जो दुआँ दिल से होतीं है।

मगर मुशिकल ये है, ये बड़ी मुश्किल से होतीं है।।

अर्थात भगवान तो हर वो दुआँ सुनता है जो दिल से की जाती है। चौपाई के अन्दर एक वचन आता है 'कोमल चिंत अति दीन दयाला, कारण बिन रघुनाथ कृपाला'

मतलब यह है कि भगवान का जो हृदय है वो इतना कोमल है कि वो तो बिना किसी कारण के भी जींव को देना चाहते है। तो जब इन्सान उनको याद करेगा, तो क्या तब पुकार नहीं  सुनेगे? जरुर सुनेंगे । वो तो अपने भक्तों से अति प्रेम करते हैं | कहते हैं कि पिता से माता  सौ गुना; माता से हरि सौ गुना; कि जितना प्यार पिता अपने बच्चो: को करता हैं उससे सौ गुना ज्यादा प्यार बच्चे की माँ करती है और माँ से भी कई गुना ज्यादा प्यार/भगवान अपने भक्तों से करते हैं। भगवात श्री कृष्ण जी ने गीता में अर्जुन से कहा हैं कि

भक्त है मेरे हृदय, मेरा है उनमें वास।

मुझ बिन वे ना जाने किसी को, मै रहता सदा उनके पास ।।

भगवान तो हमेशा ही अपने भक्तों के साथ होते है। अगर हम दिल से उन्हे याद करें तो भगवान हमारी पुकार जरुर सुनेंगे। कहते है कि एक मंदिर के गेट के ऊपर लिखा था कि भगवान के पास लोगों की दुआयें सुनने का बहुत वक्‍त है, लेकिन क्या लोगों के पास दिल से दुआ करने का वक्‍त है। तो-कहने का मतलब यही है कि इन्सान सुख की कामना सिर्फ ओर सिर्फ मालिक से करे। असली सुख असली आनन्द उसी के नाम में है, उसकी भक्ति में है। कहते हैं संसार मे हर वस्तु की एक तासीर है, जैसे आग की तासीर तपश है, पानी की तासीर ठण्डक है,इसी तरह भक्ति की तासीर है ठण्डक जो शांति  और सुख देने वाली है साथ हीं माया की तासीर गर्म है, जो दुख: और अशांति  पैदा करने वाली होतीं है। इसी तरह इन्सान की तासीर है विवेक,बुद्धि और ज्ञान ताकि वह हर चीज को सोच समझकर इस्तेमाल करे । इन्सान को भगवान ने बुद्धि दी है जिससे वह खुद अनुभव कर सकता है कि किस वस्तु से इन्सान को सुख मिलता हैं और किससे दुख:। संसार में जितनी भी वस्तुएँ है जिनसे हम प्रेम करते है जिनको हम अपना समझते हैं वह वास्तव मे अपनी नहीं है। वह सभी नश्वर है। नश्वर चीजों का सुख भी नश्वर ही होता है। लेकिन जो मालिक का नाम है, जो युगों से चलताआ रहा ह, कभी नाश नहीं होगा ।

वहीं सहीं मायनों में सच्चा सुख देने वाला है वहीं इन्सान की असली वस्तु है जिसको पाने के लिए वो धरती पर आता है। वचन है कि-

प्रमु, नाम आमृत मेरा,  जो पींवे तृ्ताये।

सुखीं बसे ससांर में, ओर परम पद पाये //

 

उदाहरण: के तौर पर जब हम किसी के घर मेहमान बनके जाते है तो हम वहाँ पर जाकर उनके घर की वस्तुओं को देखते तो जरुर है पर उनके साथ छेड़खानी नहीं करते क्योकि हमें पता होता है कि ये जो वस्तुएं है वो हमारी नहीं है। तो वो घर वाले भी हमे मान सम्मान देते है अगर हम किसी के घर मेहमान बन कर गये और वहाँ जाकर उनकी वस्तुओं को अपना समझने लगे, उनकी वस्तुओ के साथ छेड़खानी करने लगे तो हमे वहीँ मान नहीं मिलेगा। कहने का मतलब यह है कि जब तक मन में ये बात थी कि हम इस घर के मेहमान है यहाँ की वस्तुएँ हमारी नहीं है तब तक तो मान मिलता है लेकिन जैसे ही हमने उन वस्तुओ को हमने अपना समझा हमे मान नहीं मिला। इसी तरह संसार में भी अगर व्यक्ति संसारिक वस्तुओ को देखता जरुर है परन्तु उन्हे अपना नहीं समझता तो उसे यहाँ पर भी मान मिलता है, सुख मिलता है, लेकिन अगर वह इन चीजों को अपना समझ इनको मन मे बसाता है तो उसे दुख: मिलता है।  क्योकि वास्तव मे वह अपनी नहीं है | एक कथा है कि एक बार श्री गुरु नानक देव जी ने किसी शहर में कुपा फरमाई। जब लोगो को पता चला तो दूर-दूर से लोग श्री गुरु नानक जी के दर्शन के लिए पहुँचे। वही पर एक राजा भी आया जो कि अपने साथ धन-दौलत भेंट करने के लिए लाया।जब उसने श्री गुरु नानक जी के आगे वह दौलत भेंट की तो श्री गुरु नानक जी ने फरमाया कि 'राजन्‌ यह बेगानी चीज क्यो दे रहा है कोई अपनी चीज दे | तब राजा ने कहा स्वामी जी ये धन दौलत

मेरा तो है| तब श्री गुरुनानक जी ने फरमाया कि 'राजन तेरा पिता भी यही कहता था कि धन दौलत मेरा है, लेकिन क्‍या वो दौलत साथ ले गया। इसलिए तो कोई अपनी चीज दे तब राजा ने कहा कि ठीक है स्वामी जी धन मेरा नहीं है तो मेरा मन ले लो तब श्री गुरुनानक जी ने फरमाया कि मन भी तेरा नहीं है क्या तू मन को वश मे कर सकता है? अभी तू खड़ा हमारे पास है लेकिन तेरा मन 'कहां-कहां फसा पडा है। तो मन भी तेरा नहीं है| कोई अपनी चीज दे। तब राजा ने कहा, स्वामी जी धन मेरा नहीं मन मेरा नहीं तो मेरा तन ले लो। तब श्री गुरु नानक जी ने फरमाया कि तन भी तेरा नहीं | जब तू यहाँ से जाएगा तब क्या तेरा शरीर तेरे साथ जाएगा। तब राजा ने कहा कि स्वामी जी धन मेरा नहीं , मन मेरा नहीं और तन मेरा नहीं तो आप ही बताओ मै क्या दूँ ? तब श्री गुरु नानक देव जी ने फरमाया कि ये "मैं हमे दे दे। जो तू कहता है न कि धन मेरा है, तन मेरा है  |अब तू खुद विचार कर कि क्या वास्तव में तेरा है? अबआप  लोग भी जो कि इस सत्संग “सच की पहचान" को पढ़ रहे हो खुद विचार करो कि वास्तव में जिन  वस्तुओ को इन्सान अपना कहता है क्या सचमुच  में वह अपनी है। श्री गुरु नानक देव जी ने कहा जिन वस्तुओ को इन्सान धरती पर आकर अपना समझ बैठा है लेकिन वास्तव मे वह वस्तु हमारी अपनी नहीं | वह केवल तब तक ही नजरआती है जब तक शरीर में आत्मा है उसके बाद 'उन वंस्तुओ का त्याग करना पडता है । इन्सान की जो अपनी चीज है वो है मालिक का नाम जो की इस लोक मे भी इन्सान के काम आता है और परलोक मे भी। वहीं इन्सान की अपनी पुंजी है |

एक वृक्ष की तस्वीर है जिसमें आम लगे हुए हैं, अगर हम चाहे कि तस्वीर में से वो आम हमे मिल जाए तो ऐसा नहीं हो सकता। ठीक,इसी तरह अगर हम ये आशा करें कि संसार की सभी चीजें हमारी हो जाए तो ऐसा भी नहीं हो सकता। आप खुद ही देखते हो कि इन्सान चीजे तो बहुत इक्कठी करता है लेकिन अंत समय मे वह वस्तुए अपनी नहीं रहती। इसीलिए इन्सान खुद विचार करे जिन वस्तुओ से वह प्रीत करता है ना तो उनमे सच्चा सुख है और  न उनको साथ लेकर जाना है | फिर क्यों दिन रात उनके पीछे भागता रहता है माया के पदार्थ को इक्कठा करने में लगा रहता है और अंत में कुछ भी हाथ नहीं आता। वचन भी है -

संग सखा सब तज यो, कोई न निभयो साथ,

कहो नानक एक विपद मे, टेक एक रघुनाथ।

 कि अन्त में जो काम आने वाली वस्तु है वो केवल मालिक का नाम है। इसलिए अब हमे विचार करना है कि हमे संसार में रहकर क्या चीज हासिल करनी है। माया के पदार्ष जो अन्त में कुछ काम नहीं आते या फिर भक्ति का सच धन जो सहीं मायनों में सुख देने वाला शांति देने वाला है जो इस लोक में

भी हमारी रक्षा करता है, और परलोक मे भी | एक समय का वृतान्त है, एक व्यक्ति  ट्रेन में सफर कर रहा था, लेकिन उसे टिकट नहीं ले रखीं थी और बैठा भी था रिजर्वेशन वाले डिब्बे में, इतने में टी.टी आ गया। अब वह व्यक्ति टी. टी  को देखकर घबरा  गया और सोचा कि अगर टी. टी  ने टिकट माँगी तो उसके पास टिकट तो है नहीं, तो उसकी बेइज्जती भी होगी और जुर्माना भी देना पडेगा। तो उस व्यक्ति नें टी .टी .से बचने के लिए टॉयलेट में जाकर छिप गया। उस व्यक्ति के सामने एक सन्त जी बैठे थे वो सारा नजारा देख रहे थे | जब तक टी .टी . उस डिब्बे में चेकिंग करता रहा तब तक वह व्यक्ति टॉयलेट में छिपा रहा जब एक घंटे बाद वह टी .टी .चला गया तब वह व्यक्ति टॉयलेट से बाहर आया और वहीं जहाँ पहले बैठा था जाकर बैठ गया। अब जो सन्त जी उसके सामने बैठे थे। तो उन्होने उस व्यक्ति से पूछा कि भईया ये बताओ कि तुम इतनी देर के लिए कहा चले गए थे। तब उस व्यक्ति ने कहा कि सन्त जी आप से क्या झूठ बोलूँ मेरे पास टिकट नहीं थी तो उस टी .टी : से बचने के लिए मै टॉयलेट  मे छिपा रहा। तब सन्त ने फरमाया कि देखो भैया अगर तुम्हारे पास ट्रैन  की टिकट  होती तो तुम हमारी तरह निश्चित रहते और तुम्हे कोई कुछ नहीं कह सकता। लेकिन तुम्हारे पास टिकट  नहीं थी तो तुम्हे अशान्त रहना पड़ा, गन्दगी मे बैठना पड़ा। ऐसे ही इन्सान जब इस शरीर का त्याग कर यहाँ से जाता है तो अगर उसके पास सच्चे नाम की टिकट हो तब वह निश्चित रहता है नहीं तो वहाँ भी उसे गन्दगी में, नरक में रहना पड़ता है। तो कहने का मतलब यही है कि इन्सान यहाँ के लिए धन दौलत जोड़ता है। लेकिन परलोक के लिए भी उसे सच्चे नाम की पूंजी जोड़ने की आवश्यकता है | अच्छे कर्म ही इन्सान के, उसके लोक और परलोक में सहायक रहते है।

जन्म जाय जो भक्ति में, सो ही सफल कहाहिं।

भक्ति बिना मानुष जन्म, कहो किस लेखे माहिं।।

जो जन्म इन्सान का मालिक की याद मे जाता है वही उसका लेखे लगता, सफल कहलाता है। अन्त में आप सबसे यहीं कहना चाहता हूँ कि भगवान ने इन्सान को इतना सुन्दर शरीर दिया है, विवेक दिया है, बुद्धि दी है। अब इन्सान कभी अकेले मे बैठ कर विचार करे वाकई में मेरा असली काम क्या है? क्या  खाना, पीना, सोना ही मेरा असलीकाम है? नहीं खाना,पीना, सोना तो पशु भी करते है अगर हम भीं संसार में रहकर यहीं करते है तो पशुओं और हमारे में अन्तर क्या है? या इसलिए जीते है कि अच्छा खाने को मिले,अच्छा रहने को मिले तो| अब आप खुद विचार करो कि इन्सान दाल रोटी खाले या कुछ और अच्छे व्यज॑नर खाले तो खाने के बाद तो किसी को पता नहीं क्या खाया पेट तो भर ही जाता

है | वो चाहे सादे पदार्थ से भरा  हो या अच्छे व्यंजनों से। ऐसे हीं इन्सान अच्छे से अच्छे बने बिस्तर पर सो जाए या फिर जमीन पर सोने के बाद तो किसी को कुछ नहीं पता कहा सो रहा है। तो कहने का मतलब यहीं है कि भगवानने (इन्सान का शरीर) हमारी आत्मा को एक गिफ्ट दिया है जिससे ही हम कुछ अच्छा काम करे। लोगों की सेवा करे, भगवान की भक्ति करें यही जीव की असली खुशी का रास्ता है चाहे तो वह चन्दन कीं तरह महक ले या फिर सडे-गले पदार्थों की तरह अपनी दुर्गन्ध से दूसरो को भी हानि पहुँचाए। ये तो इन्सान को खुद विचार करना है कि क्या चीज उसको आन्तरिक खुशी प्रदान करती है और किन वस्तुओ से उसको दुख: प्राप्त होता है इसलिए इन्सान को अगर सच्चे सुख की तलाश है तो वह मालिक के नाम का सहारा ले जो कि सच्चा सुख देने वाला है। अपना नाता जो है मालिक के पावन श्री चरणों से जोड़े जोकि हमारा सच्चा नाता है। भगवान ही इन्सान के सच्चे मीत हैं जोकि हमेशा जीव की रक्षा करते हैं उसे असली सुख प्रदान करते हैं। उसे भक्ति की सच्ची दात से मालोमाल करते हैं।

जग की आशा छोडकर, जो राखे प्रभु आस ।

तिस सौभागी जीव के, सब कारज हो रास ।।

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